अध्याय पांच
मक्का
हज़रत मुहम्मद सल्ल० के अभ्युदय से पहले
हज़रत इस्माईल अ० मक्का में
सैयदना हज़रत इब्राहीम अ० मक्का की तरफ़ आए, जो सूखी और बग़ैर पानी की पहाड़ियों में घिरा हुआ था, जहां इंसानी ज़िंदगी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पानी, ग़ल्ला आदि कुछ न था। उनके साथ उनकी पत्नी बीबी हाजरा और बेटे हज़रत इस्माईल भी थे। इस सफ़र का मक़सद दुनिया में फैली बुतपरस्ती से इंसान की दूरी और एक ऐसे केन्द्र की स्थापना करना था जहां अल्लाह पाक की इबादत की जाए और दूसरे लोगों को भी उसकी तरफ़ बुलाया जाए, और यह केन्द्र सच्चे रास्ते की एक किरण बनकर इंसानियत की पनाह और अमन का घर तथा मूर्तिपूजा से हटकर तौहीद व विशुद्ध दीन की दावत का केन्द्र-बिन्दु बन सके।
अल्लाह पाक ने उनकी दिली तमन्ना पूरी की और इस सूखी घाटी में ख़ूब बरकत दी और इस छोटे-से परिवार के लिए, जिसमें सिर्फ़ मां-बेटे थे (जिनको हज़रत इब्राहीम अ० इस दूर स्थित उजाड़ रेगिस्तान में अल्लाह के भरोसे पर छोड़ गए थे), पानी का एक चश्मा (सोता) जारी कर दिया, जो ज़मज़म कहलाया, और अल्लाह ने इसमें बहुत बरकत दी।
हज़रत इस्माईल अ० अब कुछ बड़े हुए और चलने-फिरने तथा दौड़ने-भागने लगे, तो हज़रत इब्राहीम अ० ने अल्लाह की मुहब्बत पर उनकी मुहब्बत को क़ुर्बान कर दिया और उनको ज़िब्ह करने का इरादा किया, इसलिए कि सपने में उनको इसका इशारा दिया गया था। आज्ञाकारी बेटे ने अल्लाह पाक की इच्छा के सामने सर झुका दिया, लेकिन अल्लाह ने ज़िब्हे अज़ीम (बड़ी क़ुर्बानी) को इसका बदल बना दिया और हज़रत इस्माईल अ० को सुरक्षित रखा, ताकि अल्लाह की तरफ़ बुलाने में वह अपने पिता का हाथ बंटा सकें, और हज़रत मुहम्मद सल्ल० के पूर्वज बनने तथा मुसलमानों का पूर्वज बनने का सौभाग्य उनको हासिल हो जिस पर अल्लाह की तरफ़ बुलाने और अल्लाह की राह में जिहाद करने की ज़िम्मेदारी क़ियामत तक के लिए डाली गयी है।
हज़रत इब्राहीम अ० मक्का वापस हुए और बाप-बेटे दोनों ने मिलकर अल्लाह के घर का निर्माण शुरू किया। उनकी दुआ यह थी कि अल्लाह पाक इस घर को क़ुबूल करे और इसमें बरकत दे और वह दोनों इस्लाम पर जिएं और मरें, और उनकी मौत के बाद उनकी सन्तान को यह दौलत और अधिकार हासिल हो। वह इस दावत की सिर्फ़ सुरक्षा ही न करें, बल्कि इस दुनिया में इसके प्रचारक और अलमबरदार बनकर रहें। इसको हर चीज़ पर प्राथमिकता दें तथा इसकी राह में किसी क़ुर्बानी में पीछे न हटें, यहां तक कि यह दावत पूरी दुनिया में फैल जाए, और अल्लाह पाक उनकी सन्तान में ऐसा नबी पैदा करे जो अपने पूर्वज इब्राहीम अ० की दावत को नए सिरे से ज़िन्दा करे और उस काम को पूरा करे जिसको वह शुरू कर रहे हैं। क़ुरआन में आया है:
हज़रत इब्राहीम अ० ने यह भी दुआ की थी कि यह घर हमेशा-हमेशा सुख, चैन और अमन-शान्ति का घर रहे। अल्लाह पाक उनकी औलादों और बाद में आने वाली नस्लों को बुतों की पूजा से बचाए रखे, जो उनके लिए सबसे ज़्यादा नापसंद चीज़ थी और जिसे वह अपनी आने वाली नस्ल के लिए सबसे बड़ा ख़तरा समझते थे, क्योंकि नबियों (पहले) के बाद उनकी क़ौमों का नतीजा उनकी नज़र के सामने था, और उन्होंने देखा था कि उनकी लगातार कोशिशों और महान क़ुर्बानियों के बावजूद यह क़ौमें किस तरह उनके रास्ते से हट गईं, और अपने नबी के दुनिया से विदा होते ही शैतानों, फ़सादियों, अपने-अपने समय के दज्जालों, बुतों के पुजारियों तथा अज्ञानता के अगुआकारों ने उनको अपना शिकार किया।
उन्होंने अल्लाह पाक से यह तमन्ना भी की थी कि उनकी सन्तान और सन्तान की सन्तान इस दावत और जिहाद से बराबर रिश्ता जोड़े रखे, और उनकी बुतशिकनी, शिर्क व बुतपरस्ती (मूर्तिपूजा) से उनकी नफ़रत व बेज़ारी, सच की रक्षा के लिए उनकी लगातार कोशिश, अपने बुत गढ़ने तथा उन्हें बेचने वाले पिता के मुक़ाबले में उनका खड़ा होना, उनकी साफ़ बात करने और उनके अपना देश छोड़कर दूसरी जगह जाने को हमेशा याद रखें, और यह महसूस करें कि इतने नाज़ुक और अहम काम के लिए इस वीराने और रेतीली ज़मीन में, जो न खेती के क़ाबिल थी न सभ्यता व संस्कृति के विकास के लिए यहां कोई सामान था, चयन का भेद क्या है, और दुनिया के बड़े-बड़े आबाद शहरों, कारोबारी व औद्योगिक केन्द्रों पर, जहां हर तरह के सुख-समृद्धि के साधन मौजूद थे, को छोड़कर इस दूर स्थित गुमनाम इलाक़े को क्यों प्राथमिकता दी गई।
उन्होंने अल्लाह से यह भी दुआ की कि उनकी औलाद को लोकप्रिय बनने का सौभाग्य मिले। लोग अपने आप उनकी तरफ़ खिंचे चले आएं और दुनिया के कोने-कोने से आकर लोग उनको अपनी श्रद्धा पेश करें। खाना उनको ख़ुद हर तरफ़ से पहुंचता रहे। मेवे तथा फल और कोशिशों के बेहतर फल उनको मिलते रहें।
क़ुरैश का क़बीला
यह सारी दुआएं और तमन्नाएं (मनोकामनाएं) एक-एक करके पूरी हुईं। अल्लाह पाक ने उन दोनों की नस्लों में बढ़ोतरी की। यह इब्राहीमी अरबी ख़ानदान ख़ूब फला-फूला और फैला। हज़रत इस्माईल अ० ने जुरहुम1 के क़बीले में रिश्ता किया, जिसकी गिनती अरब आरिबा में होती थी। हज़रत इस्माईल अ० की औलाद में बहुत बरकत हुई, यहां तक कि उन्हीं में अदनान पैदा हुए, जिनके वंशज अरब में सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ हैं।
अदनान की भी बहुत औलादें हुईं, जिनमें मअद बिन अदनान अधिक मशहूर हैं। मअद की सन्तान में मुज़र मशहूर हुए, और उनकी सन्तान में फ़िहर बिन मालिक ने ख़ानदान का नाम रौशन किया। फ़िहर बिन मालिक की सन्तान का नाम “क़ुरैश” पड़ गया, और यह नाम उनके सारे नामों पर इस तरह प्रतिष्ठा, उसकी व्याख्यान शक्ति, उनका उच्च आचरण, उसकी बहादुरी और हौसलामन्दी अरब वासियों में सर्वमान्य हो गई, और अब यह एक ऐसी हक़ीक़त बन गई जो कहावत की तरह मशहूर और विवाद से परे समझी गई है, और इसमें कोई दो राय नहीं है।2
क़ुसई बिन किलाब और उनकी औलाद
