अध्याय ग्यारह
बद्र की फ़ैसलाकुन जंग
हिजरत के दूसरे साल रमज़ान ही में बद्र की वह निर्णायक ऐतिहासिक जंग हुई जिसमें इस्लाम और उसकी दावत के भविष्य का फ़ैसला हुआ, जिस पर पूरी इंसानियत की क़िस्मत निर्भर थी। उसके बाद से आज तक मुसलमानों को जो भी कामयाबियां मिलीं और उनकी जितनी सल्तनतें क़ायम हुईं वह सब उसी फ़तह का प्रतिफल है जो बद्र के मैदान में मुट्ठी भर लोगों को हासिल हुई। क़ुरआन में इस जंग को “फ़ैसले का दिन” (यौमुल फ़ुरक़ान) कहा गया है:
उस जंग की पृष्ठभूमि यह है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० को यह ख़बर मिली कि अबू सुफ़ियान शाम (सीरिया) से क़ुरैश के बड़े व्यापारी क़ाफ़िले को लेकर मक्का जा रहा है, जिसके साथ बड़ा माल है। यह वह समय था जब मुसलमानों और मुशरिकों में लड़ाई का सिलसिला जारी था, और क़ुरैश ने इस्लाम की बढ़ती हुई ताक़त के मुक़ाबले, हक़ की राह में रुकावटें डालने और मुसलमानों के लिए अनेक तरह की कठिनाइयां पैदा करने में कोई कसर न छोड़ी थी। उन्होंने अपने सभी आर्थिक साधन, जंग का व अन्य ज़रूरी सामान इसके लिए लगा रखे थे। उनके जंगी दस्ते मदीना की सीमाओं और चरागाहों तक पहुंच जाते थे।
जब अल्लाह के रसूल सल्ल० को यह सूचना मिली कि इस्लाम का घोर विरोधी अबू सुफ़ियान इतने बड़े क़ाफ़िले के साथ आ रहा है तो आपने लोगों (सहाबा) को आगे बढ़कर उसका सामना करने का हुक्म दिया, लेकिन किसी विशेष तैयारी के साथ नहीं, क्योंकि यह एक व्यापारी क़ाफ़िला था, कोई सेना की टुकड़ी न थी। उधर अबू सुफ़ियान को यह ख़बर पहुंची कि अल्लाह के रसूल सल्ल० इस क़ाफ़िले के मुक़ाबले के लिए मदीना से चल चुके हैं तो उसने फ़ौरन अपना एक सन्देशवाहक मक्का भेजा और याचना की कि वह उसकी मदद करें, और मुसलमानों को आगे बढ़ने से रोकें। जब यह फ़रियाद और पुकार मक्का पहुंची तो क़ुरैश ने पूरी तैयारी शुरू कर दी और बहुत तेज़ी के साथ एक विशाल सेना लेकर मुक़ाबले के लिए निकल पड़े। उनके सरदारों में से कोई सरदार बाक़ी नहीं बचा जो इसमें शामिल न हुआ हो। उन्होंने आस-पास के क़बीलों को भी उसमें शामिल कर लिया। यह लश्कर बड़े ग़ुस्से में बदले की भावना से ओत-प्रोत चल पड़ा।
अन्सार की वफ़ादारी
जब अल्लाह के रसूल सल्ल० को यह सूचना मिली कि यह विशाल सेना प्रस्थान कर चुकी है तो आपने अपने साथियों से सलाह की। आप वास्तव में अन्सार की प्रतिक्रिया जानना चाहते थे, क्योंकि आपसे इसी बात पर बैअत की थी कि वह मदीना में आपकी पूरी मदद करेंगे। हज़रत मुहम्मद सल्ल० ने जब मदीना से प्रस्थान करने का इरादा किया तो आपने यह मालूम करना चाहा कि इस समय अन्सार का क्या विचार है। सबसे पहले मुहाजिरों ने अपनी बात कही और बहुत अच्छी तरह अपनी हिमायत का आपको विश्वास दिलाया। आपने दोबारा सलाह की। मुहाजिरों ने पुनः आपका समर्थन किया। जब तीसरी बार आपने पूछा तो अन्सार को एहसास हुआ कि आप उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहते हैं।
