अध्याय बाईस

तबूक की जंग

कुछ लोग अभी भी यह समझ रहे थे कि इस्लाम की उठान और उफान पल-दो-पल की है और यह अधिक समय तक टिकने वाला नहीं है। दुश्मन के इस भुलावे को दूर करने के लिए ज़रूरी था कि कोई ऐसी घटना हो जिससे उनका यह भ्रम जाता रहे और उसके दिल में इस्लाम की हैबत और उसका रोब व दबदबा बन जाए। मुसलमानों को यह मौक़ा तबूक1 की जंग से हासिल हुआ। यह जंग असल में उस वक़्त की सबसे बड़ी ताक़त बाज़नतीनी साम्राज्य से एक टकराव था। इस सल्तनत का अरबों पर बड़ा रोब था। इसका एक प्रमाण अबू सुफ़ियान की वह अभिव्यक्ति है जो उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० के ख़त से प्रभावित होकर रोम के बादशाह हरकुल की बात सुनकर कही थी। हरकुल ने कहा था कि “मुझे उम्मीद है कि अरब में किसी नबी का अभ्युदय होने वाला है।” अबू सुफ़ियान बयान करते हैं कि “यह बात सुनकर मैं खड़ा हो गया और अपना हाथ मलते हुए मैंने कहा कि ‘इब्न अबी कबशा’2 का मामला तो ज़ोर पकड़ गया। उनसे यह रोम का बादशाह भी डरने लगा।” वह कहते हैं कि “मुझे यह सुनकर यक़ीन हो गया कि आप कामयाब होंगे, और इस तरह अल्लाह ने मेरे दिल में इस्लाम डाला।”

अरब उस दौर में रूमियों से जंग और उन पर हमला करने की बात सोच भी नहीं सकते थे, बल्कि वह ख़ुद हमले की शंका से डरे रहते थे। मदीना के मुसलमानों पर जब कोई अचानक मुसीबत आती या किसी बड़े ख़तरे का भय होता तो वह अधिक से अधिक ग़स्सान के ईसाई अरब प्रांत के बारे में सोचते। ‘ऐला’ की घटना जो सन् 8 हिजरी में हुई। हज़रत उमर रज़ि० के शब्दों से इस पर रोशनी पड़ती है। वह कहते हैं, “मेरे एक अन्सारी दोस्त थे। जब मैं कभी बाहर होता तो वापसी पर वह मुझे ख़ास-ख़ास ख़बरें बताते, और जब वह बाहर होते तो मैं। उन दिनों हम लोग ग़स्सान के बादशाह से बहुत डरे हुए थे जिसके बारे में चर्चा थी कि वह हम पर हमला करने का इरादा रखता है। हमारे दिल में हर समय इसी का ख़याल रहता था। इसी बीच एक दिन मेरे अन्सारी दोस्त आए और उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया और कहने लगे, ‘खोलो! खोलो!’ मैंने कहा, ‘क्या ग़स्सानी ने हमला कर दिया?’”

उस समय रोमी साम्राज्य की तूती बोलती थी। उसकी फ़ौजों ने हरकुल के नेतृत्व में ईरानी फ़ौजों को तहस-नहस कर दिया था और ईरानी साम्राज्य में अन्दर तक दाख़िल हो गई थीं, और इस महान विजय की ख़ुशी में हरकुल ने ‘हिम्स’ से ‘ऐलिया’ तक एक विशाल जुलूस में सफ़र किया। यह हिजरत के सातवें वर्ष की बात है। इस जुलूस में हरकुल उस सलीब को उठाए हुए था जो उसने ईरानियों से हासिल की थी। सारा रास्ता क़ालीन-ग़लीचों से सुसज्जित था। चारों तरफ़ से फूलों की बारिश हो रही थी।

इस शानदार विजय के दो वर्ष भी न गुज़रने पाए थे कि अल्लाह के रसूल सल्ल० मदीना से रूमियों के मुक़ाबले के लिए चल पड़े। तबूक की जंग ने शाम (सीरिया) पर हमले का रास्ता बना दिया जो हज़रत अबू बक्र और हज़रत उमर के शासनकाल में फ़तह हुआ।

