अध्याय चौदह
ग़ज़वा-ए-बनी क़ुरैज़ा
बनी क़ुरैज़ा की ग़द्दारी
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मदीना आकर मुहाजिरों व अन्सार के बीच एक समझौता कराया जिसके अनुसार यहूदियों के जान व माल की सुरक्षा के साथ उनके धर्म की रक्षा की ज़मानत दी गई थी। कुछ शर्तें उनके हक़ में थीं और कुछ उन पर आयद की गई थीं। इस समझौते की अहम बातें इस तरह थीं:
यहूदियों में से जो हमारा साथ देगा उसके साथ सहयोग और समानता का मामला किया जाएगा, न उन पर ज़ुल्म होगा न उनके ख़िलाफ़ किसी की मदद की जाएगी। मदीना का कोई मुशरिक क़ुरैश की जान व माल की रक्षा नहीं करेगा। यहूद जब तक लड़ाई में शामिल रहेंगे मुसलमानों के साथ लड़ाई का ख़र्च भी सहन करेंगे। यहूद के क़बीले मुसलमानों के साथ एक क़ौम की तरह रहेंगे। यहूदियों को धर्म की आज़ादी रहेगी और मुसलमानों को अपने धर्म की। वह अपने ग़ुलामों और अपने मामलों के बारे में ख़ुद फ़ैसला ले सकेंगे।
इस समझौते के अनुसार जंग के दौरान उन पर एक-दूसरे की मदद करना ज़रूरी होगा। जायज़ बातों तथा अल्लाह के आदेशों की सीमा के अन्दर रहते हुए एक-दूसरे के प्रति सद्भावना रखनी होगी। यसरब (मदीना) पर हमला हुआ तो दोनों मिलकर मदीना की रक्षा करेंगे।
लेकिन इन साफ़ शर्तों के बावजूद बनी अन-नज़ीर के सरदार हुयय बिन अख़्तब ने बनी क़ुरैज़ा को मुसलमानों के साथ ग़द्दारी और क़ुरैश के साथ दोस्ती पर तैयार कर लिया। हालांकि उनके सरदार काब बिन असद का कहना था कि “मैंने मुहम्मद (सल्ल०) में सच्चाई और वफ़ादारी के सिवा और चीज़ नहीं देखी।” अन्ततः काब बिन असद ने भी अपना वचन तोड़ दिया।
अल्लाह के रसूल सल्ल० को जब इस विश्वासघात की सूचना मिली तो आपने औस व ख़ज़रज के दो सरदारों साद बिन मुआज़ और साद बिन उबादा को अन्सार के कुछ लोगों के साथ इस ख़बर की सच्चाई जानने के लिए भेजा। उन लोगों ने वहां जाकर जो कुछ सुना था उससे ख़राब हाल पाया। उन लोगों ने अल्लाह के रसूल सल्ल० के लिए अनुचित शब्दों का प्रयोग किया और कड़ककर कहने लगे, “कैसा अल्लाह का रसूल? हमारे और मुहम्मद (सल्ल०) के बीच कोई समझौता नहीं है।” उन्होंने ग़द्दारी के साथ-साथ पूरी लड़ाई की तैयारी भी शुरू कर दी। यह हालत खुले हुए हमले और आमने-सामने की लड़ाई से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक थी।1
क़ुरआन ने इसका चित्रण इस तरह किया गया है:
मुसलमानों के लिए यह बड़ी कठिन घड़ी थी और इस विश्वासघात को स्वाभाविक रूप से बहुत महसूस किया गया। इसका अन्दाज़ा हमें साद बिन मुआज़ के उस वाक्य से हो सकता है जो उनके मुंह से ग़ज़वा-ए-ख़न्दक़ के मौक़े पर उस समय निकला था जब उनके हाथ में एक तीर लगने से हाथ की एक नस कट गई थी। उन्होंने कहा था, “ऐ अल्लाह! मुझे उस समय तक मौत न दे जब तक मेरी आंखें बनी क़ुरैज़ा की तबाही देखकर ठंडी न हो जाएं।”
बनी क़ुरैज़ा की तरफ़ प्रस्थान
