अध्याय चौबीस
हज्जतुल विदा (विदाई हज)
जब सब कुछ ठीक हो गया, उम्मत के लोग बुत पूजने की बुराइयों और जाहिलियत की आदतों से पाक और ईमान की दौलत से मालामाल हो गए, उनके दिल की सर्द अंगीठियों में जोश व उल्लास की चिंगारियां लहक उठीं, काबा भी बुतों की गंदगी से पाक हो गया, मुसलमानों के अन्दर हज का नया शौक़ पैदा हो गया, जुदाई की घड़ी भी बहुत क़रीब आ गई और हालात की मांग हुई कि उम्मत को विदा कहा जाए, तो अल्लाह पाक ने अपने नबी को हज की इजाज़त दी। इस्लाम में यह आप सल्ल० का पहला हज था।
इस हज का महत्व
आप मदीना से इस उद्देश्य से चले थे कि हज करेंगे, मुसलमानों से मिलेंगे, उनको दीन की शिक्षा देंगे और हज के मनासिक (हज सम्बन्धी काम) सिखाएंगे, हक़ की गवाही देंगे, अपना फ़र्ज़ अदा करेंगे, मुसलमानों को आख़िरी नसीहतें और वसीयतें करेंगे, उनसे वचन लेंगे और जाहिलियत (अज्ञानता) के रहे-सहे निशानों को मिटाएंगे। यह हज हज़ार प्रवचन तथा हज़ार पाठ के समान था। वास्तव में यह एक चलता-फिरता मदरसा, एक सचल मस्जिद और एक गश्ती छावनी थी, जहां जाहिल ज्ञान से सुसज्जित होता, ग़ाफ़िल अपनी ग़फ़लत से जागता, सुस्त व काहिल चुस्त व चालाक, और कमज़ोर बलवान बनता। चलते-फिरते हर समय रहमत की घटा उनके साथ होती। यह रहमत की घटा वास्तव में अल्लाह के रसूल सल्ल० का साथ, आपका प्रेम, आपकी शिक्षा-दीक्षा तथा आपका मार्गदर्शन था जो आपके साथ जाने वालों तथा आपके सम्पर्क में आने वाले लाखों लोगों को हासिल था, और जिसकी छाया में मानव जाति की क़िस्मत उजागर हो उठी।
एक ऐतिहासिक कीर्तिमान
अल्लाह के रसूल सल्ल० की इस तीर्थयात्रा के हर पहलू तथा बहुत ही छोटी-छोटी घटनाओं और बातों का आपके सच्चे साथियों सहाबा और न्यायप्रिय लेखकों व बयान करने वालों ने एक ऐसा रिकार्ड सुरक्षित कर दिया है जिसका उदाहरण हमें बादशाहों के सफ़रनामों में, सन्तों और विद्वानों की गाथाओं में कहीं नहीं मिलता।
विदाई हज पर एक निगाह
‘हज्जतुल विदा’ को ‘हज्जतुल बलाग़’ और ‘हज्जतुत्तमाम’ के नामों से याद किया जाता है। अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ इस सफ़र में एक लाख से अधिक सहाबी शामिल थे।1
आपने हज का इरादा फ़रमाया और लोगों को इसकी सूचना कर दी कि आप हज के लिए जाने वाले हैं। सूचना पाकर लोगों ने आपके साथ हज में जाने की तैयारियां शुरू कर दीं। इसकी ख़बर मदीना के आस-पास के इलाक़ों में भी पहुंची और लोगों के जत्थे मदीना पहुंचने लगे। रास्ते में इस क़ाफ़िले में इतनी बड़ी संख्या में लोग शामिल होते गए कि उनकी गिनती कठिन हो गई। लोगों का एक हुजूम था जो आगे-पीछे, दाएं-बाएं दूर तक आपको अपने घेरे में लिए था। आप मदीना से दिन में ज़ुहर की नमाज़ के बाद 25 ज़ीक़ादा, दिन शनिवार को रवाना हुए। पहले ज़ुहर की चार रकअत नमाज़ आपने अदा फ़रमाई। इससे पहले आपने लोगों को संबोधित किया, और इस सम्बोधन में एहराम के बारे में बयान