यह जंग कैसे शुरू हुई? अल-ज़रक़ानी ने लिखा है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० को सूचना मिली कि रूमी अरब की उत्तरी सीमाओं पर हमले की तैयारी कर रहे हैं। इब्न साद और उनके शेख़ वाक़िदी बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल० को नबतियों से यह ख़बर मिली कि हरकुल ने अपने सिपाहियों की एक साल की ख़ुराक का बन्दोबस्त कर लिया है, और उनके साथ लख़्म, जुज़ाम, आमिला और ग़स्सान तथा अरब के अन्य विजय क़बीलों को मिला लिया है, और उनकी टुकड़ियां ‘बलक़ा’ तक पहुंच चुकी थीं।

इस जंग का मक़सद इसके अलावा पड़ोसी हुकूमत को भयभीत करना भी था, जिससे इस्लाम के केन्द्र तथा उसकी उभरती हुई शक्ति को नुक़सान पहुंच जाने का डर था। इससे उन्हें होशियार करना था कि वह मुसलमानों पर उनके क्षेत्र में घुसकर हमला करने की हिम्मत न करें। क़ुरआन पाक में अल्लाह फ़रमाता है:

इस जंग से यह मक़सद पूरा हो गया। रूमियों ने इसका जवाब किसी जवाबी हमले से नहीं दिया, बल्कि उन्होंने इस खुली चुनौती के बाद एक तरह की हार और ख़ामोशी अपना ली और उन्होंने इस्लाम की पूरी ताक़त को महसूस कर लिया।

इस जंग का दूसरा लाभ यह हुआ कि अरब प्रायद्वीप के जो क़बीले रूमियों के असर में थे उन पर मुसलमानों का असर और दबदबा बन गया, और अब वह इस्लाम के बारे में गम्भीरता से सोचने लगे और उन्होंने महसूस किया कि वह कोई पानी का बुलबुला नहीं है जो जलतल पर उभरता है और देखते ही देखते ग़ायब हो जाता है। इस जंग में जो मुसलमान शामिल थे उनकी तरफ़ इशारा करते हुए क़ुरआन पाक में इरशाद होता है:

रूमियों को मूता की जंग अभी अच्छी तरह याद थी, जिसमें हर पक्ष ने सही-सलामत हो जाने को उचित समझा था, और इसकी वजह से बाज़नतीनी साम्राज्य का जो रोब अरबों के दिल पर था वह बहुत कमज़ोर पड़ गया।

संक्षेप में इस जंग का नबी की सीरत (जीवनी) और इस्लाम की दावत के इतिहास में विशेष स्थान है, और इससे वह मक़सद पूरे हुए जो आगे चलकर मुसलमानों और अरबों के हक़ में बहुत लाभकारी साबित हुए और जिन्होंने इस्लाम के इतिहास और उसके बाद की घटनाओं पर बहुत असर डाला।

तबूक की जंग का समय

तबूक की जंग रजब सन् 9 हिजरी में हुई। कड़ाके की गर्मी थी और खजूर मज़ेदार हो गई थी, और पेड़ों की छाया सुहावनी लगती थी।3 आपने चटियल मैदानों को पार करके इस जंग के लिए एक लम्बा सफ़र किया। आपने मुसलमानों को पहले होशियार कर दिया था कि वह पूरी तैयारी कर लें, क्योंकि मुक़ाबला कड़ा था और सफ़र लम्बा, और लोगों को अकाल का सामना था।

मुनाफ़िक़ इस मौक़े पर विभिन्न बहाने करके बैठ रहे। वह कड़े मौसम और कठोर दुश्मन से डर गए। उन्हें जिहाद में विशेष रुचि भी नहीं थी और उनका ईमान भी कमज़ोर था। क़ुरआन पाक में इसका चित्रण इस तरह किया गया है:

मुसलमानों का जोश

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इस जंग के लिए ठोस तैयारी की। आप सल्ल० ने धनवानों को अल्लाह की राह में ख़र्च करने की चाह दिलाई। अतः अनेक धनवान आगे आए और उन्होंने सच्चे मन से इसमें हिस्सा लिया। हज़रत उस्मान रज़ि० ने पूरे लश्कर को सामान उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी ली और इस पर एक हज़ार दीनार ख़र्च किए। उनके लिए अल्लाह के रसूल सल्ल० ने दुआ की। बहुत से सहाबी जो सक्षम न थे, आपके पास सवारी की प्रार्थना लेकर आए, लेकिन आपने असमर्थता व्यक्त की। इस तरह उन सहाबियों के इस जंग में हिस्सा लेने से वंचित रह जाने पर अल्लाह क़ुरआन पाक में फ़रमाता है:

कुछ मुसलमान ऐसे थे जिन्हें फ़ैसला करने में देर लगी और वह इस जंग में शामिल नहीं हो सके।