फ़िहर की सन्तान में क़ुसई बिन किलाब पैदा हुए और मक्का की सरदारी क़बीला जुरहुम के हाथ में रही, यहां तक कि ख़ुज़ाआ, जो काबा के संरक्षक थे, उन पर छा गए। इसके बाद क़ुसई बिन किलाब की क़िस्मत जाग उठी। उनकी क्षमताएं विकसित हुईं और काबा की सेवा का पदभार उनके हवाले किया गया। क़ुरैश के सारे लोग उनके साथ मिल गए और उन्होंने क़बीला ख़ुज़ाआ को मक्का से बेदख़ल करके उसका बंदोबस्त अपने हाथ में ले लिया।
क़ुसई बिन किलाब बड़े लोकप्रिय सरदार थे, काबा की दरबानी और देखभाल उनके ज़िम्मे थी। उसकी कुंजी उन्हीं के क़ब्ज़े में थी और उनकी इजाज़त के बिना कोई उसमें दाख़िल नहीं हो सकता था। साथ ही ज़मज़म,3 रिफ़ादा4 और नदवा5 सब चीज़ें उनके अधिकार में थीं और इस तरह मक्का में हर तरह की प्रतिष्ठा उन्हें हासिल हो गई थी।
क़ुसई बिन किलाब की सन्तान में अब्द मनाफ़ बहुत मशहूर हुए। उनके सबसे बड़े लड़के हाशिम थे, जिनके अधिकार में ज़मज़म के पानी और रिफ़ादा का पूरा बंदोबस्त था। अब्द मनाफ़ हज़रत मुहम्मद सल्ल० के दादा अब्दुल मुत्तलिब के पिता थे।
ज़मज़म और रिफ़ादा के बंदोबस्त का यह ज़िम्मा अब्दुल मुत्तलिब को अपने चाचा मुत्तलिब बिन अब्द मनाफ़ से मिला था। उन्होंने अपनी क़ौम में जो आदर, नेकनामी व लोकप्रियता पाई, वह उस वक़्त तक उनके पूर्वजों में किसी और के हिस्से में नहीं आई थी।
बनी हाशिम
बनी हाशिम क़बीला क़ुरैश की सुनहरी और अहम कड़ी थे। इतिहास के पन्नों में उनका जो विवरण हमारे लिए सुरक्षित कर दिया है (और जो सच्चाई से बहुत कम है), उनको पढ़ने से अन्दाज़ा होगा कि उनमें सज्जनता किस तरह कूट-कूट कर भरी थी। हर चीज़ में बीच का रास्ता अपनाना, अक़्ल से काम लेना, काबा की गरिमा और मान-मर्यादा का पूरा-पूरा ध्यान, ज़ुल्म और शोषण से दूरी, जोश, कमज़ोरों और पीड़ितों के साथ हमदर्दी व बहादुरी उनकी ज़िंदगी में हमें क़दम-क़दम पर दिखाई पड़ती है। अरब इन सद्गुणों को बहुत महत्व देते हैं।
यह वह आचरण है जो हज़रत मुहम्मद सल्ल० के पूर्वजों के सर्वथा अनुकूल है, और आपने जिस उच्च आचरण की, अपनी वाणी और व्यवहार से दावत दी थी, वह उसके अनुरूप था। फ़र्क़ सिर्फ़ यह था कि उनके समय में वह्य नहीं उतरती थी और अज्ञानता के विश्वास व आराधना में अपनी क़ौम के साथ बहरहाल शरीक थे।
मक्का में मूर्तिपूजा, उसका मूल स्रोत और इतिहास
क़ुरैश का क़बीला हज़रत इब्राहीम अ० और अपने पितामह हज़रत इस्माईल अ० के दीन पर बराबर क़ायम तथा ईश्वर की आराधना पर साबित-क़दम रहा, यहां तक कि अम्र बिन लुहै अल-ख़ुज़ाई का दौर आया। वह पहला व्यक्ति था जिसने हज़रत इस्माईल अ० के दीन में बदलाव किया।6 मूर्तियां स्थापित कीं। जानवरों की पूजा और उनको बुतों के नाम पर सांड बनाकर छोड़ने (सायबा) की बुनियाद डाली। उसने हलाल व हराम के नए नियम गढ़े जिनका अल्लाह के आदेशों से कोई सम्बन्ध न था और जो इब्राहीमी शरीअत से सर्वथा अलग थे।
