अध्याय इक्कीस
तायफ़ की जंग
हुनैन में हार के बाद ‘सक़ीफ़’ की एक टुकड़ी भागकर तायफ़ पहुंची। यहां उन्होंने एक साल का ग़ल्ला जमा कर शहर के दरवाज़े बन्द कर लिए और क़िले के अन्दर जंग की तैयारी करते रहे। अल्लाह के रसूल सल्ल० उन्हें कुचलने के इरादे से तायफ़ गए और तायफ़ के पास पहुंचकर पड़ाव किया। चूंकि क़िले के दरवाज़े बन्द थे, इसलिए मुसलमान उसके अन्दर दाख़िल नहीं हो सके। सक़ीफ़ के लोग अच्छे तीरअन्दाज़ थे, उन्होंने अन्दर से मुसलमानों पर तीरों की बारिश शुरू कर दी।
यह हालत देखकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अपने लश्कर को तायफ़ के दूसरी तरफ़ मोड़ दिया जहां तीरों के हमले से बचा जा सकता था, और वहां से कोई 25-30 दिन तक इस्लामी फ़ौज ने उनकी घेराबन्दी कर रखी। बीच-बीच में दोनों पक्षों में घोर लड़ाई होती रही और तीरों की बौछार से एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश करते रहे। इस घेराबन्दी में हज़रत मुहम्मद सल्ल० ने पहली बार ‘मिन्जनीक़’ (एक तरह की तोप) का प्रयोग किया। मुसलमानों के कई सिपाही दुश्मनों के तीरों से शहीद हुए।
मैदान-ए-जंग में उदारता
जब घेराबन्दी का कोई नतीजा निकलता दिखाई नहीं दिया तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने सक़ीफ़ के अंगूर के बाग़ काट डालने का हुक्म दिया। इन्हीं बाग़ों पर सक़ीफ़ की अर्थव्यवस्था पूरी तरह निर्भर थी। पेड़ों की कटान शुरू हो गई तो सक़ीफ़ के लोग आपके पास आए और विनती की कि अल्लाह के लिए और रिश्ते का ख़याल करके इन बाग़ों को छोड़ दें। आपने फ़रमाया, “बेशक मैं इसको अल्लाह के लिए और रिश्ते की बुनियाद पर छोड़ता हूं।”
आपने मुनादी करवा दी कि “जो ग़ुलाम क़िले से उतरकर हमारे पास आ जाएगा वह आज़ाद है।” मुनादी सुनकर लगभग 10 आदमी निकले, और आपने उन सबको आज़ाद किया। इन्हीं में अबू बकरा भी थे जो हदीस के एक बड़े ज्ञाता और विद्वान सहाबी हैं। आपने इनमें से हर आदमी को एक मुसलमान के हवाले किया और उनके खाने-पीने की ज़िम्मेदारी उन पर डाल दी। उन लोगों का निकलना तायफ़ वालों को बहुत बुरा लगा।
घेराबन्दी ख़त्म
तायफ़ की फ़तह अभी अल्लाह को मंज़ूर नहीं थी। अतः आपने हज़रत उमर रज़ि० को हुक्म दिया कि वापसी का एलान कर दें। उन्होंने वापसी का एलान किया तो लोगों में बहुत शोर हुआ और वह कहने लगे कि “हम बिन तायफ़ फ़तह किए कैसे चले जाएं?” इस पर आपने फ़रमाया, “अच्छा! मार-काट के लिए चलो।” उन्होंने मार-काट शुरू की और उसके नतीजे में उन्हें गम्भीर चोटें आईं। तब अल्लाह के रसूल सल्ल० ने एलान किया, “कल सुबह इन्शा अल्लाह वापस चलेंगे।” मुसलमान यह सुनकर ख़ुश हुए और वापसी की तैयारी करने लगे। आप यह नज़ारा देखकर हंसने लगे।
हुनैन का माल-ए-ग़नीमत