अल्लाह के रसूल सल्ल० जब मुसलमानों के साथ ग़ज़वा-ए-ख़न्दक़ से वापस हुए और मदीना पहुंचकर जब सबने अपने हथियार रख दिए तो आपके पास हज़रत जिब्रील आए और कहा, “या रसूलल्लाह! क्या आपने हथियार रख दिए?” आपने फ़रमाया, “हां।” इस पर हज़रत जिब्रील ने कहा कि “फ़रिश्तों ने अभी अपने हथियार नहीं रखे। अल्लाह ने आपको यह हुक्म दिया है कि बनी क़ुरैज़ा की तरफ़ रवाना हों। मैं भी वहीं का इरादा कर रहा हूं कि उनमें खलबली पैदा कर दूं।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इस पर एक मुनादी करने वाले को बुलवाया और हुक्म दिया कि वह लोगों में जाकर एलान करे कि हर उस व्यक्ति को जो सुनने और मानने वाला है, यह चाहिए कि अस्र की नमाज़ बनी क़ुरैज़ा में पढ़े। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने बनी क़ुरैज़ा में पहुंचकर उन्हें घेर लिया और घेरा 25 दिन-रात जारी रहा, यहां तक कि वह इससे तंग आ गए। अल्लाह ने उनके दिलों में ख़ौफ़ पैदा कर दिया।
अबू लुबाबा का पश्चाताप
इस बीच बनी क़ुरैज़ा ने आपके पास यह संदेश भेजा कि आप हमारे पास बनी अम्र बिन औफ़ को भेज दीजिए ताकि हम उनसे अपने मामले में सलाह कर सकें। उनकी प्रार्थना पर आपने अबू लुबाबा को वहां भेज दिया। उन्हें देखते ही सब लोग खड़े हो गए। औरतें और बच्चे दहाड़ें मारकर रोने लगे। यह देखकर उनका दिल कुछ पसीज गया। इसके बाद यह सब लोग कहने लगे, “अबू लुबाबा! क्या मुहम्मद (सल्ल०) के फ़ैसले को मान लिया जाए?” उन्होंने कहा, “हां,” और इसी के साथ अपने गले पर हाथ फेरकर उसकी तरफ़ इशारा किया। अबू लुबाबा कहते हैं कि अभी मेरे क़दम भी वहां से न हटे थे कि मुझे महसूस हुआ कि मैंने अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० की ख़यानत की है। अतः वह फ़ौरन उल्टे पांव वापस हुए और आपके सामने हाज़िर होने के बजाय मस्जिद-ए-नबवी के एक खम्बे से अपने को बांध दिया और एलान कर दिया कि “मैं उस समय तक इस जगह से न हटूंगा जब तक अल्लाह मेरे क़सूर को माफ़ न करेगा।” उन्होंने अल्लाह से वादा किया कि भविष्य में वह बनी क़ुरैज़ा के इलाक़े में क़दम भी न रखेंगे और उस जगह को भी न देखेंगे जहां उनके मन में अल्लाह और उसके रसूल के बारे में दुर्भावना पैदा हुई थी। जब अल्लाह ने उनकी तौबा क़बूल की तो यह आयत उतरीं:
और फ़ौरन लोग उनको खोलने के लिए तेज़ी से आगे बढ़े। उन्होंने कहा, “नहीं, अल्लाह की क़सम! जब तक अल्लाह के रसूल सल्ल० अपने हाथों से मुझे आज़ाद न करेंगे मैं इसी हालत में रहूंगा।” अल्लाह के रसूल सल्ल० जब फ़ज्र की नमाज़ के लिए आए और उनके पास से गुज़रे तो आपने उनको खोला। अबू लुबाबा खजूर के उस तने से लगभग बीस रात बंधे रहे। हर नमाज़ के समय उनकी पत्नी आती और नमाज़ के लिए उनको खोल देतीं, फिर वह दोबारा अपने को उस तने से बांध लेते।
साद बिन मुआज़ का हक़ व इंसाफ़