हुआ यह कि अम्र मक्का से शाम गया और वहां देखा कि लोग बुतों को पूजते हैं। यह बात उसको बहुत पसन्द आई, और उसने कुछ बुत वहां से हासिल करके मक्का में स्थापित किए और लोगों को उनकी पूजा का आदेश दिया।
पत्रा (बतरा) और नबती बुत
ऐसा भी मुमकिन है कि अम्र शाम जाते हुए “बतरा” से गुज़रा हो, जिसको प्राचीन इतिहासकार और भूगोल विशेषज्ञ “पत्रा” (Petra) कहते आए हैं। बतरा पूर्वी जॉर्डन के दक्षिण में स्थित मशहूर पहाड़ी क़स्बा है, जिसका वर्णन रूमियों तथा यूनानियों के यहां भी मिलता है। कहा जाता है कि इसको नबतियों ने, जो मूलतः अरब थे, हज़ारों वर्ष पहले बसाया था। यह लोग मिस्र, शाम, फ़ुरात की घाटी और रोम का सफ़र बराबर करते थे, और हो सकता है कि फ़ुरात की घाटी जाते हुए वह हिजाज़ से ज़रूर गुज़रते हों। यह लोग खुली हुई बुतपरस्ती करते थे। पत्थरों से मूर्तियां बनाते और उनकी पूजा करते थे। इतिहासकारों का विचार है कि उत्तरी हिजाज़ का मशहूर बुत “लात”, जो सबसे अहम समझा जाता था, असल में बतरा से ही मंगाया गया था।7
इसकी पुष्टि पी० के० हिट्टी की किताब History of Syria से भी होती है, जिसमें इन नबती इलाक़ों (वर्तमान पूर्वी जॉर्डन) पर रोशनी डाली गयी है। उसका कहना है कि:
इन देवताओं का सरदार “ज़ुश्शरा” (Dushara) था, जो एक आयताकार खम्भे या काले वर्गाकार पत्थर के रूप में था। “लात”, जिसकी अरब पूजा करते थे, असल में “ज़ुश्शरा” ही से सम्बन्धित था। दूसरे नबती बुत, जिसका उल्लेख इन ऐतिहासिक नबती पाण्डुलिपियों में मिलता है, “मनात” और “उज़्ज़ा” हैं। इनमें “हुबल” का उल्लेख भी मिलता है।8
यह ध्यान रहे कि यह वह युग है जिसमें मूर्तिपूजा के विभिन्न रूप अरब प्रायद्वीप के चारों तरफ़ जल-थल के इलाक़े में फैल रहे थे। हज़रत मसीह अ० और उनके हवारियों की दावत, जिसने मूर्तिपूजा के इस बढ़ावे को रोका और उसकी तेज़ रफ़्तार को कम किया, ज़ाहिर न हुई थी। रह गई बात यहूदी धर्म की, तो वह सीमित नस्ली मज़हब था जो बनी इस्राईल तक सीमित था। उसमें बनी इस्राईल के अलावा किसी अन्य को दावत देने की इजाज़त न थी। De Lacy O’Leary ने अपनी किताब Arabia Before Muhammad में लिखा है:
यह कहना ग़लत न होगा कि बुतों की इबादत वास्तव में शाम की देन है, जो अरब प्रायद्वीप को शाम व यूनान की मिली-जुली परम्पराओं से मिली है, जो शाम में आम थीं, और शायद अरब के शेष भागों में उनका अधिक चलन न था।
इसी तरह मूर्तिपूजा फ़ुरात की घाटी और अरब प्रायद्वीप के पूर्व में आम थी। चूंकि इस इलाक़े से अरब प्रायद्वीप के कारोबारी और दोस्ताना सम्बन्ध थे, इसीलिए हो सकता है कि अरब प्रायद्वीप में मूर्तिपूजा फैलाने में इस इलाक़े का भी हिस्सा हो। George Roux ने अपनी किताब Ancient Iraq (1972, p. 283) में इसकी विवेचना की है कि इराक़ की प्राचीन ऐतिहासिक पाण्डुलिपियां यह ज़ाहिर करती हैं कि मूर्तिपूजा वहां तीसरी शताब्दी ई० और उसके बाद आम थी। यह देश बुतों और देवताओं का केन्द्र था, जिसमें विदेशी बुत भी थे और स्थानीय भी।
