अध्याय तेरह

ग़ज़वा-ए-ख़न्दक़

ख़न्दक़ की जंग, जिसे ग़ज़वा-ए-अहज़ाब भी कहते हैं, शव्वाल सन् पांच हिजरी में हुई। यह एक फ़ैसले की जंग थी, जिसमें मुसलमानों को भी बहुत ज़्यादा कठिनाई का सामना करना पड़ा, और जिसके परिणाम बड़े दूरगामी साबित हुए। क़ुरआन पाक में इरशाद है:

इस लड़ाई को बढ़ावा देने वाले यहूदी थे। बनी अन-नज़ीर तथा बनी वाइल के कुछ लोग मक्का गए और क़ुरैश से मिलकर उनको हज़रत मुहम्मद सल्ल० के ख़िलाफ़ उकसाना चाहा। क़ुरैश को इस तरह की लड़ाइयों का अनुभव था। वह बहुत पहले से इसे भुगते हुए थे, इसलिए उनकी हिम्मत न पड़ती थी, लेकिन यहूदियों ने उनके सामने हालात कुछ इस तरह पेश किए कि क़ुरैश ने उनकी बात मान ली। यहूदियों ने कहा कि हम सब लोग आपके साथ होंगे और जब तक इस दीन को जड़ से ख़त्म न कर देंगे, दम न लेंगे। क़ुरैश ने लड़ाई की तैयारियां शुरू कर दीं। यहूदियों का प्रतिनिधि-मण्डल वहां से चलकर क़बीला ग़तफ़ान में आया और उन्हें भी इस लड़ाई में भाग लेने को कहा। उनके क़बीलों में घूम-फिरकर मदीना पर हमले की नई योजना विस्तार के साथ उनके सामने रखी और उन्हें यह भी बताया कि क़ुरैश इस जंग के लिए तैयार हैं।

इन कोशिशों के फलस्वरूप उनमें एक फ़ौजी समझौता हो गया, जिसमें मुख्यतः क़ुरैश, यहूद और ग़तफ़ान शामिल थे। उन्होंने एकमत होकर कुछ शर्तें भी निर्धारित कीं। एक शर्त यह भी कि इस मिली-जुली सेना में ग़तफ़ान के 6 हज़ार सिपाही होंगे। इसके बदले में यहूद ग़तफ़ान को ख़ैबर के बग़ीचों की पूरे साल की फ़सल दिया करेंगे। अन्ततः क़ुरैश ने चार हज़ार लड़ाकू जवान इसके लिए जमा किए, ग़तफ़ान के 6 हज़ार। कुल दस हज़ार की सेना का सेनापति अबू सुफ़ियान को बनाया गया।

मुसलमानों की हिकमत

जब अल्लाह के रसूल सल्ल० को यह सूचना मिली कि यह लोग इस तरह एक होकर मदीना पर हमला करना चाहते हैं और मुसलमानों के नाम व निशान को हमेशा के लिए ख़त्म करने का पक्का इरादा कर चुके हैं, तो आपने पूरी गम्भीरता के साथ इसका नोटिस लिया और लड़ाई के लिए तैयार हो गए। मुसलमानों ने मदीना में क़िलाबन्द रहकर सुरक्षात्मक लड़ाई को प्राथमिकता दी। उस समय उनकी सेना में 3 हज़ार मुजाहिद थे।

इस मौक़े पर सलमान फ़ारसी रज़ि० ने मदीना के सामने ख़न्दक़ खोदने की सलाह दी। लड़ाई की इस विधि से ईरानी भली प्रकार परिचित थे। हज़रत सलमान ने अल्लाह के रसूल सल्ल० से कहा, “या रसूलल्लाह! ईरान में जब हमको घुड़सवार लश्कर के हमले का ख़तरा होता था तो हम लोग इसके मुक़ाबले के लिए ख़न्दक़ें खोदते थे।” आपने उनकी राय पसन्द की और मदीना के उत्तर-पश्चिम में स्थित मैदान में ख़न्दक़ें खोदने का हुक्म दिया। यही वह खुला हिस्सा था जहां से दुश्मन हमला कर सकता था।1