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अपने साथियों के साथ ‘जिइराना’ में पड़ाव किया और हवाज़िन को इस बात का मौक़ा दिया कि दस-बीस दिन के अन्दर इस्लाम क़बूल कर लें। इसके बाद आपने लोगों को बुलाकर माल-ए-ग़नीमत बांटना शुरू किया। आपने उन्हें पहले हिस्सा दिया जिनकी दिलदारी ज़रूरी थी। अबू सुफ़ियान और उनके दोनों बेटों ‘यज़ीद’ और ‘मुआविया’ को आपने दिल खोलकर हिस्सा दिया। हकीम बिन हिज़ाम, नुज़ैर बिन अल-हारिस, अला बिन जारिया तथा क़ुरैश के अन्य सरदारों को आपने ख़ूब हिस्सा दिया, और फिर प्रत्येक को बुला-बुलाकर उसे हिस्सा दिया।
इस बंटवारे में क़ुरैश के सरदारों को बड़ा हिस्सा तथा अन्सार को मामूली हिस्सा मिलने पर कुछ अन्सार कानाफूसी करने लगे। आपने यह देखकर अन्सार को एक अहाते में जमा किया और उन्हें ऐसे प्रभावी शब्दों से सम्बोधित किया कि उनके दिल के तार झनझना उठे और उनकी आंखों में आंसू भर आए। आपने फ़रमाया, “क्या मैं तुम्हारे पास इस हालत में नहीं आया था कि तुम सब गुमराह (पथभ्रष्ट) थे, फिर मेरे द्वारा अल्लाह ने तुम्हें सीधे रास्ते पर लगाया; तुम ग़रीब थे, अल्लाह ने मेरे द्वारा तुम्हें दौलतमन्द बनाया; तुम सब एक-दूसरे के दुश्मन थे, अल्लाह ने तुम्हारे टूटे हुए दिलों को जोड़ा?”
अन्सार ने जवाब दिया, “अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० का फ़ज़्ल व एहसान सबसे ज़्यादा है।”
आपने आगे फ़रमाया, “ऐ अन्सार! क्या तुम मुझे इस सवाल का जवाब न दोगे?”
अन्सार ने कहा, “या रसूलल्लाह! हम इस बात का आपको क्या जवाब दे सकते हैं। सारा फ़ज़्ल व एहसान अल्लाह और उसके रसूल का है।”
फिर आपने फ़रमाया, “नहीं! अल्लाह की क़सम, अगर तुम चाहो तो कह सकते हो, और तुम जो कहोगे सच होगा और मैं इसका समर्थन करूंगा, कि ‘आप हमारे पास इस हालत में आए कि आपको झुठलाया जा चुका था, उस समय हमने आपकी पुष्टि की और आपको सच्चा माना; सबने आपका साथ छोड़ दिया था, हमने आपकी मदद की; आपको लोगों ने निकाल दिया था, हमने आपको पनाह दी; आपका हाथ ख़ाली था, हमने आपके साथ हमदर्दी की।’”
फिर आपने पूरे आत्मविश्वास के साथ बंटवारे के इस फ़र्क़ की वजह भी बयान की। आपने फ़रमाया, “ऐ अन्सार के लोगो! क्या तुम्हें इस बंटवारे पर नाराज़गी है कि मैंने क़ुरैश को इस्लाम की तरफ़ आकर्षित करने के लिए इस मिट जाने वाली माया का अधिक अंश दिया है और तुम्हें इस्लाम के भरोसे पर छोड़ दिया है? क्या तुम इस पर राज़ी नहीं हो कि लोग अपने साथ भेड़ व बकरियां लेकर जाएं और तुम अपने शिविरों में अल्लाह के रसूल सल्ल० को साथ लेकर जाओ? क़सम उस ज़ात की जिसके क़ब्ज़े में मुहम्मद की जान है, तुम जिस चीज़ को अपने साथ लेकर जाओगे वह उससे कहीं अच्छी है जो वह लेकर जाएंगे। अगर हिजरत न होती तो मैं अन्सार ही का एक व्यक्ति होता। अगर लोग किसी एक घाटी में चलते और अन्सार किसी दूसरी घाटी में, तो मैं अन्सार ही की घाटी में चलता। अन्सार तो उस अस्तर के समान हैं जो शरीर को छूता है, और दूसरे लोग उन कपड़ों के समान हैं जो ऊपर होते हैं और शरीर को स्पर्श नहीं करते। (यहां आपने अस्तर के लिए ‘शिआर’ और ऊपर के कपड़ों के लिए ‘दिसार’ शब्द का प्रयोग किया।) ऐ अल्लाह! अन्सार पर रहम फ़रमा, अन्सार की औलाद पर रहम फ़रमा, और अन्सार की औलाद की औलाद पर रहम फ़रमा।”
