अध्याय सोलह

बादशाहों को इस्लाम की दावत

हुदैबिया के समझौते के बाद हालात स्वाभाविक रूप से शान्त हो गए और इस्लाम की दावत के प्रचार के रास्ते खुल गए। इस मौक़े पर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अरब और अरब के बाहर अनेक बादशाहों तथा अमीरों के नाम ख़त लिखवाए और बड़े जतनपूर्ण ढंग से उन्हें इस्लाम की दावत दी। इन ख़तों को ले जाने के लिए आपने प्रत्येक बादशाह के लिए ऐसे प्रतिनिधि चुने जो बादशाह की हैसियत तथा उसके पद की गरिमा के अनुकूल बात कर सकें और वहां की भाषा तथा उस देश के हालात से अच्छी तरह से परिचित हों।1

आप सल्ल० के सहाबा ने आपसे निवेदन किया कि यह किसी ऐसे ख़त को मान्यता नहीं देते जिस पर मुहर न हो। इस पर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इन ख़तों के लिए एक मुहर बनवाई जिसकी परिधि चांदी की थी और बीच में इस तरह अरबी में लिखा हुआ था:

الله
رسول
محمد

(अल्लाह)
(रसूल)
(मुहम्मद)

हज़रत मुहम्मद सल्ल० के ख़त

उन बादशाहों में जिनके नाम ख़त भेजे गए, रोम के राजा हरकुल, ईरान के शहंशाह किसरा परवेज़, हब्शा के राजा नजाशी और मिस्र के बादशाह मुक़ौक़िस का नाम उल्लेखनीय है।

हरकुल को आप सल्ल० ने ख़त दिहया कल्बी के हाथ भेजा, और उन्होंने बुसरा के रईस के माध्यम से इस ख़त को हरकुल तक पहुंचाया। उस ख़त का अनुवाद निम्न है:

“बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। मुहम्मद की तरफ़ से जो अल्लाह का बन्दा और रसूल है, यह ख़त हरकुल के नाम है जो रोम का रईस-ए-आज़म है। उनको सलामती हो जो हिदायत (सद्मार्ग) की पैरवी करें। इसके बाद मैं तुझको इस्लाम की दावत की तरफ़ बुलाता हूं। इस्लाम लाओ, तुम सलामत रहोगे, अल्लाह तुमको दुगना बदला देगा, और अगर तुमने न माना तो देशवासियों का गुनाह तेरे ऊपर होगा। ऐ अहले किताब! एक ऐसी बात की तरफ़ आओ जो हममें और तुममें एक समान है, वह यह कि हम अल्लाह के सिवा किसी को न पूजें और हममें से कोई किसी को (अल्लाह को छोड़कर) अल्लाह न बनाए, और तुम नहीं मानते तो गवाह रहो कि हम मानते हैं।”

किसरा परवेज़ के पास आप सल्ल० ने जो ख़त भेजा उसका अनुवाद इस तरह है:

“बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। अल्लाह के पैग़म्बर मुहम्मद की तरफ़ से फ़ारस के रईस किसरा के नाम! सलाम है उस व्यक्ति पर जो हिदायत का पैरौ हो और अल्लाह व उसके रसूल पर ईमान लाए, और वह यह गवाही दे कि अल्लाह सिर्फ़ एक अल्लाह है, और यह कि मुझको तमाम दुनिया का पैग़म्बर नियुक्त करके भेजा है ताकि वह हर ज़िन्दा व्यक्ति को अल्लाह का ख़ौफ़ दिलाए। तुम इस्लाम क़बूल करो तो सलामत रहोगे, अन्यथा मजूसियों का वबाल तुम्हारी गर्दन पर होगा।”

नजाशी के नाम यह ख़त भेजा गया:

“बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। मुहम्मद की तरफ़ से जो अल्लाह के रसूल हैं, यह ख़त नजाशी के नाम है जो हब्शा का रईस-ए-आज़म है। सलाम है उस व्यक्ति पर जो हिदायत की पैरवी करे। इसके बाद मैं तारीफ़ बयान करता हूं तुमसे उस अल्लाह की जिसके सिवा कोई पूज्य नहीं, जो बादशाह है, क़ुद्दूस है, सलाम है, मोमिन है और संरक्षक है, और गवाही देता हूं इस बात की कि ईसा इब्ने मरियम अल्लाह की आत्मा और उसका कलिमा हैं जिसको उसने पवित्र मरियम के अन्दर फूंका था जिससे वह गर्भवती हो गई, जैसे उसने आदम को अपने हाथ से बनाया था। मैं तुमको दावत देता हूं एक अल्लाह पर ईमान लाने की जिसका कोई शरीक नहीं, और उसके आज्ञापालन की और सहयोग की, और यह कि तुम मेरा अनुसरण करो और जो कुछ मेरे ऊपर आसमान से उतरा है उस पर ईमान लाओ। बस बेशक मैं अल्लाह का रसूल हूं और तुमको और तुम्हारे लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाता हूं। मैंने अपना पैग़ाम कह दिया और नसीहत पूरी कर दी। पस यह नसीहत क़बूल करो, और सलाम हो उस पर जो हिदायत की पैरवी करे।”

मुक़ौक़िस के नाम लिखे गए ख़त का अनुवाद:

“बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्ल० की तरफ़ से क़िब्त के रईस मुक़ौक़िस के नाम। उसको सलामती हो जो हिदायत की पैरवी करे। इसके बाद मैं तुमको इस्लाम की दावत देता हूं। इस्लाम ले आओ, सलामत रहोगे। अल्लाह तुमको दुगुना बदला देगा। अगर तुमने न माना तो देशवासियों का गुनाह तुम्हारे ऊपर होगा। ऐ किताब वालो! एक ऐसी बात की तरफ़ आओ जो हममें और तुममें समान है, वह यह कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करें और हममें से कोई किसी को (अल्लाह को छोड़कर) पूज्य न बनाए, और तुम नहीं मानते तो गवाह रहो कि हम मानते हैं।”2

यह बादशाह कौन थे?