आपने ख़न्दक़ खोदने का काम इस तरह बांटा कि हर दस सहाबी के ज़िम्मे चालीस हाथ पड़ा। ख़न्दक़ की लम्बाई लगभग पांच हज़ार हाथ थी, गहराई सात से दस हाथ तक और चौड़ाई सामान्यतः नौ से ऊपर थी।

अल्लाह के रसूल सल्ल० ख़न्दक़ खोदने में मुसलमानों के साथ ख़ुद भी शामिल हुए। सबने मिलकर पूरी हिम्मत के साथ यह काम पूरा किया। सर्दी अधिक थी। खाने के लिए उन्हें इतना ही राशन मिल पाता था जिससे वह ज़िंदा रह सकें। हज़रत अबू तलहा रज़ि० कहते हैं कि हमने अल्लाह के रसूल सल्ल० से भूख की शिकायत की और अपना पेट खोलकर दिखाया, जिस पर एक पत्थर बंधा हुआ था। यह देखकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अपने पेट का कपड़ा हटाया और हमने देखा कि उसमें दो पत्थर बंधे हुए हैं।2 इस पर भी सब ख़ुश थे, अल्लाह का शुक्र अदा करते थे और मैदान-ए-जंग के गीतों के साथ अल्लाह की बड़ाई बयान करते थे, और शिकायत का एक शब्द उनकी ज़बान पर न आता था।

हज़रत अनस रज़ि० बयान करते हैं कि एक बार अल्लाह के रसूल सल्ल० ख़न्दक़ के निकट आए। आपने देखा कि मुहाजिरीन व अन्सार सुबह-सवेरे कठोर ठंडक में ख़न्दक़ खोदने में लगे हैं। उनके पास ग़ुलाम व कर्मचारी न थे जो यह काम करते। आपने उन्हें इस हाल में देखकर कहा:

“ऐ अल्लाह! ज़िंदगी तो आख़िरत की ज़िंदगी है, पस माफ़ फ़रमा अन्सार व मुहाजिरों को।”

यह सुनकर उसके जवाब में उन्होंने कहा:

“हम वह हैं जिन्होंने मुहम्मद सल्ल० से जिहाद पर उस समय तक के लिए बैअत की है जब तक हमारी जान में जान है।”

वह बयान करते हैं कि एक मुट्ठी जौ कहीं से मिल जाते तो उसका मलीदा बना लिया जाता और उसमें थोड़ी-सी चर्बी मिला ली जाती, हालांकि उसका मज़ा बदल चुका होता।

ख़न्दक़ की खुदाई में एक जगह एक बड़ी चट्टान आ गई, जिस पर कुदाल काम नहीं कर रही थी। लोगों ने हज़रत मुहम्मद सल्ल० को इसकी सूचना दी। आपने उसे देखा और ख़ुद कुदाल उठाकर बिस्मिल्लाह कहकर उस पर एक ऐसी चोट मारी कि एक तिहाई भाग टूट गया। आपने फ़रमाया, “अल्लाहु अकबर! मुझे शाम की कुंजियां दी गईं।” इसके बाद दूसरा तिहाई भाग भी आपने तोड़ डाला और फ़रमाया, “अल्लाहु अकबर! मुझे फ़ारस की कुंजियां दी गईं। अल्लाह की क़सम, मैं मदाइन का सफ़ेद महल अपनी आंखों से देख रहा हूं।” फिर तीसरी बार आपने बिस्मिल्लाह कहकर उस पर चोट लगाई और बाक़ी हिस्सा भी टुकड़े हो गया। आप सल्ल० ने फ़रमाया, “अल्लाहु अकबर! मुझे यमन की कुंजियां दी गईं। अल्लाह की क़सम, मैं इस समय इसी जगह सनआ शहर के दरवाज़े देख रहा हूं।” आप यह उस समय फ़रमा रहे थे जब मुसलमानों को अपने ज़िंदा रहने का भी यक़ीन नहीं था। एक तरफ़ उन्हें भूख परेशान किए जा रही थी, दूसरी तरफ़ जानलेवा ठंडक, और तीसरे दुश्मन का ख़तरा सर पर था।