यह सुनकर सभी अन्सार रो पड़े और उनकी दाढ़ियां आंसुओं से भीग गईं। वह कहने लगे, “हम इस पर राज़ी और ख़ुश हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल० हमारे हिस्से में आएं।”
क़ैदियों की वापसी
हवाज़िन का 14 सदस्यीय एक शिष्टमण्डल अल्लाह के रसूल सल्ल० से आकर मिला और आपसे विनती की कि आप मेहरबानी करके उन क़ैदियों तथा माल व दौलत को उन्हें वापस कर दें। आपने फ़रमाया, “तुम देख रहे हो मेरे साथ कौन-कौन हैं। सबसे ज़्यादा मुझे वह बात पसन्द है जो सच्ची हो। अब यह बताओ कि तुम्हारी औलाद और तुम्हारी औरतें तुम्हें ज़्यादा प्यारी हैं या तुम्हारा माल व दौलत?”
उन्होंने जवाब दिया कि “हम अपनी औलाद और अपनी औरतों के बराबर किसी चीज़ को नहीं समझते।” आपने फ़रमाया, “कल सुबह की नमाज़ के बाद तुम लोग खड़े होकर यह कहना कि ‘हम मुसलमानों के लिए अल्लाह के रसूल सल्ल० को सिफ़ारिशी बनाते हैं, और आपके सामने मुसलमानों को सिफ़ारिशी बनाकर पेश करते हैं कि आप हमारे ग़ुलाम-बन्दी वापस कर दें।’” दूसरे दिन जब आप नमाज़ अदा कर चुके तो उन्होंने खड़े होकर ऐसा ही कहा। इस पर आपने फ़रमाया, “मेरे हिस्से और बनी अब्दुल मुत्तलिब के हिस्से में जो कुछ है वह तुम्हारे हवाले है। दूसरे लोगों से मैं तुम्हारे लिए सिफ़ारिश करता हूं।” यह सुनकर मुहाजिरीन व अन्सार ने कहा, “हमारे हिस्से का जो कुछ है वह सब अल्लाह के रसूल सल्ल० की सेवा में हाज़िर है।”
बनी तमीम, बनी फ़ज़ारा और बनी सुलैम के तीन आदमी अपना हिस्सा छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। आपने उनसे फ़रमाया, “यह लोग मुसलमान होकर आए हैं। मैंने इनका इन्तिज़ार भी किया और इनको अधिकार दिया, लेकिन उन्होंने अपनी औलाद और बीवियों के बराबर किसी चीज़ को नहीं समझा। इसलिए अगर किसी के पास ऐसे क़ैदी हों और वह उनको ख़ुशी-ख़ुशी देना चाहे तो उसका रास्ता खुला हुआ है, और अगर अपने हक़ को छोड़ना चाहे तो यह उनको दे दे। ऐसे व्यक्ति को हर हिस्से के बदले में 6 हिस्से उस पहले माल-ए-ग़नीमत से दिए जाएंगे जो आगे अल्लाह हमें देगा।”
लोगों ने कहा, “आपकी ख़ातिर हम ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हैं।” आपने फ़रमाया, “हमें मालूम नहीं कि तुममें से कौन इस पर राज़ी है और कौन राज़ी नहीं है। इस समय तुम लोग वापस जाओ। तुम्हारे सरदार तुम्हारी सही-सही मंशा से मुझे अवगत कराएंगे।” उनमें से सबने उनकी औरतों और बच्चों को वापस कर दिया। हर क़ैदी को अल्लाह के रसूल सल्ल० ने पोशाक भी प्रदान की।