हज़रत मुहम्मद सल्ल० के इन ख़तों के महत्व को जानने के लिए यह ज़रूरी है कि जिन बादशाहों को यह ख़त लिखे गए थे, उनके पद, उनकी हैसियत, उनकी शान-शौकत और दबदबा तथा राज्यों के विस्तार का ज्ञान हो। अगर कोई आदमी सातवीं सदी ई० के राजनीतिक इतिहास को नहीं जानता है और उसे इन देशों की जानकारी नहीं है तो वह यह समझ सकता है कि यह ख़त कुछ एक स्थानीय अधिकारियों और रियासतों के राजाओं को लिखे गए हैं जो हर युग में और हर जगह पाए जाते हैं।

इसके विपरीत जो आदमी उस युग की राजनीति में इन बादशाहों के महत्व को जानता है और उनके इतिहास, आचरण, ताक़त और बहादुरी तथा उनके महत्व को जानता है और उनके एकाधिकार व रोब-दबदबे से परिचित है, वह महसूस करेगा कि यह महान काम वही नबी कर सकता था जिसे अल्लाह ने इस काम के लिए भेजा हो और जिस पर इस दावत व पैग़ाम की पूरी ज़िम्मेदारी हो, जिस पर डर की छाया भी न पड़ी हो, और दुनिया बनाने वाले का उसे ऐसा संरक्षण हासिल हो कि बड़े-बड़े राजा-महाराजा उसे गुड़िया-गुड्डे या बेजान पुतले मालूम होते हों। इसलिए यहां समकालीन इतिहास तथा विश्वसनीय सबूतों की मदद से उनका परिचय कराया जाता है।

सम्राट रोम हरकुल प्रथम (610 से 641 ई०)

बाज़नतीनी प्रशासक रोम का सम्राट हरकुल प्रथम एक विशाल राज्य का मालिक था जिसने ईरान के साथ मिलकर उस समय की पूरी सभ्य दुनिया को आपस में बांट रखा था, और जिसका सिक्का आधी दुनिया में चल रहा था। उसका राज्य यूरोप, एशिया और अफ़्रीका के महाद्वीपों के बड़े भाग पर फैला हुआ था। इसका केन्द्र रोम था।

हरकुल कपोडेशिया के एक यूनानी परिवार में पैदा हुआ और कारथेज में उसका पालन-पोषण हुआ। उसके पिता अफ़्रीका के एक हाकिम (Exarch of Africa) के पद पर थे। शुरू में उसमें कोई ऐसी बात न थी जिससे उसकी असाधारण सूझ-बूझ, हौसलामन्दी तथा नेतृत्व की क्षमता का पता चलता। जब फ़ोकस ने सन् 602 ई० में बाज़नतीनी राज्य के अत्याचारी राजा मौरीस को क़त्ल किया तो ईरानियों को बाज़नतीनी राज्य पर चढ़ाई करने का बहाना मिल गया, क्योंकि मौरीस का ईरान के राजा किसरा परवेज़ पर बड़ा एहसान था। ईरानियों ने बाज़नतीनी राज्य की ईंट से ईंट बजा दी। विशाल बाज़नतीनी साम्राज्य का चल-चलाव था कि हरकुल को कारथेज बुलाया गया। हरकुल ने फ़ोकस को मारकर सन् 610 ई० में शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली।3 उस समय पूरा देश बहुत कठिनाई के दौर से गुज़र रहा था। सूखा, संक्रामक रोगों, ग़रीबी का पूरे देश में राज्य था। देश दिवालिया हो चुका था। हरकुल ने अपनी हुकूमत के शुरुआती कुछ वर्ष भीगी बिल्ली की तरह गुज़ारे, लेकिन सन् 616 ई० में वह अचानक जाग उठा। यह वह साल है जिसमें क़ुरआन पाक ने कुछ वर्षों के अन्दर रोम पर विजय की भविष्यवाणी की थी। हरकुल देखते-देखते एक भोगी तथा आरामतलब बादशाह से एक उत्साही एवं स्वाभिमानी वीर सेनापति में बदल गया। उसके अन्दर देशभक्ति की चिंगारी दहक उठी। उसने ईरान पर चढ़ाई की और अपनी छीनी हुई ज़मीन और खोई हुई इज़्ज़त वापस ली। ईरान के मशहूर शहरों पर क़ब्ज़ा कर लिया। ईरान की राजधानी में अपने झंडे गाड़ दिए और विशाल ईरानी साम्राज्य की इज़्ज़त को मिट्टी में मिला दिया। सासान के सपूतों के सिंहासन की चूलें हिल गईं। हरकुल 625 ई० में क़ुस्तुनतुनिया वापस आया और 629 ई० में पवित्र सलीब, जिसे ईरानी उठा ले गए थे, को दोबारा स्थापित करने और अपनी नज़्र पूरी करने के लिए बैतुल मुक़द्दस (यरूशलम) के लिए रवाना हुआ। लोग श्रद्धा व सम्मान व्यक्त करने के लिए उसके रास्ते में फ़र्श व कालीन बिछाते थे तथा फूल बरसाते और गुलाब जल छिड़कते थे। सलीब को दोबारा स्थापित करने तथा हरकुल की कामयाबी की ख़ुशी में वहां जश्न और ख़ुशियां मनाई गईं। यह वह समय था जब हरकुल को अल्लाह के रसूल सल्ल० का ख़त मिला जिसमें उसको इस्लाम क़बूल करने की दावत दी गई थी।4

लेकिन इसके बाद ही हरकुल अपनी सुस्ती व ग़फ़लत तथा आराम-पसन्दी के उसी हाल में आ गया जिसमें पहले था। प्रजा के सुख-दुख से उसे कुछ सरोकार बाक़ी न रहा। यहां तक कि इस्लाम के मुजाहिदों ने एशिया व अफ़्रीका में उसका समापन कर दिया और हरकुल का विशाल साम्राज्य सिर्फ़ यूरोप व एशिया-ए-कोचक तक सिमटकर रह गया। हरकुल अपने समय के महान सम्राटों में से एक था। राज्य विस्तार, सामरिक शक्ति तथा विकास में अगर कोई उसके बराबर था तो वह ईरानी शहंशाह ख़ुसरो द्वितीय था। हरकुल का निधन 641 ई० में क़ुस्तुनतुनिया में हुआ, और वह वहीं दफ़न किया गया।

ख़ुसरो परवेज़ द्वितीय (590 से 628 ई०)

ख़ुसरो परवेज़ हुरमुज़ का चौथा बेटा और ख़ुसरो प्रथम (नौशेरवां आदिल) का पोता था। उसके बाप के क़त्ल के बाद 590 ई० में वह राजगद्दी पर बैठा। बहराम ने उसके ख़िलाफ़ बग़ावत की। ख़ुसरो की पराजय हुई। उसने सासानी हुकूमत को छोड़कर बाज़नतीनी राजा मौरीस की पनाह मांगी और अपने राज्य को वापस लेने के लिए उससे मदद चाही। मौरीस (Maurice) ने विशाल सेना के साथ उसकी मदद की जिसके फलस्वरूप बहराम की पराजय हुई। ख़ुसरो अपने पूर्वजों के राजसिंहासन पर दोबारा क़ाबिज़ हो गया। इस बीच उसके दत्तक पिता (adopted father) मौरीस को फ़ोकस ने क़त्ल कर दिया। ख़ुसरो ने इसका बदला लेने के लिए 612 ई० में बाज़नतीनी साम्राज्य पर हमला कर दिया और उसकी इस तरह ईंट से ईंट बजा दी कि उसका कोई उदाहरण इससे पहले नहीं मिलता। 615 ई० तक उसकी ख्याति चरम सीमा पर पहुंच गई। यहां तक कि हरकुल ने ईरानियों को उनके देश से बेदख़ल कर दिया। ख़ुसरो को अपना देश छोड़कर एक सुरक्षित एवं दूर स्थित जगह में पनाह लेनी पड़ी थी, लेकिन जल्दी ही 628 ई० की बग़ावत में उसका काम तमाम हो गया।

