अध्याय छः

मक्का

नबी सल्ल० के अभ्युदय के समय

मक्का एक महानगर

बहुत-से लोग, जो नबी सल्ल० के अभ्युदय काल के हालात से भली प्रकार परिचित नहीं हैं और जिनकी अरबों के इतिहास, उनके सामाजिक जीवन, साहित्य तथा उनके क़बीलों की परम्पराओं पर गहरी नज़र नहीं है, वह यह समझते हैं कि मक्का हज़रत मुहम्मद सल्ल० के अभ्युदय के समय एक छोटा-सा गांव था, जहां ज़िंदगी बौद्धिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक, हर पहलू से शुरुआती दौर में थी। वह क़बीलों की कुछ आबादियों का नाम था, जहां बालों के बने हुए ख़ेमों और डेरों में (जिनके चारों तरफ़ ऊंटों, भेड़-बकरियों और घोड़ों के बांधने की जगहें थीं) उनकी ज़िंदगी गुज़रती थी। वह अधिकतर घाटियों के किनारे और पहाड़ों के पहलू में फैले हुए थे। उनका खाना सूखी रोटी या ऊंट का गोश्त था, जिसे वह ठीक से पकाना भी नहीं जानते थे। ऊंट के बालों से बने हुए कपड़े पहनते थे। उनका खान-पान साधारण था। उनके पहनावे में न कोई आकर्षण था, न उनकी ज़िंदगी में गर्मी, न उल्लास व सौन्दर्य, न ही विचारों में उठान।

मक्का का यह धूमिल चित्र सीरत व इतिहास की जिन सामान्य किताबों में पेश किया गया है, वह ज़्यादातर अजमी (ग़ैर-अरब) ज़बानों में लिखी हुई हैं। जब कि यह तस्वीर उन ऐतिहासिक सच्चाइयों के विपरीत है जो इतिहास की किताबों व प्राचीन साहित्य में मिलती हैं, और जिसमें मक्का और मक्का वासियों (जो शुरुआती बद्दुवी जीवन से प्रारंभिक नागरिक और सभ्य जीवन के दौर में दाख़िल हो चुके थे) की आदतों, परम्पराओं तथा आचार-संहिता का चित्रण पेश किया गया है। क़ुरआन मजीद में मक्का को “उम्मुल क़ुरा” अर्थात नगरों की जननी के नाम से याद किया गया है:

दूसरी जगह आता है कि:

एक और जगह आता है:

सच्चाई यह है कि पांचवीं शताब्दी ई० के मध्य ही में मक्का अज्ञानता के युग से सभ्यता के युग में दाख़िल हो चुका था। हालांकि यह सभ्यता सीमित इलाक़े में थी। यह नगर एक ऐसे बंदोबस्त के तहत था जो आपसी सहयोग व एकता, जन-कल्याण तथा धर्म विभाजन की बुनियाद पर क़ायम था। इस व्यवस्था के संस्थापक क़ुसई बिन किलाब थे, जिनकी पांचवीं पीढ़ी में हज़रत मुहम्मद सल्ल० हैं।

शुरुआत में मक्का की आबादी बहुत कम थी, यह स्थान दो पहाड़ियों “अबू क़ुबैस” और “अहमर” के मध्य स्थित था, लेकिन काबा की बदौलत तथा उसके सेवकों एवं देख-रेख करने वालों और मक्का वासियों को आम तौर पर जो इज़्ज़त हासिल थी तथा वहां जो अमन-शान्ति व सुख हासिल था, उसकी वजह से क़बीलों के लिए मक्का में बड़ा आकर्षण था। फलतः समय के साथ उसकी आबादी ख़ुद ही बढ़ती गई। ख़ेमों और छोलदारियों की जगह पत्थर या गारे के बने हुए मकान बन गए। आबादी और मकानों की यह लहर मस्जिद-ए-हराम (ख़ाना-ए-काबा) से मक्का की पहाड़ियों और चोटियों तक फैल गई।