फ़रमाया, फिर ‘तलबिया’2 कहते हुए रवाना हुए। भीड़ कभी इसे कम कर देती और कभी शौक़ में बढ़ा देती। आप इस पर उन्हें रोकते-टोकते न थे। तलबिया का सिलसिला आपने बराबर जारी रखा और ‘अरज’ पहुंचकर आपने वहां पड़ाव किया। आपकी और हज़रत अबू बक्र की सवारी एक थी। फिर आप आगे चले और ‘अल-अबवा’ पहुंचे, वहां से चलकर ‘उस्फ़ान की घाटी’ और ‘सरिफ़’ में पहुंचे। फिर वहां से चलकर ‘ज़ी-तुवा’ में पड़ाव किया और शनिवार की रात वहां गुज़ारी।
ज़िलहिज्जा की 4 तारीख़ थी। फ़ज्र की नमाज़ आपने यहीं अदा की। उसी दिन स्नान भी किया, और मक्का की तरफ़ रवाना हुए। मक्का में आपने ऊंचाई की तरफ़ से प्रवेश किया। लगभग 11 बजे दिन का समय था जब आपकी नज़र काबा पर पड़ी। नज़र पड़ते ही आपने फ़रमाया, “ऐ अल्लाह! अपने इस घर की इज़्ज़त व शरफ़ और रोब व हैबत में बढ़ोतरी कर।” आप हाथ उठाकर तकबीर कहते और इरशाद फ़रमाते, “ऐ अल्लाह! आप सलामती हैं, आप ही से सलामती का वजूद है। ऐ हमारे रब! हमको सलामती के साथ ज़िन्दा रख।”
जब आप हरम शरीफ़ में दाख़िल हुए तो सबसे पहले आप सल्ल० ने काबा का रुख़ किया। हज्र-ए-असवद3 का सामना हुआ तो आपने बेहिचक इसे चूम लिया। फिर तवाफ़ के लिए दाहिनी तरफ़ रुख़ किया। काबा आपके बाईं तरफ़ था। इस तवाफ़ के पहले तीन चक्कर में आप सल्ल० ने रमल4 किया।
आप तेज़ चल रहे थे, क़दमों का फ़ासला कम होता था। आपने अपनी चादर एक कंधे पर डाल ली थी और दूसरा कंधा खुला हुआ था। जब आप हज्र-ए-असवद के पास से गुज़रते तो उसकी तरफ़ इशारा करके अपनी छड़ी से ‘इस्तिलाम’5 करते। जब तवाफ़ पूरा हुआ तो मक़ाम-ए-इब्राहीम के पास आए और यह आयत पढ़ी, “उस जगह नमाज़ पढ़ो जहां इब्राहीम खड़े थे (नमाज़ के लिए)।” इसके बाद दो रकअत नमाज़ पढ़ी। नमाज़ पढ़ चुकने के बाद फिर हज्र-ए-असवद के पास गए और उसे चूमा, फिर सामने के दरवाज़े से “सफ़ा” और “मरवा” की तरफ़ चले। जब उसके क़रीब आए तो फ़रमाया, “‘सफ़ा’ और ‘मरवा’ अल्लाह की निशानियों में से हैं। मैं शुरू करता हूं उससे जिसे अल्लाह ने शुरू किया।”
फिर आप “सफ़ा” पर चढ़े, यहां तक कि काबा आपको नज़र आता रहा। फिर वहां से क़िबला-रुख़ होकर अल्लाह की बड़ाई इन शब्दों में बयान की:
“अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह यकता (अकेला) है, उसका कोई शरीक नहीं, उसी का सब मुल्क और बादशाही है और उसी के लिए सारी तारीफ़ है, और वह हर चीज़ पर क़ुदरत रखने वाला है। अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। उसने अपना वादा पूरा किया, अपने बन्दे की मदद फ़रमाई और तमाम गिरोहों को अकेले हराया।”
