अध्याय नौ
मदीना: इस्लाम से पहले
मक्का—मदीना के समाज का फ़र्क़
मदीना, अर्थात यसरब को अल्लाह ने अपने रसूल सल्ल० की हिजरत का घर, इस्लाम की दावत का असल केन्द्र तथा इस्लाम के अभ्युदय के बाद पहले इस्लामी समाज का पालना बनाया। इस शहर के महत्व को समझने के लिए हमें इस्लाम से पहले यहां रहने वाले लोगों की सामाजिक, आर्थिक, सामरिक दशा तथा उनके जीवन-स्तर का अध्ययन करना होगा। उस समय मदीना में विभिन्न धर्म और संस्कृति के लोग रहते थे, जबकि मक्का में एक रंग, एक धर्म के लोग रहते थे।
यहूद
यहूद अरब प्रायद्वीप और फिर मदीना में पहली सदी ई० में आए। मशहूर यहूदी विद्वान डॉ० इसराईल वेलफ़ेन्सन ने अपनी किताब “तारीख़ुल यहूद फ़ी बिलादिल अरब” में लिखा है:
“सन 70 ई० में जब यहूदियों तथा रोमियों के बीच लड़ाई की वजह से फ़िलस्तीन और जेरुशलम बर्बाद हो गए तो यहूद दुनिया के विभिन्न इलाक़ों में बिखर गए। उसी वक़्त यहूद की बहुत-सी टोलियां अरब आईं, जैसा कि यहूदी इतिहासकार जोज़ीफ़स का कहना है, जो ख़ुद भी इस लड़ाई में शामिल था और कई मौक़ों पर उसने यहूदी टुकड़ियों का नेतृत्व भी किया। अरबी स्रोत भी इसका समर्थन करते हैं।”
यहूदी क़बीले और उनकी आपसी रंजिश
मदीना में यहूद के तीन क़बीले आबाद थे:
- क़ैनुक़ा, जिनमें लड़ने वाले सात सौ जवान थे;
- नज़ीर, इसमें भी लड़ने वाले सात सौ जवान थे;
- क़ुरैज़ा, जिसमें लड़ने वाले जवानों की संख्या सात से नौ सौ के बीच थी।
इस तरह कुल मिलाकर इनमें बालिग़ों की संख्या 2 हज़ार से अधिक थी।1 इन क़बीलों के आपस में सम्बन्ध अच्छे न थे और कभी-कभी लड़ाइयां भी होती थीं। डॉ० वेलफ़ेन्सन लिखते हैं:
“बनी क़ैनुक़ा और बाक़ी यहूद में दुश्मनी चली आती थी, जिसकी वजह यह थी कि बनी क़ैनुक़ा बनी ख़ज़रज के साथ बुआस की लड़ाई में शामिल थे, और नज़ीर व बनी क़ुरैज़ा ने बनी क़ैनुक़ा को बहुत बेरहमी से मारा-काटा था और उनमें बुरी तरह फूट डाली थी। यद्यपि उन्होंने क़ैद किए गए सभी यहूद का फ़िदया2 (Blood Wit) अदा कर दिया था, तो भी बुआस की लड़ाई के बाद यहूदी क़बीलों में आपसी रंजिश चली आ रही थी। जब क़ैनुक़ा तथा अन्सार के बीच लड़ाई हुई, तो अन्सार के मुक़ाबले उनका किसी यहूदी ने भी साथ न दिया।”
क़ुरआन ने भी यहूद की आपसी रंजिश की तरफ़ इशारा किया है:
बस्तियां और क़िले
यहूदी मदीना की विभिन्न बस्तियों में रहते थे, जो उन्हीं के लिए निर्धारित थीं। बनू क़ैनुक़ा को जब बनू क़ुरैज़ा और बनू नज़ीर ने मदीना की उपनगरी से भगाया, तो वह शहर के अन्दर एक ख़ास मोहल्ले में रहने लगे। बनू नज़ीर मदीना से दो-तीन मील की दूरी पर बुतहान की घाटी की तरफ़ एक ऊंचे हिस्से में रहते थे, जो खजूरों और खेतों से मालामाल था। बनू क़ुरैज़ा मदीना के दक्षिण में कुछ मील की दूरी पर महज़ूर के इलाक़े में रहते थे।
यहूद की बस्तियों में क़िले तथा मज़बूत इमारतें बनी हुई थीं। यद्यपि उन्हें यहूदी हुकूमत बनाने का मौक़ा नहीं मिला, हालांकि वह क़बीले के सरदारों की निगरानी में आराम से रहते थे। इस तरह वह बद्दुओं के हमले से बचे रहते थे और हर यहूदी किसी न किसी अरब सरदार के संरक्षण में रहता था।
धार्मिक पक्ष
यहूदी अपने को एक निश्चित धर्म और आसमानी शरीअत का अधिकारी समझते थे। उनके अपने मदरसे थे, जिसे वह मिद्रास कहते थे, और जहां वह अपने धार्मिक तथा सांसारिक मामले, इतिहास तथा अपने नबियों के हालात पढ़ते-पढ़ाते थे और विचार-विमर्श करते थे। उनकी अपनी विशिष्ट इबादतगाहें थीं, जहां वह इबादत करते और मिल-बैठकर विचार करते। उनके धर्म की आचार-संहिता का कुछ अंश उनकी धर्म की किताबों से लिया था, तथा कुछ उनके पुरोहितों और धर्माधिकारियों (Rabbis) ने अपनी तरफ़ से बना लिए थे। वह अपनी ईदें अलग मनाते थे। कुछ ख़ास दिनों, जैसे आशूरा3 के दिन, रोज़ा रखते थे।
