अध्याय दस

मदीना में

मदीना में स्वागत

मदीना में अन्सार को यह सूचना मिल चुकी थी कि अल्लाह के रसूल सल्ल० मक्का से रवाना हो चुके हैं। इसलिए वे रोज़ाना फ़ज्र की नमाज़ के बाद शहर के आख़िरी किनारे पर पहुंच जाते और आपकी राह देखते रहते, और तब तक वहां से न हटते जब तक धूप बहुत तेज़ और असहनीय न हो जाती और वे छाया में जाने पर मजबूर न हो जाते। यह बहुत गर्मी का मौसम था।

अल्लाह के रसूल सल्ल० जिस समय मदीना पहुंचे, उस समय अन्सार इन्तज़ार के बाद अपने घरों को लौट चुके थे। सबसे पहले आप पर एक यहूदी की नज़र पड़ी। आपको देखकर उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई और अन्सार को आपके आने की सूचना दी। अन्सार यह सुनते ही दौड़ पड़े। उन्होंने देखा कि आप एक खजूर के पेड़ के नीचे तशरीफ़ रखते हैं, और आपके साथ हज़रत अबू बक्र रज़ि० हैं, जो आप ही की उम्र के मालूम होते थे। इनमें से अधिकांश ने आपको इससे पहले नहीं देखा था, इसलिए उन्होंने आप दोनों को घेर लिया और भीड़ बढ़ने लगी। हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने महसूस किया कि लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इनमें मालिक कौन है और सेवक कौन; इसलिए उन्होंने एक चादर लेकर आप सल्ल० के सिर पर छाया कर दी, और इस तरह यह शंका दूर हो गई।

लगभग पांच सौ अन्सार ने आपका स्वागत किया और निवेदन किया, “हुज़ूर! तशरीफ़ ले चलिए, आप पूरी तरह सुरक्षित हैं, हम आपकी हर बात का पालन करेंगे।” अल्लाह के रसूल सल्ल० और हज़रत अबू बक्र रज़ि० इस क़ाफ़िले के झुरमुट में चले। इधर पूरा मदीना आपके स्वागत के लिए उमड़ पड़ा। औरतें मकानों की छतों से इस नए क़ाफ़िले को देख रही थीं और एक-दूसरे से पूछती थीं, “देखो, इनमें अल्लाह के रसूल कौन हैं?” हज़रत अनस रज़ि० कहते हैं कि हमने फिर कभी ऐसा मंज़र नहीं देखा।

लोग रास्तों, चौराहों, मकानों की छतों, खिड़कियों और दरवाज़ों पर जमा हो गए थे। लड़के और नौकर-चाकर चारों तरफ़ ख़ुशी से कहते फिरते थे, “अल्लाहु अकबर! अल्लाह के रसूल आ गए! अल्लाहु अकबर! मुहम्मद (सल्ल०) आ गए!”

बरा बिन आज़िब रज़ि०, जो उस समय छोटे थे, बयान करते हैं, “मैंने मदीना वालों को किसी चीज़ से इतना ख़ुश होते नहीं देखा जितना अल्लाह के रसूल सल्ल० के आने से; यहां तक कि बांदियां भी पुकारती फिर रही थीं कि अल्लाह के रसूल आ गए, अल्लाह के रसूल आ गए!” मुसलमानों ने आपके आने की ख़ुशी में तकबीर के नारे बुलन्द किए। ऐसा लगता था मानो मदीना मुस्कुरा रहा हो और ख़ुशी से इठला रहा हो।

अनस बिन मालिक रज़ि०, जो उस समय छोटे थे, कहते हैं, “जिस दिन अल्लाह के रसूल सल्ल० मदीना आए, मैं वहां मौजूद था। सच यह है कि मैंने कोई दिन उस दिन से अधिक शुभ और सुन्दर नहीं देखा, जिस दिन अल्लाह के रसूल सल्ल० हमारे यहां पधारे।”

मस्जिद-ए-क़ुबा और मदीना का पहला जुमा

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने क़ुबा में चार दिन क़याम किया और वहां एक मस्जिद की बुनियाद रखी। जुमे के दिन आप वहां से आगे चले। जुमे का वक़्त बनी सालिम बिन औफ़ की बस्ती में आया, अतः आपने जुमे की नमाज़ उन्हीं के यहां अदा की। यह जुमे की पहली नमाज़ थी जो आपने मदीना में पढ़ी।

हज़रत अबू अय्यूब अन्सारी रज़ि० के घर

जब अल्लाह के रसूल सल्ल० शहर से गुज़रे, तो रास्ते में लोगों ने टोलियां बनाकर आपसे विनती की कि आप उनके यहां ठहरें। कभी-कभी लोग आपकी ऊंटनी की नकेल अपने हाथ में ले लेते। आप फ़रमाते, “इसे छोड़ दो, यह अल्लाह की तरफ़ से मामूर (हुक्म की पाबन्द) है।” ऐसा कई बार हुआ। जब आप बनी नज्जार के मोहल्ले से गुज़रे तो वहां की बच्चियों और बांदियों ने आपके स्वागत में जो शेर पढ़े, उनका मतलब यह है:

“हम बनी नज्जार की लड़कियां हैं; हमारी ख़ुशक़िस्मती कि मुहम्मद (सल्ल०) आज हमारे पड़ोसी हैं।”

जब आप बनी मालिक बिन नज्जार के घरों तक पहुंचे, तो ऊंटनी उस जगह, जहां इस समय मस्जिद-ए-नबवी का दरवाज़ा है, ख़ुद ही बैठ गई। उस समय यहां खजूर सुखाने का एक खलियान था, जो बनी नज्जार के दो यतीम लड़कों का था, और वे आपके ननिहाली रिश्तेदार भी थे।

अल्लाह के रसूल सल्ल० ऊंटनी से उतरे। हज़रत अबू अय्यूब अन्सारी रज़ि० ने फ़ौरन आपका सामान उतरवाया और उठाकर अपने घर ले गए, और अल्लाह के रसूल सल्ल० ने वहीं क़याम किया। अबू अय्यूब अन्सारी रज़ि० ने आपकी मेहमानदारी, आवभगत और आदर-सम्मान में कोई कसर न उठा रखी। मकान के ऊपरी हिस्से में आपसे ऊंचे होकर रहना उन्हें गवारा न हुआ। उन्होंने आपसे निवेदन किया कि आप ऊपर रहें और वे और उनके घर वाले नीचे रहेंगे। आपने फ़रमाया, “अबू अय्यूब! हमारे और हमसे मिलने आने वालों के लिए इसी में ज़्यादा आसानी है कि हम नीचे रहें।”

अबू अय्यूब अन्सारी रज़ि० कोई ख़ुशहाल आदमी न थे, लेकिन अपने घर में आपके आने से उन्हें अपार ख़ुशी थी, और वे अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने में ख़ुद को असमर्थ पा रहे थे। श्रद्धा, सेवा और सुविधा के आदाब व उपाय स्वयं सिखा देती है। अबू अय्यूब अन्सारी रज़ि० कहते हैं, “हम अल्लाह के रसूल सल्ल० के लिए रात का खाना तैयार करके भेजते। अगर आपका बचा हुआ खाना वापस आता, तो मैं और उम्मे अय्यूब उस तरफ़ से, जहां से आपने खाया होता, वह बचा हुआ खाना खाते और बरकत हासिल करते। एक बार पानी का मटका टूट गया। मैंने और उम्मे अय्यूब ने अपनी एक चादर से, जिसके सिवा हमारे पास ओढ़ने को कुछ न था, वह पानी सुखाया, कि कहीं पानी नीचे न टपकने लगे और आपको तकलीफ़ हो।”

मस्जिद-ए-नबवी और मकानों का निर्माण

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उन दो लड़कों को बुला भेजा जो उस खलियान के मालिक थे, और उनसे वह जगह मस्जिद बनाने के लिए ख़रीदनी चाही। दोनों लड़कों ने निवेदन किया, “ऐ अल्लाह के रसूल! यह हमारी तरफ़ से हदिया (भेंट) है।” लेकिन अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उसे इस तरह स्वीकार नहीं किया, बल्कि क़ीमत देकर वह ज़मीन हासिल की और वहां मस्जिद बनवाई।

मस्जिद के निर्माण में आपने ख़ुद हिस्सा लिया। आप ईंटें ढोकर लाते और मुसलमान आपके साथ काम करते। इस मौक़े पर आप फ़रमाते थे, “ऐ अल्लाह! असल बदला तो आख़िरत का बदला है, तो अन्सार और मुहाजिरों पर रहम फ़रमा।” मुसलमान बहुत ख़ुश थे; वे शौक़ से शेर पढ़ते और अल्लाह का शुक्र अदा करते।

अल्लाह के रसूल सल्ल० सात महीने हज़रत अबू अय्यूब अन्सारी रज़ि० के घर ठहरे। जब आपकी मस्जिद और मकान बन गए, तो आप उनमें चले गए। मुहाजिर आपके बाद लगातार मदीना आते रहे, यहां तक कि मक्का में सिर्फ़ दो तरह के लोग बचे: या तो वे जो किसी मुसीबत में फंस गए थे, या वे जो दुश्मनों की क़ैद में थे। दूसरी तरफ़ अन्सार का कोई घर ऐसा न बचा जहां लोगों ने इस्लाम क़ुबूल न किया हो।