मक्का में आप शनिवार से बुधवार तक चार दिन ठहरे। जुमेरात को दिन निकलते ही आप सभी मुसलमानों के साथ ‘मिना’ आए। ज़ुहर और अस्र की नमाज़ें यहीं अदा कीं और रात भी यहीं गुज़ारी। यह जुमा (शुक्रवार) की रात थी। दूसरे दिन जब सूरज निकल आया तो आप ‘अरफ़ा’ (अरफ़ात) की तरफ़ रवाना हुए। आपने देखा कि ‘नमिरा’ में आपके लिए ख़ेमा लगाया जा चुका है। अतएव आप उसी में उतरे। जब दोपहर ढल गई तो आपने अपनी ऊंटनी ‘क़सवा’ को तैयार करने का हुक्म दिया और फिर वहां से चलकर अरफ़ात के मैदान के बीच में आपने पड़ाव किया और अपनी सवारी पर से ही एक शानदार ख़ुत्बा (सम्बोधन) दिया, जिसमें इस्लाम की बुनियादों को आपने साफ़ किया। इसमें आप सल्ल० ने उन सभी चीज़ों को हराम बताया जिनके हराम होने पर सभी धर्म एकमत हैं, जैसे नाहक़ ख़ून करना, माल हड़प लेना, बलात्कार, अवैध शारीरिक संबंध बनाना आदि। जाहिलियत की सभी बातों से आपने मना फ़रमाया। ब्याज कुल का कुल आपने ख़त्म कर दिया और उसे बिल्कुल ग़लत ठहराया। औरतों के साथ अच्छा बर्ताव करने की आपने नसीहत की और बताया कि दस्तूर के अनुसार खाना-कपड़ा उनका हक़ है।
आपने उम्मत को अल्लाह की किताब के साथ मज़बूती से जुड़े रहने की वसीयत की। आपने फ़रमाया, “जब तक तुम इसको अपने साथ जुड़ा हुआ रखोगे, गुमराह न होगे।” आपने उन्हें आगाह किया कि क़यामत के दिन उनसे आपके बारे में सवाल होगा और वह इसके जवाबदेह होंगे। यहां आपने मौजूद लोगों से पूछा कि वह आपके बारे में क्या कहेंगे और क्या गवाही देंगे। सबने एक आवाज़ होकर कहा, “हम गवाही देंगे कि आपने हक़ का पैग़ाम बिना किसी काट-छांट के पहुंचा दिया, अपना फ़र्ज़ पूरा किया और उपकार का हक़ अदा कर दिया।” यह सुनकर आपने आसमान की तरफ़ उंगली उठाई और तीन बार अल्लाह पाक को उन पर गवाह बनाया और उनको हुक्म दिया कि जो यहां मौजूद हैं वह ग़ैर-हाज़िर लोगों तक यह बात पहुंचा दें। जब आप ख़ुत्बा ख़त्म कर चुके तो आपने बिलाल रज़ि० को अज़ान का हुक्म दिया। उन्होंने अज़ान दी, फिर आपने ज़ुहर की नमाज़ दो रकअत पढ़ी। उसी तरह अस्र की भी दो ही रकअत पढ़ीं। यह जुमा का दिन था।
नमाज़ अदा करके आप अपनी सवारी पर बैठे और ‘मौक़िफ़’6 पर आए। यहां आकर आप अपने ऊंट पर बैठ गए और सूरज बैठने तक बहुत ही विनम्रता से अल्लाह से दुआ करते रहे। दुआ में आप अपना हाथ सीने से उठाते थे, जैसा कि कोई मांगने वाला और ग़रीब रोटी का सवाल कर रहा हो।
दुआ यह थी:
“ऐ अल्लाह! तू मेरी बात सुनता है और मेरी जगह को देखता है और मेरे ढके-छिपे को जानता है। तुझसे मेरी कोई बात छिपी नहीं रह सकती। मैं मुसीबत का मारा हूं, पनाह चाहता हूं, परेशान हूं, निराश हूं, अपने गुनाहों को क़बूल करने वाला हूं। तेरे आगे सवाल करता हूं जैसे बेकस सवाल करते हैं, तेरे आगे गिड़गिड़ाता हूं और तुझसे मांगता हूं जैसे भयभीत मांगते हैं, और जैसे वह व्यक्ति मांगा करता है जिसकी गर्दन तेरे सामने झुकी हो और उसके आंसू बह रहे हों, और तन-बदन से वह तेरे आगे झुका हो, और अपनी नाक तेरे आगे रगड़ रहा हो। ऐ रब! तू मुझे अपने दुआ मांगने में नाकाम न रख, और मेरे हक़ में बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला हो जा! सब मांगे जाने वालों से बेहतर और सब देने वालों से अच्छे!”