इसलिए साद बिन मुआज़ ने फ़ौरन इसका जवाब दिया और निवेदन किया, “या रसूलल्लाह सल्ल०! शायद आप यह सोच रहे हैं कि अन्सार ने सिर्फ़ अपने वतन में आपकी मदद का ज़िम्मा लिया है। मैं अन्सार की तरफ़ से यह बात कह रहा हूं कि आप जहां चाहें चलें, जिससे चाहें सम्बन्ध जोड़ें और जिससे चाहें ख़त्म करें, हमारे माल व दौलत में से जितना चाहें लें और हमको जितना चाहें दें, क्योंकि आप जो कुछ लेंगे वह हमें उससे कहीं अधिक प्यारा होगा जो आप छोड़ेंगे। आप कोई हुक्म देंगे तो हम उसका पालन करेंगे। अल्लाह की क़सम, अगर आप चलना शुरू करें यहां तक कि ‘बर्क़ ग़िमदान’1 तक पहुंच जाएं तब भी हम आपके साथ चलते रहेंगे, और अल्लाह की क़सम, अगर आप समुद्र में प्रवेश करेंगे तो हम भी आपके साथ उस समुद्र में कूद जाएंगे।”
मिक़दाद रज़ि० ने कहा, “हम आपसे ऐसा न कहेंगे जैसा मूसा अ० की क़ौम ने मूसा अ० से कहा था: ‘जाओ तुम और तुम्हारा रब दोनों मिलकर जंग करो, हम तो यहां बैठे रहेंगे।’ हम आपके दाएं लड़ेंगे, आपके बाएं लड़ेंगे और आपके सामने जाकर लड़ेंगे, आपके पीछे लड़ेंगे।”
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने यह वाक्य सुने तो आपका चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा। आपको अपने मानने वालों से यह बात सुनकर बहुत ख़ुशी हुई। आपने फ़रमाया, “चलो और बशारत (ख़ुशख़बरी) हासिल करो।”
नौजवानों में जिहाद का शौक़
जब मुजाहिदीन (जिहाद करने वाले) बद्र के मैदान की तरफ़ चले तो एक नौजवान सहाबी उमैर बिन अबी वक़्क़ास रज़ि०, जिनकी उम्र 16 वर्ष की थी, मुजाहिदों के साथ हो लिए। उन्हें डर था कि कहीं अल्लाह के रसूल सल्ल० उन्हें छोटा समझकर वापस न कर दें, इसलिए वह आपकी निगाह से बच रहे थे। उनके बड़े भाई साद बिन अबी वक़्क़ास रज़ि० ने उनसे छिपने की वजह पूछी तो उमैर ने कहा, “मुझे डर है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० मुझे कमसिन समझकर वापस न कर दें। मैं इस जिहाद में शामिल होना चाहता हूं, शायद अल्लाह पाक मुझे भी शहादत नसीब फ़रमाए।”
उनको जिसका डर था वही हुआ। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इस विचार से कि वह अभी जंग करने की उम्र में नहीं पहुंचे हैं, उनको वापस करना चाहा तो वह रोने लगे। यह देखकर अल्लाह के रसूल सल्ल० बहुत प्रभावित हुए, और आपने उन्हें शामिल होने की इजाज़त दे दी। उन्होंने इसी जंग में शहादत पाई और उनकी कामना पूरी हुई।
दोनों की सैन्य शक्ति में बड़ा फ़र्क़
अल्लाह के रसूल सल्ल० तेज़ी के साथ मैदान-ए-जंग की तरफ़ चले। आपके साथ 313 मुसलमान (सहाबी) थे। मुसलमानों के पास सिर्फ़ दो घोड़े और 70 ऊंट थे। एक-एक ऊंट पर दो-दो, तीन-तीन सहाबी बारी-बारी से बैठते थे। इसमें सेनापति और साधारण सिपाही में कोई भेद-भाव नहीं था। इसमें ख़ुद अल्लाह के रसूल सल्ल०, हज़रत अबू बक्र व हज़रत उमर रज़ि० व कई अन्य प्रमुख सहाबी शामिल थे। जिहाद का झण्डा हज़रत मुसअब बिन उमैर रज़ि० को, मुहाजिरीन का झण्डा हज़रत अली रज़ि० को और अन्सार का झण्डा हज़रत साद बिन मुआज़ रज़ि० को दिया गया।