मुहाजिरों और अन्सार में भाईचारा

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मुहाजिरों और अन्सार के बीच आपसी सहयोग और हमदर्दी की बुनियाद पर भाईचारे का एक समझौता भी कराया। अन्सार मुहाजिरों को अपना भाई बनाने में एक-दूसरे से इस तरह आगे बढ़ने की कोशिश करते थे कि क़ुरआ-अन्दाज़ी (पर्ची डालने) की नौबत आ जाती थी। वे मुहाजिरों को अपने मकानों, घर के सामान, माल-दौलत और ज़मीन-जायदाद, हर चीज़ में हिस्सेदार बना लेते थे और उन्हें अपने ऊपर प्राथमिकता देते थे।

एक अन्सारी अपने मुहाजिर भाई से कहता, “देखो, मेरा जितना माल है उसमें से आधा तुम ले लो। मेरी दो बीवियां हैं, इनमें से जो तुम्हें पसन्द हो बताओ, मैं उसको तलाक़ देकर तुम्हारे हवाले कर दूं।” मुहाजिर जवाब देता, “अल्लाह तुम्हारे घर-बार और माल में बरकत दे; तुम मुझे बस बाज़ार का रास्ता बता दो।”

अन्सार का काम त्याग था, और मुहाजिरों के पास सन्तोष, आत्मसम्मान और ख़ुद्दारी की दौलत थी।

यहूदियों से अमन का समझौता

इन्हीं दिनों अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मुहाजिरों और अन्सार के बीच एक लिखित समझौता तैयार कराया, जिसमें यहूदियों से अमन और शान्ति की बात थी। इसमें उन्हें अपने दीन पर क़ायम रहने और अपने माल-जायदाद की सुरक्षा का ज़िम्मा दिया गया था, और उनके अधिकारों और कर्तव्यों का उल्लेख किया गया था।

अज़ान का हुक्म

अल्लाह के रसूल सल्ल० को मदीना में जब कुछ इत्मीनान हासिल हुआ और इस्लाम की जड़ें कुछ मज़बूत हुईं, तो आपने नमाज़ की सूचना और बुलावे के उन तरीक़ों को नापसन्द फ़रमाया जो यहूदियों और ईसाइयों में प्रचलित थे, जैसे शंख, घण्टा-घड़ियाल अथवा मशाल आदि। उस समय तक मुसलमान किसी बुलावे या ऐलान के बिना नमाज़ के समय ख़ुद ही जमा हो जाते थे।

इस मौक़े पर अल्लाह ने मुसलमानों को अज़ान की दौलत से नवाज़ा; कुछ सहाबा को सपने में इसकी तरफ़ इशारा किया गया। आपने इसी अज़ान को मुक़र्रर कर दिया, और यह शरीअत का एक स्थायी हिस्सा बन गई। यह ख़िदमत हज़रत बिलाल बिन रबाह हब्शी रज़ि० के सुपुर्द हुई। वे अल्लाह के रसूल सल्ल० के मुअज़्ज़िन (अज़ान देने वाले) के पद पर सुशोभित हुए, और क़यामत तक के लिए मुअज़्ज़िनों के इमाम क़रार पाए।

मुनाफ़िक़ों का सिर उठाना

मक्का में निफ़ाक़1 न था। वहां इस्लाम कमज़ोर और बेबस था; उसमें हालात को बदलने की कोई ताक़त न थी, और वह किसी को न फ़ायदा पहुंचा सकता था न नुक़सान। बल्कि वहां इस्लाम लाने का मतलब ही यह था कि हर तरह के ख़तरे और जोखिम को सहा जाए, दुश्मनी मोल ली जाए, और जानते-बूझते दुश्मनों को भड़काया जाए। इसकी हिम्मत वही कर सकता था जो अपने वचन का सच्चा और इरादे का पक्का हो, जिसका ईमान मज़बूत हो और जो अपनी ज़िंदगी को ख़तरे में डालने को तैयार हो। वहां दो बराबर ताक़तें न थीं; मुशरिक ताक़तवर और हावी थे, और मुसलमान मज़लूम और कमज़ोर। क़ुरआन मजीद में आता है:

जब इस्लाम मदीना आया, उसकी जड़ें कुछ मज़बूत हुईं और हज़रत मुहम्मद सल्ल० और आपके साथियों ने कुछ चैन की सांस ली, तो हालात ने करवट ली और निफ़ाक़ ने सिर उठाया। यह एक स्वाभाविक बात थी जिसे टाला नहीं जा सकता था, क्योंकि निफ़ाक़ हमेशा वहीं पैदा होता है जहां दो विरोधी दावतें और दो नेतृत्व मौजूद हों। ऐसे समय एक वर्ग अनिश्चितता में दोनों दावतों के बीच हिचकोले खाता रहता है और परेशान रहता है कि किसे अपनाए और किसे छोड़े। कभी वह एक कैम्प में जाता है और कभी दूसरे में, क्योंकि दुनिया का मोह उसे किसी एक कैम्प में टिकने नहीं देता, और अपने पुराने बन्धनों से अलग नहीं होने देता। क़ुरआन मजीद में इस हाल का चित्रण इस तरह किया गया है:

इसी वर्ग की विशेषता एक दूसरी जगह इस तरह बयान की गई है:

अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल

इन मुनाफ़िक़ों का नेतृत्व अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल के हाथ में था, और ये लोग औस, ख़ज़रज और यहूदियों से सम्बन्ध रखते थे। बुआस की जंग के बाद सबने एकमत होकर अब्दुल्लाह बिन उबई को अपना सरदार चुन लिया था, और मदीना में इस्लाम के आने के समय उसकी ताजपोशी की पूरी तैयारी थी। जब उसने देखा कि लोग बड़ी संख्या में तेज़ी से इस्लाम क़ुबूल कर रहे हैं, तो यह बात फांस बनकर उसके दिल में चुभ गई और वह तिलमिला उठा।

इब्ने हिशाम लिखते हैं कि जिस समय अल्लाह के रसूल सल्ल० मदीना पधारे, अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल मदीना वालों का सरदार था। औस व ख़ज़रज के आगमन से पहले उसके अलावा कभी भी किसी पर एकमत न हो सके थे, और इन दोनों क़बीलों के किसी एक व्यक्ति को अपना सरदार बनाने पर राज़ी न थे। उसकी क़ौम ने उसकी ताजपोशी के लिए कौड़ियों का एक ताज भी तैयार कर रखा था और उसे बादशाह बनाने का इरादा था। इसी बीच अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद सल्ल० को यहां भेज दिया। जब उसकी क़ौम उसे छोड़कर मुसलमान हो गई, तो उसके मन में जलन की आग भड़क उठी; उसे लगा कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उसकी सरदारी छीन ली है। जब उसने देखा कि उसकी क़ौम किसी भी हालत में इस्लाम छोड़ने वाली नहीं, तो वह भी अपनी इच्छा से मुसलमान हो गया, लेकिन इस्लाम के प्रति उसके अन्दर द्वेष और निफ़ाक़ की भावना बनी रही।

ऐसे सभी लोग, जिनके दिल में चोर था और जो नेतृत्व के इच्छुक थे, इस्लाम से दुश्मनी पर उतर आए। वे इस नए दीन से घुटन महसूस करने लगे, जिसने उनकी तमाम योजनाओं पर पानी फेर दिया था, जिसने मदीना का रंग बदलकर मुहाजिरों और अन्सार को एक धागे में पिरो दिया था, और जिसके मानने वाले हज़रत मुहम्मद सल्ल० पर जान निछावर करते और आपकी मुहब्बत को अपने बाप, बेटों और बीवियों की मुहब्बत पर प्राथमिकता देते थे। यह देखकर मुनाफ़िक़ों के दिल जलन से भर गए और वे हज़रत मुहम्मद सल्ल० के ख़िलाफ़ साज़िशें रचने लगे।

इस तरह मदीना में इस्लामी समाज के अन्दर ही एक विरोधी वर्ग पैदा हो गया, जिससे होशियार रहना मुसलमानों के लिए ज़रूरी हो गया, क्योंकि यह वर्ग आस्तीन के सांप की तरह था और इस्लाम और मुसलमानों के लिए खुले दुश्मनों से ज़्यादा ख़तरनाक था। यही वजह है कि क़ुरआन मजीद में बार-बार इनका उल्लेख आया है और इनकी करतूतों से पर्दा उठाया गया है। इस्लाम का इनसे कई तरह का वास्ता रहा है, इसलिए सीरत की किताबों में इनका उल्लेख अनिवार्य रूप से आता है, और इस किताब में भी आएगा।

यहूदियों की दुश्मनी की शुरुआत

शुरू में इस्लाम के प्रति यहूदियों की जलन और बदले की भावना तटस्थता और ख़ामोशी के पर्दे में छिपी हुई थी। पहले वे मुसलमानों और मुशरिकों के बीच तटस्थता की नीति पर चलते रहे, बल्कि इस्लाम की तरफ़ उनका झुकाव कुछ अधिक ही था, क्योंकि रिसालत, नुबूवत और आख़िरत के दिन पर ईमान, तथा अल्लाह की ज़ात व सिफ़ात और तौहीद के अक़ीदे में वे मुसलमानों से बहुत क़रीब थे। हालांकि लम्बे समय तक जाहिल क़ौमों के पड़ोस और बुतपरस्ती के माहौल में ज़िंदगी बिताने की वजह से उनका यह अक़ीदा भी बहुत कमज़ोर पड़ चुका था, और वे कुछ नबियों के प्रति ज़रूरत से ज़्यादा श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने लगे थे।

उम्मीद यह की जाती थी कि अगर वे इस्लाम का साथ नहीं देंगे, तो कम से कम ख़ामोश तो ज़रूर रहेंगे, क्योंकि इस्लाम उनके धर्मग्रन्थों की पुष्टि करता है, और हज़रत मुहम्मद सल्ल० बनी इसराईल के तमाम नबियों पर ईमान लाने की दावत देते हैं। क़ुरआन मजीद में आता है:

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अगर ऐसा हो जाता, तो आज न सिर्फ़ इस्लाम का बल्कि विश्व-इतिहास का रुख़ कुछ और होता, और इस्लामी दावत को उन कठिनाइयों और परेशानियों का सामना न करना पड़ता जो इस्लाम और यहूदी धर्म के टकराव से, यानी शुरुआती मुसलमानों और ताक़तवर यहूदियों के आपसी टकराव से, पैदा हुईं। इस हालत की दो वजहें थीं। एक, यहूदियों की जलन और बदले से भरी तंग सोच; दूसरी, उनके अनेक झूठे अक़ीदे, उनका दुराचरण और उनकी बुरी आदतें, जिनकी क़ुरआन में अनेक जगह आलोचना की गई है। क़ुरआन ने उनके उस लम्बे इतिहास का पर्दाफ़ाश किया है जो नबियों से लड़ने, उनके पैग़ाम का विरोध करने, उन्हें शहीद करने के दुस्साहस, सरकशी, हक़ की राह रोकने, अल्लाह पर झूठ गढ़ने, दौलत के इश्क़, मना होने के बावजूद सूद के कारोबार, नाजायज़ तरीक़े से दूसरों का माल खाने, हराम माल के शौक़, तौरात में अपनी इच्छा से फेर-बदल, दुनिया की ज़िंदगी से बहुत अधिक लगाव, और उनकी अनेक क़ौमी और नस्ली विशेषताओं से भरा हुआ है।

अगर हज़रत मुहम्मद सल्ल० की जगह कोई राजनीतिक नेता होता, तो वह इस पेचीदा स्थिति का जायज़ा लेकर उसके अनुसार क़दम उठाता। वह अगर यहूदियों की चाटुकारिता और ख़ुशामद न भी करता, तो कम से कम उन्हें भड़काने और उनकी दुश्मनी मोल लेने से ज़रूर बचता। लेकिन आप रिसालत के प्रचार, हक़ और सच्चाई के दो-टूक ऐलान, सत्य और असत्य में फ़र्क़ करने और फ़साद मिटाने के लिए अल्लाह की तरफ़ से भेजे गए थे, और आपको इस बात का ज़िम्मेदार बनाया गया था कि आप दुनिया की तमाम क़ौमों को, जिनमें यहूदी और ईसाई भी शामिल हैं, इस्लाम की दो-टूक दावत दें, भले ही इसके लिए आपको बड़ी से बड़ी क़ीमत चुकानी पड़े और तरह-तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़े। यही वह रास्ता है जिस पर सारे नबी हमेशा चलते रहे; यही विशेषता राजनीति और नुबूवत की राहों को अलग करती है, और यही नबियों और राष्ट्रीय नेताओं के बीच अहम फ़र्क़ है।

इन बातों से यहूदियों की ज़िंदगी, उनके धार्मिक विश्वासों और उनके आचरण पर बड़ी चोट पहुंची। वे इस्लाम और मुसलमानों की दुश्मनी पर उतारू हो गए, उन्होंने अपना पुराना रवैया बदल दिया, और छिपकर तथा खुलकर, दोनों तरह से इस्लाम के विरोध पर उतर आए। यहूदी विद्वान इसराईल वेलफ़ेन्सन ने बहुत साफ़ लिखा है:

“अगर रसूल की शिक्षाएं सिर्फ़ मूर्तिपूजा के विरोध तक सीमित रहतीं, और यहूदियों से उनकी रिसालत स्वीकार करने को न कहा जाता, तो यहूदियों और मुसलमानों में कोई झगड़ा पैदा न होता। यहूदी रसूल की शिक्षाओं को श्रद्धा से देखते, उनका समर्थन करते और जान-माल से उनकी सहायता करते, यहां तक कि आप इन बुतों को टुकड़े-टुकड़े कर देते और वह मूर्तिपूजा ख़त्म हो जाती जो सारे अरब में फैली हुई थी। लेकिन शर्त यही थी कि वे यहूदियों और उनके दीन से कोई वास्ता न रखते, और न उन्हें अपनी रिसालत स्वीकार करने पर मजबूर करते; क्योंकि यहूदी मानसिकता किसी ऐसी चीज़ के सामने नर्म नहीं पड़ सकती जो उसे उसके दीन से हटाना चाहती हो, और वह बनी इसराईल के सिवा किसी और नस्ल के किसी नबी को मानने पर राज़ी नहीं हो सकती।”

तारीख़ुल यहूद फ़ी बिलादिल अरब, पृ० 123

यहूदियों में इस बात ने और आग भड़का दी कि उनके कुछ धार्मिक नेता, जैसे अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ि०, जिनका वे बड़ा सम्मान करते थे, मुसलमान हो गए। यहूदी सोच भी न सकते थे कि उन जैसा व्यक्ति मुसलमान हो जाएगा। इस घटना ने उनके सीनों में जलन और हसद की आग और भड़का दी।2

