अध्याय छब्बीस
आपकी बीवियां और बच्चे
आपकी पवित्र बीवियों में सबसे पहला नाम हज़रत ख़दीजा बिन्त ख़ुवैलिद का है। आपकी नुबूवत से पहले, जब उनकी उम्र 40 वर्ष थी, आपने उनसे शादी की। हज़रत ख़दीजा रज़ि० ने आपकी नुबूवत के बाद पेश आने वाली मुश्किलों में आपकी बड़ी मदद की और आपका बड़ा साथ दिया, तथा उनकी मुहब्बत व माल व दौलत हर तरह से आपकी तसल्ली व सुकून का सामान किया। उनकी वफ़ात हिजरत से तीन साल पहले हुई। अल्लाह के रसूल सल्ल० की तमाम औलादें, सैयदना इब्राहीम को छोड़कर, हज़रत ख़दीजा से हैं। आप उनका ज़िक्र हमेशा तारीफ़ और आभार की भावना के साथ करते। कभी ऐसा होता कि कोई बकरी ज़िबह की जाती तो आप उसके विभिन्न अंग अलग करके हज़रत ख़दीजा की सहेलियों के पास भिजवाते।1
उनके निधन के कुछ दिन बाद आपने सौदा बिन्त ज़मआ रज़ि० से शादी की। इसके बाद आपने हज़रत आइशा रज़ि० से निकाह किया जो आपकी बहुत ही प्यारी बीवी थीं। उम्मत की महिलाओं में फ़िक़्ह2 व दीनी ज्ञान में कोई उनके बराबर न था। बड़े-बड़े सहाबा पेचीदा धार्मिक समस्याओं को सुलझाने में उनसे सलाह-मशवरा करते थे और उनका फ़तवा3 चाहते। इसके बाद आपने हज़रत उमर रज़ि० की बेटी ‘हफ़्सा’ रज़ि० से निकाह किया। उसके बाद ‘ज़ैनब’ बिन्त ख़ुज़ैमा से शादी हुई, जिनका शादी के दो माह बाद निधन हो गया। फिर आपने उम्मे सलमा रज़ि० से शादी की। आपकी बीवियों में उनकी वफ़ात सबके बाद हुई। फिर आपने ज़ैनब बिन्त जहश से शादी की। यह आपकी फूफी उमैमा की बेटी थीं। इसके बाद आपने जुवैरिया बिन्त अल-हारिस से शादी की, जो क़बीला बनू अल-मुस्तलिक़ की थीं। फिर अबू सुफ़ियान की बेटी उम्मे हबीबा रज़ि० से शादी हुई, और उसके बाद क़बीला बनी अन-नज़ीर के सरदार ‘हुयय बिन अख़्तब’ की बेटी हज़रत सफ़िय्या रज़ि० से निकाह किया। ‘हुयय बिन अख़्तब’ हज़रत मूसा अ० के भाई हारून बिन इमरान की औलाद में से थे। इसके बाद सबसे आख़िर में मैमूना बिन्त अल-हारिस अल-हिलालिया से आपका निकाह हुआ।
इसमें कोई मतभेद नहीं है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० की वफ़ात के वक़्त आपकी पवित्र बीवियों में से 9 मौजूद थीं। हज़रत ख़दीजा और ज़ैनब बिन्त ख़ुज़ैमा का आपकी ज़िंदगी में ही निधन हो गया था। हज़रत आइशा को छोड़कर यह सब शादीशुदा थीं।
आपकी वफ़ात के समय आपकी दो बांदियां मौजूद थीं। एक मारिया बिन्त शमऊन, जो मिस्र के क़िब्ती ख़ानदान की थीं और जिन्हें मिस्र के हाकिम मुक़ौक़िस ने आपकी ख़िदमत में पेश किया था, और जो आपके बेटे सैयदना इब्राहीम की मां थीं। दूसरी क़बीला बनू अन-नज़ीर की ख़ातून रैहाना बिन्त ज़ैद थीं। इस्लाम क़बूल करने के बाद आपने उनको आज़ाद कर दिया और फिर उनसे निकाह किया।
अल्लाह ने आपकी वफ़ात के बाद इन बीवियों से शादी मुसलमानों पर हराम क़रार दे दी, इसलिए कि वह मोमिनों की मां (उम्महातुल मोमिनीन) का दर्जा रखती थीं। अल्लाह पाक का इरशाद है:
इब्न कसीर इस आयत की तफ़सीर (विवेचना) में लिखते हैं:
“विद्वानों का इस बात पर पूरी तरह एकमत है कि आपकी वफ़ात के बाद किसी दूसरे के लिए आपकी बीवियों से निकाह करना हराम है, इसलिए कि दुनिया व आख़िरत दोनों जगह वह आपकी बीवियां और ईमान वालों की मां हैं।”