ईरान के इतिहासकारों का मत है कि ख़ुसरो द्वितीय ईरान का सबसे बड़ा और शान-शौकत रखने वाला शहंशाह था। उसके शासनकाल में सासानी साम्राज्य अपने विकास, ख़ुशहाली, औपचारिक जीवन, भोग-विलास तथा श्रृंगार एवं सौन्दर्य की चरम सीमा पर था। हिन्दुस्तान के उत्तर-पश्चिमी राज्यों तक उसका सिक्का चलता था। उसके नाम से पहले लिखा जाता था: “ख़ुदाओं में इन्सान ग़ैरफ़ानी5 और इन्सानों में ख़ुदा-ए-लासानी।6 उसके नाम का बोलबाला, सूरज के साथ उदय होने वाला, रात की आंखों का उजाला।” उसके शासनकाल में ईरान की तरक़्क़ी और शान व शौकत का वर्णन करते हुए विख्यात अरब इतिहासकार तबरी के शब्द यह हैं:

“यह बादशाह सबसे अधिक कठोर, सबसे अधिक दूरदर्शी और सबसे अधिक विवेकशील था। बहादुरी और वीरता, विजय एवं सफलता, धन-दौलत की बाहुल्यता तथा भाग्य और समय ने जितना उसका साथ दिया उतना अन्य किसी बादशाह को हासिल नहीं था। इसी कारण उसे ‘परवेज़’ की पदवी मिली, जिसका अरबी में अर्थ है विजयी और इक़बालमन्द, अर्थात भाग्यशाली।”

सभ्यता एवं संस्कृति में नई चीज़ें निकालने तथा खाने-पीने के नए-नए तरीक़े और पकवान बनवाने में ख़ुसरो अद्वितीय था। इत्र व ख़ुशबू आदि में भी वह अपनी चरम सीमा पर था। उसके शासनकाल में तरह-तरह के खानों, उच्चकोटि की शराबों और बेहतरीन इत्रों के प्रति लोगों में एक विशेष लगाव पैदा हो गया था। संगीत तथा गायन कला ने उसके शासनकाल में बड़ी तरक़्क़ी हुई। ख़ुसरो को दौलत जमा करने तथा दुर्लभ व सुन्दर वस्तुओं को जमा करने का बड़ा शौक़ था। जब उसका ख़ज़ाना 607 ई० में पुराने भवन से तीसफ़ून (मदाइन) के नए भवन में ले जाया गया तो उसकी मात्रा 468 मिलियन मिस्क़ाल सोना थी, जो 375 मिलियन सोने के फ़्रैंक के बराबर होता है। उसके राजगद्दी पर बैठने के 13वें वर्ष उसके ख़ज़ाने में 880 मिलियन मिस्क़ाल सोना मौजूद था। ख़ुसरो ने 37 वर्ष शासन किया, उसके बाद उसका बेटा शेरवया राजगद्दी पर बैठा।

मुक़ौक़िस

मुक़ौक़िस इस्कन्दरिया का गवर्नर और मिस्र में बाज़नतीनी साम्राज्य का वाइसराय था। अरब इतिहासकार उसे प्रायः मुक़ौक़िस के नाम से जानते हैं। उसके असली नाम तथा वंशज के बारे में बड़ा मतभेद है। छठी शताब्दी हिजरी के इतिहासकार अबू सालेह ने उसका उल्लेख जुरैज बिन मीना अल-मुक़ौक़िस के नाम से किया है। इब्न ख़ल्दून ने लिखा है कि वह क़िब्ती था। मक़रीज़ी ने उसे रोमी बताया है। जब ईरानियों ने मिस्र पर हमला किया तो बाज़नतीनियों द्वारा तैनात किया गया गवर्नर वहां से भाग निकला और भागकर क़बरस (साइप्रस) पहुंचा, जहां उसका निधन हुआ। उसके बाद हरकुल ने उसकी जगह दूसरा गवर्नर नियुक्त किया, जिसका नाम जार्ज था। शायद यही वह व्यक्ति है जिसे अरब जुरैज कहते हैं। कुछ इतिहासकार लिखते हैं कि उसकी नियुक्ति 621 ई० में हुई।

अल्फ़्रेड जे० बटलर ने लिखा है:

“अरबों का विचार था कि जो हाकिम बाज़नतीनी हुकूमत की तरफ़ से ईरान पर विजय के बाद मिस्र का गवर्नर नियुक्त हुआ उसकी पदवी ‘मुक़ौक़िस’ थी, और वह एक समय में देश का हाकिम और कलीसा (गिरजा) का प्रमुख था। धार्मिक पेशवा भी होता था, अतएव उन्होंने जार्ज के लिए यह पदवी पेश की।”

बटलर का यह मत है कि मुक़ौक़िस उसका असली नाम नहीं बल्कि पदवी थी जो प्राचीन क़िब्ती भाषा का शब्द है। यह भी मुमकिन है कि ईरानियों के मिस्र पर अधिकार के समय किसी क़िब्ती लाट पादरी ने कलीसा प्रमुख और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों अपने हाथ में ले ली होगी। फिर भी, चूंकि रोम तथा ईरानवासियों के बीच समझौता 628 ई० में लिखा गया है इसलिए सम्भव है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० का ख़त मुक़ौक़िस के नाम उसी बीच पहुंचा हो जब मिस्र का हाकिम लगभग ख़ुदमुख़्तार था। यही कारण है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मुक़ौक़िस के नाम के साथ “अज़ीमुल क़िब्त” (अर्थात क़िब्तियों का सरदार) शब्द का प्रयोग किया।

मिस्र बाज़नतीनी साम्राज्य में पैदावार तथा आबादी की निगाह से सबसे ऊपर था। यह बाज़नतीनी साम्राज्य का खाद्य भंडार था। मिस्र के विजेता अम्र बिन अल-आस रज़ि०, जो अल्लाह के रसूल सल्ल० के ख़त भेजने के 14 वर्ष बाद वहां विजेता की हैसियत से दाख़िल हुए थे, अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फ़ारूक़ बिन अल-ख़त्ताब रज़ि० के नाम अपने ख़त में मिस्र की तारीफ़ में यह शब्द लिखते हैं:

“मिस्र की धरती बहुत सरसब्ज़ व शादाब है। इसकी लम्बाई एक महीने की यात्रा और चौड़ाई 10 दिन की यात्रा के बराबर है।”

अम्र बिन अल-आस रज़ि० ने सन् 20 हिजरी (640 ई०) में मिस्र की विजय के बाद जब यह गणना कराई कि जिज़िया देने के अधिकारी कौन-कौन लोग हैं तो उनकी संख्या 60 लाख7 से अधिक निकली, जिसमें एक लाख रूमी थे। वह अपने ख़त में आगे लिखते हैं:

“मैंने एक ऐसा शहर जीता है जिसकी तारीफ़ में सिर्फ़ इतना लिखता हूं कि मुझे वहां चार हज़ार अट्टालिकाएं नज़र आईं जहां 4 हज़ार स्नानघर थे। यहूदियों की संख्या 40 हज़ार थी। रईसों (धनवानों) के लिए 400 मनोरंजन के केन्द्र थे।”

नजाशी

पूर्वी अफ़्रीका में लाल सागर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित इथोपिया (हब्शा) एक प्राचीन देश है। अबीसीनिया की हुकूमत दुनिया की प्राचीनतम हुकूमतों में एक थी। यहूदी हवालों से पता चलता है कि मलिका-ए-सबा हब्शा ही में रहती थी और हज़रत सुलेमान अ० की औलादें आज तक हब्शा की शासक हैं। यहूदियों ने हैकल-ए-सुलेमानी8 की तबाही के बाद यहां आबाद होना शुरू किया। यह छठी शताब्दी ई० की बात है, लेकिन ईसाई धर्म यहां चौथी शताब्दी ई० में पहुंच चुका था, और जब यमन के यहूदी बादशाह ने अपने यहां ईसाइयों पर अत्याचार शुरू किया तो जस्टीनियन प्रथम ने हब्शा के राजा से ईसाइयों की सहायता करने और ईसाइयों पर होने वाले अत्याचार की रोकथाम के लिए प्रार्थना की। हब्शा के राजा नजाशी ने इसकी मदद की और उसकी सेना ने 525 ई० में यमन पर क़ब्ज़ा कर लिया, और यमन पर हब्शा का लगभग पचास वर्ष तक अधिकार बना रहा। इसी दौर में हब्शा की तरफ़ से नियुक्त यमन के गवर्नर अब्रहा ने काबा पर चढ़ाई की और ‘आमुल फ़ील’ अर्थात हाथी वाला साल की घटना हुई।

अबीसीनिया की राजधानी अक्सूम (Axum) थी। यह एक आज़ाद और अपना बंदोबस्त ख़ुद करने वाला राज्य था जो न किसी के अधीन था और न किसी को टैक्स आदि देता था। बाज़नतीनी साम्राज्य से इसका सम्बन्ध सिर्फ़ ईसाई धर्म की बुनियाद पर था। इसका सबूत इस बात से मिलता है कि बाज़नतीनी शासक जस्टीनियन ने जूलियन नाम के एक व्यक्ति को हब्शा में अपना राजदूत नियुक्त किया।9 डी लेसी ओ’लियरी (De Lacy O’Leary) ने अपनी किताब Arabia Before Muhammad में लिखा है:

“हब्शा 525 ई० से लेकर इस्लाम के अभ्युदय तक पूर्वी लाल सागर तथा अफ़्रीका के पूरे व्यवसाय पर क़ाबिज़ रहा, बल्कि शायद वह हिन्दुस्तान के व्यवसाय पर भी क़ाबिज़ था।”

हब्शा के बादशाह को हमेशा नजाशी कहा जाता था। यह ज़रूर है कि जिस नजाशी को अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़त भेजा था उसे सुनिश्चित करने में विभिन्न मत हैं। इस सम्बन्ध में हमारे सामने अबीसीनिया के दो बादशाहों के नाम आते हैं। एक वह जिसके शासनकाल में मक्का के मुसलमानों ने हज़रत जाफ़र बिन अबी तालिब रज़ि० के नेतृत्व में हब्शा के लिए हिजरत की थी। यह नुबूवत के पांचवें साल की बात है। यह बात आम ज्ञान के विपरीत है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उस समय यह ख़त भेजा हो, क्योंकि उस समय के हालात इसके अनुकूल नहीं थे और न ही इस काम का अभी समय आया था। इस बात का कोई पता नहीं मिलता कि हिजरत से पहले आपने किसी बादशाह को ख़त भेजा हो और उसे इस्लाम क़बूल करने की दावत दी हो। अधिक से अधिक जो बात मिलती है वह यह कि इस मौक़े पर आपने हब्शा के बादशाह से इन मुसलमानों को पनाह देने की फ़रमाइश की। इब्न हिशाम तथा अन्य लेखकों ने इस बारे में जो कुछ लिखा है उससे इतना ज़रूर अन्दाज़ा होता है कि ईमान उस नजाशी के दिल में उतर चुका था और वह इस बात को मानता था कि ईसा इब्न मरियम अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल हैं, और उसके शब्द हैं जिसे उसने मरियम पर उतारा था।

हाफ़िज़ इब्ने कसीर के अनुसार जिस नजाशी को आप सल्ल० ने यह ख़त भेजा था वह उन मुस्लिम नजाशी के बाद गद्दी पर बैठा जिनके समय में हज़रत जाफ़र तथा उनके साथी हब्शा गए थे। इब्ने कसीर के कथनानुसार, “यह बात उस समय पेश आई जब आप सल्ल० ने मक्का की विजय से पहले दुनिया के बादशाहों को ख़त लिखे और उन्हें इस्लाम की दावत दी।” मेरे विचार से यही कथन अधिक सही है। यही वह नजाशी था जिसने इस्लाम क़बूल किया। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ुद मुसलमानों को उसके निधन की सूचना दी और उसके लिए दुआ की।

उब्बी ने वाक़िदी तथा दूसरे सीरते लिखने वालों के हवाले से लिखा है कि यह वही नजाशी है जिसके लिए आपने दुआ की। यह बात तबूक से वापसी के बाद रजब सन् 9 हिजरी की है। इस तरह वाक़िदी का कथन सही मालूम पड़ता है।

इन बादशाहों का ख़तों के साथ मामला

हरकुल, नजाशी तथा मुक़ौक़िस, इन तीनों ने आपके ख़तों का आदर किया। इनकी तरफ़ से जवाब में श्रद्धा व सत्कार की भावना थी। नजाशी और मुक़ौक़िस ने आप सल्ल० के सन्देशवाहकों का बड़ा सत्कार किया। मुक़ौक़िस ने आप सल्ल० के लिए कुछ तोहफ़ा भी भेजा। इनमें दो बांदियां भी थीं जिनमें से एक का नाम ‘मारिया’ था। अल्लाह के रसूल सल्ल० के सुपुत्र हज़रत इब्राहीम उन्हीं की कोख से पैदा हुए थे।

किसरा परवेज़ ने ख़त सुनते ही फाड़ डाला और बोला, “मेरा ग़ुलाम होकर मुझको यूं लिखता है!” हज़रत मुहम्मद सल्ल० को इसकी ख़बर मिली तो आपने फ़रमाया, “अल्लाह उसके देश के टुकड़े-टुकड़े कर डाले।”