तबूक की तरफ़ रवानगी

अल्लाह के रसूल सल्ल० 30 हज़ार के लश्कर के साथ मदीना से तबूक के लिए रवाना हुए। इससे पहले आपके नेतृत्व में किसी अन्य जंग में इतनी संख्या में इस्लामी सेना नहीं गई थी। आपने लश्कर को ‘सनिय्यतुल विदा’ में पड़ाव डालने का निर्देश दिया, और मुहम्मद बिन मसलमा अल-अन्सारी को मदीना का हाकिम नियुक्त किया। परिवार की देखभाल का काम हज़रत अली को सौंपा। हज़रत अली ने जब आपसे इस बात को लेकर लोगों में फैली तरह-तरह की अफ़वाह का ज़िक्र किया तो आपने फ़रमाया, “क्या तुम इस पर राज़ी हो कि तुम मेरे ऐसे हो जैसे मूसा अ० के साथ हारून थे? हां, यह बात ज़रूर है कि मेरे बाद कोई नबी नहीं होगा।”

आप इस लश्कर के साथ समूद क़ौम की धरती ‘अल-हिज्र’ में उतरे। आपने अपने साथियों से कहा, “यह उनकी धरती है जिन पर अज़ाब उतरा। जब उन लोगों के मकानों में जिन्होंने अपने आप पर ज़ुल्म किया दाख़िल हो तो रोते हुए दाख़िल हो, इस डर से कि कहीं तुम पर भी वह मुसीबत न आ जाए जो उन पर आई थी। यहां का पानी न पीना, और न नमाज़ के लिए इस पानी से वुज़ू करना। अगर तुमने इस पानी से आटा गूंथ लिया हो तो उसे ऊंटों को खिला दो, और ख़ुद इसमें से ज़रा भी न खाओ।”

जब लोगों को पानी की बहुत तंगी हुई तो उन्होंने आपसे इसकी शिकायत की। आपने दुआ की और इस दुआ की बरकत से अल्लाह ने बादल भेजा और इतनी बारिश हुई कि लोगों को सुकून मिल गया और उन्होंने अपनी ज़रूरत का पानी जमा भी कर लिया।

रूमियों का मनोबल गिरा

जब आप तबूक जा रहे थे तो कुछ मुनाफ़िक़ (पाखंडी) आपकी तरफ़ इशारा करके आपस में कहते थे, “क्या तुम समझते हो कि बनी अल-असफ़र, अर्थात रूमियों, के साथ जंग में उतना आसान मामला होगा जितना अपने देश के अरब क़बीलों के साथ हुआ? अल्लाह की क़सम! हम देख रहे हैं कि कल यह सब रस्सियों से जकड़े पड़े होंगे।”

ऐला के शासक से सुलह

जब आप तबूक पहुंच गए तो ऐला का शासक ‘यूहन्ना बिन रूबा’ आपके पास आया और आपसे सुलह कर ली और जिज़िया भी अदा कर दिया। ‘जरबा’ और ‘अज़रुह’ के लोग भी आए। आपने उनको अमान का लिखित आश्वासन दिया, जिसमें सीमाओं की रक्षा, पानी तथा जलमार्गों की सुरक्षा और पक्षों के बीच सलामती की ज़मानत दी गई थी। आप सल्ल० ने यूहन्ना का आदर-सत्कार भी किया।

मदीना वापसी

यहां पर रूमियों का सीमा पार करके हमला करने का इरादा छोड़ देने की सूचना आप सल्ल० को मिली। अब चूंकि इस जंग का मक़सद हासिल हो चुका था, इसलिए आपने भी उनके देश में घुसकर उन पर चढ़ाई करना उचित नहीं समझा। बाज़नतीनी ख़ामोश थे। सिर्फ़ उकैदिर बिन अब्दुल मलिक (ईसाई) जो ‘दूमतुल जन्दल’4 का शासक था, की तरफ़ से हमले की सूचना मिली। आपने उसे कुचलने के लिए ख़ालिद बिन वलीद को 500 सवारों के साथ भेजा। ख़ालिद बिन वलीद उसे गिरफ़्तार करके आपके पास लाए। आपने उसका ख़ून माफ़ किया और उसने जिज़िया पर सुलह कर ली। आप सल्ल० ने उसे आज़ाद कर दिया।