नर्मी और उदारता
लड़ाई के हंगामे में मुसलमानों ने जिन ग़ुलामों और बांदियों को बन्दी बनाकर आपके पास भेजा उनमें आपकी रज़ाई बहन1 शैमा बिन्त हलीमा सादिया भी थीं। मुसलमान उनसे परिचित न थे, अतः उन्होंने उन्हें ले जाने में कड़ाई से काम लिया। उन्होंने मुसलमानों से कहा कि “अल्लाह की क़सम! तुमको मालूम होना चाहिए कि मैं तुम्हारे सरदार की दूध-शरीक बहन हूं,” लेकिन मुसलमानों ने उनकी बात पर यक़ीन नहीं किया और उनके साथ सख़्ती से पेश आए।
जब शैमा अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास पहुंचीं तो उन्होंने आपसे कहा, “या रसूलल्लाह! मैं आपकी रज़ाई बहन हूं।” आपने फ़रमाया, “इसकी क्या पहचान है?” उन्होंने कहा, “जब मैं आपको गोद में लिए थी, तो आपने मेरी पीठ में दांत से काट लिया था। उसका निशान मौजूद है।” आपने निशान पहचाना और अपनी चादर उनके लिए बिछा दी और उन्हें उस पर बिठाया। आपने उनसे कहा, “अगर तुम चाहो तो बड़ी इज़्ज़त और मुहब्बत के साथ मेरे साथ रह सकती हो, और अगर चाहो तो मैं तोहफ़ा व सामान के साथ तुमको विदा कर दूं और तुम अपने क़बीले में पहुंच जाओ।” शैमा ने कहा, “आप मुझे जो कुछ देना चाहें दे दें और मुझे मेरे क़बीले में वापस कर दें।” आपने उन्हें तीन ग़ुलाम, एक बन्दी और कुछ बकरियां देकर विदा किया। वह मुसलमान हो गईं।
जब अल्लाह के रसूल सल्ल० को हुनैन की जंग से फ़ुर्सत मिली और जिइराना में ग़ुलामों और माल-ए-ग़नीमत के बंटवारे का काम पूरा हो गया तो आपने उमरह के लिए एहराम बांध लिया। जिइराना तायफ़वासियों की मीक़ात2 था और मक्का से एक मंज़िल की दूरी पर था। उमरह के बाद ज़ीक़ादा सन् 8 हिजरी में आप मदीना वापस आए।
तायफ़ से लौटते समय आपने मुसलमानों से कहा, “कहो, हम वह हैं जो तौबा करते हैं, और अपने रब की इबादत करते हैं, और उसकी बड़ाई बयान करते हैं।” आपके साथियों ने कहा, “आप सक़ीफ़ के लिए बददुआ करें।” आपने दुआ की, “ऐ अल्लाह! सक़ीफ़ को हिदायत दे और उनको यहां ला।”
उर्वा बिन मसऊद अस-सक़फ़ी मदीना पहुंचने से पहले रास्ते में आपसे मिले और इस्लाम लाए, और वहीं से इस्लाम की दावत देने के लिए अपनी क़ौम में वापस गए। उन्हें अपनी क़ौम में बड़े सम्मान और इज़्ज़त की निगाह से देखा जाता था। बहुत मशहूर थे, लेकिन जब उन्होंने अपने मुसलमान होने का एलान किया और लोगों को इस्लाम की दावत दी तो उन्हें लोगों ने तीर से शहीद कर दिया। उनके क़त्ल के बाद सक़ीफ़ कुछ दिन ख़ामोश रहे। उसके बाद आपस में विचार करके वह इस नतीजे पर पहुंचे कि वर्तमान हालत में उन सब अरबों से लड़ने की उनमें ताक़त नहीं जो अल्लाह के रसूल सल्ल० के हाथ पर शपथ कर चुके हैं और मुसलमान हो चुके हैं। अतः उन्होंने आप सल्ल० के पास एक शिष्टमण्डल भेजने का फ़ैसला किया।
