अध्याय पंद्रह

हुदैबिया का समझौता

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने सपने में देखा कि आप मक्का में दाख़िल हुए और अल्लाह के घर काबा का तवाफ़ (परिक्रमा) किया। यह एक सच्चा सपना था, हालांकि इसमें समय, महीना व साल तय न था। आपने सहाबा किराम रज़ि० को इस सपने के बारे में बताया। यह ख़ुशख़बरी सुनकर सब लोग बहुत ख़ुश हुए। मक्का और काबा, जिनसे उन्हें बहुत अधिक प्यार व लगाव था, मुद्दत हुई उनसे छूट चुका था। उनके दिल में तवाफ़ की बड़ी लगन थी और वह बड़ी बेसब्री से उस दिन का इंतज़ार कर रहे थे कि जब उन्हें दोबारा तवाफ़ का मौक़ा मिले। मुहाजिरों में मक्का का आकर्षण स्वाभाविक रूप से अधिक था क्योंकि वह वहीं पैदा और बड़े हुए थे, उसकी मुहब्बत उनकी घुट्टी में पड़ी थी और बहुत दिनों से वह वहां नहीं जा सके थे। जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनको यह ख़बर दी तो उनको इसमें ज़रा भी शक नहीं हुआ कि वह सपना इसी साल सच्चा होगा। इस बात ने उनकी बेचैनी और बढ़ा दी और वह सबके सब आपके साथ चलने के लिए तैयार हो गए। आपने ‘उमरह’ का एहराम1 भी बांध लिया था ताकि लोगों को पता चल जाए कि आप सिर्फ़ अल्लाह के घर का दर्शन करने के मक़सद से जा रहे हैं।

निकलने से पहले आपने क़बीला ख़ुज़ाआ के एक मुख़बिर को आगे भेजा ताकि वह क़ुरैश की गतिविधियों का पता दे। जब आप उस्फ़ान2 के क़रीब पहुंचे तो उस मुख़बिर ने ख़बर दी कि क़बीला काब बिन लुअई ने आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए लड़ाकू क़बीले के लोगों की एक अच्छी-ख़ासी फ़ौज जमा कर ली है। उनका इरादा है कि जंग करके आपको अल्लाह के घर तक न पहुंचने दें। आपने आगे बढ़ना जारी रखा। जब आप उस जगह पहुंचे जहां से मक्का की घाटी नीचे ढलुवा है तो आपकी ऊंटनी “क़सवा” बैठ गई। लोगों ने यह देखकर कहना शुरू कर दिया, “क़सवा अड़ गई, क़सवा अड़ गई।” आपने फ़रमाया, “क़सवा अड़ी नहीं, न इसका काम है। इसको हाथियों3 के रोकने वाले ने रोका है। क़सम उस ज़ात की जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है! अगर वह लोग कोई भी ऐसी बात पेश करते हैं जो अल्लाह की गरिमा के अनुकूल हो और मुझसे दया की मांग करते हैं तो मैं उनका सवाल ज़रूर पूरा करूंगा।” फिर आपने ऊंटनी को डांटा और वह उठकर खड़ी हो गई, लेकिन अपना मुंह मोड़कर हुदैबिया की तरफ़ चल पड़ी, और हुदैबिया के आख़िरी किनारे पर एक गढ़े के पास जिसमें थोड़ा पानी था, रुक गई। लोगों ने आपसे कहा, “प्यास लगी है।” आपने अपने तरकश से तीर निकाला और हुक्म दिया कि उसको उस गड्ढे में डाल दिया जाए। उसको डालते ही उसमें से पानी फूट निकला। सबने अपनी प्यास बुझाई।