अर्थव्यवस्था
दूसरी क़ौमों से उनका अधिकांश आर्थिक लेन-देन गिरवी और ब्याज पर आधारित था। मदीना के खेतिहर इलाक़े में इसके लिए अनुकूल माहौल हासिल था। गिरवी रखने का बंदोबस्त माल तक सीमित न था। मजबूरी की हालत में औरतें और बच्चे भी गिरवी रख दिए जाते थे। अतएव कअब बिन अल-अशरफ़ के क़त्ल के सम्बन्ध में इमाम बुख़ारी लिखते हैं:
“मुहम्मद बिन मस्लमा रज़ि० ने कअब से कहा कि हम चाहते हैं कि तुम एक वसक़ या दो वसक़ (एक ऊंट या दो ऊंट) ग़ल्ला हमें क़र्ज़ दो। उसने कहा, शर्त यह है कि तुम मेरे पास कुछ गिरवी रखो। उन्होंने पूछा कि तुम क्या चीज़ चाहते हो? कअब ने कहा कि तुम मेरे पास अपनी औरतों को गिरवी रख दो। उन्होंने कहा कि हम अपनी औरतों को कैसे तुम्हारे पास गिरवी रख दें, जबकि तुम अरबों में सबसे अच्छे व ख़ूबसूरत इन्सान हो। उसने कहा, तब अपने बेटों को गिरवी रख दो। इस पर उन्होंने कहा कि हम तुम्हारे पास अपने बेटों को कैसे रख दें कि आगे उन्हें ताना दिया जाए कि वह एक या दो वसक़ के बदले गिरवी रखे गए थे। यह हमारे लिए बड़ी शर्म की बात होगी। हम तुम्हारे पास हथियार गिरवी रख सकते हैं।”
गिरवी रखने की इस व्यवस्था में गिरवी रखने वालों तथा जिसके पास गिरवी रखा जाए, दोनों के बीच अच्छे सम्बन्धों का बाक़ी न रह जाना एक स्वाभाविक बात है। धीरे-धीरे मदीना की अर्थव्यवस्था पर यहूदियों का एकाधिकार हो गया और वह मनमानी करने लगे। चोरबाज़ारी और भण्डारण बढ़ने लगा। इन वजहों से मदीना की जनता आम तौर पर उनकी धांधली से नफ़रत करने लगी थी, क्योंकि अरब ऐसी हरकतों से दूर रहते हैं।
यहूदियों की विस्तारवादी नीति तथा लोलुपता का इशारा हमें De Lacy O’Leary की किताब Arabia Before Muhammad में मिलता है। वह लिखते हैं:
“इन बद्दुओं4 तथा नई बस्तियों में रहने वाले यहूदियों के बीच सातवीं सदी ई० में सम्बन्ध बहुत ख़राब हो गए थे, क्योंकि यहूदियों ने अपनी खेती के इलाक़े इन बद्दुओं की चारागाहों तक बढ़ा लिए थे।”
औस व ख़ज़रज (मदीना के अरब निवासी) तथा यहूदियों के सम्बन्ध निजी लाभ और शोषण पर निर्भर थे। यहूद इन दोनों क़बीलों को लड़ाने पर भी अपने लाभ के लिए बहुत ख़र्च करते थे, जिसके फलस्वरूप यह दोनों क़बीले बर्बाद हो रहे थे। यहूद का एकमात्र मक़सद यह रहता था कि मदीना की अर्थव्यवस्था पर उनका क़ब्ज़ा बना रहे।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक पक्ष
अरब के यहूद की भाषा स्वाभाविक रूप से “अरबी” ही थी, लेकिन वह कुछ ‘इबरानी’ युक्त हो गई थी। उन्होंने इबरानी भाषा को पूरी तरह छोड़ा नहीं था। वह अपनी इबादतों और शिक्षा कार्यों में उसका प्रयोग करते थे। यहूद के धार्मिक पक्ष के बारे में डॉ० इसराईल वेलफ़ेन्सन ने अपनी किताब में लिखा है:
“इसमें कोई शक नहीं कि यहूदियों को अरब में अपनी धार्मिक सत्ता को फैलाने के साधन मौजूद थे और वह अगर चाहते तो प्राप्त एकाधिकार से कहीं अधिक विस्तार कर सकते थे, लेकिन यहूदियों का इतिहास जानने वाला हर व्यक्ति जानता है कि यहूदियों ने दूसरी क़ौमों को अपना दीन स्वीकार करने पर कभी आमादा (तैयार) नहीं किया और कुछ वजहों से धर्म का प्रचार यहूदियों के लिए मना रहा है।”