आपके बहुविवाह पर एक निगाह
अल्लाह के रसूल सल्ल० 25 वर्ष की उम्र तक कुंवारे रहे। आप हर तरह से परिपूर्ण इन्सानी व अरबी जवांमर्दी तथा गठे शरीर के मालिक थे। घुड़सवारी और मर्दानगी के उच्च गुणों में आप पक्के थे। संस्कृति व सभ्यता व माहौल की बुराइयों से अल्लाह ने आपको बचाए रखा था। इन गुणों का चरित्र-निर्माण में बड़ा महत्व है और अरब इन गुणों को विशेष महत्व देते हैं।
आपके कट्टर दुश्मनों को भी इन 25 वर्षों में आप पर उंगली उठाने का मौक़ा न मिला, न आपकी नुबूवत के बाद आज तक किसी ने इस सिलसिले में आपकी तरफ़ कोई उंगली उठाई। आप सच्चाई व पाकीज़गी, पवित्रता व मासूमियत के उच्च नमूने थे और हर उस कमज़ोरी से बहुत दूर थे जो आपकी शान के ख़िलाफ़ थी।
25 वर्ष की उम्र में आपने सबसे पहले हज़रत ख़दीजा रज़ि० से निकाह किया जो उस वक़्त विधवा थीं। उनकी उम्र उस समय 40 वर्ष थी और उनकी पहले ही दो बार शादियां हो चुकी थीं, और वह बाल-बच्चे वाली थीं, और आप सल्ल० की तथा हज़रत ख़दीजा की उम्र में मशहूर कथन के अनुसार 15 वर्ष का फ़र्क़ था। इसके बाद आपने दूसरी शादी हज़रत सौदा रज़ि० से उस वक़्त की जब आपकी उम्र 50 वर्ष से ज़्यादा हो चुकी थी। उनके पति का हब्शा में एक मुहाजिर मुसलमान के रूप में निधन हो गया था। आपने हज़रत आइशा रज़ि० के अलावा किसी कुंवारी और ग़ैर-शादीशुदा महिला से निकाह नहीं किया। आपने जितनी शादियां कीं उनमें दीन और दीन के प्रचार का कोई राज़, रहमदिली, मुसलमानों का कोई सार्वजनिक हित, या किसी बड़े ख़तरे से बचाव की कोई न कोई बात ज़रूर शामिल थी। रिश्तों और वैवाहिक सम्बन्धों का अरब क़बीलों के सामाजिक जीवन में जितना महत्व है उतना किसी और समाज में नहीं है। इसलिए यह शादियां और नए रिश्ते इस्लामी दावत, ख़ून बहाने से सुरक्षा और अरब क़बीलों के नुक़सान से बचाने का एक बड़ा माध्यम थे। इन पाक बीवियों के साथ आप सल्ल० की ज़िंदगी कोई भोग-विलास की ज़िंदगी नहीं थी, जो बहुविवाह में बहुत से लोगों के सामने होता है। वह भक्ति, क़ुर्बानी और तुष्टि से मुक्त एक ऐसी ज़िंदगी थी जिसकी क्षमता पुराने और नए युग के बड़े-बड़े हौसलामन्द और उत्साही व्यक्ति और भक्तों में भी नहीं है। इसकी कुछ झलकियां अगले अध्याय में पेश की जाएंगी। फिर भी एक न्यायप्रिय व्यक्ति के लिए क़ुरआन पाक की यह आयत काफ़ी है:
इस उच्च एवं पवित्र विचार, पाक व साफ़ ज़ेहन का नतीजा यह था कि इन सब बीवियों ने बिना किसी हिचकिचाहट के अल्लाह, उसके रसूल सल्ल० तथा आख़िरत के घर को दुनिया की ज़िंदगी पर प्राथमिकता दी। नमूने के तौर पर हज़रत आइशा रज़ि० का यह जवाब काफ़ी है जो इस सिलसिले में उन्होंने दिया। आपने उनके सामने यह आयत तिलावत करने के बाद फ़रमाया, “देखो, जल्दी न करना, अपने माता-पिता से राय ज़रूर कर लेना।” उन्होंने जवाब दिया, “भला इस मामले में भी मां-बाप से सलाह की ज़रूरत है? मुझे तो अल्लाह, उसके रसूल सल्ल० और आख़िरत का घर चाहिए।” वह कहती हैं कि आप सल्ल० की सब बीवियों ने ऐसा ही किया।