बुतपरस्ती को इस्लाम पर प्राथमिकता

यहूदियों ने सिर्फ़ इस्लाम के विरोध पर ही बस नहीं किया, बल्कि वे मूर्तिपूजकों को उन मुसलमानों पर खुली प्राथमिकता देने लगे जो तौहीद के अक़ीदे में उनके साझी थे। उम्मीद यह की जाती थी कि जब क़ुरैश के मज़हब और अल्लाह के रसूल सल्ल० के लाए हुए दीन की तुलना होगी और इनमें से किसी एक को चुनने का सवाल उठेगा, तो यहूदी मुसलमानों से अपने विरोध के बावजूद शिर्क व बुतपरस्ती पर इस्लाम से प्राथमिकता स्वीकार करेंगे, लेकिन इस्लाम-दुश्मनी ने उन्हें इसकी इजाज़त न दी।

एक बार जब यहूदी धार्मिक नेता क़ुरैश के सरदारों से मिलने मक्का गए, तो क़ुरैश के सरदारों ने कहा, “आप लोग पहले की किताब वाले हैं, और हमारे और मुहम्मद के बीच जो मतभेद चल रहा है वह आपको मालूम है। आप बताइए, हमारा मज़हब बेहतर है या उनका?” उन्होंने जवाब दिया, “आप लोगों का दीन उनके दीन से बेहतर है, और आप उनसे ज़्यादा हक़ पर हैं।” डॉ० वेलफ़ेन्सन ने इस घटना पर टिप्पणी करते हुए लिखा है:

“लेकिन एक बात, जिस पर असल में इनकी निंदा की जा सकती है और जिससे एक अल्लाह पर ईमान रखने वाले हर व्यक्ति को तकलीफ़ पहुंचेगी, चाहे वह यहूदी हो या मुसलमान, यहूदियों और क़ुरैश के बुतपरस्तों के बीच की वह बातचीत है, जिसमें यहूदियों ने क़ुरैश के मज़हब को इस्लाम के पैग़म्बर के लाए हुए दीन पर प्राथमिकता दी थी। जंगी ज़रूरतों ने क़ौमों के लिए दुश्मन पर जीत हासिल करने की ख़ातिर धोखेबाज़ी के अनेक तरीक़ों को जायज़ ठहराया है, लेकिन इस सबके बावजूद यहूदियों को यह बड़ी भूल कदापि न करनी चाहिए थी, और क़ुरैश के ज़िम्मेदारों के सामने यह न कहना चाहिए था कि बुतों की पूजा इस्लामी तौहीद से बेहतर है, भले ही इसकी वजह से उनके मक़सद पूरे न होते। क्योंकि बनी इसराईल, जो सदियों तक बुतपरस्त क़ौमों के मुक़ाबले में अपने पूर्वजों के नाम पर तौहीद का झण्डा ऊंचा किए रहे, और जिन्होंने इतिहास के विभिन्न दौरों में इस अक़ीदे के लिए अनगिनत तकलीफ़ें और मार-काट के दुख झेले, उनका आज यह कर्तव्य था कि मुशरिकों को हराने और नीचा दिखाने के लिए अपनी जान का बलिदान दें, और इस पर अपनी प्यारी से प्यारी चीज़ निछावर कर दें।”

क़ुरआन मजीद में आता है:

क़िबले की तब्दीली

अल्लाह के रसूल सल्ल० और तमाम मुसलमान अब तक बैतुल मक़दिस की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ते थे। मदीना आने के बाद एक वर्ष चार महीने तक इसी रुख़ पर नमाज़ पढ़ी जाती रही। अल्लाह के रसूल सल्ल० की इच्छा थी कि काबा को मुसलमानों का क़िबला बना दिया जाए। अरब मुसलमान भी दिल से यही चाहते थे; वे किसी और जगह को काबा के बराबर नहीं समझते थे। बैतुल मक़दिस की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ना और उसे अपना क़िबला मानना उनके लिए एक कठिन इम्तिहान था, लेकिन उनका ईमान था, “हमने सुना और मान लिया,” और “हम ईमान लाए, सब कुछ हमारे रब की तरफ़ से है,” और इसके सिवा उनके मुंह से कुछ न निकला। वे अल्लाह के रसूल सल्ल० की आज्ञा का पालन करने और अल्लाह के आगे झुक जाने के सिवा कुछ न जानते थे, चाहे वह उनकी इच्छा के अनुकूल हो या न हो।

जब अल्लाह ने उनके दिलों का इम्तिहान ले लिया और उन्होंने तक़वा और आज्ञापालन का पूरा सबूत दे दिया, तो क़ुरआन मजीद में क़िबला बदलने का हुक्म इस तरह आया:

मुसलमानों ने अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० की आज्ञा मानते हुए उसी समय अपना रुख़ काबा की तरफ़ कर लिया, और वह क़यामत तक के लिए मुसलमानों का क़िबला बना दिया गया। मुसलमान दुनिया के किसी भी हिस्से में हों, अपना मुंह उसी तरफ़ करके नमाज़ पढ़ते हैं।

क़ुरैश की छेड़छाड़ और लड़ाई की इजाज़त

जब मदीना में इस्लाम के क़दम जम गए, और क़ुरैश ने देखा कि उसकी लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है, तो उन्होंने महसूस किया कि अगर कुछ दिन और यही हालात रहे तो बागडोर उनके हाथ से निकल जाएगी और फिर वे इस्लाम का कुछ न बिगाड़ सकेंगे। यह देखकर उन्होंने पूरी तैयारी से चारों तरफ़ से उसका विरोध शुरू कर दिया। लेकिन मुसलमान अल्लाह के इस हुक्म पर डटे रहे कि “अपने हाथ रोके रखो और नमाज़ क़ायम करो,” जिसका मक़सद यह था कि उनकी नज़र में ज़िंदगी की राहतें बेक़ीमत हो जाएं, और आज्ञापालन, मन की दासता का विरोध और त्याग व बलिदान का कठिन काम उनके लिए आसान हो जाए।

लड़ाई की इजाज़त

जब मुसलमानों की ताक़त कुछ और बढ़ी और उनके बाज़ू मज़बूत हो गए, तो उन्हें लड़ाई की इजाज़त दे दी गई; लेकिन यह सिर्फ़ इजाज़त थी, इसे फ़र्ज़ (अनिवार्य) नहीं ठहराया गया था:

अब्दुल्लाह बिन जहश का सरिया और ग़ज़वा-ए-अबवा

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्ल० ने विभिन्न क़बीलों और इलाक़ों में छापे के लिए टुकड़ियां भेजनी शुरू कीं।3 ये टुकड़ियां एक तरह की गश्त या झड़प के समान होती थीं, जिनमें विधिवत लड़ाई नहीं होती थी। इनका मक़सद मुशरिकों को डराना और इस्लाम की शान-शौकत का प्रदर्शन करना था।

यहां हम ख़ास तौर पर अब्दुल्लाह बिन जहश के सरिये का उल्लेख करेंगे, क्योंकि इसके सम्बन्ध में क़ुरआन मजीद की एक आयत भी उतरी, और इससे इस बात की पुष्टि होती है कि क़ुरआन मुसलमानों की किसी ग़लती या कोताही का पक्ष नहीं लेता, बल्कि विभिन्न क़ौमों और वर्गों के बारे में फ़ैसला देने या राय क़ायम करने में इन्साफ़ का तराज़ू है, जिस पर हर काम तौला जाएगा। यह घटना संक्षेप में इस तरह है।

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अब्दुल्लाह बिन जहश को सन 2 हिजरी में आठ मुहाजिरों के साथ एक मुहिम पर भेजा। आपने उन्हें एक ख़त भी दिया और कहा कि इसे अभी न खोलें; जब दो दिन का सफ़र पूरा कर लें तब खोलकर पढ़ें, और फिर जो कुछ इसमें लिखा है उसका पालन करें, लेकिन अपने किसी साथी को उसके पालन पर मजबूर न करें।

जब अब्दुल्लाह बिन जहश ने दो दिन का सफ़र पूरा कर लिया, तो ख़त खोलकर देखा। उसमें लिखा था, “जब तुम यह ख़त देखो, तो आगे बढ़कर मक्का और ताइफ़ के बीच नख़लिस्तान में उतर जाना, वहां से क़ुरैश की गतिविधियों पर नज़र रखना, और उनकी ख़बरें हमारे पास भेजते रहना।” अब्दुल्लाह बिन जहश ने ख़त पढ़कर कहा, “आक़ा का हुक्म सिर-आंखों पर!” फिर उन्होंने अपने साथियों से कहा, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मुझे हुक्म दिया है कि आगे नख़लिस्तान में उतरकर क़ुरैश की सरगर्मियों पर नज़र रखूं और उनकी ख़बरें आप तक पहुंचाता रहूं; और यह भी हुक्म दिया है कि किसी को इस पर मजबूर न करूं। अब तुममें से जिसे शहादत का शौक़ हो वह मेरे साथ चले, और जो न चाहे वह वापस लौट जाए। मुझे तो हर हाल में अल्लाह के रसूल सल्ल० के हुक्म का पालन करना है।” इसके बाद वे आगे बढ़े, और उनके सभी साथी उनके साथ रहे; एक आदमी ने भी पीछे रहना गवारा न किया।