एक ग़रीब के जनाज़े में

अब्दुल्लाह ज़ुल-बिजादैन रज़ि० का निधन तबूक में हुआ। यह शुरू में इस्लाम लाने के लिए कोशिश में थे, लेकिन उनकी क़ौम उनको इससे रोके रखती थी और उनको तरह-तरह से सताया जाता था। आख़िर में उनकी क़ौम ने उन्हें सिर्फ़ एक मोटी खुरदरी चादर में छोड़ दिया। वह भागकर आप सल्ल० के पास आए। वह जब आपके क़रीब पहुंचे तो यह चादर भी फट गई और इसके दो टुकड़े हो गए। उन्होंने एक टुकड़े को बांध लिया और दूसरे टुकड़े को ओढ़ लिया, और इसी हाल में आप सल्ल० के पास आए। उसी दिन से उनका लक़ब ‘ज़ुल-बिजादैन’ पड़ गया।

जब तबूक में उनका निधन हुआ तो अल्लाह के रसूल सल्ल० और हज़रत अबू बक्र व हज़रत उमर उनके जनाज़े के साथ अंधेरी रात में गए। इनमें से किसी के हाथ में मशाल थी। क़ब्र तैयार थी। अल्लाह के रसूल सल्ल० स्वयं क़ब्र में उतरे, हज़रत अबू बक्र और हज़रत उमर रज़ि० ने जनाज़े को क़ब्र में उतारा। आपने फ़रमाया, “अपने भाई को और नीचे मेरे क़रीब करो।” जब आपने उनको क़ब्र में लिटा दिया तो फ़रमाया, “ऐ अल्लाह! मैं इससे राज़ी हूं, तू भी इससे राज़ी हो जा।” अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ि० कहते हैं कि मैंने तमन्ना की कि काश इस क़ब्र में मैं होता!

काब बिन मालिक का इम्तिहान

जो लोग तबूक की जंग में, बिना किसी शंका के, अन्य कारणों से शामिल नहीं हो सके उनमें काब बिन मालिक, मुरारा बिन अर-रबी और हिलाल बिन उमैया भी थे। यह लोग उनमें थे जिन्होंने पहले दौर में इस्लाम क़बूल किया था और अनेक यातनाएं उठाई थीं। मुरारा और हिलाल बद्र की जंग में शामिल थे। ग़ज़वे से दूर रहना उनकी आदत में न था। इसलिए तबूक की जंग में उन्हें वंचित रखकर क़ुदरत उनका इम्तिहान लेना चाहती थी, जो आने वाली नस्ल के लिए निश्चय ही एक नमूना साबित हुआ। इस मौक़े पर इन लोगों के पीछे रह जाने का कारण ढीलापन, इरादे की कमज़ोरी, साधनों पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता और इस मामले पर गम्भीरता से ग़ौर न करना था, और वह चीज़ है जिसने अनेक अल्लाह के बन्दों को, जो ईमान और अल्लाह व रसूल सल्ल० की मुहब्बत में दूसरे मुसलमानों से किसी तरह कम न थे, बार-बार नुक़सान पहुंचाया है। यही वह तत्व है जिसकी तरफ़ काब बिन मालिक के यह शब्द इशारा करते हैं। वह कहते हैं:

“मैं रोज़ाना इस इरादे से निकलता कि मैं सफ़र का ज़रूरी सामान ले लूं और उनके साथ रवाना हो जाऊं, लेकिन बिन कुछ किए वापस आ जाता। फिर मैं अपने दिल में कहता, चिन्ता किस बात की, जब चाहूंगा ले लूंगा, जल्दी क्या है? मैं सोचता रह गया और कूच की घड़ी आ गई और लश्कर रवाना हो गया। मैंने अभी तक कुछ इन्तिज़ाम नहीं किया था। मैंने सोचा, हर्ज क्या है, चलो मैं दो दिन बाद रवाना हो जाऊंगा और रास्ते में क़ाफ़िले से मिल जाऊंगा। उन सबके जाने के बाद मैं सामान जुटाने के लिए निकला, लेकिन फिर कुछ किए बिना ही वापस आ गया। दूसरे दिन भी यही हुआ। मैं सुस्त ही पड़ा रहा और लड़ाई का मामला बहुत आगे निकल गया। मैंने एक बार फिर इरादा किया कि अब भी चलकर उन्हें पा लूं। काश मैंने ऐसा ही किया होता, लेकिन इसका भी मौक़ा नहीं मिला।”