आपके कुछ चमत्कार

इस ग़ज़वे में आपके कई चमत्कार ज़ाहिर हुए। जब मुसलमानों को ख़न्दक़ खोदने में कठिनाई होती और कोई चीज़ रुकावट डालती, तो आप किसी बर्तन में पानी मांगते और अपना थोड़ा-सा लुआबे दहन (थूक) उसमें डाल देते, और जो कुछ अल्लाह आपसे कहलाता आप दुआ करते। जब यह पानी उस पत्थर पर छिड़का जाता तो वह रेत की तरह नर्म हो जाता। खाने में ऐसी बरकत होती कि थोड़ा-सा खाना बहुत सारे लोगों के लिए काफ़ी हो जाता।

जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ि० कहते हैं कि हम ख़न्दक़ की खुदाई कर रहे थे कि एक बड़ा पत्थर आ गया। सब लोग अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास गए और आपसे बताया। आपने फ़रमाया कि “मैं उतरता हूं।” फिर आप ऐसी हालत में खड़े हुए कि आपके पेट पर एक पत्थर बंधा हुआ था। उस समय हालत यह थी कि तीन दिन से हमारे मुंह में कोई चीज़ न गई थी। आपने कुदाल उठाई और उस पत्थर पर मारी। पत्थर रेत की तरह भरभराकर गिर गया। मैंने आपसे थोड़ी देर के लिए घर जाने की इजाज़त मांगी। घर पहुंचकर मैंने अपनी पत्नी से कहा कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्ल० को इस हाल में देखा कि जिसके देखने की ताब नहीं। क्या तुम्हारे पास कुछ खाने-पीने का सामान है? उन्होंने कहा, “हां, कुछ जौ है और एक बकरी का बच्चा है।” मैंने बकरी के बच्चे को ज़िबह किया, जौ को पीसा और एक डेगची में गोश्त चढ़ा दिया। जब मैं आपके पास जाने लगा तो आटा गुंथ चुका था, डेगची चूल्हे पर थी और तैयार होने के क़रीब थी।

मैंने आपके पास वापस आकर कहा, “मैंने थोड़ा-बहुत खाने का बंदोबस्त किया है, आप और दो-एक आदमी चलकर खा लें।” आपने पूछा, “कितना खाना होगा?” मैंने सब कुछ बता दिया। आपने फ़रमाया, “यह तो बहुत है और अच्छा है। अपने घर में कहना कि डेगची चूल्हे पर से उस समय तक न उतारें और न तन्दूर से रोटियां निकालें जब तक मैं न आ जाऊं।” फिर आपने फ़रमाया, “लोगो! बिस्मिल्लाह!” और सभी मुहाजिर व अन्सार खड़े हो गए।

मैं अपने घर पहुंचा और अपनी पत्नी से कहा, “कुछ ख़बर भी है? अल्लाह के रसूल सल्ल० सारे आदमियों को लेकर आ रहे हैं।” कहने लगीं, “क्या खाने के बारे में आपसे कुछ पूछा?” मैंने कहा, “हां।” मेरी कुटिया पर पहुंचकर आपने फ़रमाया, “लोगो! अन्दर दाख़िल हो और भीड़ न लगाओ।” आप रोटी के टुकड़े करके उस पर गोश्त रखते जाते और अपने साथियों को देते जाते थे। फिर कपड़ा हटाकर उसी तरह रोटी तोड़ते और गोश्त लेते रहे और साथियों को देते रहे, यहां तक कि सबने ख़ूब पेट भरकर खाना खाया, उसके बाद भी खाना बच रहा। फिर आपने जाबिर रज़ि० की पत्नी से कहा, “अब तुम खाओ और दूसरों को दो, क्योंकि सब लोग इस समय भूख और फ़ाक़े में हैं।”

एक दूसरी जगह आया है कि हज़रत जाबिर रज़ि० कहते हैं कि मैं आपके पास गया और धीरे से निवेदन किया, “या रसूलल्लाह सल्ल०! हमने एक जानवर ज़िबह किया है और हमारे पास थोड़ा-सा जौ है, उसे पीस लिया है, आप और कुछ लोग चलिए।” आपने सस्वर कहा, “ख़न्दक़ वालो! जाबिर ने एक भोज का बन्दोबस्त किया है।”