जब अबू सुफ़ियान को यह सूचना मिली कि इस्लामी लश्कर (सेना) प्रस्थान कर चुका है तो वह नीचे समुद्र-तट की तरफ़ आ गया, और यह इत्मीनान करके कि अब उसे कोई ख़तरा नहीं और क़ाफ़िला भी सुरक्षित है, उसने क़ुरैश को यह सन्देश भेजा कि तुम लोग वापस लौट जाओ, क्योंकि तुम क़ाफ़िले की सुरक्षा के लिए आए थे और यह मक़सद पूरा हो चुका है। यह सुनकर उन लोगों ने वापस जाने का इरादा किया, लेकिन अबू जहल की ज़िद ने उनको वापस जाने से रोक दिया। वह इस पर किसी तरह तैयार न था कि बिना जंग किए वापस जाया जाए। क़ुरैश के लश्कर में सिपाही की संख्या एक हज़ार से अधिक थी और उसमें एक से एक अनुभवी वीर-बांकुरे शामिल थे। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उन्हें देखकर फ़रमाया, “मक्का ने आज अपने जिगर के टुकड़ों को तुम्हारे सामने डाल दिया है।”
क़ुरैश की सेना ने बद्र पहुंचकर घाटी के एक तरफ़ पड़ाव डाला, मुसलमानों ने दूसरी तरफ़। इस बीच हुबाब बिन अल-मुन्ज़िर रज़ि० अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास आए और कहा, “या रसूलल्लाह सल्ल०! क्या यहां हमने पड़ाव अल्लाह के हुक्म से डाला है और इसमें कोई बदलाव हमारे लिए जायज़ नहीं? या इसका सम्बन्ध सामरिक नीति से है?” आपने फ़रमाया, “नहीं, यह रण-कौशल की बात है। इसमें दुश्मन को धोखे में डालने की तमाम बातें की जा सकती हैं।” उन्होंने कहा, “या रसूलल्लाह सल्ल०! तब तो यहां पड़ाव डालना उचित नहीं है।” उन्होंने एक दूसरी जगह की तरफ़ इशारा किया जो हालात की नज़र से अधिक सुरक्षित थी। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अपनी सहमति जताई।
उसके बाद आप अपने सभी साथियों के साथ उस जगह की तरफ़ चले और वहां पहुंचकर पड़ाव डाला, जो पानी से ज़्यादा क़रीब थी। अल्लाह के रसूल सल्ल० और उनके साथी रात तक सबसे पहले पानी तक पहुंच गए और उसके हौज़ तैयार कर लिए। आप सल्ल० ने कुफ़्फ़ार को भी उससे पानी पीने की इजाज़त दी। उसी रात पानी भी बरसा, जो मुशरिकों को बहुत भारी पड़ा और उनका आगे बढ़ना रुक गया, लेकिन मुसलमानों के लिए यह रहमत की बारिश साबित हुई, जिसने रेत को और जमा दिया। इस तरह अल्लाह ने मुसलमानों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर दिया और उनके दिलों को इत्मीनान नसीब हुआ। क़ुरआन पाक में आता है:
हज़रत मुहम्मद सल्ल० सेनापति के रूप में
इस मौक़े पर आपका असाधारण एवं अद्वितीय नेतृत्व अपनी चरम सीमा पर था। आपकी व्यूह-रचना, दुश्मन की ताक़त का सही अन्दाज़ा, उसके पड़ाव तथा टुकड़ियों की सही जानकारी, यह वह चीज़ें हैं जिनमें आपके नेतृत्व का सही अनुमान लगाया जा सकता है।