शुरू में यह लोग अपने मकानों की छतें काबा की तरह वर्गाकार न बनाते थे और ऐसा करना बेअदबी समझते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह बात न रही और इसमें बहुत गुंजाइश पैदा कर ली गई, फिर भी काबा से उस समय भी मकान नीचे ही रखे जाते थे। कुछ लोगों का कहना है कि मक्का वासी काबा के प्रति श्रद्धा व सम्मान के कारण अपने मकान गोल बनाते थे। पहला व्यक्ति जिसने वर्गाकार मकान बनवाया, हुमैद बिन ज़ुहैर है, उसके इस काम को क़ुरैश के लोगों ने नापसन्द किया। मक्का के मालदारों और सरदारों के मकान पत्थर के बने हुए होते थे। इनमें कई कमरे होते थे। आमने-सामने दो दरवाज़े होते थे, ताकि घर के एक हिस्से में मेहमानों की मौजूदगी के समय औरतें दूसरे दरवाज़े से निकल सकें।

मक्का का पुनर्निर्माण

मक्का के विकास, विस्तार तथा पुनर्निर्माण में सबसे बड़ा हाथ क़ुसई बिन किलाब का था, क्योंकि उन्होंने सबसे पहले क़ुरैश को इस मक़सद के लिए जोड़ा और मकान के लिए जगहों की विधिवत हदबंदी की, जिसको अरबी में “रिबाअ” कहते हैं, अर्थात मकान व उसके आस-पास का हिस्सा। क़ुरैश के विभिन्न ख़ानदानों और बिरादरियों को इन मकानों में आबाद किया। उनकी सन्तान ने मक्का की ज़मीन को विभाजित करने और सीमाबन्दी का काम जारी रखा। ख़ुद आबाद हुए और ज़मीनें दूसरों के हाथ बेचीं। ख़रीदने-बेचने और मकान बनाने का यह सिलसिला बिना किसी रुकावट के क़ुरैश और दूसरी बिरादरियों के बीच चलता रहा।

ज़िंदगी का बंदोबस्त

क़ुसई अपनी क़ौम तथा मक्का वासियों, दोनों पर हावी थे। काबा की दरबानी, प्याऊ1 की व्यवस्था, हाजियों की सालाना दावत,2 सलाहकार समिति तथा जंगी बंदोबस्त, सब उन्हीं के हाथ में था।

उन्होंने नदवा (सलाहकार समिति का भवन) को मस्जिद-ए-हराम से लगा हुआ बनाया और उसका दरवाज़ा काबा की तरफ़ निकाला। यह नदवा क़ुसई बिन किलाब का घर भी था और क़ुरैश के मशवरों, फ़ैसलों और मक्का की सोसाइटी का केन्द्र भी। क़ुरैश का कोई व्यक्ति, मर्द या औरत, शादी करना चाहता, किसी अहम विषय पर फ़ौरन सलाह की ज़रूरत होती, किसी क़बीले पर जंग करने या उसकी तैयारी करनी होती तो, जब बच्ची बड़ी होती तो उसको ओढ़नी ओढ़ाने की भी रस्म यहीं अदा की जाती। क़ुसई के व्यक्तित्व को उनके जीवनकाल में और मरने के बाद भी दीन व मज़हब जैसी प्रतिष्ठा हासिल रही, जिसके असर के बिना कोई काम नहीं हो सकता था।

क़ानून यह था कि दारुन्नदवा में “बनी क़ुसई” के अलावा दूसरे क़बीलों के वही लोग आ सकते हैं जिनकी अवस्था 40 से कम न हो। बनी क़ुसई तथा उनके साथी-संगी क़बीलों के सभी व्यक्ति, छोटे हों या बड़े, उसमें शामिल होने का हक़ रखते थे। दारुन्नदवा में जिन बिरादरियों और ख़ानदानों को शामिल होने की इजाज़त थी, वह थे: हाशिम, उमैया, मख़ज़ूम, जुमह, सहम, तैम, अदी, असद, नौफ़ल तथा ज़ोहरा। यह दस विभिन्न ख़ानदान के लोग थे।

क़ुसई के निधन के बाद पदों का नया विभाजन हुआ। बनी हाशिम को सिक़ाया (प्याऊ), बनी उमैया को क़ुरैश का झंडा “उक़ाब”, बनी नौफ़ल को “रिफ़ादा”, बनी अब्दुद्दार को काबा की दरबानी, पौरोहित्य और रक्षा मंत्रालय और बनी असद को मुशावरत (विधानसभा) का विभाग दिया गया।