कड़े इम्तिहान

क़ुरैश ने आगे बढ़कर मदीना के बाहर पड़ाव डाला। उनकी सेना 10 हज़ार थी। ग़तफ़ान भी अपने क़बीलों के साथ उसी जगह ठहरे। अल्लाह के रसूल सल्ल० तीन हज़ार की सेना लेकर उनके मुक़ाबले के लिए चले। दोनों सेनाओं के बीच ख़न्दक़ थी। मुसलमानों और बनी क़ुरैज़ा के बीच मदीना की सुरक्षा का एक समझौता था, लेकिन बनी अन-नज़ीर के सरदार हुयय बिन अख़्तब के बहकावे में आकर बनी क़ुरैज़ा इस समझौते से फिर गए, जिसके फलस्वरूप पूरे शहर में ख़ौफ़ का माहौल फैल गया। मुनाफ़िक़ों ने भी पांव निकाले।

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने सोचा कि इस समय क़बीला ग़तफ़ान से इस बात पर सुलह कर लेना उचित है कि मदीना के फलों का एक तिहाई हिस्सा हमेशा उनको दिया जाएगा। आपके मन में यह विचार अन्सार के ऊपर जंग के बढ़ते हुए बोझ को देखकर आया। आप उन्हें और परीक्षा में नहीं डालना चाहते थे, लेकिन औस व ख़ज़रज के दोनों सरदार साद बिन मुआज़ और साद बिन उबादा रज़ि० के इरादे और साबित-क़दमी को देखकर आपने अपनी यह राय बदल दी। उन्होंने निवेदन किया कि “जिस समय हम शिर्क से ग्रसित थे, न हम अल्लाह की इबादत करते थे और न उनको पहचानते थे, तब तो खजूर का एक दाना भी (आतिथ्य-सत्कार और क्रय-विक्रय के अलावा) हम उन्हें देने पर तैयार न थे, और अब जब हम मुसलमान हो गए और अल्लाह ने हमें आप और इस्लाम से गौरवान्वित किया, तो क्या हम अपना माल उनको दे देंगे? अल्लाह की क़सम, हमें इसकी कोई ज़रूरत नहीं। हमारे पास उनके लिए तलवार के सिवा और कुछ नहीं है, यहां तक कि अल्लाह उनके और हमारे बीच फ़ैसला कर दे।” यह सुनकर आपने इरशाद फ़रमाया, “जैसी तुम्हारी राय हो।”

घुड़सवारों का मुक़ाबला

अल्लाह के रसूल सल्ल० और आपकी सेना ने वहां पर पड़ाव किया। दुश्मन ने उन्हें घेर लिया था, लेकिन लड़ाई की नौबत नहीं आई। यह ज़रूर हुआ कि दुश्मन के कुछ घुड़सवार तेज़ी के साथ आगे बढ़े। अचानक उन्हें रास्ते में ख़न्दक़ दिखाई दी तो वह ठहर गए। वह आपस में कहने लगे, “यह नया तरीक़ा व जाल है, अरब इस तरीक़े को नहीं जानते हैं।” वह सोचने लगे कि ख़न्दक़ को किस तरह पार करें। यह सोचते हुए वह वहां पहुंचे जहां ख़न्दक़ की चौड़ाई सबसे कम थी। वहां पहुंचकर उन्होंने अपने घोड़ों को एड़ लगाई तो घोड़े ख़न्दक़ पार करके मदीना की तरफ़ पहुंच गए।

इस दस्ते में अरब का मशहूर शहसवार अम्र बिन अब्दे वुद्द भी था, जिसका मुक़ाबला एक हज़ार घुड़सवारों से किया जाता था। उसने एक जगह ठहरकर आवाज़ लगाई, “है कोई मुक़ाबला करने वाला?” यह ललकार सुनकर हज़रत अली रज़ि० सामने आए और कहा, “अम्र! तुमने अल्लाह से वादा किया था कि क़ुरैश का कोई व्यक्ति तुम्हें दो बातों की तरफ़ बुलाएगा तो तुम एक ज़रूर मान लोगे।” उसने जवाब दिया, “हां!” हज़रत अली रज़ि० ने कहा, “ठीक है, मैं तुम्हें अल्लाह की, उसके रसूल की और इस्लाम की दावत देता हूं।” उसने कहा कि “मुझे इसकी कोई ज़रूरत नहीं।” हज़रत अली ने कहा, “तो फिर मैं तुम्हें मुक़ाबले की दावत देता हूं।” कहने लगा, “क्यों मेरे भतीजे! अल्लाह की क़सम, मैं तुम्हें क़त्ल नहीं करना चाहता।” हज़रत अली ने कहा, “लेकिन अल्लाह की क़सम, मैं तुम्हें ज़रूर क़त्ल करना चाहता हूं।”

