अध्याय बीस
हुनैन की जंग
मक्का की शानदार फ़तह और उसके बाद बड़ी संख्या में लोगों को मुसलमान होते देखकर इस्लाम दुश्मन बौखला उठे, और उन्होंने इसे रोकने के लिए अपने तरकश का आख़िरी तीर भी चला दिया, लेकिन वह अपनी योजना में कामयाब नहीं हो सके।
हवाज़िन का जमाव
क़बीला हवाज़िन क़ुरैश के बाद ताक़त में दूसरे नम्बर पर था। उनके और क़ुरैश के बीच पहले से ही दुश्मनी चली आ रही थी। इसलिए क़ुरैश को इस्लाम के असर में आते देखकर हवाज़िन के लोग इस्लाम विरोध पर और अधिक उतारू हो गए। वह इस कोशिश में लग गए कि इस्लाम की जड़ें काटने का सेहरा उनके सर बन्धे और लोग कहें कि जो काम क़ुरैश न कर सके, हवाज़िन ने उसे कर दिखाया।
क़बीले का सरदार मालिक बिन औफ़ अन-नसरी ने जंग का ऐलान किया। हवाज़िन के साथ उनकी आवाज़ पर क़बीला सक़ीफ़, नस्र व जुशम और साद बिन बक्र आगे आए। काब और किलाब ने उनका समर्थन नहीं किया। सबने मिलकर एक साथ अल्लाह के रसूल सल्ल० के मुक़ाबले की योजना बनाई। उनके माल व असबाब तथा बीवी-बच्चे लश्कर के साथ थे, ताकि घर वालों की चिन्ता से उन्हें मैदान से भाग निकलने की कोई गुंजाइश न रहे।
इस जंग में दुरैद बिन अस-सिम्मा भी शामिल था। वह एक वरिष्ठ, अनुभवी और अच्छी सूझ-बूझ रखने वाला व्यक्ति था। हवाज़िन का लश्कर ‘औतास’1 में उतरा। हालत यह थी कि ऊंटों की बलबलाहट, गधों, ख़च्चरों की चीख़-पुकार, बकरियों के मिमियाने और बच्चों के रोने-चिल्लाने से लश्कर के अन्दर शोर-शराबे का माहौल था। मालिक बिन औफ़ ने अपने सिपाहियों को निर्देश दिया कि “मुसलमानों को देखते ही तुम अपनी तलवारों की मियान तोड़ देना और एक पूरी ताक़त से हमला करना।”
दूसरी तरफ़ अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ मक्का के दो हज़ार मुसलमान थे, जिनमें कुछ लोग नए-नए इस्लाम लाए थे। कुछ को अभी इस्लाम क़बूल करने की नौबत नहीं आई थी। इसके अलावा आपके साथियों और इस्लाम पर मर मिटने वाले 10 हज़ार सहाबा की फ़ौज थी जो मदीना से आपके साथ निकले थे। इस तरह सामूहिक रूप से यह संख्या अब तक की अन्य किसी जंग की अपेक्षा अधिक थी। कुछ मुसलमान यह बड़ी संख्या देखकर कहने लगे, “आज हम संख्या में कम होने की वजह से पराजित नहीं हो सकते।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने सफ़वान बिन उमैया से (जो अभी तक मुसलमान नहीं हुए थे) कुछ कवच और हथियार उधार लिए और हवाज़िन से जंग की नीयत से चल पड़े।