किसरा ने यमन के हाकिम बाज़ान को आदेश किया कि आपको हाज़िर किया जाए। उसने बाबवैह को आपके पास भेजा और कहलवाया कि “शहंशाह किसरा ने बाज़ान को निर्देशित किया है कि किसी को भेजकर आपको वहां हाज़िर कराया जाए। उन्होंने मुझे इसलिए भेजा है कि आप मेरे साथ चलें।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनको यह ख़बर दी कि अल्लाह ने किसरा पर उसके बेटे शेरवया को थोप दिया है जिसने उसको क़त्ल कर दिया है। आपकी यह सूचना शब्द-ब-शब्द सही निकली। किसरा की राजगद्दी पर उसका लड़का क़ुबाद, जिसकी पदवी ‘शेरवया’ थी, क़ाबिज़ हुआ, और उसके इशारे पर किसरा 628 ई० में क़त्ल किया गया। किसरा की मौत के बाद देश टुकड़े-टुकड़े हो गया और शासक परिवार के हाथ में सल्तनत एक खिलौना बन गई। शेरवया 6 महीने से अधिक हुकूमत न कर सका। किसरा की राजगद्दी पर चार साल के अन्दर एक के बाद एक 10 राजा बैठे। सल्तनत की चूलें हिल गईं। आख़िर में यज़्दगर्द पर सबकी सर्वसम्मति बनी और वह राजगद्दी पर बैठा। यह सासानी वंशज का आख़िरी प्रशासक था और उसी को इस्लामी सेना का सामना करना पड़ा था, जिसने आख़िर में सासानी साम्राज्य का समापन किया। इस तरह इस सल्तनत, जिसका 400 साल तक दुनिया में डंका बजता रहा था, का चिराग़ बुझ गया। यह घटना 637 ई० की है। इस तरह अल्लाह के रसूल सल्ल० की भविष्यवाणी 8 वर्ष के अन्दर पूरी हो गई।10

अल्लाह ने मुसलमानों को ईरान का वारिस व शासक बना दिया। ईरानवासियों को इस्लाम की हिदायत दी। उनमें दीन व शिक्षा के बड़े-बड़े इमाम और इस्लाम के असाधारण व्यक्तित्व वाले लोग पैदा हुए, और अल्लाह के रसूल सल्ल० की यह बात सही साबित हुई:

“अगर ज्ञान सुरैया (नक्षत्र) पर भी होगा तो कुछ ईरानी सपूत उसे हासिल करके रहेंगे।”

हरकुल और अबू सुफ़ियान के बीच संवाद

हरकुल ने अल्लाह के रसूल सल्ल० के बारे में सही जानकारी हासिल करने की कोशिश की और किसी ऐसे आदमी की तलाश की जो आप सल्ल० के बारे में सही जानकारी दे सके। संयोग से उन दिनों अबू सुफ़ियान कारोबार करने वहां आए हुए थे। उन्हें शाही दरबार में लाया गया। बादशाह के सवाल एक प्रबुद्ध, अनुभवी, धर्मों व नबियों के इतिहास व जीवनी की पूरी जानकारी रखने वाले व्यक्ति के सवाल थे, जिनका जवाब अबू सुफ़ियान ने पुराने अरबों की तरह सही-सही दिया। यह संवाद इस तरह है:

हरकुल: उनका नसब (वंशज) कैसा है?
अबू सुफ़ियान: वह हममें उच्च नसब समझे जाते हैं।

हरकुल: क्या जो बात वह कहते हैं, उनसे पहले भी किसी ने कही थी?
अबू सुफ़ियान: नहीं।

हरकुल: इस ख़ानदान में कोई बादशाह गुज़रा है?
अबू सुफ़ियान: नहीं।

हरकुल: क्या उनका अनुसरण प्रभावशाली व्यक्तियों ने किया है अथवा कमज़ोरों ने?
अबू सुफ़ियान: कमज़ोर लोगों ने।

हरकुल: क्या कोई उनके दीन में दाख़िल होने के बाद दीन को नापसन्द करके फिर जाता है?
अबू सुफ़ियान: नहीं।

हरकुल: क्या उनके इस दावे से पहले भी तुमने कभी उन पर झूठ का अनुभव किया है?
अबू सुफ़ियान: नहीं।

हरकुल: क्या वह वादे को तोड़ते भी हैं?
अबू सुफ़ियान: अभी तक तो नहीं, लेकिन अब जो नया समझौता हुआ है उसमें देखें वह वादे पर जमे रहते हैं या नहीं।

हरकुल: तुम लोगों ने उनसे कभी लड़ाई भी की?
अबू सुफ़ियान: हां।

हरकुल: क्या परिणाम रहा?
अबू सुफ़ियान: जंग का पासा हमारे और उनके बीच पलटता रहा। कभी हम विजयी होते हैं, कभी वह।

हरकुल: वह क्या शिक्षा देते हैं?
अबू सुफ़ियान: कहते हैं कि एक अल्लाह की इबादत करो, किसी और को अल्लाह का शरीक न बनाओ, नमाज़ पढ़ो, पाकदामनी अपनाओ, सच बोलो, रहमदिल बनो, दयालुता अपनाओ।

हरकुल ने अनुवादक से कहा, “इनसे कहो कि हमने तुमसे उनके नसब के बारे में पूछा, तो तुमने बताया कि वह तुममें शरीफ़ घराने के हैं। पैग़म्बर हमेशा अच्छे ख़ानदानों में पैदा होते हैं। मैंने तुमसे पूछा कि इस ख़ानदान में किसी और ने भी नुबूवत का दावा किया था, तुमने कहा नहीं। अगर इससे पहले किसी ने यह दावा किया होता तो मैं कहता कि उसी की नक़ल कर रहे हैं।

“मैंने तुमसे पूछा क्या उनके ख़ानदान में कोई बादशाह गुज़रा है, तुमने कहा नहीं। अगर कोई बादशाह गुज़रा होता तो मैं कहता कि अपने ख़ानदान की बादशाहत चाहते हैं। मैंने पूछा कि क्या तुमने उनके इस दावे से पहले कभी झूठा पाया है, तुमने कहा ‘नहीं’। मैं जानता हूं कि यह सम्भव नहीं है कि वह लोगों से झूठ न बोलें और अल्लाह पर झूठ बांधें। मैंने तुमसे पूछा कि रईस और प्रभावशाली लोग उनके अनुयायी हैं या कमज़ोर और ग़रीब। तुमने कहा कमज़ोर और ग़रीब। पैग़म्बरों के (शुरुआती) अनुयायी हमेशा ग़रीब लोग ही होते हैं। मैंने तुमसे पूछा कि उनके अनुयायी बढ़ते जाते हैं या घटते जाते हैं, तुमने कहा कि बढ़ते जाते हैं। ईमान का यही मामला है कि बढ़ता जाता है, यहां तक कि कमाल को पहुंच जाए। मैंने तुमसे पूछा कि कोई उनके दीन से नाराज़ होकर फिर भी जाता है, तुमने कहा नहीं। ईमान का यही हाल होता है, जब दिलों को उसकी मिठास हासिल हो जाती है तो वह निकलता नहीं।