जंग की तैयारी
आप सल्ल० के लिए मैदान-ए-जंग के सामने एक टीले पर एक छप्पर डाल दिया गया। वहां से आप मैदान में आए और हाथ के इशारे से बताने लगे कि इन्शा अल्लाह (अल्लाह ने चाहा) यहां फ़लां आदमी मारा जाएगा, यहां फ़लां आदमी मारा जाएगा। अतएव एक जगह भी उसके विपरीत नहीं हुआ, और आपका कहना शब्द-ब-शब्द सही हुआ।
जब दोनों सेनाएं आमने-सामने हुईं तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने कहा, “ऐ अल्लाह! यह क़ुरैश के लोग आज पूरे घमण्ड के साथ आए हैं, यह तुझसे लड़ाई पर तुले हुए हैं और तेरे रसूल को झूठा ठहरा रहे हैं।”
वह जुमा (शुक्रवार) की रात थी और रमज़ानुल मुबारक की 17 तारीख़। सुबह हुई तो क़ुरैश की टुकड़ियां सामने आ चुकी थीं और दोनों पक्ष आमने-सामने थे।
अल्लाह से दुआ
अल्लाह के रसूल सल्ल० व्यूह-रचना करने के बाद अपने शिविर में हज़रत अबू बक्र रज़ि० के साथ वापस आए और अल्लाह से गिड़गिड़ाकर दुआ की। आप ख़ूब जानते थे कि अगर आज मुसलमानों के भाग्य का फ़ैसला संख्या व शक्ति के आधार पर होगा तो परिणाम साफ़ है। मुसलमान कम और कमज़ोर थे। दुश्मनों का पलड़ा भारी था। दोनों की संख्या और बल का कोई जोड़ न था। आपने यह देखकर मुसलमानों के पलड़े पर वह पासंग रख दिया जो सबसे भारी था, और उससे मुसलमानों का पलड़ा भारी हो गया। आपने सृष्टि के निर्माता उस महाशक्ति के सामने अपनी फ़रियाद रखी जिसके फ़ैसले और हुक्म कोई टाल नहीं सकता, और मुसलमानों के लिए अल्लाह की मदद और समर्थन की सिफ़ारिश फ़रमाई।
आपने फ़रमाया, “ऐ अल्लाह! अगर आज तूने मुझसे जिस चीज़ का वादा किया है वह पूरा फ़रमा। ऐ अल्लाह! तेरी मदद की ज़रूरत है।” आप दोनों हाथ उठाकर दुआ फ़रमा रहे थे, यहां तक कि चादर आपके कन्धे से गिर पड़ी। हज़रत अबू बक्र रज़ि० आपको ढारस दे रहे थे और इत्मीनान दिला रहे थे। उनसे आपका रोना देखा न जाता था।
मुसलमानों का वास्तविक परिचय
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इस नाज़ुक घड़ी में अपनी छोटी-सी सेना के लिए जिन संक्षिप्त शब्दों में अल्लाह से याचना की, वह आपके आत्मविश्वास, आपकी बेचैनी, सब्र और विनय का परिचायक था। इन शब्दों द्वारा मुसलमानों का वास्तविक परिचय, दुनिया में असल स्थान तथा उनकी वास्तविक क़ीमत और उनकी उपयोगिता व ज़रूरत का सही-सही चित्रण पेश किया गया था, और यह इस बात का एलान था कि यह उम्मत जिस सीमा की रक्षा के लिए तैनात की गई है, वह सच्चे दिल से अल्लाह की इबादत, उसके आदेशों का पूरी तरह पालन और उसकी तरफ़ सच्चे मन से लोगों को बुलाने के साथ उसकी इबादत और उसकी पूरी इताअत का मोर्चा है।
बद्र की कामयाबी ने, जिसने सभी अन्दाज़ों को ग़लत साबित कर दिखाया, आप सल्ल० के शब्दों को सदा के लिए साकार कर दिया और प्रमाण पेश कर दिया कि आपकी बात शब्द-ब-शब्द सही थी। वास्तव में मुसलमानों की सही, सच्ची और बोलती हुई तस्वीर यही है।