क़ुरैश की परेशानी

क़ुरैश ने जब अल्लाह के रसूल सल्ल० के आने की ख़बर सुनी तो उनमें खलबली मच गई। आपने उचित समझा कि अपने साथियों में से किसी को भेजकर उनको इत्मीनान दिला दिया जाए। अतएव वहां भेजने के लिए आपने हज़रत उमर रज़ि० को बुलवाया। वह आए और कहने लगे, “या रसूलल्लाह सल्ल०! मक्का में बनी अदी बिन काब का एक आदमी भी मौजूद नहीं है जो मेरा समर्थन कर सके। आप उस्मान को वहां जाने का हुक्म फ़रमाएं कि उनका पूरा ख़ानदान वहां मौजूद है। वह सन्देशवाहक का काम अच्छी तरह कर सकते हैं।” आपने हज़रत उस्मान रज़ि० को बुलवाकर क़ुरैश के पास भेजा और फ़रमाया, “उनसे जाकर कह दो कि हम लड़ाई लड़ने के लिए नहीं आए हैं, बल्कि उमरह के इरादे से यहां आए हैं। उनको इस्लाम की दावत भी देना है।” आपने यह निर्देश दिया कि मक्का में जो मुसलमान मर्द और औरतें हैं उनके पास जाकर उन्हें कामयाबी की ख़ुशख़बरी दें और उनको बताएं कि अल्लाह मक्का में अपने दीन को छाने व फैलाने वाला है, यहां तक कि ईमान को ढका-छिपा रखने की ज़रूरत बाक़ी न रहे।

इम्तिहान की घड़ी

हज़रत उस्मान रज़ि० मक्का पहुंचकर अबू सुफ़ियान और क़ुरैश के सरदारों के पास गए और अल्लाह के रसूल सल्ल० का पैग़ाम उनको पहुंचाया। जब वह अपनी बात कह चुके तो उन्होंने हज़रत उस्मान से कहा, “अगर तुम तवाफ़ करना चाहते हो तो तवाफ़ कर लो।” हज़रत उस्मान ने जवाब दिया, “जब तक अल्लाह के रसूल सल्ल० तवाफ़ न कर लेंगे मैं तब तक तवाफ़ नहीं कर सकता।”

जब हज़रत उस्मान वापस आए तो मुसलमानों ने कहा, “अबू अब्दुल्लाह! तुम तो बड़े मज़े में रहे। तुमने तो तवाफ़ करके अपनी मनोकामना पूरी कर ली होगी।” हज़रत उस्मान ने कहा, “तुम लोगों को भ्रम है। क़सम है उस ज़ात की जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है! अगर मुझे एक साल भी वहां ठहरना पड़ता और अल्लाह के रसूल सल्ल० हुदैबिया में होते तो मैं उस समय तक तवाफ़ न करता जब तक कि आप तवाफ़ न कर लेते। मुझे तो क़ुरैश ने तवाफ़ करने को कहा भी था लेकिन मैंने इन्कार कर दिया।”

बैअत-ए-रिज़वान

इधर अल्लाह के रसूल सल्ल० को यह सूचना मिली कि हज़रत उस्मान शहीद कर दिए गए। आपने लोगों को बैअत की दावत दी। तमाम लोग उत्साह के साथ आपके चारों तरफ़ जमा हो गए। उस समय आप एक बबूल के पेड़ के नीचे हुदैबिया में थे। आपने यहां इस बात पर बैअत ली कि कोई साथ न छोड़ेगा। जब सब शपथ ले चुके तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ुद अपना हाथ एक दूसरे पर रखा और कहा, “यह उस्मान की तरफ़ से है।” क़ुरआन पाक में इस बैअत का उल्लेख इस तरह आया है:

आपसी बातचीत और सुलह की कोशिश

अभी यह हालत चल रही थी कि अचानक ख़ुज़ाआ क़बीला का बुदैल बिन वरक़ा कुछ आदमियों के साथ वहां पहुंचा और आपसे इन मामलों पर बात करना चाही, और पूछा कि आपके आने का मक़सद क्या है? अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया कि “हम लोग किसी लड़ाई लड़ने के लिए नहीं आए हैं। हम सिर्फ़ उमरह के इरादे से यहां आए हैं। क़ुरैश को जंग ने पहले ही चूर कर रखा है। अगर वह चाहे तो मैं कुछ समय के लिए उनसे अमन समझौता कर लूं और वह मेरे रास्ते से हट जाएं, और अगर वह चाहें तो उस गिरोह में शामिल हो जाएं जिसमें और लोग शामिल हुए। इस तरह उन्हें कुछ आराम का मौक़ा तो मिल ही जाएगा, लेकिन अगर लड़ाई के अलावा उन्हें कोई बात स्वीकार नहीं तो उस ज़ात की क़सम जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है, मैं अपने इस मामले में लड़ाई करूंगा, यहां तक कि मेरा सर बदन से अलग हो जाए या अल्लाह अपने दीन को ग़ालिब फ़रमाए।”