“मैंने तुमसे पूछा कि क्या वह वादे को तोड़ते तो नहीं हैं, तुमने कहा नहीं। पैग़म्बर वादे को नहीं तोड़ते। और मैंने तुमसे पूछा कि वह क्या सिखाते हैं, तुमने बताया कि वह तुमको यह सिखाते हैं कि एक अल्लाह की इबादत करो, उसके साथ किसी को शामिल न करो, और तुमको बुतों की पूजा करने से रोकते हैं, नमाज़ पढ़ने, सच्चाई और पाकी की शिक्षा देते हैं। अगर तुम्हारा कहना सच है तो निकट भविष्य में इस समय जहां मेरे पैर हैं यहां तक उनका क़ब्ज़ा हो जाएगा। मुझे यह ज़रूर ख़याल था कि एक पैग़म्बर आने वाला है, लेकिन यह ख़याल न था कि वह अरब में पैदा होगा। अगर मैं वहां जा सकता तो उनसे मुलाक़ात के लिए जाता, और अगर मैं उनके पास होता तो उनके पांव धोता।”

हरकुल ने अपने दरबारियों और सल्तनत के कार्यकर्ताओं को महल में बुलवाया और महल के दरवाज़े बन्द करवा दिए। फिर मौजूद लोगों को सम्बोधित करते हुए उसने कहा, “ऐ रोमवासियो! क्या तुम भलाई और अच्छाई चाहते हो? और चाहते हो कि तुम्हारा देश बाक़ी रहे? अगर ऐसा है तो तुम इस नबी की हाथ पर ईमान लाओ।” लोग तेज़ी से दरवाज़े की तरफ़ भागे तो उनको बन्द पाया। जब हरकुल ने उन्हें नाराज़ देखा और उनके ईमान लाने से निराश हो गया तो उसने हुक्म दिया कि उनको वापस लाओ, और कहा कि “अभी मैंने जो बात कही थी वह इसलिए कि अपने दीन पर तुम्हारे जमे रहने का इम्तिहान लूं, और अब मैं तुम्हारी मज़बूती देखकर संतुष्ट हूं।” दरबारियों ने उसके सामने सर झुका दिए और उससे ख़ुश हो गए।

इस तरह हरकुल ने नजात का यह सुनहरा मौक़ा खो दिया, और उसने छुटकारे की हमेशा रहने वाली दौलत पर अपनी पल-दो-पल की सल्तनत को प्राथमिकता दी। जिसका नतीजा यह हुआ कि हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ि० के शासनकाल में उसको इससे भी हाथ धोना पड़ा।

अरीसी कौन थे?

‘यरीसीन’ या ‘अरीसीन’ का शब्द अल्लाह के रसूल सल्ल० के सिर्फ़ उस ख़त में आया है जो हरकुल के नाम भेजा था। आपके किसी अन्य ख़त में यह शब्द नहीं आया है। हदीस तथा शब्दकोष के विद्वानों का इस शब्द के असल अर्थ के बारे में बड़ा मतभेद है। मशहूर कथन यह है कि ‘अरीसीन’ ‘अरीसी’ का बहुवचन है जो सेवकों तथा काश्तकारों (किसानों) के लिए आता है।

इब्न मंज़ूर ने ‘लिसानुल अरब’ में शब्दकोष के विद्वान सअलब के हवाले से इसे काश्तकारों का पर्यायवाची बताया है। इब्नुल आराबी के कथन का हवाला देते हुए भी इसके यही अर्थ लिखे हैं, और अबू उबैदा का कथन नक़ल किया है कि “मेरे नज़दीक अरीस सरदार और बड़े को कहते हैं जिसके आदेशों का पालन किया जाए, और जब वह इताअत (आज्ञापालन) चाहे तो उसकी इताअत की जाए।”

यहां सवाल यह उठता है कि यदि अरीसीन का अर्थ काश्तकार है तो इस शब्द का प्रयोग किसरा परवेज़ के ख़त में भी आना चाहिए था, क्योंकि सासानी साम्राज्य में बाज़नतीनी साम्राज्य की अपेक्षा किसान अधिक थे और ईरान की राष्ट्रीय आय तथा आर्थिक संसाधन अधिकतर कृषि पर निर्भर थे, जैसा कि अज़हरी ने इसकी तरफ़ इशारा किया है। इब्न मंज़ूर ने अज़हरी के हवाले से लिखा है कि:

“इराक़वासी जो किसरा के दीन पर थे, काश्तकार थे; रोमवासी कारीगर थे और उद्योग-धन्धे करते थे, इसलिए वह मजूसी को अरीसीन कहते थे, अरीस से सम्बन्ध बताते हुए, जिसका अर्थ है काश्तकार। अरब भी ईरानियों को ‘फ़लाहीन’ अर्थात काश्तकार के लक़ब से याद करते थे।”

लेखक इस कथन को प्राथमिकता देता है कि अरीसीन से मतलब मिस्र के अरीयूस (Arius, 236–280) के अनुयायी हैं, जो ईसाई धर्म के एक वर्ग विशेष का संस्थापक था। अरीयूस वह आदमी है जिसने तौहीद का नारा बुलन्द किया और सृष्टा तथा सृष्टि (ईसाइयों के धर्म में ‘बाप’ ‘बेटे’) के बीच फ़र्क़ करने का अपील की। उसने इस विषय पर वाद-विवाद का दरवाज़ा खोल दिया और ईसाई समाज में सदियों तक यह बहस चलती रही। उसके विचारों का सारांश यह है कि अल्लाह की यह शान नहीं कि वह ज़मीन पर ज़ाहिर हो, इसलिए उसने हज़रत मसीह अ० को ताक़त और ईशवाणी से भर दिया। अल्लाह एक और हमेशा रहने वाला है। उसने अपनी ज़ात (अपने से प्रत्यक्ष रूप) से किसी को पैदा नहीं किया। ‘बेटा’ ख़ुद ‘अल्लाह’ नहीं है बल्कि रब की मन्शा और हिकमत का एक रूप है।

जेम्स मैकिनन (James Mackinnon) ने अपनी किताब From Christ to Constantine में लिखा है:

“अरीयूस इस बात पर बल देते थे कि अकेले अल्लाह की ज़ात क़दीम है, वह आदि है। उसमें कोई शामिल नहीं है। वही है जो ‘बेटे’ को वजूद (अस्तित्व) में लाया। इसलिए ‘बेटा’ आदि नहीं है। अल्लाह हमेशा से बाप नहीं है। अतएव एक दौर ऐसा गुज़रा है कि बेटा का अस्तित्व ही न था। बेटा अपना एक निश्चित अस्तित्व रखता है जिसमें अल्लाह उसका शरीक नहीं, क्योंकि ‘बेटा’ परिवर्तन से प्रभावित भी होता है, इसलिए उसको अल्लाह नहीं कहा जा सकता, हालांकि वह अपने आप में परिपूर्ण है। बहरहाल उसका एक पूर्ण अस्तित्व है।”