यह तीनों लोग ईमान, अल्लाह व रसूल सल्ल० से मुहब्बत, इस्लाम से वफ़ादारी में ऐसे साबितक़दम और ईमानदार व सच्चे साबित हुए कि इसकी मिसाल हमें किसी अन्य धर्म व समाज में कहीं नहीं मिलती। उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० से सब कुछ साफ़-साफ़ बता दिया, और जब लोग बातें बनाकर माफ़ी मांग रहे थे, उन्होंने उस वक़्त ख़ुद अपने ख़िलाफ़ गवाही दी। काब बिन मालिक अपना क़िस्सा बयान करते हुए कहते हैं:

“यह सब पीछे रहने वाले आपके पास आए और क़समें खा-खाकर आपसे अपनी-अपनी मजबूरी बयान करने लगे। यह कोई 80 से अधिक लोग थे। आपने उनकी ज़ाहिरी बातों को क़बूल फ़रमा लिया, उनसे बैअत ली और उनके लिए दुआ की। उनके दिल की बात को अल्लाह के सुपुर्द किया। मैं भी आपकी सेवा में हाज़िर हुआ, सलाम पेश किया। आपने नाराज़गी की मुस्कान के साथ मेरा स्वागत किया, फिर फ़रमाया, ‘आओ!’ मैं आगे बढ़ा और आपके बिल्कुल सामने बैठ गया। आपने मुझसे पूछा, ‘तुम क्यों पीछे रह गए थे? क्या तुमने अपनी सवारी नहीं ख़रीदी थी?’ मैंने कहा, ‘जी हां! अल्लाह की क़सम! ऐसा ही है। अल्लाह की क़सम! अगर मैं आपके बजाए इस दुनिया के अन्य किसी आदमी के सामने होता तो मैं समझता कि मैं कुछ बहाना करके उसकी नाराज़गी से बच जाऊंगा। मेरे अन्दर बात करने और अपनी बात साबित करने का सलीक़ा भी है, लेकिन अल्लाह की क़सम! मुझे यक़ीन है कि मैं अगर आज झूठ बोलकर आपको राज़ी कर लूंगा तो क़रीब है कि अल्लाह आपको मुझसे नाराज़ कर दे, और अगर मैं सच बोलकर आपको दुखी कर दूंगा तो इसमें मुझे अल्लाह की तरफ़ से माफ़ी की उम्मीद है। अल्लाह की क़सम! मेरे पास कोई बहाना नहीं है, और जिस समय मैं पीछे रह गया था उससे ज़्यादा मैं कभी स्वस्थ और सुखी न था।’”

आख़िर इम्तिहान की घड़ी आ गई। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने लोगों को उनसे बात करने को मना कर दिया। मुसलमान तो आपकी बात सुनना और उस पर अमल करना, यही जानते थे। अतः सबने उनसे किनारा काट लिया और बिल्कुल बदल गए, यहां तक कि उनकी निगाह में ज़मीन-आसमान भी बदल गए। मालूम होता था कि यह वह ज़मीन ही नहीं है जो पहले थी। इस हाल में उनकी पचास रातें गुज़रीं। मुरारा तथा हिलाल दोनों थक-हारकर अपने घर बैठ रहे और रोते रहे। काब इन सबसे ज़्यादा जवान और ताक़तवर थे। वह बाहर निकलते थे, मुसलमानों के साथ नमाज़ पढ़ते थे, बाज़ारों में आते-जाते थे, लेकिन कोई व्यक्ति उनसे बात करने को तैयार न था।

लेकिन इन तमाम बातों ने मुहब्बत और वफ़ादारी के उस रिश्ते पर कोई असर नहीं डाला जो काब और अल्लाह के रसूल सल्ल० के बीच क़ायम था। इससे आपकी वह मुहब्बत व शफ़क़त भी कम न हो सकी जो उनके हाल पर थी, बल्कि इससे उसमें और बढ़ोत्तरी हो गई। वह कहते हैं:

“मैं अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास हाज़िर होता, सलाम करता। उस समय आप नमाज़ के बाद अपनी मजलिस में बैठे होते। मैं अपने दिल में सोचता कि आपने सलाम के जवाब में अपने होंठ को हिलाया या नहीं। फिर मैं आपके क़रीब नमाज़ के लिए खड़ा हो जाता और कनखियों से आपको देखता रहता। जब मैं नमाज़ में व्यस्त होता उस समय आप मेरी तरफ़ प्यार से देखते, जब मैं आपकी तरफ़ देखता तो आप निगाह फेर लेते।”

इतना ही नहीं, उनके क़रीबी दोस्त अबू क़तादा, जिन पर उन्हें बड़ा भरोसा था, ने भी उनसे मुंह फेर लिया। वह बयान करते हैं:

“लोगों की जफ़ा मेरे लिए असहनीय हो गई। अन्त में एक दिन दीवार लांघकर मैं क़तादा के अहाते में पहुंचा। वह मेरे चचेरे भाई थे और मुझे बहुत प्यारे थे। मैंने उनको सलाम किया तो उन्होंने, अल्लाह की क़सम, सलाम का जवाब तक नहीं दिया। मैंने कहा, ‘अबू क़तादा! मैं तुमको अल्लाह का वास्ता देकर पूछता हूं, क्या तुम जानते हो कि मुझे अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० से मुहब्बत है?’ इस पर भी वह ख़ामोश रहे। मैंने दोबारा यही बात कही और उनको अल्लाह का वास्ता दिया। वह ख़ामोश रहे, फिर इतना कहा कि ‘अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० ज़्यादा जानते हैं।’ इस पर मेरी आंखों से आंसू बहने लगे। मैं उसी समय मुड़ा और दीवार लांघकर चला गया।”

इस पूर्ण बहिष्कार का असर इन तीनों की पत्नियों पर भी पड़ा। इनको हुक्म मिला कि वह अपनी बीवियों को अलग कर दें, और उन्होंने उस पर अमल किया।

वफ़ादारी और सच्चाई पर जमे रहने के इस इम्तिहान की सबसे नाज़ुक घड़ी उस समय आई जब ग़स्सान के बादशाह ने उनकी इस मुहब्बत व सम्बन्ध को ख़रीदना चाहा। यह वह बादशाह है जिसका दरबारी बनना लोग अपने लिए बड़ी ख़ुशनसीबी समझते थे और इसके लिए बड़ी होड़ लगती थी। बादशाह का सन्देशवाहक उनके पास ऐसे समय पहुंचा जब वह कड़ी मानसिक परेशानी, लोगों के सम्बन्ध-विच्छेद और अल्लाह के रसूल सल्ल० की बेरुख़ी से घिरे थे। सन्देशवाहक ने उनको ग़स्सान के बादशाह का ख़त दिया जिसमें लिखा था:

“मुझे पता चला है कि तुम्हारे स्वामी ने तुम्हारे साथ जफ़ा की है। अल्लाह ने तुम्हारे नसीब में ज़िल्लत और बेकारी नहीं लिखी है। तुम हमारे पास आ जाओ, हम तुम्हारे साथ अच्छा मामला करेंगे।”

इस ख़त से काब बिन मालिक की ग़ैरत भड़क उठी और उनकी मुहब्बत जोश मारने लगी। वह एक तन्दूर के पास गए और ख़त उसमें फेंक दिया।

जब इन तीनों महापुरुषों का इम्तिहान पूरा हो चुका, क़ुरआन पाक में इनका ज़िक्र करके उन्हें अमर बना दिया, और इनकी घटना ने रहती दुनिया तक मुसलमानों के लिए एक पाठ और उदाहरण बना दिया। वह अपने ईमान की परीक्षा में खरे उतरे, और अल्लाह ने उनकी क़बूलियत का ऐलान किया, और सिर्फ़ उनकी तौबा का ज़िक्र नहीं किया कि वह कहीं इससे तन्हाई और तिरस्कार न महसूस करें और यह कि कहीं लोग उनकी तरफ़ उंगली न उठाएं, बल्कि इनकी तौबा की भूमिका में नबियों के सरदार, मुहाजिरों व अन्सार की तौबा की भी ज़िक्र किया। इसका मक़सद उनके सुकून और लोगों की निगाह में उनकी शान को दोगुना करना था। अल्लाह पाक का इरशाद है:

ग़ज़वों पर एक निगाह

तबूक की जंग के साथ, जो हिजरत के 9वें वर्ष रजब के महीने में हुई, ग़ज़वों व सराया (रेडिंग पार्टियों) का सिलसिला ख़त्म हुआ।5