जब बुदैल ने क़ुरैश को अल्लाह के रसूल सल्ल० का पैग़ाम पहुंचाया तो उर्वा बिन मसऊद अस-सक़फ़ी ने कहा कि “उन्होंने बहुत समझदारी का प्रस्ताव रखा है। मेरी यह राय है कि तुम इसको मान लो और मुझे उनसे मिल लेने दो।” सबने कहा, “जाओ, बात कर लो।” उर्वा अल्लाह के रसूल सल्ल० से जाकर मिले। आपने उनसे बात शुरू की। बातचीत के समय उर्वा कनखियों से सहाबा किराम रज़ि० को देखते जाते थे। उसने देखा कि अगर आप थूकते तो कोई न कोई उसको हाथ पर ले लेता और चेहरे पर मल लेता। आप कोई हुक्म फ़रमाते तो हर व्यक्ति पालन करने के लिए लपकता। वुज़ू फ़रमाते तो उसके पानी पर आपके भक्त इस तरह टूटते कि लड़ाई का ख़तरा होने लगा। आप बात करते तो सब शान्त हो जाते। श्रद्धा-भाव के कारण कोई आपसे निगाहें मिलाने की हिम्मत न करता। उर्वा ने वापस जाकर अपने साथियों से कहा, “मैं बादशाहों के दरबार में गया हूं, मैंने क़ैसर व किसरा और नजाशी की शान व शौकत भी देखी है, लेकिन अल्लाह की क़सम! मैंने नहीं देखा कि किसी बादशाह के दरबारी ऐसा अदब करते हों जैसा मुहम्मद (सल्ल०) के साथी उनका करते हैं।” उन्होंने जो कुछ देखा था सब कुछ कह सुनाया और कहा कि “उनका प्रस्ताव बहुत अच्छा है, तुम लोग इसको मान लो।”

समझौता

इस बीच बनी किनाना का एक व्यक्ति मिकरज़ बिन हफ़्स भी वहां पहुंचा। दोनों ने आंखों देखा हाल क़ुरैश को सुनाया। क़ुरैश ने सुहैल बिन अम्र को अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास भेजा। आपने उनको देखते ही फ़रमाया, “मालूम होता है कि वह सुलह चाहते हैं।” आपने सुलहनामा का आलेख तैयार करने को कहा। आपने लिखने के लिए हज़रत अली रज़ि० को बुलवाया।

आपने फ़रमाया, “लिखो, ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’।” सुहैल बोल उठा, “जहां तक ‘रहमान’ का सम्बन्ध है, अल्लाह की क़सम! हम इससे परिचित नहीं हैं। उसी पुराने दस्तूर के मुताबिक़ ‘बिस्मिकल्लाहुम्म’ लिखो।” आपने फ़रमाया कि “लिख दो ‘बिस्मिकल्लाहुम्म’।” इस पर मुसलमान बोल उठे, “नहीं, हम तो ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’ लिखेंगे।” आपने फ़रमाया, “‘बिस्मिकल्लाहुम्म’ ही लिखो।”

फिर आपने फ़रमाया कि “लिखो, ‘यह वह है जिसका अल्लाह के रसूल सल्ल० ने समझौता किया।’” यह सुनकर सुहैल फिर बोल उठा, “अल्लाह की क़सम! अगर हमारा इस पर ईमान होता कि आप अल्लाह के रसूल हैं तो हम आपको अल्लाह के घर से रोकते ही क्यों? और आपसे जंग की क्यों करते? आप इसकी जगह ‘मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह’ लिखें।” आपने फ़रमाया, “मैं अल्लाह का रसूल हूं, भले ही तुम झुठलाओ।” आपने हज़रत अली से कहा, “इसे मिटाकर ‘मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह’ लिखो।” हज़रत अली ने कहा, “अल्लाह की क़सम! मुझसे यह काम नहीं हो सकता।” आपने फ़रमाया, “मुझे उसकी जगह दिखाओ।” हज़रत अली ने आपको वह जगह दिखाई तो आपने उसे ख़ुद मिटा दिया।