आपके साथ लश्कर में कुछ ऐसे लोग भी थे जो नए-नए इस्लाम की परिधि में आए थे। अरब के कुछ क़बीलों की ‘ज़ात-ए-अनवात’ के हरे-भरे पेड़ के प्रति बड़ी आस्था व श्रद्धा थी। वे इस पेड़ में अपने हथियार लटकाते थे, क़ुर्बानियां करते थे और एक दिन उसके नीचे पड़ाव करते थे। इसलिए चलते-चलते जब उन्हें यह पेड़ रास्ते में दिखाई पड़ा तो उन्हें अज्ञानता के युग की पुरानी रस्में याद आ गईं। वह आपसे कहने लगे, “या रसूलल्लाह सल्ल०! जैसा उन लोगों का ‘ज़ात-ए-अनवात’ था वैसा ही एक हमारे लिए श्रद्धा का केन्द्र तय कर दीजिए।” आपने फ़रमाया, “अल्लाहु अकबर! उसकी क़सम जिसके क़ब्ज़े में मुहम्मद (सल्ल०) की जान है, तुमने मुझसे ऐसी फ़रमाइश की है जैसी मूसा अ० की क़ौम ने मूसा अ० से की थी और कहा था, ‘आप हमारे लिए भी एक माबूद बना दीजिए जैसे उनके बहुत से माबूद हैं।’ उन्होंने जवाब दिया कि ‘तुम बड़ी जहालत की बातें करने वाली क़ौम हो।’” इसके बाद आपने फ़रमाया, “बेशक तुम अपनी पहले की क़ौमों की तरह एक-एक बात और तरीक़े की पैरवी करोगे।”
हुनैन की घाटी में
जब मुसलमान हुनैन की घाटी में पहुंचे तो शव्वाल की 10 तारीख़ सन् 8 हिजरी थी। उन्होंने सुबह के धुंधलके में नीचे की तरफ़ उतरना शुरू किया। हवाज़िन उनसे पहले उस घाटी में पहुंच चुके थे और घाटी के तंग रास्तों में छुपकर बैठने के मोर्चे बना लिए थे। मुसलमानों ने सिर्फ़ इतना देखा कि तलवारें मियान से बाहर हैं और तीरों की उन पर बारिश हो रही है। हवाज़िन माने हुए तीरअन्दाज़ थे, उन्होंने भरपूर हमला किया।
अधिकांश मुसलमान इस अचानक हमले से घबराकर पीछे की तरफ़ पलटे। कोई किसी को देखता न था कि वह कहां है। यह एक ख़तरनाक और निर्णायक पल था, और क़रीब था कि जंग का पासा मुसलमानों के ख़िलाफ़ पलट जाए, और फिर उनको संभलने और अपनी जगह बनाए रखने की गुंजाइश न रहे। यहां जो कुछ हुआ उसमें बहुत कुछ उहद की जंग से मिलता-जुलता था, जब यह मशहूर हो गया कि अल्लाह के रसूल सल्ल० शहीद हो गए हैं और वहां मुसलमानों के पैर उखड़ गए।
मक्का के अक्खड़ लोग, जो आपके साथ इस लश्कर में थे और जिनके दिलों में अभी ईमान न उतरा था, यह परेशानी देखकर तरह-तरह की बातें करने लगे। वह कहने लगे कि “अब समुद्र से इधर उनकी परेशानी का सिलसिला ख़त्म न होगा।” कुछ कहने लगे कि “आज उनका जादू टूट गया।”
कामयाबी और शांति
मुसलमान जो अपनी संख्या पर इतराए थे, जब उसका घमंड टूट गया और उन्हें उसकी सज़ा मिल गई, तो अल्लाह ने फिर उनकी मदद की और उन्हें हमले की पोज़ीशन में पहुंचा दिया। अल्लाह के रसूल सल्ल० उस समय अपने सफ़ेद ख़च्चर ‘शहबा’ पर बेख़ौफ़ होकर बैठे थे। आपके साथ अन्सार, मुहाजिरीन और आपके सगे-संबंधियों में से थोड़े से लोग बाक़ी रह गए थे। अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब आपके ख़च्चर की लगाम थामे थे। अल्लाह के रसूल सल्ल० कहते जाते थे, “मैं सच्चा पैग़म्बर हूं, मैं अब्दुल मुत्तलिब का बेटा हूं।” जब मुशरिकों की टुकड़ियां आपके सामने आईं तो आपने एक मुट्ठी मिट्टी लेकर दुश्मनों की आंखों में दूर तक इस तरह फेंक दी कि वह उनकी आंखों में भर गई।