बनी क़ुरैज़ा ने अल्लाह के रसूल सल्ल० के फ़ैसले को मान लिया, लेकिन क़बीला औस के लोग, जिनके दिलों में बनी क़ुरैज़ा के प्रति नरमी थी, आपके पास आए और कहने लगे, “या रसूलल्लाह! ख़ज़रज के मुक़ाबले में हमारा उनसे समझौता है, और उन्होंने हमारे भाइयों के दोस्तों के साथ मिलकर जो कुछ किया वह आप जानते हैं।” उनकी यह बात सुनकर आप सल्ल० ने फ़रमाया, “औस के लोगो! क्या तुम इस पर तैयार हो कि तुम्हारा ही कोई आदमी इसका फ़ैसला कर दे?” उन्होंने कहा, “हां, हम तैयार हैं।” आपने कहा, “मैं यह काम साद बिन मुआज़ के हवाले करना चाहता हूं।” उनको बुलवाया गया। जब वह आए तो उनके क़बीला वालों ने उनसे कहा, “अबू अम्र! अपने क़बीला वालों के साथ अच्छा बर्ताव करना,” अर्थात कुछ रियायत करना। जब उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया और कहा कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने तुम्हारे सुपुर्द यह मामला इसी लिए किया है कि तुम इन लोगों (बनी क़ुरैज़ा) के साथ अच्छा बर्ताव करो, तो साद ने कहा, “क़िस्मत से साद को आज यह मौक़ा मिला है। अल्लाह करे कि अल्लाह के हुक्म के सामने मुझे किसी की मलामत (बुरा-भला कहना) की परवाह न हो।” साद ने कहा, “मैं यह फ़ैसला करता हूं कि उनके मर्द क़त्ल कर दिए जाएं, उनका माल बांट लिया जाए, बच्चे और औरतें ग़ुलाम बना ली जाएं।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “तुमने अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ फ़ैसला किया है।”
इस्राईली मज़हब के मुताबिक़ सज़ा
फ़ैसला बनी इस्राईल की शरीअत के जंगी नियमों के अनुसार भी था। तौरेत की आयत 11, 12, 13 में है:
“और जब तू किसी शहर के पास उससे लड़ने के लिए आ पहुंचे तो पहले उससे सुलह का पैग़ाम कर, तब यूं होगा कि अगर वह तुझे जवाब देकर सुलह मानकर दरवाज़े तेरे लिए खोल दें तो सारे जानदार जो उस शहर में पाए जाएं तेरे अधीन होंगे और तेरी सेवा करेंगे, और अगर वह तुझसे सुलह न करें और तुझसे जंग करें तो उसे घेर लो, और जब ख़ुदावन्द (The Lord) तेरा ख़ुदा उसे मेरे क़ब्ज़े में कर देवे तो वहां के हर मर्द को तलवार की धार से क़त्ल कर, मगर औरतों, बच्चों, जानवरों और जो कुछ उस शहर में हो उसका सारा लूट अपने लिए ले।”
बनी इस्राईल में प्राचीन काल में यही चलन था। तौरेत में आता है:
“और उन्होंने मिद्यानियों से लड़ाई की जैसा ख़ुदावन्द ने मूसा को फ़रमाया था, और सारे मर्दों को क़त्ल किया, और उन्होंने मिद्यान के पांच बादशाहों— ईवी, राक़िम, सूर, हूर और रूबा को जान से मारा, और बऊर के बेटे बलआम को भी तलवार से क़त्ल किया, और बनी इस्राईल ने मिद्यान की औरतों और उनके बच्चों को बन्धक बना लिया, और उनके सारे शहरों को जिनमें वह रहते थे और उनके सारे क़िलों को फूंक दिया।”
मूसा अ० के ज़माने में यही क़ानून चलन में था और उसको उनका समर्थन हासिल था। तौरेत में है:
“तब मूसा और अहले अज़र पादरी तथा जमाअत के सारे सरदार उनके स्वागत के लिए ख़ेमा से बाहर गए, और मूसा लश्कर के रईसों पर और उन पर जो हज़ारों के सरदार थे और उन पर जो सैकड़ों के सरदार थे, जो जंग करके फिरे, ग़ुस्सा हुए और उनको कहा कि क्या तुमने सब औरतों को जीता रखा?”