आगे अल्लाह के रसूल सल्ल० ने लिखाया, “अल्लाह के रसूल ने यह मामला इस पर किया है कि तुम लोग (क़ुरैश) अल्लाह के घर का तवाफ़ करने के लिए हमारे रास्ते में रुकावट नहीं डालोगे, और हम इसका तवाफ़ कर लें।” सुहैल ने कहा कि “हमें डर है कि अरबों में यह चर्चा न होने लगे कि यह समझौता हमने दबकर किया है। आप अगले साल तवाफ़ कर सकते हैं।” आपने यह बात भी समझौते में शामिल कर ली।

सुहैल ने कहा कि “यह भी ज़रूरी होगा कि अगर हमारे यहां से कोई व्यक्ति आपके यहां चला जाए, चाहे वह आप ही के मज़हब पर हो, तो आप उसको हमें लौटा देंगे।” मुसलमान बोल उठे, “यह कैसे हो सकता है कि कोई मुसलमान होकर हमारे पास आए और हम उसे मुशरिकों के हवाले कर दें!”

यह बात हो ही रही थी कि अचानक अबू जन्दल बिन सुहैल बेड़ियों में गिरते-पड़ते पहुंचे। वह मक्का की घाटी से आए थे और किसी तरह मुसलमानों के पास पहुंचे थे। सुहैल ने कहा, “ऐ मुहम्मद (सल्ल०)! यह पहला व्यक्ति है जिसकी वापसी की मांग मैं आपसे करता हूं।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “अभी तो हमने आलेख भी पूरा नहीं किया।” उसने जवाब दिया, “अगर ऐसा है तो फिर किसी बात पर आपसे मामला करने पर तैयार नहीं हैं।” आपने फ़रमाया, “मेरे कहने से इन्हें इजाज़त दे दो।” उसने कहा, “मैं आपके कहने से इजाज़त नहीं दे सकता।” आपने फ़रमाया, “अच्छा, जो तुम्हारा जी चाहे करो।” उसने कहा, “मुझे कुछ नहीं करना है।” यह सुनकर अबू जन्दल बोले, “मुसलमानो! मैं मुसलमान होकर आया हूं और फिर मुशरिकों को वापस किया जा रहा हूं। क्या तुम लोग देखते नहीं मेरे साथ क्या हो रहा है?” अबू जन्दल ने अल्लाह के रास्ते में कठोर तकलीफ़ें उठाई थीं। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इस मांग पर उनको वापस कर दिया।

दोनों पक्षों में यह भी समझौता हुआ कि दस साल तक दोनों मार-काट न करेंगे ताकि लोग अमन-शांति के साथ रह सकें और कोई किसी पर हाथ न उठा सके। दूसरी बात यह तय हुई कि अगर क़ुरैश से कोई आदमी अपने संरक्षक की इजाज़त के बिना मुहम्मद (सल्ल०) के पास आ निकले तो वह उसको वापस कर देंगे, और अगर मुहम्मद (सल्ल०) के साथियों में से कोई क़ुरैश के पास आ निकले तो वह वापस न करेंगे, और यह कि जो व्यक्ति मुहम्मद (सल्ल०) के समझौते और हिफ़ाज़त में दाख़िल होना चाहे, हो सकता है। इसी तरह जो क़ुरैश के समझौते और हिफ़ाज़त में आना चाहे उसको इसकी इजाज़त होगी।

मुसलमानों का इम्तिहान

जब मुसलमानों ने यह सुलह और वापसी की बात सुनी और उन्होंने देखा कि आपने किस तरह इसको बर्दाश्त किया तो यह बात उनके लिए बहुत तकलीफ़ वाली साबित हुई और उनकी जान पर बन आई। यहां तक कि हज़रत उमर, हज़रत अबू बक्र के पास आए और कहने लगे, “क्या अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हमसे यह नहीं फ़रमाया था कि हम लोग अल्लाह के घर जाएंगे और तवाफ़ करेंगे?” हज़रत अबू बक्र ने कहा, “हां, फ़रमाया था, लेकिन क्या उन्होंने तुमसे यह कहा था कि तुम इसी साल अल्लाह के घर जाओगे और तवाफ़ भी करोगे?”