क़ुरैश के लब्धप्रतिष्ठित एवं सूझबूझ वाले व्यक्तियों में यह ज़िम्मेदारियां बंटी थीं। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़, जो बनी तैम से थे, के पास तावान, अनुग्रह-दान और जुर्माना आदि का विभाग था। ख़ालिद बिन वलीद, जो बनी मख़ज़ूम में से थे, के पास “क़ुब्बा” और “अइन्ना” का विभाग था। “क़ुब्बा” उस डेरे को कहते हैं जिसमें फ़ौजी ज़रूरत का सामान रखा जाता था। “अइन्ना” वह सामान था जो जंग के समय क़ुरैश के घोड़ों पर रहता था। उमर बिन ख़त्ताब के पास दूतावास का विभाग था। जब किसी क़बीले से लड़ाई लड़नी होती तो राजदूत के रूप में उन्हें दूसरे पक्ष के पास भेजा जाता। अगर कोई बिरादरी अपने पर घमंड करती तो मुक़ाबले के लिए उनको भेजा जाता। सफ़वान बिन उमैया, जो बनी जुमह के थे, के ज़िम्मे “ऐसार व अज़लाम” (अर्थात जुए के वह पासे जो किसी मामले में किसी पहलू को प्राथमिकता देने के लिए फेंके जाते, उन पर “हां” “नहीं” के निशान बने होते थे) का काम था। हारिस बिन क़ैस के ज़िम्मे प्रशासन बंदोबस्त और बुतों के नाम पर जमा किया हुआ माल था। यह ज़िम्मेदारियां इन लोगों को अपने पूर्वजों से उत्तराधिकार में मिली थीं।

व्यावसायिक आयात-निर्यात

कारोबार के लिए दो दिशाओं में सफ़र करते थे: एक, गर्मियों में शाम की तरफ़; दूसरे, जाड़ों में यमन की तरफ़। रजब, ज़ीक़ादा, ज़िलहिज्जा और मुहर्रम के चार इस्लामी महीने उनके वहां पवित्र समझे जाते थे, और वह इन महीनों में लड़ाई से बचते थे। उनके बाज़ार काबा के बराबर में हरम शरीफ़ के अन्दर लगते थे। इस बाज़ार में दैनिक जीवन की ज़रूरत का सभी सामान मिलता था।

मक्का के इतिहास में हमें बाज़ारों का जो वर्णन मिलता है, उससे वहां के लोगों के जीवन-स्तर का पता चलता है। इन बाज़ारों में एक बाज़ार इत्र बेचने वालों के लिए तय था, एक विभिन्न प्रकार के फलों के लिए, एक पंसारियों के लिए, एक नाइयों के लिए। यह सब बाज़ार बड़े होते थे, जिसमें गेहूं, घी, शहद आदि विभिन्न वस्तुएं बड़ी मात्रा में बिकती थीं। “यमामा” मक्का की ग़ल्ला मण्डी थी।3 इन बाज़ारों के अलावा एक गली जूतों की दुकानों के लिए और एक कपड़े की दुकानों के लिए थी। मक्का वासियों के कुछ मनोरंजन केन्द्र भी थे, जहां सर्दी के दिनों में शाम का समय मक्का में गुज़ारते और गर्मियां ताइफ़ में। मक्का में कुछ नौजवान क़ीमती वस्त्रों और बनाव-शृंगार के लिए बहुत मशहूर थे, उनमें से कुछ की पोशाकें कई-कई सौ दिरहम में तैयार होती थीं।

कारोबारी काम मक्का में बहुत अच्छा था। वहां के व्यापारी अफ़्रीका व एशिया के विभिन्न देशों की यात्रा करते थे और हर देश की विशिष्ट व मशहूर वस्तुएं अथवा वह वस्तुएं जिनकी उनके देश को ज़रूरत थी, अपने साथ लाते थे। वह