साद बिन मुआज़ के उस उचित फ़ैसले को पूरा किया गया और इस तरह मदीना यहूदी साज़िश, षड्यन्त्र और फ़ितना-फ़साद से बच गया, और मुसलमानों को इत्मीनान हो गया कि अब पीछे से उन पर कोई हमला न होगा और किसी अंदरूनी साज़िश को सर उठाने का मौक़ा न मिलेगा।
सल्लाम बिन अबिल हुक़ैक़ एक यहूदी था जिसने मुसलमानों के ख़िलाफ़ पार्टीबन्दी की थी। ख़ज़रज ने उसे भी क़त्ल कर दिया। इससे पहले औस काब बिन अल-अशरफ़ का ख़ात्मा कर चुके थे। काब अल्लाह के रसूल सल्ल० की अदावत और आपके ख़िलाफ़ लोगों को उकसाने में सबसे आगे था। इन दोनों के क़त्ल से मुसलमानों को फ़ितना व फ़साद के उन सरदारों से छुटकारा मिला जो इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ़ लगातार साज़िश करने में लगे रहते थे, और सबने इत्मीनान की सांस ली।
अल्लाह के रसूल सल्ल० बनी क़ुरैज़ा से जिस तरह निबटे वह सामरिक नीति तथा अरब के यहूदी क़बीलों के स्वभाव के अनुसार था। उनके लिए इस तरह की कड़ी सज़ा की ज़रूरत थी ताकि ग़द्दारी करने वालों को सदा के लिए सबक़ मिल जाए और आगे आने वाली पीढ़ी इससे सीख ले। आर० वी० सी० बॉडले ने अपनी किताब The Messenger: The Life of Mohammed में इस घटना पर रोशनी डालते हुए लिखा है:
“मुहम्मद अरब में अकेले थे। यह देश क्षेत्रफल में संयुक्त राज्य अमेरिका का एक तिहाई है और इसकी आबादी 50 लाख है। उनका अपना राज्य सेन्ट्रल पार्क से अधिक बड़ा न था। अपनी नीतियों को लागू करने के लिए उनके पास सिर्फ़ तीन हज़ार की सेना थी जो हथियारों से सुसज्जित न थी। अगर वह कमज़ोर होते और ज़ुल्म को सर उठाते ही न दबा देते तो इस्लाम ज़िंदा न रहता। यहूदियों का यह क़त्ले आम एक कठोर क़दम ज़रूर था लेकिन धर्मों के इतिहास में यह पहली घटना न थी। एक मुसलमान की निगाह से यह सबसे उचित था। इसके बाद अरब क़बीलों और यहूदियों को किसी ग़द्दारी से पहले बार-बार सोचना पड़ा था, इसलिए कि वह इसका अंजाम देख चुके थे और देख चुके थे कि मुहम्मद सल्ल० अपने फ़ैसला लागू करने की ताक़त रखते हैं।”
सर स्टैनली लेन-पूल ने Selections from the Kur-an के परिचय में लिखा है:
“यह याद रखना चाहिए कि उन लोगों का जुर्म ग़द्दारी था, वह भी एक घेरे के दौरान। जिन लोगों ने इतिहास में यह पढ़ा है कि वेलिंग्टन की फ़ौज जिस रास्ते से गुज़री उसकी निशानदेही भागे हुए सिपाहियों और लूटमार करने वालों की लाशें करती थीं जो पेड़ों पर टांग दी जाती थीं, उन्हें एक ग़द्दार क़बीले के एक सरसरी फ़ैसले के अनुसार क़त्ल किए जाने पर हैरत नहीं होना चाहिए।”
मदीना में यहूदियों के इस आख़िरी मोर्चे को ख़त्म करने से एक फ़ायदा यह हुआ कि ढोंग का कैम्प क़ुदरती तौर पर कमज़ोर पड़ गया और मुनाफ़िक़ों की गतिविधियां मन्द पड़ गईं। वह हताश और निराश हो गए। डा० इसराईल वेल्फ़िन्सन ने ग़ज़वा-ए-क़ुरैज़ा पर रोशनी डालते हुए लिखा है:
“जहां तक मुनाफ़िक़ों का सम्बन्ध है, बनी क़ुरैज़ा की लड़ाई के बाद उनकी आवाज़ मन्द पड़ गई, और उसके बाद उनकी कथनी व करनी से कोई ऐसी बात ज़ाहिर न हुई जो अल्लाह के रसूल सल्ल० और आपके साथियों (सहाबा) के फ़ैसले के ख़िलाफ़ होती, जैसा कि इससे पहले आशा की जा रही थी।”
सख़ावत व रहमदिली
