अध्याय तेईस

शिष्टमण्डलों का वर्ष

पहले अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्ल० के हाथों मक्का फ़तह फ़रमाया। फिर तबूक के मोर्चे से कामयाब होकर वापस हुए। इससे पहले आप सल्ल० विभिन्न राज्याध्यक्षों के नाम ख़त भेज चुके थे जिनमें उन्हें इस्लाम की दावत दी गई थी। इन ख़तों का कुछ ने श्रद्धा व सम्मान से स्वागत किया, कुछ ने नर्मी के साथ उसका जवाब दिया, कुछ अनिश्चितता की हालत में रहे और कुछ ने उसे गुस्ताख़ी के साथ रद्द कर दिया। यह वह घटना थी जिसकी ख़बर पूरे अरब में थी और जगह-जगह उसकी चर्चा होती थी।

मक्का अरब प्रायद्वीप का धार्मिक व आध्यात्मिक केन्द्र था। मक्का की फ़तह के बाद क़ुरैश का इस्लाम ले आना अरब के उन लोगों के लिए बड़ा प्रभावशाली साबित हुआ जो अनिश्चितता की हालत में थे या इस्लाम की नाकामी के सपने देख रहे थे। इस घटना ने उनका रास्ता साफ़ कर दिया। हदीस के मशहूर विद्वान अल्लामा मुहम्मद ताहिर पटनी अपनी मशहूर किताब ‘मजमा-ए-बिहारुल अनवार’ में लिखते हैं:

“यह वर्ष शिष्टमण्डलों के आगमन का वर्ष था। अरब क़बीलों ने इस्लाम के साथ क़ुरैश की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा की थी, क्योंकि वही लोगों के अगुवा थे और काबा के ज़िम्मेदार भी। जब उन्होंने इस्लाम के सामने घुटने टेक दिए, मक्का फ़तह हो गया और क़बीले सक़ीफ़ ने भी इस्लाम क़बूल कर लिया, तो उन्होंने महसूस किया कि अब उनके अन्दर मुक़ाबले की ताक़त नहीं। इस समय चारों तरफ़ से शिष्टमण्डलों का आगमन शुरू हुआ और लोग जत्थे के जत्थे में आकर अल्लाह के रसूल सल्ल० के हाथ पर इस्लाम में शामिल होने की बैअत करने लगे।” (खण्ड पांच, पृ० 272)

इन घटनाओं का अरबों के दिल व दिमाग़ पर गहरा असर पड़ा और उनके लिए आप सल्ल० की सेवा में हाज़िर होकर इस्लाम ले आने के दरवाज़े खुल गए। शिष्टमण्डल इस तरह इस्लाम की परिधि में आने लगे जैसे कोई मोती की लड़ी टूट जाए और उसके सारे दाने एक तरफ़ लुढ़क जाएं। यह शिष्टमण्डल आते और इस्लाम की दावत का नया जज़्बा व ईमान का नया जोश तथा बुतपरस्ती व शिर्क के प्रति गहरी नफ़रत की भावना लेकर वापस जाते।

इन शिष्टमण्डलों में एक मण्डल बनी तमीम का भी था जिसमें उनकी क़ौम के मशहूर रईस व सरदार शामिल थे। उनके प्रवक्ता व शायर और मुसलमानों के प्रवक्ता व शायर में मुक़ाबला हुआ और इसमें इस्लाम के प्रवक्ता कामयाब रहे। इस कामयाबी को उनके सरदारों ने स्वीकार किया। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उन्हें ख़ूब इनाम भी दिए।

बनी आमिर का शिष्टमण्डल भी आया। बनी साद बिन बक्र की तरफ़ से ज़िमाम बिन सअलबा प्रतिनिधि बनकर आए और मुसलमान होकर अपनी सेना में प्रचारक बनकर गए। वहां पहुंचकर उनका पहला वाक्य था, “बुरा हो ‘लात’ व ‘उज़्ज़ा’ का!” लोगों ने कहा, “अरे क्या कहते हो ज़िमाम! कोढ़ से डरो, हाथीपांव से डरो, पागलपन से डरो।” वह कहने लगे, “तुम्हारी ख़राबी हो! अल्लाह की क़सम! यह दोनों न नुक़सान पहुंचा सकते हैं न फ़ायदा। बेशक अल्लाह ने एक रसूल भेजा है और उन पर एक किताब उतारी है जिसके द्वारा उन्होंने तुमको इससे छुटकारा दिया जिसमें तुम लोग हो, और मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं, और मुहम्मद सल्ल० उसके बन्दे और रसूल हैं। मैं उनके पास से जो कुछ उन्होंने हुक्म दिया और जिस चीज़ से मना किया है, वही तुम्हारे लिए लेकर आया हूं।” उस दिन शाम भी नहीं हुई कि उनके मुहल्ले में कोई औरत-मर्द ऐसा नहीं था जो इस्लाम न ला चुका हो।