पत्थरों से बुतों तक
एक कथन यह भी है कि क़ुरैश में मूर्तिपूजा धीरे-धीरे शुरू हुई। इसका एक कारण अरब इतिहासकारों के अनुसार यह भी हो सकता है कि पहले वह लोग जब मक्का से कहीं बाहर यात्रा पर जाते थे तो हरम काबा के कुछ पत्थर सौग़ात के रूप में श्रद्धापूर्वक अपने साथ ले लेते थे। इसके बाद जो पत्थर उनको ज़्यादा पसन्द आते, उसे पूजने लगते। उनकी सन्तान और नई नस्ल इस विवरण से भी अपरिचित थी; वह खुली हुई मूर्तिपूजा करने लगी, और दूसरी रास्ता भटकी क़ौमों की तरह यह भी रास्ते से हट गई। फिर भी इब्राहीमी दौर के कुछ कामों और रस्मों को अपने सीने से लगाए रहे, जैसे काबा के प्रति श्रद्धा, तवाफ़,9 हज10 और उमरा।11 क़ौमों तथा धर्मों का सिलसिलेवार इतिहास देखने से इतिहासकारों की इस बात की पुष्टि होती है कि अरबों में और विशेषकर क़ुरैश में मूर्तिपूजा किस तरह शुरू हुई।
कुछ दूसरी मुस्लिम क़ौमों और वर्गों में तस्वीरों, काल्पनिक चित्रों तथा मज़ारों से जितना अधिक लगाव तथा उनके प्रति जिस तरह श्रद्धा व सम्मान व्यक्त किया गया, उससे भी इसकी पुष्टि होती है। इसीलिए इस्लामी शरीअत ने वह सभी रास्ते व चोर-दरवाज़े पहले ही से बन्द कर दिए हैं जो शिर्क या व्यक्ति, स्थान व अवशेष निशानों के प्रति श्रद्धा व सम्मान की अनावश्यक सीमा तक ले जाते हैं।12
हाथी वालों की घटना
इसी दौर में इतनी बड़ी घटना हुई जिससे बड़ी घटना अरबों के इतिहास में कभी न घटी थी। यह इस बात का इशारा था कि निकट भविष्य में कोई बहुत बड़ी बात होने वाली है और अल्लाह पाक अरबों के साथ अच्छाई का इरादा रखता है, और काबा की शान इस तरह बढ़ने वाली है और उसके साथ मानवता का उज्ज्वल भविष्य तथा उसकी सुख-शान्ति जुड़ी है।
क़ुरैश के लोगों का यह पक्का यक़ीन था कि अल्लाह की निगाह में काबा का एक ख़ास स्थान है और वही उसका संरक्षक है। उनके इस यक़ीन की पुष्टि उस बातचीत से होती है जो हज़रत मुहम्मद सल्ल० के दादा व क़ुरैश के सरदार अब्दुल मुत्तलिब और हब्शा के राजा अब्रहा के बीच हुई थी। इसका क़िस्सा यह है कि अब्दुल मुत्तलिब के दो सौ ऊंट अब्रहा ने ले लिए थे, वह इसके लिए अब्रहा से मिलने गए और अन्दर आने की अनुमति चाही। अब्रहा ने उनको बहुत इज़्ज़त दी, अपने सिंहासन से उतर आया, उन्हें अपने पास बिठाया और आने की वजह पूछी।
अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि “मेरे दो सौ ऊंट बादशाह ने ले लिए हैं, वह वापस लेना चाहता हूं।” बादशाह ने अब्दुल मुत्तलिब की इस छोटी मांग पर हैरत प्रकट करते हुए कहा, “तुम दो सौ ऊंटों की बात करते हो जो मैंने ले लिए हैं और उस घर की चिन्ता नहीं करते जिस पर तुम्हारा और तुम्हारे पूर्वजों का दीन व धर्म क़ायम है और जिसको गिराने के लिए मैं यहां आया हूं।” अब्दुल मुत्तलिब ने बहुत यक़ीन के साथ जवाब दिया कि “मैं तो ऊंटों का मालिक हूं (इसलिए उसकी फ़िक्र करता हूं), जो घर का मालिक है वह अपने आप उसकी रक्षा करेगा।” उसने कहा, “वह मुझसे कहां बच सकता है!” अब्दुल मुत्तलिब ने जवाब दिया, “यह तुम जानो और वह (घर का मालिक) जाने।”