बहुविवाह तथा उसके मनोवैज्ञानिक, आर्थिक एवं सामूहिक असर व तक़ाज़ों ने अल्लाह के रसूल सल्ल० को प्रचार की महान ज़िम्मेदारी, संघर्षमय जीवन तथा मुसलमानों के अहम कामों से पल भर के लिए ग़ाफ़िल (दूर) नहीं किया, बल्कि इससे आपकी सक्रियता, जोश और ताक़त व सुख में कुछ और बढ़ोतरी हुई। आप सल्ल० की बीवियां इस्लाम के प्रचार और दीन के संगठन में आपकी मदद करती थीं। वह ग़ज़वों (जंगों) में आपके साथ रहती थीं, घायलों का इलाज व मरीज़ों की सेवा करती थीं। आपकी घरेलू और सामाजिक ज़िन्दगी का एक तिहाई हिस्सा, तथा उसके अलावा और बहुत से हुक्म व शिक्षा असल में आपकी पाक बीवियों ही की वजह से पूरे हुए, जिनसे मुसलमानों ने इनको विधिवत सीखा, याद किया और दूसरों को बताया व सिखाया है।4
इस सिलसिले में सिर्फ़ हज़रत आइशा रज़ि० का नाम ले लेना काफ़ी है, जिनके बारे में मशहूर विद्वान इमाम ज़हबी ने अपनी मशहूर किताब ‘तज़किरतुल हुफ़्फ़ाज़’ में लिखा है कि:
“आपके जो साथी इस्लामी आचार संहिता के माहिर (विशेषज्ञ) थे उनमें हज़रत आइशा रज़ि० सबसे आगे थीं। सहाबा उनसे पेचीदा (कठिन) मामलों पर राय लेते थे। क़बीसा बिन ज़ुऐब बयान करते हैं कि हज़रत आइशा समस्याओं की सबसे अधिक जानकारी रखती थीं। बड़े-बड़े सहाबा उनसे पूछते थे। अबू मूसा कहते हैं कि हम सहाबियों को किसी हदीस के समझने में कठिनाई होती तो आइशा रज़ि० से पूछते, और वह इसका ज्ञान रखती थीं। हस्सान रज़ि० कहते हैं कि मैंने क़ुरआन पाक, हलाल व हराम, फ़र्ज़, हुक्म, कविता, अरब का इतिहास तथा वंशजों के इतिहास का उनसे अधिक जानकार किसी को नहीं पाया।”
जहां तक नैतिक मूल्यों, जोश, रहमदिली, हमदर्दी और मुहब्बत व दिलदारी की बात है, उसके बारे में जितना भी कहा जाए कम ही होगा। इस सिलसिले में वह बयान काफ़ी होगा जो हिशाम ने अपने पिता से नक़ल किया है:
“एक बार मुआविया रज़ि० ने हज़रत आइशा रज़ि० को एक लाख दिरहम भेजे। एक महीना भी नहीं गुज़रा था कि हज़रत आइशा ने उसे ज़रूरतमंदों में बांट दिया। उनकी बांदी ने कहा, ‘अगर आप इनमें से एक दिरहम का गोश्त ख़रीद लेतीं तो अच्छा था।’ कहने लगीं कि ‘तुमने उस वक़्त याद न दिला दिया।’ उस वक़्त हज़रत आइशा रोज़े से थीं।”
बहुविवाह के मामले ने पश्चिम के अनेक विचारकों तथा विद्वानों (Orientalists) के दिल व दिमाग़ को उलझा रखा है। इसका एकमात्र कारण यह है कि उन्होंने अरब में और इस्लामी शरीअत में वैवाहिक जीवन की विशिष्ट व्यवस्था को पश्चिम की परिस्थितियों, आदतों तथा रस्म व रिवाज का पाबन्द बनाना चाहा है। उन्होंने पश्चिम के मापदण्डों को यहां की वस्तुस्थिति पर मढ़ने की कोशिश की है। अरब में और इस्लामी शरीअत में वैवाहिक व्यवस्था प्रकृति के सर्वथा अनुकूल तथा अरबी माहौल के अनुसार थी, और इसके पीछे विभिन्न नैतिक और सामाजिक उद्देश्य छुपे थे। असल में यह पश्चिमी लेखकों का एक बहुत कमज़ोर पहलू है कि वह पहले पश्चिम को मापदण्ड बनाते हैं, फिर उस कसौटी पर हर चीज़ को कसते हैं, और उस पर जो खरी न उतरे उस हर चीज़ के ख़िलाफ़ फ़ैसला करते हैं। वह ख़ुद एक समस्या खड़ी करते हैं जिसकी कोई जड़-बुनियाद नहीं होती, और फिर उसे हल करने की कोशिश करते हैं। यह उनकी अपनी हर चीज़ के प्रति ज़रूरत से अधिक लगाव और स्वाभिमान का नतीजा है।