दूसरी तरफ़ इस्कन्दरिया का गिरजा चौथी शताब्दी ई० में हज़रत मसीह अ० को अल्लाह मानता था, और उसके नज़दीक “बाप” और “बेटे” में कोई फ़र्क़ न था। अरीयूस को, जो इस आस्था को नहीं मानता था, पादरियों की एक सभा ने 321 ई० में इस्कन्दरिया के गिरजा से बेदख़ल कर दिया। उस सभा का लाट पादरी अलेक्ज़ेण्डर था। अरीयूस शहर छोड़कर चला गया, लेकिन उसके निकल जाने से झगड़ा ख़त्म नहीं हुआ। बादशाह क़ुस्तुनतीन ने इस विवाद को ख़त्म करने की कोशिश की, लेकिन वह उसमें कामयाब नहीं हुआ। 325 ई० में उसने नीकिया (Nicaea) में एक सभा बुलाई जिसमें 2030 पादरी शामिल हुए। बादशाह का झुकाव मसीह अ० को अल्लाह मानने की तरफ़ था, इसलिए उसने अरीयूस के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया। इसके बावजूद अधिकांश प्रतिनिधियों का समर्थन अरीयूस को हासिल था और सिर्फ़ 318 पादरी बादशाह के पक्ष में थे, फिर भी उसने अरीयूस को इलीरिया में देश-निकाला कर दिया। उसके सारे लेख जला दिए गए। जिसके पास उसका कोई लेख मिलता उसे कड़ी सज़ा दी जाती, लेकिन इन बातों से लोगों में अरीयूस की लोकप्रियता ख़त्म न की जा सकी।

आख़िर में क़ुस्तुनतीन को ही अपना रुख़ नर्म करना पड़ा और उसने इस आस्था पर लगी पाबन्दी उठा ली। अपने सबसे बड़े विरोधी अलेक्ज़ेण्डर की मौत और उसके उत्तराधिकारी अथेनेसियूस के देश-निकाले के बाद अरीयूस इस्कन्दरिया फिर वापस आ गया। क़रीब था कि क़ुस्तुनतीन उसको मिस्र के गिरजाघर का प्रमुख नियुक्त कर दे और अरियनिज़्म क़बूल कर ले, लेकिन अरीयूस की अचानक मौत ने उसको यह मौक़ा नहीं दिया।

जॉन विलियम ड्रेपर ने अपनी किताब History of the Conflict Between Religion and Science में लिखा है कि चौथी शताब्दी ई० में 13 मसीही सभाओं ने अरीयूस के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया था, 15 ने उसका समर्थन किया था, 17 सभाओं ने जो राय प्रकट की थी वह उसकी राय के बहुत क़रीब थी। इस तरह 45 सभाएं इस प्रकरण पर विचार-विमर्श के लिए आयोजित हुईं। वास्तविकता यह है कि मसीही दुनिया में चौथी शताब्दी से पहले तसलीस की आस्था का कोई चलन नहीं मिलता। न्यू कैथोलिक इंसाइक्लोपीडिया में आता है कि:

“तसलीस11 की आस्था आधुनिक संरचना और उसके भेद से पर्दा सिर्फ़ 19वीं सदी के बीच में ही उठ सका। अगर कोई विशुद्ध तौहीद की आस्था की बात करता तो इसका मतलब यह है कि चौथी सदी के अन्तिम चरण तक लौट जाता है। मसीही दुनिया में ‘एक अल्लाह की तीन अभिव्यक्तियों’ की भावना उसी ऐतिहासिक युग में पैदा हुई थी।” (खण्ड 14, पृष्ठ 295)

तसलीस की यह आस्था हज़रत ईसा मसीह अ० की खुली शिक्षा के साथ सदा टकराती रही है। कभी इसका पलड़ा भारी होता, कभी उसका। बाज़नतीनी साम्राज्य के पूर्वी भाग में ईसाइयों की बहुत बड़ी संख्या अरीयूस की आस्था को मानती थी। यहां तक कि महान थियोडोसियस ने क़ुस्तुनतुनिया में ईसाइयों की एक सभा बुलाई जिसने हज़रत ईसा मसीह अ० के ईश्वरत्व (Divinity) और उनके अल्लाह का बेटा होने की आस्था को विधिवत मान लिया, और इसके एलान के बाद अरीयूस आस्था की दावत ख़त्म हो गई और यह आन्दोलन आंखों से ओझल हो गया। फिर भी ईसाइयों का एक वर्ग उससे जुड़ा रहा और यह लोग ‘अरीसिया’ अथवा ‘अरीसीन’ के नाम से मशहूर हुए।

इसीलिए यही कथन सच मालूम पड़ता है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अपने ख़त में जो ‘अरीसीन’ का शब्द प्रयोग किया है उससे तात्पर्य यही वर्ग है, क्योंकि उस समय की मसीही दुनिया में, जिसकी बागडोर बाज़नतीनी साम्राज्य के हाथ में थी और जिसका शासनाध्यक्ष हरकुल था, यही वर्ग अपेक्षाकृत तौहीद का मानने वाला था।

प्राचीन काल के कुछ एक महान विद्वानों ने भी यही धारणा व्यक्त की है। इमाम तहावी ने अपनी किताब “मुश्किलुल-आसार” में लिखा है:

“कुछ एक प्रकाण्ड विद्वानों ने लिखा है कि हरकुल के लोगों में एक वर्ग था जिसको ‘अरीसिया’ कहते थे। यह अल्लाह को एक तथा हज़रत ईसा अ० को उनका बन्दा मानता था। ईसाई मसीह अ० के ईश्वरत्व के बारे में जो कुछ कहते थे, यह वर्ग उसको नहीं मानता था। यह मसीह अ० के दीन पर जमे थे और इंजील में जो कुछ था उसे मानते थे। ईसाई इससे आगे बढ़कर जो कुछ कहते थे यह वर्ग उस पर ईमान न रखता था। अगर यह बात सही है तो इस वर्ग को ‘अरीस्यूना’ या ‘अरीसीन’ दोनों कहना उचित है, जैसा कि हदीस के विद्वानों का विचार है।”

कुछ इसी तरह का मत “मुस्लिम शरीफ़” के टीकाकार इमाम नववी ने पेश किया है। वह कहते हैं:

“दूसरा कथन यह है कि वह (अरीसीन) यहूद व नसारा (ईसाई) हैं, जो अब्दुल्लाह बिन अरीस के मानने वालों में थे, जिससे ‘अरूसियत’ को जुड़ा बताया जाता है।”12

अरब शासकों के नाम ख़त

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अरब के शासकों में बहरीन13 के शासक मुन्ज़िर बिन सावा, ओमान के शासकों जैफ़र बिन अल-जुलन्दा14 व अब्द बिन अल-जुलन्दा अज़्दी, यमामा के शासक हौज़ा बिन अली15 तथा हारिस बिन अबी शम्र अल-ग़स्सानी के नाम ख़त भेजे। मुन्ज़िर बिन सावा और जुलन्दा के दोनों बेटों जैफ़र और अब्द ने इस्लाम क़बूल कर लिया। हौज़ा बिन अली ने अल्लाह के रसूल सल्ल० से प्रार्थना की कि उसको सत्ता में शामिल किया जाए। आपने उसे स्वीकार नहीं किया और इसके बाद जल्दी ही उसकी मौत हो गई।