जब आपने देखा कि हर व्यक्ति घबराया हुआ है तो आप सल्ल० ने अब्बास से कहा कि “‘अन्सारी’ और ‘बबूल के पेड़ वालों’2 को आवाज़ दो।” अब्बास की आवाज़ सुनते ही उन्होंने कहा, “आ गए! आ गए!” इसके साथ ही जो कोई अब्बास की आवाज़ सुनता, फ़ौरन घोड़े से कूद पड़ता और अपनी तलवार व ढाल लेकर अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास पहुंच जाता। देखते-देखते आपके चारों तरफ़ लड़ने वाले वीर बांकुरों का एक जत्था जमा हो गया। तैयारी के बाद दुश्मन से मुक़ाबला शुरू हो गया और दोनों पक्ष गुंथ गए। आपने एक टीले से लड़ाई का यह मंज़र देखकर फ़रमाया, “अब तन्दूर गर्म हो गया है,” अर्थात ज़ोर की लड़ाई है। इसके बाद आपने कुछ कंकरियां लेकर दुश्मन की तरफ़ फेंक दीं। अब्बास रज़ि० फ़रमाते हैं कि इसके बाद दुश्मन की तेज़ी लगातार मन्द पड़ती गई और वह हारते नज़र आए।
दोनों सेनाएं ख़ूब लड़ीं। हवाज़िन की हार हुई। उनके अनेक क़ैदी जिनके हाथ बंधे हुए थे, आपके सामने लाए गए। मुसलमान जीत गए और पूरी घाटी फ़तह और मदद के फ़रिश्तों से भर गई। क़ुरआन में आता है:
आख़िरी मुठभेड़
अरबों के सीने में इस्लाम के ख़िलाफ़ जो आग सुलग रही थी वह हुनैन की जंग के बाद ठंडी पड़ गई। इस जंग ने उनकी रही-सही ताक़त भी ख़त्म कर दी, और उनके तरकश के सारे तीर बेकार कर दिए। विरोधियों के परख़च्चे उड़ गए और अब उनके दिल इस्लाम क़बूल करने के लिए खुल गए। इस तरह जंग-ए-हुनैन के बाद कोई बड़ी ताक़त इस्लाम विरोधी के रूप में अरब में बाक़ी नहीं रही।
औतास में
हार के बाद हवाज़िन की एक टुकड़ी ने, जिसमें क़बीले का सरदार मालिक बिन औफ़ भी था, तायफ़ में जाकर पनाह ली और वहां अपने को क़िलाबन्द कर लिया। एक दूसरी टुकड़ी ने चलकर ‘औतास’ में पड़ाव डाल दिया। उनका पीछा करने के लिए अल्लाह के रसूल सल्ल० ने एक रेडिंग दल (सरिय्या) अबू आमिर अल-अशअरी के नेतृत्व में भेजा, जिसने उनसे जिहाद किया और उन्हें हराया। हुनैन का माल-ए-ग़नीमत (जंग में लूट का माल) और बन्दियां आदि आपके पास लाई गईं तो आपने उन सबको ‘जिइराना’ (मक्का से उत्तर-पूर्व में स्थित एक जगह) भेज दिया और उन्हें वहां हिरासत में रखा गया।
ग़ुलामों और बन्दियों की संख्या 6 हज़ार थी। 24 हज़ार ऊंट और 40 हज़ार से अधिक बकरियां थीं। इसके अलावा 4 हज़ार ‘ऊक़िया’ चांदी थी। यह सबसे बड़ा माल-ए-ग़नीमत था जो अब तक मुसलमानों के हाथ लगा था।
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हुनैन की जंग में अपने साथियों को हुक्म दिया कि किसी बच्चे, औरत, मर्द या ग़ुलाम जो कामकाज के लिए हों, पर हाथ न उठाया जाए। आपने एक औरत के क़त्ल पर, जो हुनैन में मारी गई थी, दुःख व्यक्त किया।