लेकिन यह तय है कि औस व ख़ज़रज तथा अन्य अरब क़बीलों से सम्बन्ध रखने वाले अनेक व्यक्तियों ने यहूदी धर्म अपनी इच्छा से, रिश्तेदारी या यहूदी माहौल में पालन-पोषण की वजह से अपना लिया था। अरब के यहूद में सब प्रकार पाए जाते थे। मशहूर यहूदी व्यापारी और शायर “कअब बिन अल-अशरफ़” क़बीला “तय” का एक व्यक्ति था। उसके बाप ने नज़ीर में शादी की थी। इस तरह कअब का पालन-पोषण एक यहूदी के रूप में हुआ। इब्ने हिशाम लिखते हैं: “उसका वंशज क़बीला ‘तय’ फिर ‘बनी नबहान’ से था। उसकी मां बनी नज़ीर से थी।”
अरबों में एक रस्म यह थी कि जिसका लड़का जीवित न रहता था वह नज़र मानता था कि अगर वह जीवित रहा तो उसको यहूदियों के सुपुर्द कर देगा कि वह उसे अपने में शामिल कर लें। इस तरह अनेक अरब यूं भी यहूदी बन गए। “सुनन अबू दाऊद” में है कि:
“जिस औरत का बच्चा ज़िन्दा न रहता था वह नज़र मानती थी कि अगर बच्चा ज़िन्दा रहा तो इसे यहूदी बना देगी। अतः जब बनू नज़ीर को देश-निकाला हुआ तो उनमें से अन्सार के लड़के भी थे। इसलिए वह कहने लगे कि हम अपने बेटों को नहीं छोड़ेंगे। इस पर यह आयत उतरी:”
औस व ख़ज़रज
औस ख़ज़रज का वंश यमन के ‘अज़्द’ क़बीला से है, जहां से यसरब की तरफ़ हिजरत की लहरें समय-समय पर उठती रहीं। इसके कई कारण थे: यमन का अशान्त वातावरण, हब्शा का हमला, मआरिब बांध के टूट जाने से सिंचाई व्यवस्था में व्यवधान आदि। इस तरह औस व ख़ज़रज मदीना में, यहूदियों के बाद आए।5
बस्तियां और क़बीले
औस मदीना के दक्षिण-पूर्व में आबाद हुए, जो ‘अवाली’ का इलाक़ा कहलाता है। ख़ज़रज मध्य तथा उत्तरी इलाक़े में आबाद हुए, जो मदीना का निचला भाग है, इसके बाद पश्चिम में ‘हर्रतुल वबरा’ तक और कुछ नहीं है।
ख़ज़रज में चार क़बीले शामिल थे: 1—मालिक, 2—अदी, 3—माज़िन, 4—दीनार। यह सबके सब बनू नज्जार से सम्बन्ध रखते थे, जिन्हें ‘तैमुल्लात’ कहा जाता है। बनू नज्जार के क़बीले मदीना के उस बीच के हिस्से में आबाद हुए जहां इस समय ‘मस्जिदे नबवी’ सल्ल० मौजूद है। औस मदीना के उपजाऊ खेतिहर इलाक़ों में आबाद हुए तथा यहूद के बड़े क़बीलों के पड़ोसी बने। ख़ज़रज जहां ठहरे वह अधिक हरा-भरा इलाक़ा न था; उनका सिर्फ़ एक बड़ा यहूदी क़बीला क़ैनुक़ा ही पड़ोसी था।
औस व ख़ज़रज के व्यक्तियों की निश्चित संख्या मालूम करना कठिन है, लेकिन समकालीन परिस्थितियों तथा उनकी फ़ौजी ताक़त से इसका अनुमान लगाया जा सकता है। मक्का की विजय के दिन उनके लड़ने वालों की संख्या 4 हज़ार थी।
आपसी लड़ाइयां और यहूदियों की साज़िशें
हिजरत के समय मदीना की सत्ता अरबों के ही हाथों में थी। यहूद के क़बीलों में फूट थी और वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के मुक़ाबले में संगठित न थे। उनके कुछ क़बीले औस के साथ संधि किए हुए थे और कुछ ख़ज़रज के साथ। लड़ाई के समय वह अरबों की अपेक्षा यहूदियों से अधिक सख़्ती करते थे। क़ैनुक़ा, बनी नज़ीर, बनी क़ुरैज़ा की आपस की अनबन के फलस्वरूप अपने खेत छोड़कर उद्योग-धन्धे में लगने पर मजबूर हुए थे।
इसी तरह औस व ख़ज़रज में भी बहुत-सी लड़ाइयां हुईं। इस कड़ी में पहली लड़ाई ‘सुमैर’ थी और आख़िरी ‘बुआस’ की थी, जो हिजरत से पांच साल पहले हुई थी। यहूद, औस और ख़ज़रज को आपस में लड़ाने की साज़िशें करते, और फूट डालते। उनका मक़सद था कि अरब उनकी तरफ़ से ग़ाफ़िल (बेफ़िक्र) रहें। अरब इस बात को महसूस करते थे, इसलिए अरब उन्हें ‘लोमड़ी’ के नाम से याद करते थे।