अंग्रेज़ लेखक आर० वी० सी० बॉडले ने अपनी किताब (The Messenger: The Life of Mohammed, London 1946, pp. 202–203) में इस मामले पर साफ़ विचार पेश किए हैं। वह लिखते हैं:
“मुहम्मद (सल्ल०) के वैवाहिक जीवन को न तो पश्चिम के मापदण्ड से जांचने की ज़रूरत है और न उन रस्मों और नियमों की निगाह से जिन्हें इन्सानियत ने जन्म दिया है। यह लोग न पश्चिम के थे, और न ईसाई, बल्कि वह एक ऐसे देश में और ऐसे दौर में पैदा हुए थे जबकि उनके अपने नैतिक मूल्यों का ही चलन था। इसके बावजूद अमरीका और यूरोप के नैतिक मूल्यों को अरबों के नैतिक मूल्यों से अच्छा समझने की कोई वजह नहीं है। पश्चिम के पास पूरब के लोगों को देने के लिए बहुत कुछ है। उन्हें अभी बहुत कुछ जो पीछे छूटा हुआ है उसे बटोरना है, और जब तक वह यह न साबित कर दें कि उनका रहन-सहन किसी अन्य से ऊंचे स्तर का है, उन्हें दूसरे धर्म, जाति और देश के लोगों पर अपना फ़ैसला नहीं सुनाना चाहिए।”
पश्चिम में बहुविवाह को बिना विचार किए एक बुराई मान लिया है और वह इसे कोई महत्व दिए बिना नकारता रहा है। यह वास्तव में भावावेश में लिया गया फ़ैसला है जो ज़ोरदार प्रचार के सहारे टिका है। यह न तो सिद्धान्ततः सही है और न ही स्वाभाविक है। इस बात की पूरी सम्भावना है कि समय के साथ और आर्थिक, सामाजिक तथा नैतिक ढांचे में बदलाव के साथ न सिर्फ़ भ्रमात्मक प्रचार का ज़ोर कम हो जाए, बल्कि यह हमेशा के लिए ख़त्म हो जाए। पश्चिम के एक लेखक (Alvin Toffler) ने अपनी मशहूर किताब (Future Shock, Pan Books Ltd. 1975) में इस बात की सम्भावना व्यक्त की है कि पश्चिम के कामुक दृष्टिकोण में ढील के साथ, और धन-दौलत में बढ़ोतरी के फलस्वरूप सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकारों के महत्व में कमी की वजह से, बहुविवाह के प्रति पश्चिम के दृष्टिकोण को लोग विवेकहीन एवं तर्करहित समझने लगे।
आपकी औलादें
हज़रत मुहम्मद सल्ल० के बेटे ‘अल-क़ासिम’ हज़रत ख़दीजा की कोख से पैदा हुए। उन्हीं के नाम पर आप सल्ल० को ‘अबुल क़ासिम’ कहा जाता है। अल-क़ासिम का निधन बचपन में ही हो गया। इसके बाद क्रमशः हज़रत ज़ैनब, हज़रत रुक़य्या, हज़रत उम्मे कुलसूम और हज़रत फ़ातिमा रज़ि० पैदा हुईं। हज़रत ख़दीजा से एक और बेटा पैदा हुआ जिनका नाम ‘अब्दुल्लाह’ था, और इब्नुल क़य्यिम के शोध के अनुसार ‘तय्यिब’ व ‘ताहिर’ ‘अब्दुल्लाह’ के लक़ब थे, जबकि कुछ विद्वान इन तीनों को अलग-अलग लड़के बताते हैं। यह सब औलादें हज़रत ख़दीजा से थीं।
हज़रत फ़ातिमा रज़ि० आपकी सबसे प्यारी व छोटी बेटी थीं। आपने उन्हीं के लिए इरशाद फ़रमाया, “वह जन्नत में औरतों की सरदार होंगी।” आपने यह भी फ़रमाया, “फ़ातिमा मेरे जिस्म का एक हिस्सा है। जिस बात से उसे तकलीफ़ होती है, उससे मुझे होती है।” अल्लाह के रसूल सल्ल० की वफ़ात के बाद परिवार के सदस्यों में सबसे पहले हज़रत फ़ातिमा इस दुनिया से रुख़सत हुईं और आप सल्ल० से जा मिलीं।