  1. अफ़्रीका से गोंद, हाथी दांत, सोना, आबनूस की लकड़ी,
  2. यमन से खालें, अगरबत्ती व लोबान, कपड़े,
  3. इराक़ से गर्म मसाले,
  4. हिन्दुस्तान से सोना, टीन, जवाहरात, हाथी दांत, चन्दन (सन्दल) की लकड़ी, गर्म मसाले और ज़ाफ़रान,
  5. मिस्र व शाम से विभिन्न तरह के तेल, अनाज, हथियार, रेशम और शराब आयात करते थे।

वह कुछ बादशाहों और अमीरों को मक्का की विशेष वस्तुएं तोहफ़े के रूप में भी भेजा करते थे। उनमें सबसे विशेष चीज़ चमड़ा होता था। जब क़ुरैश ने हब्शा के राजा नजाशी के पास अपने दो प्रतिनिधियों अब्दुल्लाह बिन अबी रबीआ और अम्र बिन अल-आस बिन वाइल को, वहां पहले से गए हुए मुसलमानों को वापस लेने के लिए भेजा, तो उन्होंने मक्का के ख़ास तोहफ़े के रूप में चमड़ा भी दिया था।

वहां औरतें भी कारोबार करती थीं तथा शाम व अन्य देशों में उनके क़ाफ़िले जाया करते थे। इनमें ख़दीजा बिन्त ख़ुवैलिद तथा अबू जहल की मां हन्ज़लिया बहुत मशहूर थीं। क़ुरआन के निम्न वाक्यों से भी इसकी पुष्टि होती है:

आर्थिक दशा और नाप-तौल के पैमाने

मक्का वासियों में अनेक लोग बड़े ख़ुशहाल और खाते-पीते थे तथा उनके पास बहुत पूंजी थी। इसका सुबूत इससे भी मिलता है कि क़ुरैश का वह व्यापारिक क़ाफ़िला, जो बद्र की लड़ाई के मौक़े पर शाम से वापस आया था, उसके साथ एक हज़ार ऊंट थे तथा उन पर पचास हज़ार दीनार का सामान था।

मक्का वाले बाज़नतीनी व ईरानी, दो तरह के सिक्के प्रयोग में लाते थे। उस समय अरब प्रायद्वीप में दो तरह के सिक्के चलन में थे। एक दीनार व दूसरे दिरहम। दिरहम दो तरह का था। एक पर फ़ारस (ईरान) की मुहर थी, उसे “बग़लिया” और “सौदाय दामिया” कहते थे। दूसरे पर रोम की मुहर थी। उसे “तबरिया” और “बैज़न्तिया” कहते थे। यह सब चांदी के सिक्के होते थे। इनकी तौल अलग-अलग होती थी। इसीलिए मक्का वासी इनकी संख्या पर नहीं, बल्कि मात्रा (वज़न) पर लेन-देन करते थे। विद्वानों के कथन से पता चलता है कि दिरहम, जो कि शरीअत में मान्य है, जौ के पचपन दानों के वज़न के बराबर होता है। दस दिरहम सात मिस्क़ाल के बराबर हैं, और शुद्ध सोने का एक मिस्क़ाल 72 दानों के वज़न के बराबर, और यही सर्वमान्य है।

हज़रत मुहम्मद सल्ल० के समय में प्रायः चांदी के सिक्के चलन में आते थे। उस समय चांदी का प्रचलन था, सोने का नहीं। दीनार सोने का होता था। अज्ञानता के युग में और इस्लाम के शुरुआती दौर में शाम व हिजाज़ में दीनार का प्रचलन था, वह रोमी सिक्का था जो रोम में ढाला जाता था। उस पर रोम के सम्राट का चित्र बना होता था और उसका नाम रोमन में लिखा होता था, जैसा कि इब्ने अब्दुल बर्र ने “अत-तमहीद” में लिखा है। दीनार शब्द मूलतः एक प्राचीन रोमी सिक्के डिनेरियस (Denarius) से अरबी भाषा में आया है। कुछ पश्चिमी देशों में यह शब्द अब तक प्रचलित है। इन्जील में इसका वर्णन बराबर आया है।