इस कड़ी में इब्ने हिशाम ने इब्ने इस्हाक़ के हवाले से जो कुछ लिखा है, उससे इस पर रोशनी पड़ती है। वह लिखते हैं: एक बार एक वरिष्ठ यहूदी ‘शास बिन क़ैस’ ने एक जगह औस व ख़ज़रज को इस्लाम लाने के बाद एक सभा में बैठे आनन्द से बातें करते हुए सुना। उसे यह देखकर बड़ा दुख हुआ। उसने एक यहूदी नवयुवक को, जिसके अन्सार से सम्बन्ध थे, इशारा किया कि वह इस बैठक में शामिल हो जाए, फिर किसी बहाने बुआस और उससे पहले की लड़ाइयों का ज़िक्र छेड़ दे और उन मौक़ों पर कहे हुए शेर पढ़े, ताकि दोनों क़बीलों के ज़ख़्म ताज़ा हो जाएं और उनमें आपस में ठन जाए।
इस साज़िश से दोनों क़बीलों में ठन गई, वह भड़क उठे। क़रीब था कि तलवारें म्यानों से निकल आएं कि अल्लाह के रसूल सल्ल० मुहाजिरों के साथ आए और आपने अपने इरशाद से उनके ईमान की चिनगारी को दहकाया और उनकी धार्मिक भावना को जगाया। औस व ख़ज़रज के लोगों को अपनी भूल का एहसास हो गया, उनकी आंखों से आंसू बह निकले। वह आपस में गले मिले और ऐसा लगा मानो कुछ हुआ ही न था।
प्राकृतिक व भौगोलिक दशा
हिजरत के समय यसरब विभिन्न भागों में बंटा हुआ था, जिनमें यहूदी और अरब क़बीले रहते थे। हर इलाक़ा किसी न किसी के हिस्से में था। इन इलाक़ों की दो क़िस्में थीं: 1—खेतिहर भूमि तथा आबादी, 2—वह इलाक़े जिनमें गढ़ियां थीं; इन्हें ‘आताम’ कहा जाता था, यह क़िलाबन्द मोहल्ले थे। यहूद के इन ‘आताम’ की कुल संख्या 59 थी।
आताम: क़िलेबन्द गढ़ियां
डॉ० वेलफ़ेन्सन के अनुसार:
“यसरब में ‘आताम’ (गढ़ियों) का बड़ा महत्व था, जहां दुश्मन के हमले के समय क़बीले के लोग पनाह लेते थे और ख़ास तौर पर औरतों, बच्चों और विकलांग लोगों को उस वक़्त ठिकाना मिलता था जब मर्द लड़ने के लिए चले जाते थे। यह गढ़ियां गोदाम के तौर पर भी इस्तेमाल होती थीं, जिनमें ग़ल्ले और फल रखे जाते थे, क्योंकि वह खुली जगहों पर लूट ली जा सकती थीं। इसके अलावा इनमें माल व हथियार भी रखे जाते थे। यह दस्तूर था कि सामान से लदे हुए व्यापारिक क़ाफ़िले गढ़ियों के क़रीब ही उतरते थे और इन्हीं गढ़ियों के दरवाज़ों पर बाज़ार भी लगता था।
समझा जाता है कि इन गढ़ियों में इबादतगाहें और ‘मदारिस’ (यहूदी पाठशालाएं) भी होते थे, क्योंकि जो क़ीमती माल पर्याप्त मात्रा में वहां रहता था उससे इसी बात का पता चलता है। वहां दीनी किताबें भी रहती थीं। विचार-विमर्श के लिए वहां यहूदी सरदार जमा होते, जहां वह किसी अहम मुद्दे पर फ़ैसला या किसी समझौते के समय पवित्र ग्रंथों की क़समें खाते थे।”
“इबरानी भाषा में ‘आताम’ का अर्थ बन्द कर देने के होंगे। दीवारों के साथ जब यह शब्द आता है तो उसका अर्थ उन खिड़कियों से है जो बाहर से बन्द लेकिन अन्दर से खोली जा सकती हैं। इसका प्रयोग चहारदीवारी या विशाल सुरक्षात्मक दीवार के लिए भी होता था। इस तरह हम मान सकते हैं कि यहूद ‘आताम’ को छोटे क़िले के अर्थ में प्रयोग करते थे। इनमें बाहर से रोशनदान होते थे जो बाहर से बन्द और अन्दर से खोले जाते थे।”
यसरब इनके मोहल्लों और क़िलाबन्दियों का नाम था, जो वस्तुतः क़रीब-क़रीब की बस्तियों का एक झुरमुट था, जिनसे शहर बन गया था। क़ुरआन पाक में इसकी तरफ़ इशारा इस तरह आया है:
दूसरी जगह आया है:
हर्रे: मदीना की क़ुदरती क़िलेबन्दी
मदीना की भौतिक रचना में लावा की चट्टानों का बड़ा महत्व है, जिन्हें यहां ‘हर्रा’ कहते हैं। हर्रा वह लावा पदार्थ है जो ज्वालामुखी के फूटने के समय उससे निकलकर ठण्डा होने के बाद आड़े-तिरछे और नोकीले कठोर, काले पत्थरों के रूप में मीलों तक जमा हो जाता है। इन पर न पैदल चलना आसान है और न ऊंटों और घोड़ों का गुज़रना।