फिर अल्लाह के रसूल सल्ल० सेना के सामने आए और अल्लाह के रास्ते में जिहाद व शहादत का शौक़ दिलाया। इसी बीच उत्बा बिन रबीआ, उसका भाई शैबा और उसका बेटा वलीद सामने आ गए और मुसलमानों को ललकारा। उनकी ललकार के जवाब में अन्सार के तीन नौजवान निकले, जिन्हें देखकर उन्होंने पूछा, “तुम कौन लोग हो?” जवाब मिला, “हम अन्सार में से हैं।” वह कहने लगे, “शरीफ़ लोग हो, लेकिन हमारे जोड़ के नहीं हो। हमारे मुक़ाबले के लिए हमारे चचेरे भाइयों में से (क़ुरैश) किसी को भेजो।” यह सुनकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने कहा, “उबैदा बिन अल-हारिस, हमज़ा, अली! तुम तीनों इनके मुक़ाबले के लिए जाओ।” उनको देखकर उन्होंने कहा, “हां, अब बराबर की जोड़ी है।”
सबसे पहले उबैदा ने, जो उन तीनों में बड़े थे, उत्बा को ललकारा, हमज़ा ने शैबा को और अली ने वलीद बिन उत्बा को ललकारा। हज़रत हमज़ा और हज़रत अली रज़ि० ने देखते ही देखते उन दोनों का काम तमाम कर दिया। उबैदा और उत्बा में कुछ लड़ाई हुई। कोई फ़ैसला न होता देखकर हज़रत अली और हज़रत हमज़ा ने अपनी तलवारें लेकर उत्बा पर हमला किया और उसका काम तमाम करके हज़रत उबैदा को ज़ख़्मी हाल में वापस लाए, और उन्होंने बाद में शहादत पाई। इसी वक़्त दोनों सेनाओं में जंग छिड़ गई और वे एक-दूसरे से लड़ने लगे। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “चलो, बढ़ो उस जन्नत की तरफ़ जिसकी चौड़ाई आसमानों और ज़मीन के बराबर है।”
पहला शहीद
उमैर बिन अल-हुमाम अन्सारी ने यह वाक्य सुना तो कहने लगे, “या रसूलल्लाह! वह जन्नत आसमानों और ज़मीनों के बराबर है?” आपने फ़रमाया, “हां।” कहने लगे, “वाह! वाह!” आपने फ़रमाया, “यह तुम क्या कह रहे हो?” उन्होंने कहा, “नहीं, या रसूलल्लाह, और कोई बात नहीं। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि शायद मेरी क़िस्मत में भी यह जन्नत हो।” आपने फ़रमाया, “हां, हां! तुम्हें यह जन्नत नसीब होगी।” इसके बाद उन्होंने अपने तरकश से कुछ खजूरें निकालीं और खाने लगे। फिर अचानक कहने लगे कि अगर मैंने खजूरों को ख़त्म करने का इन्तज़ार किया तो बहुत देर हो जाएगी, इतना जीने की ताब नहीं। यह कहकर जो खजूरें रह गई थीं फेंक दीं और लड़ाई के मैदान में कूद पड़े और शहादत पाई। यह बद्र की लड़ाई के पहले शहीद थे।
दूसरी तरफ़ इस्लाम के मुजाहिद सीसा पिलाई हुई दीवार की तरह दुश्मनों के लश्कर के मुक़ाबले में डटे हुए थे। उनमें सब्र था, साहस था और उनके दिल अल्लाह की याद में डूबे रहते थे। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने लड़ाई में भरपूर हिस्सा लिया। आप दुश्मन से सबसे अधिक क़रीब थे और आपसे अधिक बहादुर वीर कोई दूसरा नज़र न आता था। अल्लाह ने मुसलमानों की मदद के लिए फ़रिश्ते भेजे और उन्होंने मुशरिकों को तहस-नहस कर दिया। क़ुरआन पाक में अल्लाह का इरशाद है:
जिहाद का शौक़
जिहाद के शौक़ में और शहादत के शौक़ में आज सगे भाइयों और क़रीबी दोस्तों में रस्साकशी हो रही थी। अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ि० बयान करते हैं कि बद्र की लड़ाई में मैं अपनी टुकड़ी में था कि अचानक मेरी निगाह उठी। मैंने देखा कि मेरे दाएं और बाएं दो कमसिन नौजवान हैं। इन दोनों को अपने पास देखकर मुझे कुछ चिन्ता हुई। मैं सोच ही रहा था कि उनमें से एक ने अपने साथी से छुपाते हुए मेरे कान में चुपके से कहा, “चाचा! मुझे ज़रा अबू जहल को दिखा दीजिए।” मैंने कहा, “तुम्हारा इससे क्या मतलब है?” उन्होंने कहा, “मैंने अल्लाह से अहद किया था कि जहां कहीं भी उसको देख लूंगा उसे ज़रूर ठिकाने लगा दूंगा या अपनी जान दे दूंगा।” दूसरे ने भी मेरे कान में चुपके से यही बात कही। हज़रत अब्दुर्रहमान कहते हैं कि मैंने अबू जहल की तरफ़ इशारा ही किया था कि दोनों बाज़ की तरह उस पर झपटे और उसे वहीं ढेर कर दिया। यह दोनों जियाले ‘अफ़रा’ के सपूत थे। जब अबू जहल मारा गया तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “यह अबू जहल है, इस उम्मत का फ़िरऔन।”
कामयाबी
इस लड़ाई में मुसलमानों को कामयाबी हुई और कुफ़्फ़ार की हार। कामयाबी पर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “अल्लाह का शुक्र है जिसने अपना वादा पूरा किया, अपने बन्दे की मदद फ़रमाई और अकेले सारी पार्टियों को परास्त दी।” क़ुरआन पाक में आया है:
आपने आदेश दिया कि सारे मृतकों को वहां स्थित अन्धे कुएं में डाल दिए जाएं। वह सब उसमें डाल दिए गए। आपने वहां खड़े होकर कहा, “ऐ कुएं वालो! क्या तुमको तुम्हारे रब का कहना सच नज़र आया? मैंने तो अपने रब का वादा बिल्कुल हक़ पाया है।”
इस लड़ाई में कुफ़्फ़ार के 70 बड़े नामी सरदार मारे गए और 70 क़ैदी बनाए गए। मुसलमानों में क़ुरैश के 6 और अन्सार के 8 सहाबी शहीद हुए।
जंग-ए-बद्र का नतीजा
जंग ख़त्म होने के बाद अल्लाह के रसूल सल्ल० मदीना वापस आए। इस जंग की वजह से मदीना और आस-पास दुश्मनों पर मुसलमानों का रौब व दबदबा बन गया और मदीनावासी बड़ी संख्या में इस्लाम लाए।
कामयाबी की ख़ुशख़बरी लेकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जिन दो लोगों को पहले मदीना भेजा था, उनमें एक अब्दुल्लाह बिन रवाहा थे। उन्होंने मदीनावासियों को कामयाबी की ख़ुशख़बरी इन शब्दों में सुनाई, “ऐ अन्सार के लोगो! अल्लाह के रसूल सल्ल० की सलामती और कुफ़्फ़ार की गिरफ़्तारी व क़त्ल तुम्हें मुबारक हो।” क़ुरैश के जो सरदार लड़ाई में मारे गए थे, वह उनमें से एक-एक के नाम का एलान करते और घर जाकर यह ख़ुशख़बरी सुनाते। बच्चे उनके साथ तराने गाते और ख़ुशियां मनाते। कुछ लोग यह ख़बर सुनकर यक़ीन करते और कुछ चिन्तित होते और अल्लाह के रसूल सल्ल० के आने का बेसब्री से इन्तज़ार करते, क्योंकि उन्हें यक़ीन नहीं होता था, और जब अल्लाह के रसूल सल्ल० मदीना तशरीफ़ लाए। इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्ल० के ग़ुलाम शुक़रान की निगरानी में क़ैदियों को लाया गया। हज़रत मुहम्मद सल्ल० जब “रौहा” पहुंचे तो मुसलमानों ने आगे बढ़कर आपकी अगवानी की और कामयाबी के लिए बधाई दी।