दीनार का वज़न एक मिस्क़ाल के बराबर माना जाता था और विशुद्ध सोने का एक मिस्क़ाल मध्यम आकार के जौ के 72 दानों के बराबर माना गया था। इसके वज़न में कभी बदलाव नहीं हुआ। दाइरतुल मआरिफ़ इस्लामिया में है कि एक बाज़नतीनी दीनार 4.25 ग्राम के बराबर होता है। कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि उस समय दीनार का वज़न 4.55 ग्राम था, जिसे ख़लीफ़ा अब्दुल मलिक के दौर में संशोधित करके 4.25 ग्राम कर दिया गया। ज़ाम्बावर (Zambaur) के अनुसार मक्का का मिस्क़ाल 4.25 ग्राम होता है। दिरहम और दीनार में 7:10 का अनुपात था और दिरहम का वज़न 7:10 मिस्क़ाल के बराबर होता था।

हदीस, फ़िक़ह (Jurisprudence) व इतिहास से यह साबित होता है कि लेन-देन में एक दीनार दस दिरहम के बराबर था। अबू दाऊद शरीफ़ में अम्र बिन शुऐब कहते हैं कि “दियत” (Blood Money) की क़ीमत रसूलुल्लाह सल्ल० के समय में आठ सौ दीनार या आठ हज़ार दिरहम थी, इसके बाद सहाबा रज़ि० का इसी पर अमल रहा, यहां तक कि उम्मत के लिए यही सर्वमान्य हो गया। इस तरह यह साबित होता है कि सोने का हिसाब बीस दीनार है और यह कि अज्ञानता के युग में तथा इस्लाम के अभ्युदय के समय एक दीनार दस दिरहम के बराबर था। इमाम मालिक रह० ने “मुवत्ता” में लिखा है कि, “वह नियम जो हमारे निकट सर्वमान्य है, यह है कि ज़कात बीस दीनार पर या दो सौ दिरहम पर वाजिब है।”

नाप-तौल के जो पैमाने उस दौर में प्रचलित थे, वह यह थे: “साअ”, “मुद्द”, “रत्ल”, “ऊक़िया” और “मिस्क़ाल”। इन्हीं में से कुछ नए पैमाने उन्होंने निकाले थे। अरब गणित से भी परिचित थे। हिस्सा व मीरास के बंटवारे के सिलसिले में क़ुरआन में जो वर्णन आया है, उससे इसका पता चलता है।

क़ुरैश के धनवान

क़ुरैश के धनी परिवारों में बनू उमैया तथा बनू मख़ज़ूम विशेष तौर से उल्लेखनीय हैं। धनी व्यक्तियों में वलीद बिन मुग़ीरा, अब्दुल उज़्ज़ा (अबू लहब), अबू उहैहा बिन सईद, अब्दुल्लाह बिन अबी रबीआ मख़ज़ूमी का नाम उल्लेखनीय है। इनमें बनू तैम के अब्दुल्लाह बिन जुदआन अत-तैमी बहुत मशहूर थे, जिनके बारे में आता है कि वह सोने के प्याले में पानी पीते थे और उनका पूरा लंगरख़ाना था, जिसमें ग़रीबों और भूखे लोगों को खाना खिलाया जाता था।

अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब की गिनती भी क़ुरैश के धनवान लोगों में होती थी। वह अपनी दौलत लोगों पर ख़ूब ख़र्च करते थे और सूदी लेन-देन भी करते थे। यहां तक कि इस्लाम फैला और सूद-ब्याज को हराम बताया गया। हज़रत मुहम्मद सल्ल० ने हज्जतुल विदा (आख़िरी तीर्थ यात्रा-हज) के मौक़े पर सूदी पैसा व कारोबार ख़त्म करने का एलान किया और इसे अपने चचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब से शुरू किया। आप सल्ल० ने फ़रमाया, “पहला सूद जिसको मैं ख़त्म करता हूं, वह अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब का सूद है।”

क़ुरैश के धनवानों में ऐसे लोग भी थे जो रात-रात भर भोग-विलास में पड़े रहते थे, सुसज्जित कमरे, सजे हुए दस्तरख़ान और मदिरा-पान का चलन आम था। क़ौम (क़बीले) के सरदारों की महफ़िलें आम तौर से काबा के सामने जमती थीं, जहां शेर व शायरी होती और अज्ञानता के युग के मशहूर शायर जैसे लबीद बिन रबीआ आदि उसमें शामिल होते। इसका भी उल्लेख मिलता है कि अब्दुल मुत्तलिब का फ़र्श (महफ़िल) काबा के साये में बिछता था, उनके लड़के श्रद्धापूर्वक फ़र्श के बाहर चारों तरफ़ बैठते और जब तक वह न आ जाते, कोई फ़र्श पर न बैठता।