मदीना के दो हर्रे मशहूर हैं। एक पश्चिम में है, जिसे ‘हर्रतुल वबरा’ कहते हैं, दूसरा पूरब में है, जिसे ‘हर्र-ए-वाक़िम’ कहते हैं। मज्दुद्दीन फ़ीरोज़ाबादी ने अपनी किताब में अनेक हर्रों का विवरण दिया है जो मदीना के आस-पास फैले हुए हैं। हर्रतुल वबरा और हर्र-ए-वाक़िम ने मिलकर मदीना को एक क़िलाबन्द शहर बना दिया है, जिस पर सिर्फ़ उत्तर की तरफ़ से हमला किया जा सकता है, और यही वह दिशा है जहां अहज़ाब की लड़ाई में ख़न्दक़ खोदकर इसे सुरक्षित कर दिया गया था। दक्षिण में घने नख़लिस्तान और घनी आबादी है। इस तरफ़ से भी बाहरी हमला एक कठिन काम है। इस तरह मदीना एक क़ुदरती गढ़ है, जिसका प्राचीन समय में बड़ा सामरिक महत्व था।
मदीना के पूर्व में स्थित हर्र-ए-वाक़िम, हर्रतुल वबरा से अधिक आबाद था। जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ने यसरब की हिजरत की, उस समय हर्र-ए-वाक़िम में यहूदियों के प्रमुख क़बीले रहते थे, जैसे बनू नज़ीर, बनू क़ुरैज़ा आदि। उनके साथ औस की प्रमुख शाखाएं बनू अब्दुल अशहल, बनू ज़फ़र, बनू मुआविया, बनू हारिसा भी वहीं रहते थे। बनी अल-अशहल के इलाक़े में एक मोहल्ले का नाम वाक़िम था, जिसके नाम पर हर्र-ए-वाक़िम का नाम पड़ा।
धार्मिक और सामाजिक दशा
बुतपरस्ती
मदीना की अरब आबादी अधिकांश मामलों में क़ुरैश ही के अधीन रहती थी। मदीना वासी क़ुरैश को ‘काबा का मुतवल्ली’ (संरक्षक), धार्मिक पथ-प्रदर्शन तथा विश्वास एवं व्यवहार में अनुकरणीय समझते थे। वह अरब प्रायद्वीप में फैली हुई बुतपरस्ती के अधीन तो थे ही, लेकिन विशेषकर उन्हीं बुतों को पूजते थे जिन्हें क़ुरैश और हिजाज़ वासी पूजते थे, सिर्फ़ क़बीलों के कुछ एक क्षेत्रीय बुतों को छोड़कर।
मनात मदीना वासियों का सबसे प्यारा व पुराना बुत था। औस व ख़ज़रज इसको अत्यन्त पवित्र समझते थे और इसे अल्लाह के शरीक ठहराते थे। यह बुत क़ुदैद पर्वत के सामने “मुशल्लल” पर स्थापित था, जो मक्का और मदीना के बीच, समुद्र-तट की तरफ़ एक जगह है। ‘लात’ ताइफ़ वासियों का प्यारा बुत था। ‘उज़्ज़ा’ मक्का वालों का क़ौमी बुत था, इसलिए इन शहरों के लोग अपने-अपने इन बुतों से भावनात्मक सम्बन्ध रखते थे। मदीना वासियों में से जो कोई लकड़ी या किसी चीज़ का बुत अपने घर में रखता, तो उसे ‘मनात’ ही के नाम से पुकारता, जैसा कि बनी सलिमा के सरदार अम्र बिन अल-जमूह ने इस्लाम लाने से पहले बना रखा था।
इमाम अहमद रह० ने हज़रत आइशा रज़ि० के हवाले से “इन्नस्सफ़ा वल मरवता मिन शआइरिल्लाह” के सार में नक़ल किया है कि उन्होंने फ़रमाया: “अन्सार इस्लाम लाने से पहले मनात के नाम पर तल्बिया (लब्बैक, अर्थात मैं हाज़िर हूं) पढ़ते थे और जिसकी वह मुशल्लल के पास पूजा करते थे, और उसके नाम पर हज शुरू करने वाला सफ़ा व मरवा की ‘सई’6 को सही नहीं समझता था। जब लोगों ने अल्लाह के रसूल सल्ल० से इस बारे में पूछते हुए कहा कि या रसूलल्लाह! हम अज्ञानता के युग में सफ़ा व मरवा के तवाफ़ (परिक्रमा) में हर्ज समझते थे, तो अल्लाह पाक ने यह आयत नाज़िल की:”
हम मदीना में किसी और बुत के बारे में नहीं जानते कि वह ‘लात’, ‘मनात’ या ‘उज़्ज़ा’ व ‘हुबल’ की तरह मशहूर हुआ हो और लोग उसकी इबादत करते और उसके लिए मदीना से बाहर से आते हों। कुछ ऐसा लगता है कि मक्का की तरह मदीना में बुतों की बाहुल्यता न थी, क्योंकि मक्का के हर घर में एक ख़ास बुत होता था। मक्का में बुतों को लोग फेरी में बेचने के लिए निकलते थे। मक्का बुतपरस्ती में मदीना से आगे था।
त्योहार