इन तमाम ग़ज़वों और सराया में कुल मिलाकर जितना ख़ून बहा, जंगों के पूरे इतिहास में हमें इससे कम कोई मात्रा नज़र नहीं आती। इनमें मारे जाने वालों की संख्या 1018 से अधिक नहीं, जिसमें दोनों पक्ष शामिल हैं, लेकिन इस थोड़ी संख्या ने इन्सानों को जिस ख़ून-ख़राबे तथा बेइज़्ज़ती से बचाया उसकी पूरी समीक्षा और सर्वे न सिर्फ़ कठिन बल्कि असम्भव है। इसके फलस्वरूप अरब प्रायद्वीप में और उसके आस-पास इतना अमन व इत्मीनान स्थापित हो गया कि एक सफ़र करने वाली औरत हीरा से चलती और काबा का तवाफ़ करके वापस जाती और उसे अल्लाह के सिवा किसी का डर नहीं होता। एक औरत क़ादिसिया से अपने ऊंट पर चलती और बैतुल्लाह (काबा) का दर्शन करती और उसको किसी का डर न होता। इससे पहले यह हालत न थी। पूरे अरब प्रायद्वीप में मार-काट, बदले की कार्रवाइयों, घरेलू लड़ाइयों का एक सिलसिला क़ायम था, और बड़ी-बड़ी हुकूमतों के क़ाफ़िले भी सुरक्षा के कड़े बन्दोबस्त और निपुण पथप्रदर्शकों की मदद से चलते थे।

यह ग़ज़वे क़ुरआन पाक के दो जतनपूर्ण नियमों पर आधारित हैं। एक यह कि “फ़ितना फैलाना (अंग्रेज़ी Persecution) क़त्ल से बढ़कर है।” दूसरे यह कि “ऐ अक़्ल वालो! तुम्हारे लिए बदला और क़िसास ही में ज़िन्दगी है।” इनकी वजह से इंसानियत का बहुत वक़्त बचा, और सुधार की उन लम्बी कोशिशों और लगातार मेहनत की ज़रूरत न पड़ी जो प्रायः निष्फल रही है। इसके अलावा इन ग़ज़वात को अल्लाह के रसूल सल्ल० का नैतिकता और सहानुभूतिपूर्ण निर्देशन हासिल था, जिसमें बदले की भावना और ग़ुस्से की आग बुझाने के बजाए सुधार का काम होता था। अल्लाह के रसूल सल्ल० जब किसी लश्कर को रवाना फ़रमाते तो उसे निर्देश करते:

“मैं तुम्हें अल्लाह से डरने और जो मुसलमान आपके साथ हों उनके साथ अच्छे बर्ताव की नसीहत करता हूं। अल्लाह के नाम पर लड़ना और अल्लाह ही के रास्ते में उससे जंग करना जिसने अल्लाह के साथ कुफ़्र अपनाया। ग़द्दारी न करना। माल-ए-ग़नीमत की चोरी न करना। किसी बच्चे, औरत, विकलांग, बूढ़े या किसी इबादतगाह में बैठे हुए व्यक्ति को क़त्ल न करना। किसी खजूर को हाथ न लगाना। किसी पेड़ को न काटना। किसी इमारत को न गिराना।”

यह ग़ज़वे कितने सफल रहे इसका अन्दाज़ा इससे हो सकता है कि दस वर्ष के अन्दर अरब प्रायद्वीप का लगभग 274 वर्ग मील प्रतिदिन इस्लाम के असर में आता गया। मुसलमानों के जानी नुक़सान को देखा जाए तो महीने में एक आदमी का औसत पड़ता है। दस वर्ष पूरे नहीं हो पाए थे कि 10 लाख वर्ग मील का इलाक़ा इस्लाम के अधीन आ चुका था। इसकी तुलना दो विश्व युद्धों से कीजिए तो आपको सही हालत का पता चलेगा।

इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में इस प्रकरण पर जो कुछ लिखा है उससे पता चलता है कि प्रथम विश्व युद्ध में मरने वालों की संख्या 64 लाख थी तथा दूसरे विश्व युद्ध में यह संख्या 3.5 करोड़ से 6 करोड़ के बीच थी। इन दोनों युद्धों ने, जैसा कि सब जानते हैं, इंसानियत को कोई लाभ नहीं पहुंचाया, न इनसे कोई समस्या हल हुई।

मध्य युग में रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा स्थापित जांच अदालतों (Inquisitions) का जो नास्तिक निशाना बने, उनकी संख्या 1 करोड़ 20 लाख तक पहुंचती है।

इस्लाम में पहला हज

हज सन् 9 हिजरी में फ़र्ज़ किया गया6 और अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत अबू बक्र को हज का अमीर बनाया और मुसलमानों को हज कराने की ज़िम्मेदारी उनको सौंपी। उनके साथ मदीना से तीन सौ मुसलमानों का क़ाफ़िला हज के लिए रवाना हुआ। मुशरिक भी अपने हज के मक़ामात में थे।