मक्का के उद्योग-धन्धे, साहित्य व संस्कृति

मक्का वाले उद्योग-धन्धों को बहुत महत्व न देते थे, बल्कि वह उसको गिरी हुई निगाह से देखते और मान-मर्यादा के ख़िलाफ़ समझते थे। आम तौर पर उद्योग-धन्धों को ग़ुलामों तथा अजमियों के साथ जोड़ा जाता था। तथापि कुछ उद्योग-धन्धे, जिनकी उन्हें अधिक ज़रूरत थी, वहां थे और मक्का के कुछ लोग उनसे जुड़े थे। ख़ब्बाब बिन अल-अरत तलवारें बनाते थे। निर्माण का काम रूमी व ईरानी मज़दूर करते थे।

निरक्षरता वहां आम थी, लेकिन कुछ लिखने-पढ़ने वाले लोग मौजूद थे। क़ुरआन पाक ने इसीलिए उनको “उम्मी” अर्थात निरक्षर कहा है:

मक्का वाले पूरे अरब प्रायद्वीप में सौन्दर्य, सुरुचि तथा बनाव-शृंगार के मामले में सर्वश्रेष्ठ समझे जाते थे, जैसा कि प्रायः प्राचीन सभ्यता के केन्द्र व राजधानी का हाल होता है। उनकी भाषा प्रामाणिक थी और अरब प्रायद्वीप में तथा उसके आस-पास उसी को मापदण्ड माना जाता था। मक्का वाले सबसे अधिक अलंकृत भाषा का प्रयोग करते थे, वह बोलने में तेज़ होते, शारीरिक गठन, सौन्दर्य एवं सन्तुलन में भी अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा वह अधिक उत्कृष्ट थे। वह बहादुरी और हमदर्दी के उन गुणों से भरपूर थे जिसे अरबी में “अल-फ़ुतुव्वा” और “अल-मुरुव्वा” कहा जाता है (और जो अरबी के कवियों और वक्ताओं द्वारा बार-बार प्रयोग किया गया है)। इस तरह मक्का वाले अच्छाई व बुराई, दोनों मैदानों में सबके उस्ताद थे।

जातीय ज्ञान, अरब की पौराणिक कथाएं, काव्य-रचना, ज्योतिष नक्षत्र-ज्ञान, पक्षियों से मुहूर्त लेने, उनके पूर्वजों के कथनों पर आधारित उनको थोड़ा-बहुत औषधि-ज्ञान, शहसवारी, घोड़ों की पहचान, उनके अंगों तथा गुण-दोषों की भरपूर पहचान तथा मुखाकृति-विज्ञान मक्का वालों की अभिरुचि के मुख्य विषय थे। उपचार के जो तरीक़े उनमें प्रचलित थे, उनमें दाग़ने, सड़े अंग को काटने, शल्य-चिकित्सा, पछना लगवाने का उल्लेख मिलता है।

फ़ौजी ताक़त

क़ुरैश स्वभाव से अमन-पसंद थे। उस दौर की दूसरी क़ौमों की तरह उनकी अर्थव्यवस्था अधिकतर कारोबारी क़ाफ़िलों के आने-जाने, बाज़ारों और मण्डियों के बंदोबस्त तथा व्यापारियों के आने-जाने पर आधारित थी। इससे उनके धार्मिक व आर्थिक दोनों पक्षों के विकास एवं बढ़ोतरी का मौक़ा मिलता था, और हर तरह के खाने-पीने का सामान चारों तरफ़ से वहां पहुंचता था। क़ुरआन में आता है:

यद्यपि अरब की लड़ाइयां बहुत लम्बी होती थीं, जिनका सिलसिला 30-30, 40-40 वर्ष चलता रहता था, और जिसके नतीजे में, जैसा कि ज़ुहैर बिन अबी सुल्मा ने वर्णन किया है, हज़ारों बच्चे अनाथ और हज़ारों औरतें विधवा हो गयीं, तथापि मक्का वाले जंग के दूरगामी और बुरे असर को जानते थे। वह मक्का की “हर्बुल फ़िजार” और मदीना की “बुआस” का हश्र देख चुके थे। इन दोनों जंगों के कुपरिणाम उनकी आंखों के सामने थे। अतः सच्चाई को मानते हुए वह अरब के अन्य लड़ाकू क़बीलों की तरह, जिनका पेशा ही लड़ना था, जल्दी लड़ाई करने को तैयार न थे।

दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि क़ुरैश, जब तक कि उनकी क़बायली व मज़हबी ग़ैरत को ललकारा न जाए, “अपना अस्तित्व बचाए रखने” के सिद्धान्त के समर्थक थे, लेकिन इसके साथ ही पर्याप्त फ़ौजी ताक़त के मालिक थे। उनकी बहादुरी और घुड़सवारी बेमिसाल थी। उनका “अल-ग़ज़बतुल मुज़रिय्या” (मुज़री ग़ुस्सा) पूरे अरब में मशहूर था और अरबी साहित्य का एक मुहावरा बन गया था।

क़ुरैश की शक्ति यहीं तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह मक्का के आस-पास रहने वाले किनाना ख़ुज़ैमा की औलादों “अहाबीश” से भी फ़ायदा उठाते रहे। ख़ुज़ाआ क़ुरैश के समर्थक थे। क़ुरैश के पास ग़ुलामों की भी बड़ी संख्या थी, जो तमाम लड़ाइयों में उनके झंडे तले रहते थे। वह एक समय में कई हज़ार वीर-बांकुरे लड़ाई के मैदान में झोंक देते थे। अहज़ाब की लड़ाई में यह संख्या दस हज़ार तक पहुंची थी और यह अज्ञानता के युग के इतिहास में अरब प्रायद्वीप की सबसे बड़ी फ़ौजी टुकड़ी थी।

मक्का, अरब का दिल

अपनी इस मज़हबी हैसियत, आर्थिक विकास, कारोबारी क्रिया-कलाप, सामाजिक विकास व तरक़्क़ी की वजह से मक्का, अरब प्रायद्वीप का एक बड़ा शहर बन गया था और यमन के मशहूर शहर “सनआ” से आंखें मिला रहा था और जब छठी शताब्दी ई० के मध्य में सनआ पर एक-एक करके हब्शा और ईरान का अधिकार हो गया और ग़स्सान के राज्यों की भी पहले जैसी शान शौकत न रही, तो उस समय मक्का को अरब प्रायद्वीप में जो मज़हबी व सामाजिक हैसियत हासिल थी, वह किसी दूसरे शहर को नहीं।

नैतिक पक्ष

मक्का का नैतिक पक्ष बहुत कमज़ोर था, सिर्फ़ उन कुछ एक रस्मों को छोड़कर जिन्हें वह अपने सीने से लगाए हुए थे। जुए का कारोबार उनमें आम था और वह इस पर गर्व करते थे। शराब का आम चलन था। भोग-विलास तथा नाच-गाने की महफ़िलें ख़ूब सजती थीं। अनेक बुराइयां, अत्याचार, अन्याय, शोषण और अवैध कमाई उनके समाज में बुरी नज़र से न देखी जाती थीं। उस नैतिक पतन की सबसे सच्ची तस्वीर हमें क़ुरैश ही के एक सपूत और मक्का के असली निवासी जाफ़र बिन अबी तालिब के उन शब्दों में देखने को मिलती है जो उन्होंने नजाशी के दरबार में कहे थे, उन्होंने कहा था:

ऐ बादशाह! हम जाहिलियत वाली क़ौम थे। बुतों को पूजते थे। मुर्दार खाते थे, हर तरह की बेहयाई करते थे। रिश्ते को तोड़ते थे। पड़ोसी के साथ बुरा सुलूक करते थे और ताक़तवर कमज़ोर को खाता था।