इसके बाद जो कुछ हुआ, उसका वर्णन आगे आएगा। इस घटना के बाद अब किसी की हिम्मत नहीं कि काबा को बुरी नज़र से देखे और उस पर हाथ उठाए। निश्चय ही अपने घर और दीन की रक्षा अल्लाह पाक ही के ज़िम्मे थी और है।
इस अहम घटना का सारांश यह है कि अब्रहा हब्शा के राजा नजाशी का सनआ में नियुक्त गवर्नर था। अब्रहा ने सनआ में एक बड़ा गिरजाघर बनाया और उसका नाम “अल-क़ुलैस” रखा, जिसका मक़सद यह था कि अरबों के हज का रुख़ इस तरफ़ मोड़ दिया जाए, क्योंकि काबा की शान उसकी निगाह में खटकती थी और वह चाहता था कि यह शान और विशिष्ट स्थान गिरजा को हासिल हो।
यह बात अरबों को बहुत अखरी, क्योंकि काबा की मुहब्बत उनकी घुट्टी में पड़ी थी, और वह किसी धार्मिक केन्द्र व प्रार्थना-स्थल को इसके बराबर नहीं समझते थे और उसको छोड़कर कोई बड़ी से बड़ी दौलत लेने को तैयार न थे। इस बात ने उनके दिल व दिमाग़ को झिंझोड़ कर रख दिया। इसी दौरान किनानी इस काम के लिए निकल खड़ा हुआ और उस गिरजा में जाकर मल-मूत्र से अपवित्र कर दिया। इससे एक नया हंगामा खड़ा हो गया। अब्रहा को इस बात पर बहुत ग़ुस्सा आया। उसने उसी वक़्त क़सम खाई कि वह ख़ुद काबा पर हमला करेगा और उसको गिराए बिना चैन की सांस नहीं लेगा।13
अब्रहा की सेना में बड़ी संख्या में हाथी थे, अरबों ने हाथियों के बारे में पहले भी काफ़ी सुन रखा था। यह ख़बर उन पर बिजली बनकर गिरी, और वह इस हमले से बहुत डर गए और कोशिश की कि किसी तरह अब्रहा के लश्कर को आगे बढ़ने से रोका जाए, लेकिन उनको जल्दी ही अन्दाज़ा हो गया कि अब्रहा और उसकी विशाल सेना का मुक़ाबला करना उनकी ताक़त से बाहर है। अतः यह मामला उन्होंने अल्लाह के सुपुर्द कर दिया। उनको पूरा यक़ीन था कि इस घर का जो मालिक है वह इसकी ख़ुद रक्षा करेगा।
फ़ौज के ज़ुल्मों से बचने के लिए क़ुरैश के लोगों ने पहाड़ियों और घाटियों में पनाह ली और प्रतीक्षा करते रहे कि अल्लाह अपने घर (काबा) की रक्षा कैसे करता है। अब्दुल मुत्तलिब, उनके कुछ साथी काबा का दरवाज़ा पकड़ कर अल्लाह से दुआ करने लगे, और अब्रहा की हार की दुआ की। उधर अब्रहा अपनी फ़ौज के साथ काबा की तरफ़ बढ़ा, अपने हाथी को, जिसका नाम “महमूद” था, उसने हमले के लिए तैयार किया, लेकिन मक्का के रास्ते ही में हाथी एक जगह बैठ गया और मारने के बावजूद वह वहां से न उठा। जब उन्होंने उसका रुख़ यमन की तरफ़ किया तो वह फ़ौरन उठा और तेज़ी से दौड़ने लगा।
उस समय अल्लाह ने समुद्र की तरफ़ से चिड़ियों के झुंड भेजे। हर चिड़िया अपने पंजों में पत्थर लिए हुए थी। यह पत्थर जिसको लगता, वह मर जाता। यह देखकर हब्शा वासी जिस रास्ते से आए थे, उसी पर तेज़ी से वापस भागे। भागते हुए चिड़ियों के पत्थरों से गिर-गिर कर मरते गए। अब्रहा का बदन भी छलनी हो गया। वह उसको उठाकर अपने साथ वापस ले जाने लगे तो उसका एक-एक पोर गिरने लगा, यहां तक कि सनआ पहुंचकर उसका अन्त हो गया। इस घटना का वर्णन क़ुरआन में भी आया है:
अब्रहा की हार के परिणाम
जब अल्लाह ने हब्शा वासियों को हराकर वापस किया और उन पर यह मुसीबत टूटी जिसका ऊपर वर्णन किया गया, तो अरबों के दिल में स्वाभाविक रूप से क़ुरैश के प्रति बड़ी श्रद्धा पैदा हो गई। वह कहने लगे कि बेशक यह अल्लाह वाले हैं। उनकी तरफ़ से अल्लाह ने दुश्मन को पराजित किया और उनको लड़ना भी न पड़ा। उनके दिलों में काबा के प्रति श्रद्धा और बढ़ गयी, और अल्लाह की तरफ़ से उसकी रक्षा पर उनका ईमान और बढ़ गया।
यह अल्लाह की एक खुली हुई निशानी और चमत्कार था; इस बात का इशारा कि मक्का में एक ऐसे नबी का अभ्युदय होने वाला है जो काबा को बुतों की अपवित्रता से पाक करेगा। उसके हाथों इसकी शान बढ़ेगी। उसके दीन का इस घर से गहरा और कभी न ख़त्म होने वाला पक्का रिश्ता रहेगा। इस घटना से यह भी अन्दाज़ा होता था कि उस नबी का अभ्युदय जल्द होने वाला है।
अरबों में इसको बहुत महत्व हासिल हुआ और उससे उन्होंने नई तारीख़ शुरू की। फलतः उनके लेखों में इसका प्रचलन मिलता है कि “यह बात आमुल-फ़ील (अर्थात हाथी वाली घटना का वर्ष) में घटित हुई।” “अमुक व्यक्ति आमुल-फ़ील में पैदा हुआ।” यह घटना 570 ई० में घटी।
टिप्पणियां
- 1कहा जाता है कि जुरहुम का क़बीला वह सबसे पहला क़बीला है जो मक्का में बसा। इसकी वजह पानी के न ख़त्म होने वाले सदाबहार स्रोत का होना था। बताया जाता है कि जब हज़रत इब्राहीम अ० अपनी पत्नी हज़रत हाजरा और अपने बेटे हज़रत इस्माईल अ० को इस घाटी में छोड़ कर गए, उस समय यह क़बीला यहां मौजूद था।
- 2विस्तार में सीरत इब्ने हिशाम, भाग 1 देखें।
- 3ज़मज़म कुआं, जिसका पानी सबसे पवित्र और लाभकारी है और जिसका प्रयोग हाजी करते हैं तथा अपने साथ लाते भी हैं।
- 4उस दावत को कहते हैं जो हाजियों के लिए हर साल इस भावना के प्रति की जाती थी कि वह अल्लाह के मेहमान हैं।
- 5वह बैठक, जो परामर्श और लड़ाइयों में झण्डा लेकर चलने वाली टुकड़ी के सरदार के चयन के लिए ज़रूरत पड़ने पर होती थी।
- 6हदीस में आता है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया कि “मैंने अम्र बिन आमिर अल-ख़ुज़ाई को देखा कि वह जहन्नम में अपनी आंत घसीटता हुआ चल रहा है।” (बुख़ारी, मुस्लिम, अहमद)। मुहम्मद बिन इसहाक़ दूसरी जगह लिखते हैं कि वह पहला व्यक्ति था जिसने इस्माईल अ० के दीन को बदला, बुत स्थापित किए और जानवरों को सायबा करने की परम्परा डाली।
- 7लेखक ने 19 अगस्त 1973 को राबिता आलमे इस्लामी के शिष्टमण्डल के सदस्य की हैसियत से यह जगह ख़ुद देखी है और पहाड़ों में तराशे गए बुतों की बहुलता ख़ास तौर से नोट की है। विस्तार के लिए लेखक का सफ़रनामा “दरिया-ए-काबुल से दरिया-ए-यरमूक तक” देखें।
- 8History of Syria, P. K. Hitti, London, 1951, pp. 382–383.