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने नज्द की तरफ़ कुछ सवारों को एक मुहिम पर भेजा। यह लोग वापस आए तो अपने साथ बनी हनीफ़ा के सरदार सुमामा बिन उसाल को क़ैदी बनाकर लाए और उनको मस्जिद के एक खम्भे से बांध दिया गया। जब अल्लाह के रसूल सल्ल० उधर से गुज़रे तो आपने उनसे पूछा, “सुमामा! कुछ कहना तो नहीं है?” उन्होंने कहा, “ऐ मुहम्मद (सल्ल०)! अगर आप क़त्ल करेंगे तो ऐसे व्यक्ति को क़त्ल करेंगे जिसकी गर्दन पर ख़ून है। अगर एहसान करेंगे तो एक शुक्रगुज़ार पर एहसान करेंगे, और अगर आपको माल व दौलत चाहिए तो बताएं। आप जो भी मांग रखेंगे वह पूरी की जाएगी।” आप यह सुनकर आगे बढ़ गए। दूसरी बार जब आपका उधर से गुज़र हुआ तो आपने उससे वही सवाल किया और उसने वही जवाब दिया और आपने पहले जैसा रुख़ अपनाया। तीसरी बार जब आप उधर से गुज़रे तो आपने आदेश दिया कि “सुमामा को छोड़ दो।” अतः उसे छोड़ दिया गया। इसके बाद सुमामा ने मस्जिद के क़रीब एक खजूर के बाग़ में जाकर स्नान किया और आपके पास आकर मुसलमान हो गया और कहने लगा, “अल्लाह की क़सम! एक समय था कि मुझे आपके चेहरे से अधिक कोई चेहरा बुरा न लगता था, लेकिन आज आपका चेहरा मुझे हर चीज़ से अधिक प्यारा है, और अल्लाह की क़सम! आपके दीन से अधिक ज़मीन पर मुझे किसी अन्य चीज़ से नफ़रत न थी, लेकिन आज आपका दीन मुझे सभी धर्मों से अधिक प्यारा है।
मेरा क़िस्सा यह है कि मैं उमरा की नीयत से जा रहा था कि आपके सवारों ने मुझे गिरफ़्तार कर लिया।” इस पर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उन्हें बधाई दी और उमरा अदा करने की हिदायत की। जब सुमामा क़ुरैश से मिले तो उन्होंने कहा, “सुमामा! तुम बेदीन हो गए।” सुमामा ने जवाब दिया, “नहीं! अल्लाह की क़सम, मैं तो ईमान लाया हूं। तुम्हारे पास यमामा के गेहूं का एक दाना भी उस समय तक न पहुंचेगा जब तक अल्लाह के रसूल सल्ल० की मंज़ूरी न होगी।” इसके बाद वह अपने इलाक़े में वापस आ गए और ऊंटों के क़ाफ़िले को जो गेहूं लेकर जाते थे मक्का जाने से रोक दिया, जिसके फलस्वरूप क़ुरैश को फ़ाक़ा की नौबत आ गई, और उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास प्रार्थना भेजी कि सुमामा को अनाज के निर्यात की इजाज़त दे दें। आपने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।
ग़ज़वा-ए-बनी अल-मुस्तलिक़ तथा इफ़्क की घटना
इसके बाद दूसरे ग़ज़वे, ग़ज़वा-ए-बनी लहयान तथा ग़ज़वा-ए-ज़ी-क़रद पेश आए, लेकिन इनमें लड़ाई नहीं हुई। शाबान सन् 6 हिजरी में हज़रत मुहम्मद सल्ल० को यह ख़बर मिली कि बनी अल-मुस्तलिक़ लड़ाई के लिए जमा हो रहे हैं। यह ख़बर पाकर आप भी मुक़ाबले के लिए चले। मुनाफ़िक़ों की इतनी बड़ी संख्या आपके साथ हो गई कि इससे पहले किसी ग़ज़वे में न थी। उनका सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई भी साथ था।
मुसलमानों की विजय ने इस गिरोह का पित्ता पानी कर दिया। मुसलमानों की क़िस्मत का आसमान उठान पर था। मुसलमानों की लगातार कामयाबी की ख़बरें मक्का के कुफ़्फ़ार, मदीना तथा उनके आस-पास बसने वाले यहूदियों और मुनाफ़िक़ों के लिए गहरी चिन्ता का कारण बनी हुई थीं। वह यह समझ चुके थे कि मैदान-ए-जंग में अब मुसलमानों को अधिक सेना और साज-सज्जा के बल-बूते हराया नहीं जा सकता। इसलिए उन्होंने अन्दरूनी बिगाड़ पैदा करना शुरू किया। मुसलमानों में फूट डालने के लिए उन्होंने क़ौमी तथा क़बीलों के