सीरत इब्ने हिशाम, खण्ड 1, पृ० 336

धार्मिक पक्ष

मक्का वालों का धार्मिक पक्ष और भी अधिक कमज़ोर था। इसकी वजह यह थी कि वह बहुत दिनों से किसी पैग़म्बर की शिक्षा-दीक्षा से वंचित थे। अज्ञानता आम थी। मूर्तिपूजा, जो उन्होंने अपने पड़ोस की क़ौमों से सीख ली थी, उनके दिलों में घर कर चुकी थी। बुतों से उनको एक तरह से इश्क़ हो गया था।

फलतः सिर्फ़ काबा के अन्दर और आंगन में 360 बुत थे, जिसमें सबसे बड़ा हुबल था, और जिसे सम्बोधित करते हुए अबू सुफ़ियान ने उहद की जंग में कहा था, “हुबल की बड़ाई हो!” यह काबा के बीच में एक गढ़े के ऊपर था, जिसमें चढ़ावे आदि जमा होते थे। यह बुत लाल पत्थर का बना हुआ था। यह एक मानव-मूर्ति के समान था, जिसका दायां हाथ टूटा हुआ था। क़ुरैश ने इसको इसी तरह से पाया था। इसमें उन्होंने सोने के हाथ लगवा दिए थे।

काबा के सामने दो बुत रखे थे, जिनमें एक का नाम “इसाफ़” और दूसरे का “नाइला” था। एक काबा से बिल्कुल मिला हुआ था और दूसरा ज़मज़म के पास था। क़ुरैश ने काबा के क़रीब वाले बुत को भी दूसरे बुत के पास कर दिया था। यह वह जगह है जहां अरब क़ुर्बानी आदि करते थे। सफ़ा पर भी एक बुत था, जिसका नाम “नहीक मुजाविदुर्रीह” था। मरवा पर जो बुत रखा था उसका नाम “मुतइमुत्तैर” था।

मक्का के हर घर में एक बुत था, जिसकी सब घर वाले इबादत करते थे। “उज़्ज़ा” अरफ़ात से क़रीब था और उस पर एक मन्दिर बना दिया गया था। क़ुरैश के नज़दीक यह सभी बुतों से बड़ा और अधिक माननीय था। वह इन बुतों के सामने तीरों से फ़ाल निकाला करते थे। “अल-ख़लसा” मक्का की घाटी में था, इस बुत को हार पहनाए जाते थे। जौ और गेहूं की भेंट इस पर चढ़ाई जाती थी। इसको दूध से नहलाया जाता था, इसके लिए क़ुर्बानी की जाती थी और इस पर शुतुरमुर्ग़ के अण्डे लटकाए जाते थे। बुत मक्का में गली-गली आवाज़ देकर बेचे जाते थे। देहात के लोग अधिक पसन्द करते और ख़रीद कर अपने घरों की शोभा बढ़ाते।

इस तरह यह क़ौम अपनी सारी जवांमर्दी, वफ़ादारी तथा अपनी हमदर्दी के बावजूद मूर्तिपूजा, अंधविश्वास में लीन थी। दीन के वास्तविक अर्थ से अनजान तथा दीन-ए-इब्राहीमी से कोसों दूर, पतन के उस गढ़े में पहुंच चुकी थी जहां दुनिया की बहुत कम क़ौमें होंगी।

छठी शताब्दी के मध्य में मक्का का यह हाल था, जो रसूलुल्लाह सल्ल० की पैग़म्बरी का एलान होने और उसके अंधेरे आसमान से इस्लाम का सूरज उगने से पहले हमें दिखाई देता है। क़ुरआन पाक में आता है:

टिप्पणियां

  1. 1सिक़ाया, अर्थात हाजियों के लिए पानी का बंदोबस्त करना।
  2. 2रिफ़ादा, अर्थात हाजियों के लिए विशिष्ट भोज।
  3. 3जब सुमामा बिन उसाल ने इस्लाम क़ुबूल करने के बाद मक्का गेहूं ले जाने पर पाबन्दी लगा दी तो क़ुरैश को बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा। उन्होंने पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्ल० से इसकी शिकायत की। आप सल्ल० ने यमामा को यह पाबन्दी हटा लेने का हुक्म दिया। (ज़ादुल मआद, खण्ड 1, पृ० 377)