इस मौक़े पर सूरह मायदा की निम्न आयतें उतरीं जिसका अनुवाद इस तरह है:
जब सूरज डूब गया तो आपने उसामा बिन ज़ैद को अपने पीछे बिठाया और पूरे सुकून और वक़ार से अरफ़ात से रवाना हुए। ऊंटनी की महार आपने इस तरह समेट ली कि क़रीब था कि उसका सर आपकी काठी से लग जाए। आप कहते जाते थे, “लोगो! सुकून और इत्मीनान के साथ चलो।” रास्ते भर आप ‘तलबिया’ पढ़ते जाते और जब तक ‘मुज़दलिफ़ा’ न पहुंच गए यह सिलसिला जारी रहा। वहां पहुंचते ही आपने हज़रत बिलाल को अज़ान का हुक्म दिया। अज़ान दी गई। आप खड़े हो गए और ऊंटों को बिठाने व सामान उतारने से पहले मग़रिब की नमाज़ अदा की। जब लोगों ने सामान उतार लिया तो आपने इशा की नमाज़ अदा की। फिर आप आराम करने के लिए लेट गए और फ़ज्र7 तक सोए।
फ़ज्र की नमाज़ पहले वक़्त में अदा की, फिर सवारी पर बैठे और ‘मशअरुल हराम’ आए और क़िबला-रुख़ होकर दुआ और ज़िक्र में लग गए और सूरज निकलने तक व्यस्त रहे। सूरज निकलने के बाद आप ‘मुज़दलिफ़ा’ से रवाना हुए। फ़ज़्ल बिन अब्बास से कहा कि ‘रमी-ए-जिमार’8 के लिए सात कंकरियां चुन लें। जब आप ‘मुहस्सिर’ घाटी के बीच में पहुंचे तो आपने ऊंटनी को तेज़ कर दिया, क्योंकि यही वह जगह है जहां हाथी वालों पर अज़ाब (अभिशाप) नाज़िल हुआ था। आप ‘मिना’ पहुंचे और वहां से ‘जमरतुल अक़बा’9 आए। वहां सूरज निकलने के बाद आपने रमी की और तलबिया पढ़ना बन्द किया।
फिर मिना वापसी हुई। यहां पहुंचकर आपने एक सारगर्भित भाषण दिया, जिसमें आपने ‘यौमुन्नह्र’10 की पवित्रता पर रोशनी डाली और इस दिन का महत्व बयान किया। दूसरे सभी शहरों पर मक्का की बरतरी का ज़िक्र किया, और लोगों से कहा कि अल्लाह की किताब के अनुसार जो भी उनका मार्गदर्शन करे वह उसका अनुसरण करें। फिर आपने लोगों से कहा कि वह आप सल्ल० से हज के मनासिक (काम) मालूम कर लें। आपने लोगों को समझाया कि “देखो, मेरे बाद काफ़िरों की तरह न हो जाना जो एक-दूसरे की गर्दन मारते रहते हैं।” आपने यह भी कहा कि यह सब बातें दूसरों तक पहुंचा दी जाएं। इस बयान में आपने यह भी फ़रमाया, “अपने रब की इबादत करो, पांच वक़्त की नमाज़ पढ़ो, एक महीने (रमज़ान) के रोज़े रखो, और उन लोगों की बात मानो जो अधिकारी (अधिकृत) हैं, और तुम अपने रब की जन्नत में दाख़िल हो जाओगे।”
इस समय आपने लोगों के सामने विदाई वाक्य भी कहे, और इस कारण इस हज का नाम ‘हज्जतुल विदा’ पड़ा।