भेद-भाव को हवा दी, नबी के गरिमापूर्ण पद के अपमान और उस पर से मुसलमानों के यक़ीन को कमज़ोर बनाने की योजना बनाई, और आपके कैम्प के ख़िलाफ़ आरोप लगाने की ख़तरनाक मुहिम चलाने का फ़ैसला किया। लेकिन अब तक मदीना में एक नई सोसाइटी जन्म ले चुकी थी, जिसका प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे का सम्मान करता। जब वह अपने किसी भाई के बारे में कोई ग़लत बात सुनता तो पहले अपना जायज़ा लेता। अगर अपने अन्तःकरण को पाक-साफ़ पाता तो फिर जिस प्रकार अपने लिए ऐसी निराधार बात न करता, दूसरे के लिए भी न करता। बेशक मुनाफ़िक़ों की यह एक बहुत ख़तरनाक और गहरी चाल थी, और उनकी यह चाल बनी अल-मुस्तलिक़ के ग़ज़वे में जिस तरह खुलकर सामने आई, इससे पहले कभी न आई थी।
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मदीना से चलकर बनी अल-मुस्तलिक़ के सोते के पास, जिसे “मुरैसीअ” भी कहते हैं, पड़ाव किया। यह जगह समुन्द्र तट की तरफ़ ‘क़ुदैद’ के पास था। यहां लड़ाई हुई और बनी अल-मुस्तलिक़ हार गए।2
इस मौक़े पर हज़रत उमर रज़ि० का एक नौकर जो बनी ग़िफ़ार के क़बीले से सम्बन्ध रखता था और जुहैना क़बीला का एक व्यक्ति जिसका सम्बन्ध ख़ज़रज से था, आपस में लड़ने लगे। तो जुहैनी ने आवाज़ लगाई, “ऐ अन्सारियो!” अजीर ने आवाज़ लगाई, “ऐ मुहाजिरीन!” अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल यह सुनकर बहुत ग़ुस्सा हुआ। उस समय वह अपने आदमियों में बैठा हुआ था। उसने कहा, “अच्छा! इन मुहाजिरीन के हौसले यहां तक पहुंचे। उन्होंने हमारे इलाक़े में आकर हमसे रस्साकशी की और अपनी संख्या बढ़ाने की कोशिश की। यह तो वैसे ही हुआ कि अपने कुत्ते को ख़ूब खिला-पिलाकर मोटा करो तो तुमको ही खाएगा। अल्लाह की क़सम! जब हम मदीना वापस जाएंगे तो वहां के बड़े लोग दलितों को निकालकर बाहर करेंगे।” फिर उसने अपने आदमियों को सम्बोधित करके कहा, “यह सब कुछ तुमने अपने हाथों किया है। तुमने अपने देश में उनको जगह दी, उन्हें अपना माल दिया। अल्लाह की क़सम! अगर तुम अपने हाथ को ज़रा रोक लेते और इतनी उदारता से काम न लेते तो वह निश्चय ही दूसरा घर देखते।”
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जब यह बात सुनी तो आपने सेना की वापसी का आदेश दिया ताकि लोग फ़ितना में न पड़ें और शैतान को उन्हें बहकाने का मौक़ा न मिले। यह वापसी आपकी सामान्य आदत से हटकर थी। आपके आदेश पर सब लोग चल खड़े हुए। उस दिन आप बराबर चलते रहे। रात भर चलकर सुबह हुई। सफ़र जारी रहा और दिन चढ़ गया। सूरज की गर्मी से लोगों को तकलीफ़ होने लगी जब आपने पड़ाव किया। लोग इतने थक गए थे कि लेटते ही सो गए। अब्दुल्लाह बिन उबई के लड़के अब्दुल्लाह लश्कर से पहले मदीना पहुंच गए। वह रास्ते में अपने बाप का रास्ता रोककर खड़े हो गए। अपने बाप को देखकर उन्होंने रास्ते में अपना ऊंट बैठा दिया और कहा, “मैं तुम्हें उस समय तक नहीं छोड़ूंगा जब तक कि अपनी ज़बान से तुम न कह दो कि मैं गिरा हुआ हूं और मुहम्मद सल्ल० इज़्ज़त वाले हैं।” इसी बीच अल्लाह के रसूल सल्ल० का उधर से गुज़र हुआ। आपने फ़रमाया, “अब्दुल्लाह! जाने दो। जब तक वह हमारे बीच हैं हम उनके साथ अच्छा सुलूक ही करेंगे।”