मदीना वासी साल के दो दिनों में खेल-कूद का त्योहार मनाते थे। अल्लाह के रसूल सल्ल० जब मदीना पहुंचे तो आपने मदीना वासियों से फ़रमाया: “अल्लाह पाक ने तुम्हें इन दो दिनों से बेहतर ईद और बक़रीद के दिन अता किए हैं।” हदीस के कुछ विद्वानों ने इन दो दिनों के बारे में बताया कि वह नौरोज़ और मेहरजान के दिन थे, जिन्हें शायद उन लोगों ने ईरान वासियों से लिया था।
औस और ख़ज़रज की कुलीनता
औस व ख़ज़रज की कुलीनता को क़ुरैश भी मानते थे। उनका वंश ‘क़हतान’ की शाखा से था, जिसमें क़ुरैश शादी-विवाह भी करते थे। हाशिम बिन अब्द मनाफ़ ने सलमा बिन्त अम्र बिन ज़ैद से शादी की थी, जो बनी अदी बिन अल-नज्जार से थीं, जो ख़ज़रज की एक शाखा है। इसके बावजूद क़ुरैश अपने को मदीने के अरब क़बीलों से बेहतर समझते थे।
बद्र की लड़ाई के दिन जब उत्बा बिन रबीआ, शैबा बिन रबीआ और वलीद बिन उत्बा ने मुसलमानों को ललकारा, तो अन्सार के कुछ नौजवान निकले। उनसे उन्होंने पूछा: “तुम कौन हो?” जवाब मिला: “हम अन्सार हैं।” इस पर उन्होंने कहा: “हमें तुमसे मतलब नहीं।” फिर उनमें से एक आदमी ने आवाज़ दी: “ऐ मुहम्मद! (सल्ल०) हमारे मुक़ाबले पर हमारे बराबर लोग भेजिए।” इस पर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया: “उबैदा बिन अल-हारिस! तुम बढ़ो, हमज़ा! तुम बढ़ो, अली! तुम खड़े हो।” जब यह लोग उनके निकट गए और अपने नाम बताए, तो क़ुरैश ने कहा: “हां, यह शरीफ़ हमारी जोड़ के हैं।”
इसका कारण यह है कि क़ुरैश खेती के पेशे को (जिसके मदीना वासी आदी थे) गिरी निगाह से देखते थे। इसका इशारा अबू जहल के उस वाक्य में भी मिलता है जो उसने आख़िरी वक़्त अब्दुल्लाह बिन मसऊद से कहा था: “काश एक किसान के अलावा किसी ने मुझे क़त्ल किया होता।”
आर्थिक दशा एवं नागरिक जीवन
खेती और बाग़बानी
मदीना एक खेतिहर इलाक़ा था, इसलिए मदीना वासी अधिकतर खेती और बाग़बानी7 पर निर्भर थे। वहां की मुख्य पैदावार खजूर तथा अंगूर थे। खेतों में खाद्यान्न तथा सब्ज़ियां पैदा की जाती थीं। अकाल और सूखे के समय लोगों की अधिकतर ज़रूरत खजूरों से पूरी होती थी। खजूर का मदीना वासियों के जीवन में बड़ा महत्व था।8 खाद्यान्न के अलावा वे उससे उद्योग का कच्चा माल, ईंधन तथा निर्माण कार्य के लिए लकड़ी और जानवरों की खाद्य सामग्री प्राप्त करते हैं।
मदीना में खजूरों के इतने प्रकार थे कि उनकी गिनती करना भी कठिन है। मदीना वासियों को खजूर उत्पादन का दीर्घकालीन अनुभव था और वह खजूर की उन्नतिशील क़िस्में पैदा करते थे।
यहां की मिट्टी लावा पदार्थ से बनी थी, अतः बहुत उपजाऊ थी। यहां की घाटियों में बाढ़ का पानी फैल जाता था और खेतों तथा बग़ीचों की सिंचाई इस तरह ख़ुद हो जाती थी। अक़ीक़ की घाटी बहुत मशहूर थी, जो मदीना वासियों के लिए मनोरंजन का केन्द्र थी। यहां पानी बहुत मात्रा में था और बाग़ अधिक थे। मदीने में कुएं भी आसानी से खोदे जा सकते थे। बाग़ों में आम तौर पर कुएं होते थे। बाग़ के चारों तरफ़ चारदीवारी होती थी; ऐसे बाग़ को वहां ‘हाइत’ कहते थे। मदीना के बहुत-से कुएं अपने पानी की मिठास और पर्याप्त मात्रा के लिए मशहूर थे। वहां नहरों और रहट का बंदोबस्त भी था, जिससे वह अपने बाग़ों की सिंचाई करते थे।
जौ तथा उसके बाद गेहूं प्रमुख खाद्यान्न थे। सब्ज़ियां ख़ूब पैदा होती थीं। खेती के मामलों की कई क़िस्में थीं, जैसे ‘मुज़ाबना’, ‘मुहाक़ला’, ‘मुख़ाबरा’, ‘मुआवमा’।9 इनमें से कुछ को इस्लाम ने बाक़ी रखा और कुछ को मना कर दिया या उसमें सुधार कर दिया।
व्यापार और उद्योग