बनी हनीफ़ा का शिष्टमण्डल आया जिसमें मुसैलिमा कज़्ज़ाब भी था। यह मुसलमान हुआ लेकिन बाद में उससे फिर गया और ख़ुद नुबूवत का दावेदार बन बैठा। मुसलमानों से लड़ाई में मारा गया।

‘बनी तै’ के शिष्टमण्डल में मशहूर घुड़सवार ‘ज़ैदुल ख़ैल’ भी थे, जिनका नाम अल्लाह के रसूल ने बदलकर ‘ज़ैदुल ख़ैर’ कर दिया। इनकी गिनती मोमिनों में हुई।

मशहूर उदार हातिम के बेटे अदी बिन हातिम भी आपकी सेवा में हाज़िर हुए और आपका सुलूक देखकर इस्लाम ले आए। अदी कहते हैं, “अल्लाह की क़सम! यह किसी बादशाह का अन्दाज़ नहीं है।”

‘बनी ज़ुबैद’ का शिष्टमण्डल भी आपके पास आया। इसमें अरब के मशहूर घुड़सवार अम्र बिन मादीकरिब भी थे। ‘किन्दा’ के शिष्टमण्डल में ‘अशअस बिन क़ैस’ शामिल थे। ‘अज़्द’ का शिष्टमण्डल भी आया। बादशाह हिमयर का एक दूत भी और अपने बादशाहों का ख़त लाया जिसमें वहां के लोगों ने इस्लाम क़बूल करने की सूचना दी थी।

मुआज़ बिन जबल तथा अबू मूसा रज़ि० को आपने इस्लाम की दावत देने के लिए यमन भेजा, और उन्हें निर्देश दिया, “देखो! आसानी पैदा करना, तंगी व सख़्ती न करना, ख़ुशख़बरी देना, बेज़ार (परेशान) न करना।”

फ़रवा बिन अम्र अल-जुज़ामी ने एक दूत भेजकर आपको अपने इस्लाम क़बूल करने की सूचना दी। फ़रवा रूमी सल्तनत की तरफ़ से ‘मआन’ का गवर्नर था।

‘नजरान’ बनू अल-हारिस बिन काब, ख़ालिद बिन वलीद के हाथ पर इस्लाम लाए। हज़रत ख़ालिद बिन वलीद ने वहां पड़ाव करके उनको इस्लाम की दावत दी। उसके बाद ख़ालिद अपने साथ बनू अल-हारिस का एक शिष्टमण्डल लेकर वापस आए। जब वह लोग अपने इलाक़े में वापस गए तो उनकी शिक्षा के लिए आपने अम्र बिन हज़्म को भेजा कि वह सुन्नत और इस्लामी तरीक़ों से उनको परिचित कराएं। ‘हमदान’ का शिष्टमण्डल भी आपकी सेवा में हाज़िर हुआ।

मुग़ीरा बिन शोबा को अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ‘लात’ बुत को तोड़ने के लिए भेजा। उन्होंने पहले इस बुत के टुकड़े किए, फिर वह बुतख़ाने की चहारदीवारी पर चढ़ गए, और दूसरे लोग जो उनके साथ वह भी चढ़ गए, और सबने मिलकर उसके एक-एक पत्थर को गिराना शुरू कर दिया, यहां तक कि वह ज़मीन के बिल्कुल बराबर हो गया। उसी दिन यह शिष्टमण्डल वापस भी आ गया। आपने उसकी प्रशंसा की।

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अब्दुल क़ैस के शिष्टमण्डल का स्वागत किया और उन्हें उन बर्तनों को प्रयोग करने से मना किया जिनमें नशा जल्दी पैदा होता है। आपने ऐसा इसलिए किया कि अब्दुल क़ैस के लोग पीने-पिलाने के आदी थे।

‘अशअरीन’ तथा यमनवासियों का शिष्टमण्डल बड़ी मस्ती के साथ वह शेर पढ़ता हुआ आया जिसका अर्थ है, “कल हम प्रिय से मिलेंगे, मुहम्मद सल्ल० और आपके साथियों से।” आपने इस शिष्टमण्डल को देखकर फ़रमाया, “तुम्हारे पास यमनवासी आए हैं, जो बहुत नर्म व कोमल दिल वाले हैं। ईमान तो यमन का हिस्सा है, हिकमत तो यमन की हिकमत है।”