अल्लाह के रसूल सल्ल० का यह नियम था कि जब आप सफ़र का इरादा करते तो आप अपनी पत्नियों के नाम क़ुरआ (लॉटरी) डालते, जिसका नाम निकलता उसको अपने साथ ले जाते। ग़ज़वा-ए-बनी अल-मुस्तलिक़ में क़ुरआ में हज़रत आइशा रज़ि० का नाम निकला। अतः आप उनको अपने साथ ले गए। वापसी पर जब मदीना क़रीब आया तो आपने पड़ाव किया और रात का कुछ हिस्सा वहीं गुज़ारा, उसके बाद कूच का एलान किया। हज़रत आइशा शौच के लिए गईं तो उनके गले का हार किसी जगह टूटकर गिर गया और उन्हें पता न चला। जब वह ऊंट में वापस आईं तो उनको मालूम हुआ कि उनका हार ग़ायब है। वह उसको तलाश करने फिर वहां गईं। इसी बीच कूच का एलान हो गया। जिन लोगों के ज़िम्मे उनकी सवारी थी वह समय से आए और यह समझकर कि हज़रत आइशा अन्दर होंगी, डोली उठाकर चल पड़े। हज़रत आइशा रज़ि० की उम्र कम थी और उनका शरीर हल्का-फुल्का था, इसलिए डोली लेकर चलने वालों को तनिक भी सन्देह न हुआ कि वह डोली के अन्दर नहीं हैं। हज़रत आइशा रज़ि० वापस आईं तो वहां कोई न था। सब जा चुके थे। उन्होंने अपनी चादर ओढ़ी और वहीं लेट गईं।
इस बीच सफ़वान बिन अल-मुअत्तल जो अपनी किसी ज़रूरत से क़ाफ़िले से पीछे रह गए थे, इधर आ निकले। सफ़वान ने हज़रत आइशा को देखा तो “इन्ना लिल्लाहि” पढ़ा और कहने लगे, “यह तो अल्लाह के रसूल सल्ल० की पत्नी हैं।” सफ़वान ने अपना ऊंट उनके क़रीब कर दिया और ख़ुद पीछे हट गए। हज़रत आइशा रज़ि० उसमें सवार हो गईं तो उन्होंने ऊंट की नकेल पकड़ी और तेज़ी के साथ क़ाफ़िले से जा मिलने के लिए चल पड़े। जब वह क़ाफ़िले के क़रीब पहुंचे तो क़ाफ़िला पड़ाव कर चुका था, लेकिन इस घटना से लोगों में किसी तरह की सनसनी पैदा नहीं हुई, क्योंकि रेगिस्तान में क़ाफ़िलों के आने-जाने में इस तरह की घटनाएं हो जाती थीं। बहन-बेटियों की इज़्ज़त की हिफ़ाज़त उनके ख़मीर में थी और इस तरह के बुरे ख़याल से उनके पैदाइशी गुणों का कोई वास्ता न था। वह इस पर इस्लाम लाने से पहले भी उसी तरह डटे थे जैसे इस्लाम लाने के बाद।
अज्ञानता-युग का एक अरब कवि कहता है:
“अगर मेरे पड़ोस की किसी औरत पर मेरी नज़र भी पड़ जाती है तो मैं अपनी निगाहें नीचे कर लेता हूं, यहां तक कि उसका नशेमन (पर्दा) उसे अपने अन्दर छिपा न ले।”
अल्लाह के रसूल सल्ल० के सहाबियों का आपके साथ वह सम्बन्ध था जो बाप-बेटे के बीच होता है। आपकी पत्नियां मोमिनों के लिए मां का दर्जा रखती हैं। उनकी नज़र में आप सबसे अधिक प्यारे थे। सफ़वान भी दीनदारी और शर्म व हया में नेकनाम थे। यह भी उल्लेख मिलता है उनको औरतों में कोई दिलचस्पी न थी।3
इस तरह यह कोई ऐसी बात न थी जिसकी तरफ़ लोग ध्यान देते, लेकिन अब्दुल्लाह बिन उबई ने मदीना पहुंचकर इस घटना को फैला दिया। उसके और उसके साथियों के लिए यह एक ऐसी चीज़ हाथ लग गई थी जिससे मुसलमान आसानी के साथ फ़ितने में पड़ सकते थे, और हज़रत मुहम्मद सल्ल० के साथ उनके रिश्ता कमज़ोर तथा आप सल्ल० के प्रति उनकी श्रद्धा-भक्ति को कम किया जा सकता था। इससे मुसलमानों का एक-दूसरे पर भरोसा कमज़ोर पड़ता था। इस साज़िश के कुछ ऐसे सादा दिल मुसलमान भी शिकार हुए जिन्हें अधिक बातें करने का शौक़ था और जो बिना जांचे-परखे बात को दोहराने के आदी थे।