जब समझौता लिखा जा चुका था तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जानवरों की क़ुर्बानी की और सर मुड़ाया। मुसलमानों के लिए यह कठिन घड़ी थी। मदीना से निकलते समय उन्होंने सोचा भी न था कि उन्हें मक्का जाने और उमरह करने का मौक़ा न मिल सकेगा, लेकिन जब उन्होंने आपको क़ुर्बानी करते और सर मुड़ाते देखा तो सब उसी समय तेज़ी से खड़े हो गए और आपका अनुसरण करते हुए क़ुर्बानी करने और सर मुड़ाने लगे। इसके बाद आप मदीना आए। रास्ते में क़ुरआन निम्न आयतें उतरीं:

हज़रत उमर रज़ि० ने पूछा, “या रसूलल्लाह! क्या यही फ़त्ह है?” आपने फ़रमाया, “हां।”

कामयाबी या नाकामी

जब आप मदीना आए तो आपके पास क़ुरैश का अबू बसीर उत्बा बिन उसैद नामी एक आदमी पहुंचा। अबू बसीर के पीछे दो आदमी उसकी तलाश में पहुंचे और उन्होंने समझौता याद दिलाया था, इसलिए आपने उस आदमी को इन दोनों के हवाले कर दिया। वह दोनों उसे साथ लेकर वापस गए, लेकिन रास्ते में अबू बसीर किसी तरह बच निकलने में कामयाब हो गए और समुन्द्र तट पर आ गए। दूसरी तरफ़ अबू जन्दल बिन सुहैल भी किसी तरह क़ुरैश के चंगुल से निकल आए और अबू बसीर से आ मिले। अब यह होने लगा कि क़ुरैश का जो भी मुसलमान मक्का से जान व ईमान बचाकर निकलता वह सीधा अबू बसीर से जा मिलता। धीरे-धीरे उनका पूरा गिरोह तैयार हो गया। यह लोग यह करते कि क़ुरैश का जो भी क़ाफ़िला शाम की तरफ़ जाने वाला उन्हें मिलता, यह उसका रास्ता रोककर उसके सामान पर क़ब्ज़ा कर लेते और सब क़ाफ़िले वालों को क़त्ल कर डालते। इससे तंग आकर क़ुरैश ने अल्लाह का वास्ता और रिश्तेदारी की दुहाई देकर अल्लाह के रसूल सल्ल० से निवेदन किया कि आप उन लोगों को ज़रूर बुलवा भेजें। अब जो भी आपके पास पहुंचेगा वह सुरक्षित रहेगा, अर्थात आपके पास ही रहेगा और वह उसे वापस नहीं मांगेंगे।

समझौता विजय में कैसे बदला

बाद में घटित बातों ने यह साबित कर दिया कि हुदैबिया के समझौते ने असल में इस्लाम की कामयाबी का एक नया दरवाज़ा खोल दिया, और इसके नतीजे में इस्लाम अरब प्रायद्वीप में इतनी तेज़ी के साथ फैला कि इससे पहले कभी ऐसा न हुआ था। इसने फ़त्ह-ए-मक्का का भी दरवाज़ा खोला और इसी के फलस्वरूप क़ैसर व किसरा, मुक़ौक़िस, नजाशी तथा अरब के अमीरों को इस्लाम की दावत दी गई। अल्लाह पाक का इरशाद है:

इस समझौते का एक अच्छा परिणाम यह हुआ कि क़ुरैश ने मुसलमानों की हैसियत को स्वीकार किया और उनको उनकी जायज़ जगह दी, और सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि मुसलमानों को बहुत दिनों के बाद अमन के माहौल में सांस लेने का मौक़ा मिला और पूरी तन्मयता के साथ इस्लाम के प्रचार का सुनहरा मौक़ा हासिल हुआ।

इस समझौते ने मुसलमानों और मुशरिकों को एक-दूसरे से मिलने-जुलने और एक-दूसरे को समझने का मौक़ा भी प्रदान किया, जिसके नतीजे में इस्लाम के अनेक गुण मुशरिकों के सामने आए जो अब तक नहीं आए थे। उदाहरण के लिए शिर्क व बुतपरस्ती की बुराई से एकदम छुटकारा, दुश्मनी, इंसानियत पर ज़ुल्म तथा मार-काट से पूरी दूरी। उन्होंने महसूस किया कि मक्का में उन्हीं की तरह पैदा हुए और पले-बढ़े लोग किस तरह कुछ ही सालों में एक ऐसे वर्ग के रूप में उभरकर सामने आए जिसमें पारस के गुण पैदा हो गए थे और जिसे बुराइयों, मूर्तिपूजा आदि से कोई सरोकार बाक़ी न रह गया था। इस्लाम की शिक्षाओं तथा नबी के साथ के अलावा कोई चीज़ मक्का वासियों और इन मुहाजिरों के बीच फ़र्क़ करने वाली न थी। एक साल के अन्दर, जबकि मक्का अभी फ़त्ह नहीं हुआ था, अरबों की इतनी बड़ी संख्या मुसलमान हुई जितनी पिछले पन्द्रह सालों में नहीं हुई थी। यह इसी समझौते का नतीजा था।