यह सुनकर अम्र का ख़ून गरम हो गया। वह अपने घोड़े से उतर पड़ा, उसकी कूचें काट दीं, उसके चेहरे पर ग़ुस्से में एक तमाचा मारा, फिर इसी हालत में हज़रत अली की तरफ़ बढ़ा। मुक़ाबला शुरू हुआ। थोड़ी देर दोनों ने अपने जौहर दिखाए, फिर हज़रत अली ने उसे ठिकाने लगा दिया। उनके दूसरे शहसवारों में नौफ़ल बिन मुग़ीरा भी था। यह देखकर बाक़ी घुड़सवार भाग निकले और ख़न्दक़ पार करके भाग गए।

मां का अपने बेटे को जिहाद पर भेजना

हज़रत आइशा रज़ि०, जो बनी हारिसा के क़िले में मुसलमान औरतों के साथ थीं (उस वक़्त तक पर्दा का हुक्म नहीं हुआ था), बयान करती हैं कि साद बिन मुआज़ उधर से गुज़रे। वह एक इतना छोटा कवच पहने हुए थे कि उनका पूरा हाथ उससे बाहर था। वह रजज़ (वीर रस के गीत) पढ़ते जाते थे। उनकी मां ने देखकर कहा, “बेटे! तुमने बहुत देर कर दी, जल्दी जाओ।” हज़रत आइशा ने उनसे कहा, “ऐ साद की मां! कितना अच्छा होता कि साद का कवच इससे बड़ा होता।” मैदान-ए-जंग में इसी खुले हाथ पर एक तीर ऐसा लगा कि उससे हाथ की नस कट गई, और साद रज़ि० बनी क़ुरैज़ा के ग़ज़वे में शहीद हुए।

क़ुदरती मदद

मुशरिकों ने मुसलमानों को चारों तरफ़ से घेर लिया और लगभग एक महीने तक घेरे रखा। इस बीच मुसलमानों को अनेक मुसीबतें झेलनी पड़ीं। मुनाफ़िक़ों का ढोंग भी सामने आ गया। अतएव कुछ लोगों ने अल्लाह के रसूल सल्ल० से मदीना वापस जाने की इजाज़त चाही और यह बहाना किया कि उनके घर खुले रह गए हैं।

अल्लाह के रसूल सल्ल० और आपके साथी इसी परेशानी में थे कि अचानक नुऐम बिन मसऊद ग़तफ़ानी आपके पास आए और कहा कि “या रसूलल्लाह! मैं इस्लाम ला चुका हूं, लेकिन मेरी क़ौम को मेरे मुसलमान होने का पता नहीं है। आपकी जो आज्ञा हो।” आपने फ़रमाया, “तुम अकेले आदमी हो। तुम वहीं रहकर हमारी मदद करो, क्योंकि जंग हीला व कूटनीति का नाम है।” नुऐम बिन मसऊद रज़ि० वहां से वापस बनी क़ुरैज़ा के पास आए और उनसे कुछ ऐसी बातें कीं कि उन्हें ख़ुद अपनी नीति पर शक पैदा हो गया। वह सोचने लगे कि अपने पड़ोसी मुहाजिरीन व अन्सार से दुश्मनी तथा दूर स्थित ग़तफ़ान के क़बीलों से सम्पर्क बनाए रखना कहां तक उचित है। नुऐम ने उन्हें सलाह दी कि वह क़ुरैश और ग़तफ़ान की हिमायत में लड़ने से पहले उनके कुछ सरदारों को बन्धक बनाकर अपने पास रख लें, ताकि उनकी पोज़ीशन सुरक्षित रहे। बनी क़ुरैज़ा ने इस अच्छी सलाह के लिए नुऐम के प्रति आभार व्यक्त किया।