जब हज़रत आइशा रज़ि० को मदीना में अचानक इसकी ख़बर हुई तो वह सन्नाटे में आ गईं। वह बहुत दुखी हुईं। उनकी रातों की नींद उड़ गई। अल्लाह के रसूल सल्ल० के लिए यह एक कठिन घड़ी थी। जब आपको पता चला कि बात कहां से चली थी और कहां पहुंच गई, तो आप मस्जिद आए और मिम्बर पर खड़े होकर फ़रमाया, “ऐ मुसलमानो! मुझे कौन उस व्यक्ति के बारे में कुछ कहने की इजाज़त देता है जिससे मेरे घर वालों के बारे में कुछ कहकर दुख पहुंचाने का मुझे पता चला है। अल्लाह की क़सम! मुझे अपने परिवार के बारे में जो कुछ जानकारी है वह सन्तोषजनक है। लोगों ने इस मामले में जिन साहब का नाम लिया है उनके बारे में भी मुझे अच्छी बात मालूम है। वह जब कभी मेरे घर आते तो मेरे साथ आते थे।”
यह सुनकर ‘औस’ के कुछ लोग भड़क उठे और कहने लगे कि “जिसने ऐसी बात ज़बान से निकाली है हम उनकी गर्दन उड़ा देंगे, चाहे वह ‘औस’ का आदमी हो या ‘ख़ज़रज’ का।” अब्दुल्लाह बिन उबई का सम्बन्ध ख़ज़रज से था। यह बात सुनकर “औस व ख़ज़रज” के क़बीले कटने-मरने को तैयार हो गए, लेकिन अल्लाह के रसूल सल्ल० की सूझ-बूझ तथा बीच-बचाव से मामला ठंडा पड़ गया और बात वहीं ख़त्म हो गई। हज़रत आइशा रज़ि० को अपनी बेगुनाही का पूरा यक़ीन था। उनको पूरा यक़ीन था कि अल्लाह अन्ततः उनको बरी कर देगा, लेकिन उनके मन में यह बात नहीं आई थी कि अल्लाह की तरफ़ से इसके लिए विशेष कर ‘वही’ नाज़िल होगी। कुछ ही दिनों में क़ुरआन पाक की निम्नलिखित आयतें उतरीं और इस तरह सात आसमानों के ऊपर से उनकी बेगुनाही का एलान किया गया:
इस तरह एक ज़बरदस्त फ़ितना सदा के लिए ख़त्म हो गया, और इस तरह ख़त्म हुआ मानो कुछ हुआ ही न था। मुसलमान पहले की तरह अपने उन अहम कामों को पूरा करने में लग गए जिन पर न सिर्फ़ उनका बल्कि पूरी इंसानियत मानवता का कल्याण निर्भर था।
टिप्पणियां
- 1मॉन्टगोमरी वॉट की किताब (Cambridge History of Islam) में है कि मदीना में बनी क़ुरैज़ा का बड़ा क़बीला बाक़ी रह गया था। मदीना के घेरे के समय यह मुसलमानों के साथ दोस्ती करते थे लेकिन अन्दर-अन्दर वह मुशरिकों से मिल चुके थे।
- 2यह ग़ज़वा राजनीतिक, सामरिक तथा आर्थिक दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण था क्योंकि इसका मुख्य केन्द्र ‘मुरैसीअ’ मक्का की तिजारत के राजमार्ग पर स्थित था, जो मक्का से मदीना का एक छोटा रास्ता भी था, जिससे मुसाफ़िर और तिजारती क़ाफ़िले गुज़रते थे।
- 3इसी तरह की एक घटना उम्मे सलमा के सम्बन्ध में बयान की जाती है। जब उनको अपने पति के साथ मदीना हिजरत करने से रोक दिया गया, तो वह रोज़ घाटी में जाकर बैठ जातीं, और शाम तक रोती रहतीं। लगभग एक वर्ष तक उनका यह हाल रहा। अन्ततः लोगों का दिल पसीज उठा, और उन्होंने उम्मे सलमा को मदीना जाने की इजाज़त दे दी। उन्होंने अपना ऊंट तैयार किया और अल्लाह का नाम लेकर उस पर बैठ गईं। रास्ते में उन्हें उस्मान बिन तलहा मिले, और उनकी यह हालत देखकर उनकी नकेल थामकर मदीना तक उनके साथ गए। उम्मे सलमा कहती हैं कि “उनसे अधिक शरीफ़ किसी अरब से मेरा सामना नहीं पड़ा। उनका हाल यह था कि जब कोई मंज़िल आती तो वह ऊंट को बिठाकर पीछे चले जाते, मैं उतर जाती तो आते और सामान आदि उतारकर उसे किसी पेड़ से बांध देते, और जब तक मुझे मदीना नहीं पहुंचा दिया वह बराबर यही करते रहे।” यह उस समय की बात है जब उस्मान बिन तलहा इस्लाम नहीं लाए थे, लेकिन सफ़वान उस घटना से बहुत पहले मुसलमान हो चुके थे और अल्लाह के रसूल सल्ल० का सत्संग उन्हें प्राप्त था।