मारिया क़िब्तिया से आपके लड़के इब्राहीम पैदा हुए। उनकी वफ़ात भी बचपन में उस वक़्त हुई जब वह अपने पालने में थे। उनकी वफ़ात पर आपने फ़रमाया, “आंखों से आंसू निकल रहे हैं और दिल दुःखी है, लेकिन हम कोई ऐसी बात नहीं कहते जो रब को नाराज़ करने वाली हो। ऐ इब्राहीम! हम तुम पर दुखी हैं।”
हज़रत इब्राहीम के निधन पर सूरज ग्रहण हो गया तो सहाबा ने कहा कि इब्राहीम के निधन की वजह से सूरज ग्रहण हो गया है। आप सल्ल० ने सुना तो सहाबा को जमा करके उनसे कहा, “सूरज और चांद अल्लाह की निशानियों में से दो निशानियां हैं, जिनको किसी की मौत से ग्रहण नहीं होता।”
हज़रत ज़ैनब रज़ि०, जो कि हज़रत ख़दीजा के भांजे अबुल आस बिन रबीअ को ब्याही थीं, के एक लड़का हुआ जिनका नाम ‘अली’ था और एक लड़की हुई जिसका नाम ‘उमामा’ था। हज़रत रुक़य्या रज़ि० का निकाह हज़रत उस्मान रज़ि० से हुआ और उनसे एक लड़का हुआ जिनका नाम “अब्दुल्लाह” था। हज़रत रुक़य्या का निधन उस समय हुआ जब आप बद्र के मैदान में थे। उनके बाद हज़रत उस्मान की शादी हज़रत रुक़य्या की बहन हज़रत उम्मे कुलसूम रज़ि० से हुई, इसलिए उनका लक़ब “ज़ुन्नूरैन” पड़ा। हज़रत उम्मे कुलसूम का निधन भी आप सल्ल० की ज़िन्दगी में ही हुआ।
हज़रत फ़ातिमा की शादी अबू तालिब के बेटे और आप सल्ल० के चचेरे भाई हज़रत अली से हुई। उनके बड़े लड़के हज़रत हसन रज़ि० थे, जिनके नाम पर हज़रत अली को ‘अबुल हसन’ कहा जाता है, और छोटे लड़के का नाम हज़रत हुसैन था। इनके लिए आपने फ़रमाया, “वह इस दुनिया में मेरे दो फूल हैं।” इन दोनों के बारे में आपने यह भी फ़रमाया, “यह दोनों जन्नत वालों में नौजवानों के सरदार होंगे।”
अल्लाह ने इन दोनों की औलाद में ख़ूब बरकत अता फ़रमाई और इस्लाम तथा मुसलमानों को इनसे बहुत फ़ायदा हुआ। इनमें बड़े सरदार और लीडर, तथा विद्वान एवं सन्त प्रवृत्ति के इमाम पैदा हुए, और उन्होंने इस्लाम के इतिहास के विभिन्न युगों में बड़े नाज़ुक वक़्तों में मुसलमानों का मार्गदर्शन किया और जिहाद का झण्डा बुलंद किया। हज़रत फ़ातिमा की हज़रत अली से दो लड़कियां, ज़ैनब और उम्मे कुलसूम, भी थीं। ज़ैनब की शादी उनके चचेरे भाई अब्दुल्लाह बिन जाफ़र से हुई, जिनकी गिनती अरब के बहुत रहमदिल, दानी लोगों में की जाती थी। उनसे अली और औन, दो लड़के पैदा हुए। उम्मे कुलसूम की शादी हज़रत उमर बिन अल-ख़त्ताब से हुई और उनसे एक लड़का हुआ जिनका नाम ज़ैद था।
हज़रत फ़ातिमा को छोड़कर अल्लाह के रसूल सल्ल० की सब औलादों का आप सल्ल० की ज़िन्दगी में ही निधन हो गया, जबकि हज़रत फ़ातिमा का निधन आप सल्ल० की वफ़ात के 6 माह बाद हुआ।
टिप्पणियां
- 1हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं कि “मुझे अल्लाह के रसूल सल्ल० की बीवियों में से किसी पर इतना प्यार नहीं आया जितना ख़दीजा पर, हालांकि मैंने उनको देखा भी नहीं।”
- 2इस्लामी आचार संहिता।
- 3इस्लामी आचार संहिता के अनुसार राय।
- 4विस्तार के लिए देखें लेखक मौलाना क़ाज़ी शाह मुहम्मद सुलेमान मन्सूरपुरी की किताब “रहमतुल्लिल आलमीन” का दूसरा भाग, पृ० 141–144।