इमाम इब्न शिहाब ज़ुहरी कहते हैं:

“इस्लाम को इससे पहले इतनी बड़ी कोई विजय हासिल नहीं हुई। जब पक्षों में समझौता हुआ, जंगबन्दी का एलान हुआ, लोग बिना किसी डर के एक-दूसरे से मिलने लगे, और उनको साथ रहने तथा बातचीत करने का मौक़ा मिला, तो जिस समझदार आदमी से इस्लाम के बारे में बात की गई वह मुसलमान हो गया। सिर्फ़ इन 2 वर्षों में इतने लोग मुसलमान हुए जितने अब तक हुए थे, बल्कि उससे भी कुछ अधिक।”

इब्न हिशाम कहते हैं:

“ज़ुहरी के कथन का सबूत यह है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ हुदैबिया में, जाबिर बिन अब्दुल्लाह के अनुसार, 1400 सहाबी थे, लेकिन 2 वर्ष बाद मक्का की विजय के मौक़े पर अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ 10 हज़ार सहाबी थे।”

इस समझौते की वजह से उन मुसलमानों को फ़ायदा पहुंचा जो मक्का में अपनी मजबूरी के कारण बाक़ी रह गए थे और जिनसे क़ुरैश के नौजवानों की एक बड़ी संख्या मुसलमान हुई। यह सब लोग अबू बसीर के गिरोह से आ मिले और देखते ही देखते मक्का इस्लाम के प्रचार एक बड़ा केन्द्र बन गया। क़ुरैश इससे चिन्तित हुए। उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० से प्रार्थना कि इन लोगों को मदीना बुला लें। अतएव आपने ऐसा ही किया और इस तरह जिस मुसीबत में वह लोग फंसे थे उससे उन्हें छुटकारा मिला। यह सब असल में इस समझौते का नतीजा था। इस मौक़े पर शांति और समझौते की तरफ़ आपके झुकाव का एक फ़ायदा यह भी मिला कि अरब के जो नए क़बीले अभी इस्लाम नहीं लाए थे, इस नए दीन के प्रचारक को नई निगाह से देखने लगे। उनके दिलों में ख़ुद ही इस्लाम के प्रति वह श्रद्धा पैदा हो गई जो इससे पहले न थी, यद्यपि इसके लिए अल्लाह के रसूल सल्ल० और मुसलमानों ने कोई कोशिश नहीं की थी।

ख़ालिद बिन वलीद और अम्र बिन अल-आस

हुदैबिया के समझौते ने दिलों को जीत लिया। क़ुरैश के सेनापति ख़ालिद बिन वलीद इस समझौते के बाद ही मुसलमान हुए। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उन्हें “सैफ़ुल्लाह” (अल्लाह की तलवार) की पदवी प्रदान की। वह अल्लाह की राह में हर तरह से सफल हुए और अल्लाह ने उनके हाथों से शाम (सीरिया) के क्षेत्र पर कामयाबी दिलाई।

अम्र बिन अल-आस, जो एक बड़े सेनापति थे और बाद में मिस्र के विजेता की हैसियत से सामने आए, इसी दौर में मुसलमान हुए। यह दोनों हुदैबिया की सुलह के बाद मदीना आए और मुसलमान हुए।

टिप्पणियां

  1. 1दो बिना सिली हुई चादरें जिसे हाजी हज के समय अपने बदन पर डाल लेते हैं। एक लुंगी या तहबन्द की तरह बांध लेते हैं और दूसरी बदन पर लपेट लेते हैं।
  2. 2मक्का और मदीना के बीच एक स्थान है।
  3. 3आपका इशारा अब्रहा के हाथी की तरफ़ था जिसे अल्लाह ने मक्का में दाख़िल नहीं होने दिया।