मदीना में व्यापार भी होता था, लेकिन उतने बड़े पैमाने पर नहीं जितना कि मक्का में था, क्योंकि मक्का वासियों का मुख्य व्यवसाय पानी की कमी के कारण व्यापार करना, जिसके लिए उन्हें लम्बे-लम्बे सफ़र करने पड़ते थे।
मदीना के कुछ उद्योग यहूदियों से ही जुड़े थे, जिन्हें वे सम्भवतः यमन से लाए थे। क़ैनुक़ा के लोग प्रायः सोने-चांदी का कारोबार करते थे। यहूद मदीना में सबसे अधिक मालदार थे, उनके घर माल व दौलत तथा सोने-चांदी से भरे हुए थे।
सिक्के और नाप-तौल
मक्का और मदीना में एक ही तरह के सिक्के चलन में थे, जिनका वर्णन विस्तार के साथ पहले मक्का के अध्याय में आ चुका है। मक्का वालों की अपेक्षा मदीना वासियों को नाप-तौल के पैमानों की अधिक ज़रूरत पड़ती थी, क्योंकि खाद्यान्न और फल उनकी असल पूंजी थी। मदीना में प्रयोग होने वाले पैमाने यह थे: मुद्द, साअ, फ़रक़, अरक़, वसक़; वज़न के पैमाने थे: दिरहम, शिक़ाक़, दानिक़, क़ीरात, नवात, रत्ल, क़िन्तार, औक़िया।
मदीना की मिट्टी उपजाऊ थी, लेकिन खाद्यान्न के मामले में वह आत्मनिर्भर न था। अतः वहां वाले बाहर से भी ग़ल्ला आयात करते थे। वह मैदा, घी और शहद शाम से लाते थे। तिरमिज़ी में आया है कि मदीना वासी खजूर और जौ खाते थे। अमीर लोग शाम से आने वाले “ज़ाफ़िता” (अर्थात शहरों तक सामग्री पहुंचाने वाला) से अपने लिए मैदा ख़रीद लेते थे, लेकिन परिवार के अन्य लोग खजूरें और जौ ही खाते थे।
यहूदियों का स्वभाव तथा उनका इतिहास हर जगह लगभग एक जैसा रहा है। यहूदी मदीना में भी अरबों से अधिक धनी थे। अरब स्वभाव से आड़े दिनों के बारे में अधिक सोचने के आदी न थे। वह मेहमान की सेवा तथा उदार प्रवृत्ति को अधिक महत्व देते थे। धन जमा करना उनकी आदत में न था। परिणामस्वरूप उन्हें यहूद से प्रायः क़र्ज़ लेना पड़ता था, जो अधिकतर सूदी या गिरवी होता था।
पशु, बाज़ार और रहन-सहन
मदीनावासियों के पास ऊंट, गायें और बकरियां भी थीं। सिंचाई काम के लिए भी ऊंट से काम लेते थे। इनके पास चरागाहें भी थीं, जिनमें ‘ज़ुग़ाबा’ और ‘ग़ाबा’ अधिक मशहूर थे। यहां से लोग लकड़ियां हासिल करते और यहां जानवरों को चराते थे। घोड़े जंग में प्रयोग में आते थे, यद्यपि मक्का की अपेक्षा मदीना में घोड़े कम पाए जाते थे। बनू सुलैम घोड़े के लिए मशहूर थे, जिन्हें वह बाहर से मांगते थे।
मदीना में कई बाज़ार भी थे, जिनमें सबसे मशहूर बनी क़ैनुक़ा का बाज़ार था। यह सोने-चांदी के ज़ेवरों तथा कपड़ों के लिए मशहूर था। उन दिनों मदीना में सूती और रेशमी कपड़े, रंगीन ग़लीचे तथा बेलबूटेदार पर्दे प्रायः पाए जाते थे। इत्र तथा कस्तूरी के बेचने वाले भी थे। इसी तरह अंबर और पारे के व्यापारी भी पाए जाते थे। ख़रीदने-बेचने के अनेक तरीक़ों में से कुछ को इस्लाम ने बाक़ी रखा और कुछ को रोक दिया। औस व ख़ज़रज के कुछ लोग भी सूदी कारोबार करने लगे थे, लेकिन यहूद की अपेक्षा बहुत कम।
मदीना के जन-जीवन में वहां के वासियों के सुरुचिपूर्ण स्वभाव के कारण ख़ासी तरक़्क़ी हो चली थी। दो मंज़िला मकान बनने लगे थे और कुछ मकानों के साथ साग-सब्ज़ी के बग़ीचे भी होते थे। मदीना वासी मीठे पानी के आदी थे, जिसे उन्हें कभी दूर से भी लाना पड़ता था। बैठने के लिए कुर्सी का प्रयोग भी होता था, शीशे और पत्थर के प्याले प्रयोग में आते थे। विभिन्न तरह के चिराग़ (दीपक) प्रयोग होते थे। घर और खेत के कामों में छोटी टोकरियां और बैग काम में लाए जाते थे। मालदारों, विशेषकर यहूद के घरों में पर्याप्त फ़र्नीचर पाया जाता था। तरह-तरह के ज़ेवर भी प्रयोग होते थे, जैसे कंगन, बाज़ूबन्द, पायल, कड़े, कान के बुन्दे और बालियां, अंगूठियां और सोने अथवा यमनी दानों के हार आदि।