- 9काबा की परिक्रमा। (अनुवाद)
- 10मक्का की तीर्थयात्रा, जो ज़िलहिज्जा के महीने में की जाए। (अनुवाद)
- 11हज के दिनों के अलावा किसी समय काबा की तीर्थयात्रा करना। (अनुवाद) इन बुतों के नाम आदि का विस्तृत विवरण जानने के लिए सैयद महमूद शुक्री अल-आलूसी की किताब “किताबुल असनाम लिल कल्बी” देखें।
- 12इस्लामी शरीअत और हदीसों में इसके तर्क इतने ज़्यादा हैं कि उनकी गिनती मुश्किल है। इन्हीं में से एक मशहूर हदीस है कि “मेरी क़ब्र को ईद और जश्न की जगह न बनाना, न इस पर मेला लगाना।” एक और हदीस में है कि “सिर्फ़ तीन मस्जिदें हैं जहां बाक़ायदा ज़ियारत (दर्शन) की नीयत करके सफ़र करना जायज़ है।” दूसरी हदीस है कि “मेरी इस तरह हद से बढ़ी हुई प्रशंसा न करो जिस तरह नसारा ने मसीह बिन मरियम की की है।” जानदारों की तस्वीर बनाना इसीलिए मना है। प्राचीन समय में अनेक क़ौमें अपने पूर्वजों के चित्रों के प्रति श्रद्धा, उनकी मूर्ति गढ़ना और उनकी पूजा करने लगी हैं। इब्ने कसीर लिखते हैं, मुहम्मद बिन क़ैस बयान करते हैं कि “आदम व नूह के बीच वह सन्त व सज्जन व्यक्ति थे जिनके शिष्यों और भक्तों की बड़ी संख्या थी, जब उनका निधन हुआ तो उन शिष्यों और भक्तों ने सोचा अगर हम उनकी कोई तस्वीर या काल्पनिक चित्र बनाएं तो इससे उनकी याद ताज़ा होगी और इबादत में अधिक दिल लगेगा। इस विचार से शिष्यों ने उनकी तस्वीर बनाई। जब यह नस्ल भी ख़त्म हुई और नई नस्ल आई तो शैतान ने उसको सिखाया या पढ़ाया कि उनके पूर्वज वास्तव में तस्वीरों और चिह्नों की इबादत करते थे और उन्हीं की बरकत से वर्षा होती थी। धीरे-धीरे यह उनकी बाक़ायदा पूजा करने लगे और खुली हुई मूर्तिपूजा का चलन हो गया।”
- 13मुमकिन है अब्रहा के हमले का मक़सद इससे कुछ अधिक रहा हो और वह मक्का पर विजय हासिल करना चाहता हो ताकि शाम से यमन का सम्पर्क जुड़ जाए और ईसाई शासन के क़दम अरब प्रायद्वीप में जम जाएं। उसका यह क़दम रोम तथा हब्शा के हित में था, क्योंकि वह दोनों ईसाई धर्म से संबंध रखते थे। यह योजना, चाहे उसके निशाने कुछ भी रहे हों, तब तक सफल नहीं हो सकती थी जब तक मक्का, जिसे विशिष्ट स्थान हासिल था और जो मानवता के लिए रोशनी का मीनार बनने वाला था, को अपने गौरवपूर्ण पद से बेदख़ल न किया जाता। लेकिन क़ुदरत को मंज़ूर कुछ और ही था। ऐसा भी मुमकिन है कि रूमियों ने ही अब्रहा को उकसाया हो और उसके पीछे कुछ राजनीतिक मक़सद काम कर रहे हों, जैसे ईरान के प्रभाव को कम करना, क्योंकि अरब प्रायद्वीप में रूमियों का मुक़ाबला अकेले ईरानी कर रहे थे।