टिप्पणियां

  1. 1वाक़िदी का कथन है कि यह ख़त हुदैबिया के समझौते के बाद ज़िलहिज्जा सन् 6 हिजरी, सन् 627 ई० में भेजे गए, क्योंकि जिन बादशाहों के नाम ख़त लिखे गए उनमें पहला नाम ईरान के सम्राट ख़ुसरो परवेज़ का था जो मार्च सन् 628 ई० में मारा गया। हरकुल को जो ख़त लिखा गया वह भी सन् 627 ई० में, क्योंकि यदि उसका वर्ष 628 ई० मान लिया जाए तो सन् 628 ई० में हरकुल आरमीनिया के दौरे पर आ चुका था। देखें The Arab Conquest of Egypt by Alfred J. Butler (p. 140)। इब्न साद ने अपनी किताब ‘तबक़ात’ भाग दो के पृष्ठ नं० 23 पर तथा सियूती ने अपनी किताब ‘अल-ख़साइसुल कुबरा’ भाग दो के पृष्ठ 11 तथा सियूती ने इस सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है उससे पता चलता है कि हज़रत मुहम्मद सल्ल० के दूतों को भाषा का एक अनोखा ईश्वरीय वरदान हासिल था। उनका कहना है, “उनमें प्रत्येक देश की भाषा, जहां वह भेजा गया था, ख़ुद बोलने लगा।” लेखक को इस चमत्कार की संभावना पर कोई सन्देह नहीं है, क्योंकि हज़रत मुहम्मद सल्ल० तथा अन्य नबियों की जीवनी में इस तरह की अनेक असाधारण बातें पाई जाती हैं, लेकिन असल में यह बहुत कुछ अल्लाह के रसूल सल्ल० के विवेकपूर्ण चयन पर भी निर्भर था, क्योंकि रोम, फ़ारस, मिस्र और हब्शा (इथोपिया) की भाषाएं चुने गए राजदूतों के लिए कोई अनोखी न थीं, क्योंकि उन देशों का सम्पर्क अरब से व्यापार आदि के कारण बराबर बना हुआ था। सवाल सिर्फ़ चार ऐसे व्यक्तियों के चुनाव का था जो उन चार देशों की भाषा से परिचित हों, और अरब में ऐसे लोगों की कमी न थी। अरब प्रायद्वीप के अन्दर अरब क़बीलों को इस्लाम की दावत अरबी भाषा में दी गई।
  2. 2इस समय तक इन ख़तों में से पांच की पाण्डुलिपियों की खोज हो चुकी है। इनकी तस्वीरें भी अनेक इस्लामी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। फ़्रांसीसी विद्वान बार्थेलेमी (Barthélemy) को मिस्र के एक स्थान अख़मीम के एक प्राचीन मन्दिर में सन् 1850 ई० में हिरन की खाल पर लिखा हुआ एक लेख मिला। अध्ययन और शोध के बाद साबित हुआ कि यह वह ख़त है जो मुक़ौक़िस के नाम भेजा गया था। (देखें एशियाई जर्नल सन् 1854 और पत्रिका ‘अल-हिलाल’, मिस्र, सन् 1904)। इसी तरह नजाशी और किसरा के नाम फ़रमान की असल भी मिल चुकी है।
  3. 3देखें Decline and Fall of the Roman Empire by Gibbon; आर्थर क्रिस्टेनसेन की किताब ‘ईरान ब-अहद-ए-सासानियान’।
  4. 4हरकुल को बाद में और किसरा को पहले ख़त पहुंचने का कारण यह था कि हरकुल के लिए लिखा गया ख़त पहले बुसरा के प्रशासक को दिया गया जो हरकुल तक उसकी सामरिक व्यस्तता के कारण देर से पहुंचा। दूसरे यह कि पाश्चात्य स्रोतों में इसका उल्लेख आया है कि हरकुल को 628 ई० में एक बग़ावत को कुचलने के लिए आरमीनिया जाना पड़ा, और इसीलिए वह अपनी नज़्र सन् 629 ई० में पूरी कर सका।
  5. 5अमर
  6. 6अद्वितीय
  7. 7विभिन्न देशों में जनसंख्या वृद्धि के अनुपात को देखते हुए लेखक को इस संख्या में सन्देह है, क्योंकि इस समय मिस्र की जनसंख्या 40 मिलियन से अधिक नहीं।
  8. 8सुलेमान का मन्दिर
  9. 9A History of Abyssinia by Jones & Monroe (Oxford 1935, p. 63)
  10. 10किसरा के नाम लिखा गया जो ख़त मिला है उसमें चाक (फाड़ने) का निशान अब भी मौजूद है जो बीच में ऊपर से नीचे की तरफ़ झुकता हुआ है और जिसे सिला गया है। यह ख़त शीशे में फ़्रेम किया हुआ लेबनान सरकार के भूतपूर्व मंत्री हेनरी फ़िरऔन के पास सुरक्षित है। (डा० इज़्ज़ुद्दीन इब्राहीम)
  11. 11एक पूज्य की तीन अभिव्यक्तियां, अर्थात हज़रत ईसा अ० (बेटा), हज़रत मरियम (मां) और अल्लाह (बाप) तीनों को पूज्य मानना। (अनुवाद)
  12. 12यह मत सही नहीं मालूम होता है, क्योंकि इस्लाम के अभ्युदय से 300 वर्ष पहले अरीस का वजूद था और इसका नाम भी कोई अरबी इस्लामी नाम नहीं था।
  13. 13बहरीन नज्द के उस भाग को कहते हैं जिसका नाम अब ‘अल-अहसा’ है। हज़रत अबू उबैदा के नेतृत्व में जो लश्कर भेजा गया था और जिसमें विशाल मछली के हाथ आने की घटना घटित हुई, वह इसी तरफ़ भेजा गया था, और सही हदीसों में इस मौक़े पर ‘अल-बहरीन’ ही का शब्द आता है। अब यह नाम खाड़ी देशों में एक देश को दिया जाता है। इसके अधिकतर वासी बनी अब्दुल क़ैस, बनी बक्र बिन वाइल तथा बनी तमीम के क़बीलों से हैं। जब यह ख़त भेजे गए उस समय वहां का शासक मुन्ज़िर बिन सावा था जो बनी तमीम के क़बीले का था।
  14. 14इतिहासकारों के बयान से पता चलता है कि अल-जुलन्दा किसी व्यक्ति विशेष का नाम न था, वह एक लक़ब था जिसका अर्थ ओमानवासियों की भाषा में सरदार या धार्मिक पेशवा था।
  15. 15ईसाई धर्म का मानने वाला था। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने सलीत बिन अम्र को इसी के पास भेजा था। उन दिनों यमामा की सीमाएं पूर्व में बहरीन से और पश्चिम में हिजाज़ से जा मिलती थीं। बनू हनीफ़ा इसी भाग में आबाद थे। उन्हीं में मुसैलिमा पैदा हुआ जिसका लक़ब नुबूवत का झूठा दावा करने की वजह से ‘कज़्ज़ाब’ पड़ गया।