तब नुऐम क़ुरैश के सरदारों के पास गए और उनके प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त की और कहा कि यहूद अपने किए पर पछता रहे हैं और सोच रहे हैं कि क़ुरैश के कुछ सरदारों को वह बन्धक बना लें, ताकि उनकी पोज़ीशन मज़बूत रहे। उनका इरादा है कि वह इन सरदारों को मुहम्मद (सल्ल०) के हवाले कर देंगे, और वह उनके सर तलवार से उड़ा देंगे।

वहां से नुऐम ग़तफ़ान के पास गए और उन्हें भी उसी तरह समझाया जैसे क़ुरैश को समझाया था। नतीजा यह हुआ कि क़ुरैश और ग़तफ़ान एक-दूसरे से चौकन्ना और होशियार हो गए, और उनके दिलों में यहूद की तरफ़ से बड़ा मनमुटाव पैदा हो गया। सभी सम्बन्धित दलों में फूट पड़ गई, और प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे से भयभीत रहने लगा। अतएव जब अबू सुफ़ियान और क़बीला ग़तफ़ान के लोगों ने एक फ़ैसलाकुन जंग की शुरुआत करनी चाही, तो यहूद टाल-मटोल करने लगे। उन्होंने कुछ सरदारों को बन्धक बनाना चाहा। उनका यह इरादा देखकर क़ुरैश और ग़तफ़ान समझ गए कि नुऐम जो कुछ कह रहे थे सच निकला, और उन्होंने यहूद की मांग को ठुकरा दिया। दूसरी तरफ़ यहूद (बनी क़ुरैज़ा) के अन्दर भी बदगुमानी पैदा हो गई। इस तरह उन सबकी ताक़त कमज़ोर पड़ गई और उनके इरादे धूमिल पड़ गए, और उनमें फूट पड़ गई।

अल्लाह का करना कुछ ऐसा हुआ कि ठंड और रात में ऐसी तेज़ हवाएं चलीं कि दुश्मनों के ख़ेमे उखड़ गए और चूल्हे पर से डेगचियां उलट गईं। यह मंज़र देखकर अबू सुफ़ियान ने कहा, “लोगो! अब यह ठहरने की जगह नहीं रही। हमारे खच्चर और घोड़े मर गए। बनी क़ुरैज़ा ने हमारे साथ विश्वासघात किया। इस आंधी ने जो क़यामत ढाई है वह भी तुम लोग देख रहे हो। डेगचियां उड़ी जा रही हैं, आग जलना मुश्किल है, हमारा कोई ख़ेमा सुरक्षित नहीं है। अब यहां से वापस चला जाना ही ठीक है।” यह कहकर वह अपने ऊंट पर बैठा और चल पड़ा।

जब ग़तफ़ान को यह सूचना मिली कि क़ुरैश कूच कर गए, तो वह भी अपने-अपने ठिकानों की तरफ़ चल पड़े। हुज़ैफ़ा बिन अल-यमान, जिन्हें अल्लाह के रसूल सल्ल० ने दुश्मन का भेद लेने के लिए भेजा था, उस समय लौटे जब आप नमाज़ पढ़ रहे थे। नमाज़ पढ़ चुकने के बाद उन्होंने आपको सब हाल बताया। सुबह हुई तो आप मुसलमानों के साथ मदीना वापस आए। इस घटना का क़ुरआन में इस तरह वर्णन आया है:

इस तरह जो बादल बड़े ज़ोर से उठा था, वह गरज-चमक कर बिन बरसे निकल गया, और मदीना का आसमान साफ़ हो गया। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “इस साल के बाद से अब क़ुरैश तुम पर चढ़ाई न करेंगे, बल्कि तुम ही उन पर हमला करोगे।”

ग़ज़वा-ए-ख़न्दक़ में मुसलमानों के अधिक से अधिक सात आदमी शहीद हुए और मुशरिकों के चार आदमी क़त्ल किए गए।

टिप्पणियां

  1. 1खुदाई का काम मदीना के उत्तर-पूर्व से शुरू होकर उत्तर-पश्चिम तक समाप्त हुआ। इसका पूर्वी किनारा हर्र-ए-वाक़िम से मिलता था और पश्चिमी किनारा बुतहान की घाटी से मिलता था।
  2. 2अरब में यह प्रथा थी कि भूख की दशा में लोग अपने को सीधा रखने के लिए पेट पर पत्थर बांध लेते थे। (शरह मिश्कात)