ख़ालिद बिन वलीद को अल्लाह के रसूल सल्ल० ने एक दल के साथ इस्लाम के प्रचार के लिए यमनवासियों के पास भेजा। उन्होंने वहां 6 महीने गुज़ारे। हज़रत ख़ालिद बराबर उनको इस्लाम की दावत देते और वह क़बूल न करते। फिर आपने हज़रत अली को वहां भेजा। उन्होंने उनको आप सल्ल० का ख़त पढ़कर सुनाया और पूरा क़बीला हमदान मुसलमान हो गया। हज़रत अली ने आपको उनके इस्लाम लाने की सूचना भेजी। आपने जब उनका ख़त पढ़ा तो सजदे में गिर पड़े, फिर सर उठाया और फ़रमाया, “सलामती हो हमदान पर, सलामती हो हमदान पर।”

मुज़ैना का शिष्टमण्डल 400 लोगों के साथ आया। नजरान के ईसाइयों का भी एक शिष्टमण्डल आया जिसमें 60 सवार थे। इसमें उनके 24 सरदार थे, जिनमें उनके बड़े पादरी अबू हारिसा भी थे। रूमी बादशाह उनका बड़ा आदर करते थे और उनकी हर तरह से आर्थिक मदद करते थे और उनके लिए गिरजे बनवाते थे। इन लोगों के बारे में क़ुरआन पाक में अनेक स्थानों पर आयतें उतरी हैं।

नजरानवासियों के लिए अल्लाह के रसूल सल्ल० ने एक ख़त भेजा और उनको इस्लाम की दावत दी। यह ख़त पढ़कर उन्होंने आपके पास एक शिष्टमण्डल भेजा। उसने बहुत से सवाल आपके सामने रखे जिसके जवाब में ‘सूरह आले इमरान’ की कई आयतें उतरीं। आपने उनको ‘मुबाहला’1 के लिए बुलाया, लेकिन डर के मारे वह इस पर तैयार नहीं हुए। दूसरे दिन यह लोग फिर आपके पास आए। उस समय आपने उनको एक लिखित दी, उन पर टैक्स लगाया और अबू उबैदा बिन अल-जर्राह को उनके साथ यह कहकर भेजा, “यह उम्मत के अमीन हैं।”

तुजैब का शिष्टमण्डल आया तो आपको बहुत ख़ुशी हुई। आपने उनकी बहुत इज़्ज़त और सत्कार किया। उन्होंने आपसे अनेक सवाल किए। आपने उनको सवालों के जवाब लिखवाकर दे दिए। फिर वह आपसे क़ुरआन व सुन्नत के बारे में बहुत सी बातें पूछने लगे। इस कारण आपको उनसे विशेष लगाव पैदा हो गया। आपने हज़रत बिलाल को निर्देश दिया कि उनकी अच्छी तरह मेहमानदारी करें। यह लोग थोड़े दिन आपके पास रहे। जाते समय उनसे पूछा गया कि वह क्यों इतनी जल्दी कर रहे हैं, तो वह कहने लगे, “हम अपने लोगों में जाकर बताना चाहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल० के दर्शन हमने कैसे किए, आपके साथ हमारी क्या-क्या बातें हुईं और आपने क्या जवाब दिए।” इसके बाद वह लोग वापस गए और पुनः सन् 10 हिजरी के हज में ‘मिना’ में आपकी सेवा में हाज़िर हुए।

इन शिष्टमण्डलों में बनी फ़ज़ारा, बनी असद, बहरा और उज़्रा के शिष्टमण्डल भी थे। यह सब लोग इस्लाम लाए। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इन्हें शाम (सीरिया) की फ़तह की ख़ुशख़बरी सुनाई। उन्हें जादूगरनियों के पास जाकर उनसे क़िस्मत का हाल पूछने से मना किया। वह जो क़ुर्बानियां करते थे उन्हें भी मना किया और फ़रमाया कि सिर्फ़ ईदुल अज़हा की क़ुर्बानी जायज़ है। ‘बली’, ‘ज़ी मुर्रा’ और ख़ौलान के शिष्टमण्डल भी आए। उनसे आपने ख़ौलान के बारे में पूछा। उन्होंने कहा, “मुबारक हो, आप जो कुछ लेकर आए हैं उससे अल्लाह ने उसको बदल दिया है। कुछ पुराने लोग, कुछ बड़ी-बूढ़ी औरतें अब भी उसको अपने सीने से लगाए हुए हैं। जब हम वापस जाएंगे तो अल्लाह ने चाहा, उस बुत को तोड़ डालेंगे।” ‘मुहारिब’, ‘ग़स्सान’, ‘ग़ामिद’ और ‘नख़अ’ के शिष्टमण्डल भी आपके पास आए।