यह शिष्टमण्डल जब आपके पास पहुंचा तो आप सल्ल० ने उनके लिए शिविर लगवाया। उसके सदस्य मुसलमान हुए और उन्होंने आपसे प्रार्थना की कि उनके विशेष बुत “लात” को तीन वर्ष तक आप न तोड़ें। आपने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। वह लोग समय को एक-एक वर्ष करके कम करते रहे और आप सल्ल० इन्कार करते रहे। आख़िर में उन्होंने कहा कि उनके आने के एक माह बाद तक “लात” को नुक़सान नहीं पहुंचाया जाए। आपने इन्कार कर दिया और अबू सुफ़ियान व मुग़ीरा बिन शोबा को हुक्म दिया कि वह दोनों जाकर ‘लात’ को टुकड़े-टुकड़े कर डालें। शिष्टमण्डल ने प्रार्थना की कि नमाज़ में उनको छूट दी जाए। इस पर आपने फ़रमाया, “जिस दीन में नमाज़ न हो उसमें कोई ख़ैर नहीं।”
जब शिष्टमण्डल जाने लगा तो आपने उनके साथ अबू सुफ़ियान और मुग़ीरा बिन शोबा रज़ि० को भी भेजा। मुग़ीरा ने ‘लात’ को तोड़ दिया। इसके बाद सक़ीफ़ में इस्लाम फैल गया और तायफ़ का हर आदमी मुसलमान हो गया।
काब बिन ज़ुहैर इस्लाम लाए
तायफ़ से वापसी पर आपकी सेवा में काब बिन ज़ुहैर आए। काब एक शायर थे और उन्होंने आपकी बुराई बयान करने वाली अनेक रचनाएं की थीं, लेकिन अन्त में जब उन्हें परेशानी ने घेर लिया तो उनके भाई बुजैर ने उनको सलाह दी कि वह आपके पास जाकर तौबा करें और इस्लाम ले आएं। उनके भाई ने उन्हें डराया कि अगर उन्होंने ऐसा न किया तो उनका बुरा अन्त होगा। इस पर काब ने आपकी प्रशंसा में वह मशहूर क़सीदा (एक तरह की कविता) की रचना की जो ‘क़सीदा बानत सुआद’ के नाम से मशहूर है। इसके बाद वह मदीना आए और सुबह के समय नमाज़ के बाद आपके पास जाकर बैठ गए और अपना हाथ आपके हाथ में दे दिया और कहा, “काब बिन ज़ुहैर ताइब मुसलमान होकर आपकी सेवा में हाज़िर है, और आपसे अमान का प्रार्थी है। क्या आप इसकी तौबा क़बूल करेंगे?” यह सुनकर एक अन्सारी उसकी तरफ़ लपके और कहा, “या रसूलल्लाह! मुझे अल्लाह के दुश्मन से निपट लेने दें, मैं इसी समय इसकी गर्दन उड़ा देता हूं।” आपने फ़रमाया, “नहीं, रहने दो, वह तौबा करके यहां आए हैं।” फिर काब ने मशहूर क़सीदा पढ़ा।
जब काब ने क़सीदे का वह शेर पढ़ा जिसका अर्थ है, “अल्लाह के रसूल सल्ल० निःसन्देह एक नूर (उजाला) हैं, और वह अल्लाह की एक तेज़ व खुली तलवार हैं,” तो आप सल्ल० ने अपनी चादर उतारकर उन्हें प्रदान की।3
टिप्पणियां
- 1एक ही दाई के दूध पर पले बच्चे, अर्थात दूध-शरीक बहन।
- 2मक्का के चारों तरफ़ कुछ दूरी पर निश्चित जगह जहां से हाजी लोग एहराम बांध लेते हैं।
- 3यह वही चादर है जिसे हज़रत मुआविया ने दस हज़ार दीनार में ख़रीदना चाहा था, लेकिन काब ने जवाब दिया कि मैं इस पर किसी को प्राथमिकता नहीं दे सकता। काब के निधन के बाद मुआविया ने उनके अधिकारियों से यह चादर 20 हज़ार दीनार देकर हासिल कर ली। (क़स्तलानी)