मक्का के मुशरिकों के घरों में हाहाकार मच गया। जो लोग मारे गए थे उनके घरों में रोना-पीटना मच गया। इस्लाम के दुश्मनों के दिलों पर इस्लाम का रौब बैठ गया। अबू सुफ़ियान ने मन्नत मानी कि जब तक अल्लाह के रसूल सल्ल० और मुसलमानों से उसकी दोबारा लड़ाई न होगी तब तक वह अपने सर पर पानी की एक बूंद भी नहीं डालेगा। बद्र में कामयाबी से मक्का के मुसलमानों ने इत्मीनान की सांस ली और वह अपने अन्दर ताक़त व इज़्ज़त महसूस करने लगे।
ईमान का रिश्ता ख़ून के रिश्ते से अधिक मज़बूत
बद्र की लड़ाई में अबू अज़ीज़ बिन उमैर बिन हाशिम भी क़ैदी बनाकर लाए गए। यह मुसअब बिन उमैर रज़ि० के सगे भाई थे। मुसअब बिन उमैर मुसलमानों का झण्डा लेकर चलते थे और उनके भाई कुफ़्फ़ार का झण्डा। लड़ाई के मैदान में जब मुसअब अपने भाई के पास से गुज़रे तो उस समय एक अन्सारी उनके हाथ बांध रहे थे। मुसअब ने अन्सारी से कहा, “ज़रा अच्छी तरह कसना, इसकी मां बड़ी मालदार है, उससे फ़िदये की अच्छी रक़म मिलने की उम्मीद है।” अबू अज़ीज़ ने यह सुनकर अपने भाई मुसअब की तरफ़ मुंह करके कहा, “भाई! तुम भाई होकर यह सलाह दे रहे हो?” मुसअब ने कहा, “तुम मेरे भाई नहीं हो। भाई वह है जो तुम्हारे हाथ बांध रहा है।”
क़ैदियों के साथ मुसलमानों का सुलूक
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने क़ैदियों के साथ अच्छा सुलूक करने की नसीहत फ़रमाई। अबू अज़ीज़ बयान करते हैं कि जब वह मुझे बद्र से क़ैदी बनाकर लाए तो मुझे अन्सार के एक ख़ानदान में जगह मिली। वह दोनों वक़्त अपने खानों में से रोटी तो मुझे देते और ख़ुद खजूर पर गुज़ारा करते। यह अल्लाह के रसूल सल्ल० की नसीहत का असर था कि किसी को कहीं से रोटी का एक टुकड़ा भी मिल जाता तो मुझे लाकर देता। मुझे शर्म महसूस होती और मैं उसे लौटा देता, लेकिन वह ज़बरदस्ती मुझे देता और ख़ुद उसे हाथ भी न लगाता।
इन्हीं क़ैदियों में अल्लाह के रसूल सल्ल० के चाचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब, आपके चचेरे भाई अक़ील बिन अबी तालिब और आप सल्ल० की बेटी ज़ैनब के पति अबुल आस बिन अर-रबीअ भी थे। उनके साथ कोई विशिष्ट बर्ताव न करके आम क़ैदियों जैसा ही बर्ताव किया गया।
बच्चों की शिक्षा के बदले क़ैदियों की रिहाई