यह शिष्टमण्डल आपकी सेवा में हाज़िर होकर दीन सीखते, दीन की समझ और जानकारी हासिल करते, अल्लाह के रसूल सल्ल० के उच्च आचरण को देखते, और आपके साथियों सहाबा का साथ उन्हें नसीब होता। प्रायः मस्जिद-ए-नबवी में उनके लिए शिविर लगा दिया जाता। वह वहां रहते, क़ुरआन पाक सुनते, मुसलमानों को नमाज़ पढ़ते हुए देखते, और उनके दिल में जो कुछ आता बड़ी सादगी और सफ़ाई से अल्लाह के रसूल सल्ल० से पूछ लेते। आप सल्ल० बड़े अच्छे ढंग से उन्हें समझाते, क़ुरआन पाक से उदाहरण देते। इससे उनका ईमान पक्का होता और उनके अन्तःकरण को सुकून मिलता।

एक जाहिल से संवाद

किनाना बिन अब्द यालैल एक जाहिल बुत पूजने वाला था। आप सल्ल० और उसके बीच जो संवाद हुआ वह इस तरह है:

किनाना: जहां तक ज़िना (बलात्कार) का मसला है, हम लोग अक्सर ग़ैर-शादीशुदा रहते हैं, इसलिए यह हमारे लिए ज़रूरी है।
अल्लाह के रसूल सल्ल०: वह तुम पर हराम है। अल्लाह पाक का इरशाद है, “और ज़िना के पास भी न जाना कि वह बेहयाई और बुरा रास्ता है।”

किनाना: सूद के बारे में जो आप कहते हैं, तो हमारा सारा माल सूद ही सूद है।
अल्लाह के रसूल सल्ल०: मूलधन वापस लेने का तुम्हें हक़ है। अल्लाह पाक का इरशाद है, “मोमिनो! अल्लाह से डरो, और अगर ईमान रखते हो, जितना सूद बाक़ी रह गया है उसको छोड़ दो।”

किनाना: जहां तक शराब की बात है, तो वही तो हमारी ज़मीन का निचोड़ है, और हमारे लिए बहुत ज़रूरी है।
अल्लाह के रसूल सल्ल०: अल्लाह ने इसे हराम किया है। उसका इरशाद है, “ऐ ईमान वालो! शराब और जुआ और बुत व पांसे (यह सब) नापाक काम और शैतान के काम हैं, सो इनसे बचते रहना ताकि छुटकारा पाओ।”

किनाना: रब्बा बुत के बारे में आप क्या कहते हैं?
अल्लाह के रसूल सल्ल०: उसको तोड़ डालो।
किनाना और उसके साथी: अगर रब्बा को मालूम हो जाए कि आप उसको तोड़ देना चाहते हैं तो वह अपने सब पुजारियों को ख़त्म कर दें।

इस पर हज़रत उमर रज़ि० ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, “बिन अब्द यालैल! तुम्हारी ख़राबी हो। तुम कितने जाहिल हो। रब्बा एक पत्थर के सिवा क्या है?”

किनाना और साथी: इब्न ख़त्ताब! हम तुम्हारे पास नहीं आए हैं। फिर उन्होंने आप सल्ल० को सम्बोधित करते हुए कहा, “आप उसको तोड़ डालें। हम उसको कभी नहीं तोड़ सकते हैं।”
अल्लाह के रसूल सल्ल०: मैं किसी आदमी को तुम्हारे यहां भेज दूंगा जो तुम्हारे लिए यह काम कर देगा।

फिर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने पूरे आदर-सत्कार के साथ उन्हें विदा किया। उन्होंने कहा, “या रसूलल्लाह! आप हमारे लिए हमारी क़ौम का कोई अमीर बना दीजिए।” आपने उस्मान बिन अबिल आस को उनका अमीर नियुक्त किया। यह उन सब में सबसे ज़्यादा युवा थे, लेकिन उनकी दीन की शिक्षा से लगाव का आप सल्ल० को ज्ञान था। उन्होंने वहां जाने से पहले क़ुरआन पाक की कुछ सूरतें याद कर ली थीं।

ज़कात कब फ़र्ज़ हुई?

हिजरत के पांचवें वर्ष ज़कात फ़र्ज़ हुई, और अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ज़कात वसूल करने के लिए उन सभी इलाक़ों में अपने आदमी (सहाबा) को भेजा जहां के लोग ईमान ला चुके थे।

टिप्पणियां

  1. 1अर्थात “आओ, हम और तुम बुला लें अपने बेटों को और तुम्हारे बेटों को, अपनी औरतों को और तुम्हारी औरतों को, और ख़ुद अपने तनों को और तुम्हारे तनों को। फिर हम सब मिलकर दिल से दुआ करें, इस तरह अल्लाह की लानत भेजें उन पर जो इस बहस में नाहक़ पर हों।” (सूरह आले इमरान, 3:61)