इस मौक़े पर अल्लाह के रसूल सल्ल० पर सूरह बराअत उतरी। आपने हज़रत अली को बुला भेजा और उनसे फ़रमाया कि सूरह बराअत की प्रारम्भिक आयतें और उनके अहकाम (आदेश) को लेकर वहां जाएं, और क़ुर्बानी के दिन जब सब लोग ‘मिना’ में जमा हों यह ऐलान कर दें: “जन्नत में कोई काफ़िर दाख़िल नहीं होगा, और इस साल के बाद कोई मुशरिक हज नहीं कर सकता, और कोई व्यक्ति नंगा होकर तवाफ़ नहीं कर सकता, और अगर अल्लाह के रसूल सल्ल० से किसी का कोई समझौता हो तो निर्धारित समय तक उसकी पाबन्दी की जाएगी।” हज़रत अली आपकी ऊंटनी पर सवार होकर रवाना हुए और रास्ते में हज़रत अबू बक्र से जा मिले। उन्होंने पूछा कि “अमीर हो या मामूर?” हज़रत अली ने कहा, “मामूर हूं।” इसके बाद वह लोग मक्का गए। हज़रत अबू बक्र हज के बन्दोबस्त में लग गए। जब क़ुर्बानी का दिन आया तो हज़रत अली ने खड़े होकर अल्लाह के रसूल सल्ल० के हुक्म और निर्देश के अनुसार उन सब बातों का एलान किया जो उन्हें आप सल्ल० ने बताई थीं।

टिप्पणियां

  1. 1मदीना और दमिश्क़ के बीच ‘ऐला’ के दक्षिण-पूर्व में, मदीना से 700 किलोमीटर पर स्थित एक जगह।
  2. 2अबू सुफ़ियान ने आपके लिए इन शब्दों का प्रयोग व्यंग्य करते हुए किया था। अबू कबशा के बारे में दो कथन हैं। एक, यह कि ख़ुज़ाआ का कोई व्यक्ति था जिसने बुतपरस्ती छोड़ दी थी। दूसरे, यह कि आप सल्ल० के पूर्वजों में कोई इस नाम का गुज़रा है।
  3. 3सौर कैलेण्डर के अनुसार तबूक की जंग का समय निर्धारित करना कठिन है। कुछ विद्वानों ने नवम्बर महीने को रजब सन् 9 हिजरी के अनुसार बताया है। मौलवी हबीबुर्रहमान ख़ां की किताब “जदीद मिफ़्ताहुत्तक़वीम” से भी इसकी पुष्टि होती है, लेकिन घटना-चक्र से प्रामाणिक सबूत और हदीस से यह साबित होता है कि यह जंग गर्मियों के मौसम में हुई। काब बिन मालिक बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने रेगिस्तान की तपती गर्मी में कड़े दुश्मन से मुक़ाबले के लिए लम्बा सफ़र किया।” मूसा बिन उक़बा बयान करते हैं कि ख़रीफ़ की रातों और सख़्त गर्मी में, जबकि लोग नख़लिस्तानों में रहना पसंद करते हैं, (यह जंग हुई)। सूरह बराअत में आया है कि “उन्होंने कहा कि इस गर्मी में (घर का आराम छोड़कर) कूच न करो। (ऐ पैग़म्बर! तुम कहो) जहन्नम की आग की गर्मी तो इससे कहीं अधिक गर्म होगी, अगर वह समझते हों।”
  4. 4दूमतुल जन्दल एक आबाद गांव था जहां आराबी क्रय-विक्रय के लिए जाया करते थे। समय के साथ उजाड़ हो गया। उकैदिर ने आकर उसे पुनः बसाया और वहां ज़ैतून की खेती शुरू की। इस गांव के चारों तरफ़ एक प्राचीन चहारदीवारी के अन्दर एक मज़बूत क़िला है जिसके कारण इस स्थान का सामरिक महत्व भी रहा है। इसके अधिकांश लोगों का सम्बन्ध कल्ब क़बीला से है। उकैदिर अपने आपको उस समय के चलन के अनुसार ‘मालिक’ कहलवाता था। उस समय दूमा-वासी ईसाई थे।
  5. 5ग़ज़वात की कुल संख्या 27 और सराया की संख्या 60 बताई गई है। इराक़ी जनरल और विख्यात लेखक महमूद ख़त्ताब की खोज के अनुसार ग़ज़वात की संख्या 28 है।
  6. 6कुछ विद्वानों के मत है कि हज सन् 6 हिजरी में फ़र्ज़ हुआ। शेख़ मुहम्मद अल-ख़ुदरी का यही मत है।