रसूलुल्लाह सल्ल० ने इन क़ैदियों के साथ अच्छा बर्ताव किया और उनका फ़िदया स्वीकार किया। जो जितना मालदार होता उसी के अनुसार उससे फ़िदया लिया जाता। जिनके पास देने के लिए कुछ न होता, आप उसे छोड़ देने का आदेश देते। क़ुरैश ने बहुत-से क़ैदी फ़िदया देकर आज़ाद कराए। कुछ ऐसे क़ैदी भी थे जिनका फ़िदया नहीं हो सका। आपने उनके लिए सुझाव दिया कि वह अन्सार के बच्चों को लिखना-पढ़ना सिखाएं। एक क़ैदी पर दस मुसलमानों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी अनिवार्य की गई। ज़ैद बिन साबित रज़ि० ने इसी तरह शिक्षा हासिल की थी। शिक्षा के महत्व तथा उसकी गरिमा का जो भाव आपके इस सुझाव में निहित है, उसकी विवेचना की ज़रूरत नहीं।
अन्य लड़ाइयां
जैसा कि ऊपर गुज़रा, अबू सुफ़ियान ने क़सम खाई थी कि जब तक मुसलमानों से बदला नहीं ले लेगा, अपने सर पर पानी की एक बूंद भी नहीं डालेगा। वह अपनी क़सम पूरी करने के लिए क़ुरैश के दो सौ सवारों के साथ निकला, और बनी नज़ीर के सरदार सल्लाम बिन मिश्कम से इजाज़त चाही। उन्होंने न सिर्फ़ इजाज़त दी, बल्कि उनकी ख़ूब आव-भगत भी की, और मदीना के हालात का उन्हें ज्ञान कराया, तथा साथ में कुछ लोगों को भेजा, जिन्होंने अन्सार में से दो आदमियों को शहीद कर दिया।
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने सहाबा किराम के साथ उनका पीछा किया, लेकिन अबू सुफ़ियान और उनके साथी मुसलमानों के पहुंचने से पहले निकल भागे और अपने पीछे बड़ी मात्रा में खाद्यान्न, जिसमें अधिकतर सत्तू था, छोड़ गए। इसीलिए इस लड़ाई को “ग़ज़वा-ए-सवीक़” भी कहा जाता है।
“बनू क़ैनुक़ा” पहले यहूदी थे जिन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ समझौते को तोड़ा, आपसे लड़ाई की और मुसलमानों को दुख पहुंचाया। अतएव अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनको घेर लिया और 15 रातें इसी हाल में गुज़ारीं, यहां तक कि उन्होंने परास्त स्वीकार कर ली और आपके फ़ैसले पर राज़ी हो गए। उनके सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई की सिफ़ारिश पर आपने घेरा उठा लिया। यह सात सौ लोग थे, अधिकांश सुनारी व दुकानदारी करते थे।
यहूदियों का सरदार कअब बिन अल-अशरफ़ आपको बराबर तकलीफ़ें पहुंचाता था और मुसलमान औरतों के बारे में भद्दी कविताएं लिखा करता था। बद्र की लड़ाई के बाद उसने मक्का के कुफ़्फ़ार को हज़रत मुहम्मद सल्ल० और मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काना शुरू किया। इसी हाल में वह मदीना पहुंचा तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “कअब बिन अल-अशरफ़ ने अल्लाह और उसके रसूल को बहुत तकलीफ़ पहुंचाई है। इसका कोई इन्तज़ाम कर सकता है?” अन्सार के कुछ लोग उसी समय खड़े हो गए और उसका काम तमाम कर दिया।
टिप्पणियां
- 1सीरत इब्ने हिशाम में “बर्कुल ग़िमाद” का शब्द आया है। यह यमन के इलाक़े में एक स्थान का नाम है। एक कथन यह भी है कि वह हिज्र (दियारे समूद) का एक दूर स्थित हिस्सा है। सुहैली कहते हैं कि मैंने तफ़सीर की कुछ किताबों में देखा है कि वह हब्शा का शहर है। कुछ भी हो, वह मदीना से दूर स्थित कोई स्थान था।