औरतों में बुनने और कातने की आम प्रथा थी। मुख्य कुटीर उद्योग सिलाई, रंगाई, राजगीरी, ईंटा बनाना, पत्थर काटना था। हिजरत से पहले यह धन्धे मदीना में प्रचलित थे।
एक पेचीदा व विकासशील समाज
इस तरह यह बात साफ़ हो जाती है कि रसूलुल्लाह सल्ल० तथा मुहाजिरीन ने मक्का से यसरब नाम के किसी गांव की तरफ़ सफ़र नहीं किया था, बल्कि वह एक शहर से दूसरे शहर की तरफ़ आए थे। यद्यपि यह दूसरा शहर पहले शहर की अपेक्षा ज़िंदगी के अनेक मैदानों में भिन्न था और अपेक्षाकृत मक्का से कुछ छोटा भी था, लेकिन वहां का जन-जीवन मक्का की अपेक्षा अधिक पेचीदा था और अल्लाह के रसूल सल्ल० को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा वह नाना प्रकार की थीं।
क्योंकि वहां अनेक धर्म, जाति और संस्कृति के लोग रहते थे, जिन पर क़ाबू पाना और मदीना वासियों को एक आस्था और एक दीन के रंग में रंगने का कठिन काम अल्लाह का कोई ऐसा रसूल ही कर सकता था जिसे अल्लाह का समर्थन हासिल हो और जिसे अल्लाह ने सूझ-बूझ, दूरदृष्टि, निर्णय-शक्ति और इंसानियत के बिखरे हुए ढेर को जमा करने तथा परस्पर विरोधी शक्तियों व विचारधाराओं को सिसकती मानवता को फिर से पुख़्ता करने के काम में एक-दूसरे का पूरक और मददगार बनाने की अपार क्षमता प्रदान की थी, और जो एक मनमोहक व्यक्तित्व का मालिक था। क़ुरआन पाक में आता है:
टिप्पणियां
- 1यह अनुमान सीरत इब्ने हिशाम की संख्याओं आधारित है।
- 2इस्लामी शरीअत (आचार संहिता) में फ़िदया ऐसे बदल को कहते हैं जिसके द्वारा इंसान अपने आपको किसी ऐसी तकलीफ़ या नुक़सान से छुड़ाए और सुरक्षित करे जो उसके लिए अपरिहार्य बन चुका हो। इमाम राग़िब के अनुसार फ़िदया उस माल को कहते हैं जो इंसान अपनी इबादत में क़सूर अथवा कमी के लिए अदा करता है।
- 3मुहर्रम महीने की दसवीं तारीख़।
- 4औस व ख़ज़रज तथा दूसरे अरब क़बीलों की तरफ़ इशारा है, जो मदीना और उसके आसपास रहते थे।
- 5मशहूर ओरियन्टलिस्ट सेड्यू के अनुसार औस व ख़ज़रज ने सन 300 ई० में यसरब को अपना वतन बनाया और सन 492 ई० में उनका यसरब पर पूर्ण अधिकार हो गया।
- 6हज का एक अमल, जिसमें सफ़ा व मरवा पहाड़ियों के बीच हाजी तेज़ चलते हैं।
- 7हदीस से पता चलता है कि मदीना में ऐसे घने बाग़ भी थे कि गौरैया जैसी छोटी चिड़िया भी घुसकर निकल नहीं पाती थी। अबू तलहा अन्सारी के क़िस्से में है कि वह अपने बाग़ में नमाज़ पढ़ रहे थे कि एक गौरैया चिड़िया बाग़ से बाहर निकलने के लिए इधर-उधर उड़ने लगी, जिससे उनकी नमाज़ में ग़फ़लत हो गई, जिसकी वजह से उन्होंने उस बाग़ को सदक़ा (दान) कर दिया।
- 8खजूर के सम्बन्ध में अरबी में इतने अधिक शब्द पाए जाते हैं कि इसी से उसकी व्यापकता साफ़ हो जाती है।
- 9‘मुज़ाबना’ पेड़ में लगी हुई खजूरों को नक़द खजूरों से बेचने को कहते हैं। ‘मुहाक़ला’ ढेर में लगे हुए ग़ल्ले को नक़द ग़ल्ले, अर्थात जौ को जौ के बदले और गेहूं को गेहूं के बदले, तौलकर लेने को कहते हैं। ‘मुख़ाबरा’ ज़मीन की पैदावार की तिहाई या चौथाई पर मामला करने को कहते हैं। इसे ‘मुज़ारआ’ भी कहते हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि ‘मुज़ारआ’ में बीज मालिक के होते हैं और ‘मुख़ाबरा’ में बीज किसान के होते हैं। ‘मुआवमा’ कई साल के लिए फ़सलों को बेच देने को कहते हैं, जैसे पेड़ के फल दो-तीन साल के लिए बेच दिए जाते।