फिर आप मिना में क़ुर्बानी की जगह गए और 63 ऊंट अपने हाथ से ज़िबह किए। जितने ऊंट आपने क़ुर्बान किए उतने ही वर्ष आपकी उम्र के भी हैं। इसके बाद आप रुक गए और हज़रत अली से कहा कि 100 में जितने बाक़ी हैं वह पूरा करें। जब आप क़ुर्बानी कर चुके तो नाई को बुलवाया और हल्क़ करवाया (सर मुंडवाया)। आपने अपने बालों को क़रीब के लोगों में बांट दिया। उसके बाद सवारी पर मक्का रवाना हुए। वहां तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा किया जिसे तवाफ़-ए-ज़ियारत भी कहते हैं। फिर आप ज़मज़म के कुएं पर आए और खड़े होकर पानी पिया, फिर उसी दिन मिना वापसी हुई और रात वहां गुज़ारी। दूसरे दिन जब दोपहर ढल गई तो आप अपनी सवारी से उतरकर ‘रमी-ए-जिमार’ के लिए गए। जमरा-ए-ऊला से शुरू किया। इसके बाद जमरा-ए-वुस्ता और जमरा-ए-अक़बा के पास जाकर रमी की। मिना में आपने दो ख़ुत्बे दिए: एक क़ुर्बानी के दिन, जिसका वर्णन ऊपर आ चुका है, दूसरा क़ुर्बानी के दूसरे दिन। मिना में आप ठहरे और ‘अय्याम-ए-तशरीक़’11 के तीनों दिन की रमी पूरी की। फिर मक्का की तरफ़ रवाना हुए और प्रातःकाल विदाई का तवाफ़ किया और लोगों को तैयारी का हुक्म दिया और मदीना रवाना हो गए।12
जब आप ‘ग़दीर-ए-ख़ुम’13 पहुंचे तो वहां आपने एक ख़ुत्बा दिया और हज़रत अली रज़ि० की फ़ज़ीलत बयान फ़रमाई। आपने फ़रमाया, “जिसको मैं महबूब (प्यारे) हूं, अली भी उसको महबूब होना चाहिए। ऐ अल्लाह! जो अली से मुहब्बत रखे तू भी उससे मुहब्बत रख, और जो उनसे दुश्मनी रखे उससे तू भी दुश्मनी रख।”14
जब आप ‘ज़ुल-हुलैफ़ा’ आए तो रात यहीं गुज़ारी। दूर से मदीना की बाहरी बस्तियों पर आपकी नज़र पड़ी तो आपने तीन बार तकबीर कही और फ़रमाया, “अल्लाह बुज़ुर्ग व बरतर है, उसके सिवा कोई माबूद नहीं, उसका कोई शरीक नहीं। बस उसी की सल्तनत है, उसी के लिए तारीफ़ है। वह हर बात पर क़ुदरत रखने वाला है। लौटे आ रहे हैं तौबा करते हुए, फ़रमांबरदाराना (आज्ञापालन), ज़मीन पर पेशानी (माथा) रखकर अपने परवरदिगार की तारीफ़ करते हुए। अल्लाह ने अपना वादा सच्चा किया, अपने बन्दे की मदद की और तमाम क़बीलों को अकेले हराया।” आप मदीना में दिन के समय दाख़िल हुए।
दो अहम ख़ुत्बे
इस हज के दौरान अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जो ख़ुत्बे दिए उनमें दो का अनुवाद यहां पेश किया जा रहा है। इनमें एक वह ख़ुत्बा है जो आपने अरफ़ा के दिन दिया था। दूसरा वह है जो आपने अय्याम-ए-तशरीक़ के बीच दिया था। यह दोनों ख़ुत्बे (Addresses) बहुत ही लाभदायक, प्रभावशाली और नसीहतपूर्ण हैं।
अरफ़ा का ख़ुत्बा
“तुम्हारा ख़ून और तुम्हारा माल इसी तरह हराम है जिस तरह यह दिन इस महीने में और इस शहर में हराम है। यह भी याद रखो कि हर जाहिल अम्र (बात) बातिल (झूठ) है, और जाहिलियत के सभी ख़ून (अर्थात बदले के ख़ून) बातिल (माफ़) कर दिए गए, और सबसे पहले वह मैं (अपने ख़ानदान का ख़ून) इब्न रबीआ बिन अल-हारिस का ख़ून बातिल (माफ़) करता हूं, जिसने बनी साद में परवरिश पाई और उसको हुज़ैल ने क़त्ल कर डाला। जाहिलियत के सभी ब्याज भी बातिल कर दिए गए, और सबसे पहले (अपने ख़ानदान का ब्याज) अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब का ब्याज बातिल करता हूं। यह सबका सब ब्याज बातिल है। औरतों के मामले में अल्लाह से डरो। तुमने उनको अल्लाह की अमानत के तौर पर हासिल किया है, और उनकी शर्मगाहों (गुप्तांगों) को अल्लाह की बात के साथ हलाल समझा है, और तुम्हारी तरफ़ से उन पर ज़िम्मेदारी है कि वह तुम्हारे बिस्तर पर किसी ग़ैर को, जिसका आना-जाना तुमको गवारा (पसन्द) नहीं है, न आने दें। अगर वह ऐसा करें तो तुम उनको ऐसी मार मारो जो ज़ाहिर (ऊपर आना) न हो, और उनका हक़ तुम्हारे ऊपर यह है कि उनके लिए उचित रूप से खाने और कपड़े का बन्दोबस्त करो। मैं तुममें एक चीज़ छोड़ जाता हूं, अगर तुमने इसको मज़बूती से पकड़ लिया तो गुमराह न होगे। वह चीज़ क्या है? अल्लाह की किताब। तुमसे अल्लाह के यहां मेरे बारे में पूछा जाएगा, तुम क्या जवाब दोगे?” सहाबा ने कहा, “हम कहेंगे कि आपने अल्लाह का पैग़ाम पहुंचा दिया, अपना फ़र्ज़ अदा कर दिया।” आपने शहादत की उंगली (तर्जनी) आसमान की तरफ़ उठाई और तीन बार फ़रमाया, “ऐ अल्लाह! तू गवाह रहना।”
दूसरा ख़ुत्बा
“ऐ लोगो! क्या तुम यह जानते हो कि तुम किस शहर में हो और यह कौन से महीना और दिन हैं?” लोगों ने जवाब दिया, “यह दिन बड़ा पाक और यह महीना बड़ी श्रद्धा (अक़ीदत) का है और यह शहर पाक शहर है।” आपने फ़रमाया, “तुम्हारा ख़ून, तुम्हारा माल और तुम्हारी इज़्ज़त इसी तरह क़यामत तक पाक है जिस तरह यह दिन, यह महीना और यह पाक शहर है।” फिर फ़रमाया, “सुनो, मुझसे वह बातें सुनो जिससे तुम सही ज़िन्दगी गुज़ार सकोगे। ख़बरदार! ज़ुल्म न करना। किसी मुसलमान के माल में से कुछ लेना जायज़ नहीं, हां अगर वह राज़ी हो (तो कोई हर्ज नहीं)। हर ख़ून, हर माल जो जाहिलियत से चला आता था क़यामत तक वह बातिल है, और सबसे पहला ख़ून जो बातिल (माफ़) किया जाता है वह रबीआ बिन अल-हारिस बिन अब्दुल मुत्तलिब का ख़ून है। उसने बनी लैस में परवरिश पाई थी और हुज़ैल ने उसको क़त्ल कर दिया था। जाहिलियत के सभी ब्याज भी बातिल (माफ़) कर दिए गए, और अल्लाह ने यह फ़ैसला फ़रमा दिया कि जो सबसे पहला ब्याज बातिल (माफ़) किया जाए वह अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब का ब्याज है। तुम्हारा मूलधन आपके लिए सुरक्षित है। इसमें न तुम किसी पर ज़ुल्म करोगे न तुम्हारे ऊपर ज़ुल्म किया जाएगा। शुरू में अल्लाह ने जब आसमान व ज़मीन को पैदा किया था, ज़माना घूम-फिरकर फिर उसी बिन्दु पर आ गया।” फिर आपने सूरह तौबा की आयत नम्बर 36 पढ़ी, जिसका अनुवाद यह है:
“हां! मेरे बाद काफ़िर न हो जाना कि ख़ुद एक-दूसरे की गर्दन मारने लगो, और हां! शैतान भी इससे निराश हो चुका है कि नमाज़ पढ़ने वाले उसकी पूजा करें, लेकिन वह तुम्हारे बीच फूट डालेगा। औरतों के मामले में अल्लाह से डरो, क्योंकि वह तुम्हारे ऊपर निर्भर हैं, वह अपने लिए ख़ुद कोई अधिकार नहीं रखतीं, और उनका तुम पर हक़ है, और तुम्हारा उन पर कि वह तुम्हारे अलावा तुम्हारे बिस्तर पर किसी को न आने दें, और न ऐसे व्यक्ति को तुम्हारे घर आने दें जिसे तुम नापसन्द करते हो, और अगर तुम उनकी नाफ़रमानी (अवज्ञा) से भय महसूस करो तो उन्हें नसीहत करो और उनको उनके शयनकक्ष (ख़्वाबगाहों) में छोड़ दो और हल्की मार मारो, और उन्हें खाने-कपड़े का हक़ उचित तरीक़े पर हासिल है। तुमने उन्हें अल्लाह की अमानत के तौर पर हासिल किया है, और उनकी इज़्ज़त को अल्लाह के नाम से हलाल किया है। आगाह (सचेत) हो जाओ, जिसके पास कोई अमानत हो, वह जिसकी अमानत (धरोहर) है उसे वापस कर दे।” इतना फ़रमाने के बाद आपने अपने दोनों हाथ फैलाए और फ़रमाया कि “क्या मैंने पैग़ाम पहुंचा दिया? क्या मैंने पैग़ाम पहुंचा दिया?” फिर फ़रमाया, “जो हाज़िर हैं वह ग़ैर-हाज़िर लोगों तक यह बात पहुंचा दें, क्योंकि बहुत से ग़ैर-हाज़िर सुनने वालों से ज़्यादा ख़ुशबख़्त होते हैं।”
टिप्पणियां
- 1यह संख्या एक लाख 24 हज़ार से एक लाख 30 हज़ार के बीच बताई गई है।
- 2‘लब्बैक अल्लाहुम्म लब्बैक, लब्बैक ला शरीक लक लब्बैक, इन्नल हम्द वन्नेमत लक वल मुल्क, ला शरीक लक’ सस्वर पढ़ना। यह हाजियों का तराना है, जिसका अर्थ है, “आपकी सेवा में ऐ अल्लाह, आपकी सेवा में, आपकी सेवा में, तेरा कोई शरीक नहीं, तेरी सेवा में, सभी तारीफ़ें तेरी हैं, तेरा ही मुल्क है, तेरा कोई शरीक नहीं।” तलबिया का अर्थ है ‘आदेश की प्रतिष्ठा में खड़ा होना।’ हाजी लोग हज के समय इन शब्दों को बार-बार सस्वर दुहराते हैं। (अनुवाद)
- 3काबा में जड़ा हुआ एक पवित्र काला पत्थर। (अनुवाद)
- 4तेज़ चलकर काबा का तवाफ़ करना। विस्तार के लिए हज की किताबें देखें।
- 5हज्र-ए-असवद को चूमना अथवा उस तक न पहुंच सकने की दशा में छू देना। (अनुवाद)
- 6अरफ़ात में वह जगह जहां आपने दुआ फ़रमाई थी।
- 7प्रतिदिन पांच वक़्त पढ़ी जाने वाली नमाज़ के नाम हैं: फ़ज्र, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब और इशा। (अनुवाद)
- 8मिना में ‘जमरा’ (स्तम्भ) पर कंकरियां फेंकना। यही वह जगह है जहां शैतान ने हज़रत इब्राहीम अ० और हज़रत इस्माईल अ०
- 9वहां तीन स्तम्भ हैं: ऊला, वुस्ता और अक़बा।
- 10क़ुर्बानी का दिन, अर्थात ज़िलहिज्जा की 10 तारीख़।
- 11ज़िलहिज्जा की 9 से 13 तारीख़ तक।
- 12विस्तार के लिए देखें ‘ज़ादुल मआद’ (खण्ड एक, पृ० 180–249)।
- 13मक्का और मदीना के बीच जुहफ़ा से 3 किलोमीटर दूर एक जगह।
- 14अहमद और नसई के अनुसार इस ख़ुत्बे की एक विशेष वजह थी। कुछ लोगों ने हज़रत अली की आपसे शिकायत की थी। यह लोग यमन में अली के साथ थे और उन्हें अली के कुछ फ़ैसले न्यायोचित प्रतीत नहीं हुए, यद्यपि उनका यह भ्रम ग़लत था कि फ़ैसलों में पक्षपात किया गया है।