आगे चलकर वे और उनके साथी नख़लिस्तान में ठहरे। इतने में क़ुरैश का एक क़ाफ़िला वहां से गुज़रा, जिसमें अम्र बिन हज़रमी भी था। क़ाफ़िले वाले इन लोगों को देखकर डर गए, क्योंकि उनका पड़ाव भी क़रीब ही था। इतने में उक्काशा बिन मिह्सन ने, जिनका सिर मुंडा हुआ था, सिर उठाकर देखा। क़ुरैश ने जब उन्हें देखा तो इत्मीनान जताया और कहा, “इनसे डरने की ज़रूरत नहीं, ये तो उमरा4 करने वाले हैं।” यह सन 2 हिजरी के रजब5 महीने के आख़िरी दिन की घटना है।

इसके बाद मुसलमानों ने आपस में सलाह की। उन्होंने सोचा कि अगर इस रात इन काफ़िरों को छोड़ दिया, तो ये काबा में दाख़िल हो जाएंगे और तुमको वहां जाने से बाज़ रखेंगे; और अगर इनसे लड़ते हो, तो पवित्र महीने में लड़ना पड़ेगा। इस बात ने उन्हें चिन्ता में डाल दिया और वे कोई क़दम उठाने से झिझके। लेकिन फिर सबकी राय हुई कि जितनों को हो सके, मार दिया जाए और उनके माल पर क़ब्ज़ा कर लिया जाए। अतः वाक़िद बिन अब्दुल्लाह तमीमी ने पहला तीर चलाया और अम्र बिन हज़रमी को मार दिया, और दो आदमियों को क़ैदी बना लिया गया। अब्दुल्लाह बिन जहश और उनके साथी क़ाफ़िले का सामान और दोनों क़ैदियों को लेकर वापस आए।

जब वे मदीना में अल्लाह के रसूल सल्ल० की सेवा में हाज़िर हुए, तो आपने फ़रमाया, “मैंने तुम्हें पवित्र महीने में लड़ने का हुक्म तो नहीं दिया था।” और आपने उनके लाए हुए माले-ग़नीमत में से कुछ भी लेने से इन्कार कर दिया। जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ने यह फ़रमाया, तो उनके हाथ-पांव फूल गए और वे घबराए कि अब मौत यक़ीनी है। दूसरे मुसलमानों ने भी उन्हें ख़ूब खरी-खोटी सुनाई। उधर क़ुरैश कहने लगे, “लो, मुहम्मद ने पवित्र महीने में भी जंग और ख़ून-ख़राबा जायज़ कर दिया!” इस मौक़े पर क़ुरआन की यह आयत उतरी:

अल्लामा इब्नुल क़य्यिम “ज़ादुल मआद” में लिखते हैं:

“अल्लाह ने अपने दोस्तों और दुश्मनों के बीच इन्साफ़ का मामला फ़रमाया। उसने अपने प्यारे बन्दों के इस काम का, कि वे पवित्र महीने में गुनाह कर बैठे थे, समर्थन नहीं किया, बल्कि उसे बड़ी बात ठहराया। और साथ ही यह भी बता दिया कि उसके दुश्मन मुशरिक, जो कुछ कर रहे हैं उसकी वजह से, एक पवित्र महीने में हुए इस गुनाह से कहीं ज़्यादा निंदा और सज़ा के पात्र हैं; ख़ास तौर पर इस हाल में कि उसके प्यारे बन्दों ने इसमें बहाने से काम लिया था, या यूं कहिए कि उनसे यह चूक हो गई थी, जिसे अल्लाह उनकी तौहीद, उसके प्रति समर्पण, अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ हिजरत और अल्लाह के लिए त्याग व बलिदान की बदौलत माफ़ करने वाला है।”

ग़ज़वा-ए-अबवा

हज़रत मुहम्मद सल्ल० ने ग़ज़वा-ए-अबवा में, जिसे “बवात” भी कहा जाता है, ख़ुद हिस्सा लिया। यह आपका पहला ग़ज़वा था, लेकिन इसमें लड़ाई की नौबत नहीं आई और आप सल्ल० वापस आ गए। इसके बाद अनेक सरिये और ग़ज़वे हुए।

रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ होना

जब इस्लाम मुसलमानों के दिलों में अच्छी तरह समा गया, उन्हें नमाज़ से लगाव पैदा हो गया, उनके अन्दर शरीअत पर चलने और अल्लाह के आदेशों के पालन की भावना घर कर गई, और वे नए आदेशों की प्रतीक्षा में रहने लगे, तो अल्लाह ने रोज़े का हुक्म दिया। यह हिजरत के दूसरे साल की बात है। इस मौक़े पर क़ुरआन की यह आयत उतरी:

और यह आयत भी उतरी:

टिप्पणियां

  1. 1दोहरी नीति और ढोंग को “निफ़ाक़” कहते हैं, और इस पर चलने वाले को “मुनाफ़िक़”। क़ुरआन की वे सभी सूरतें जिनमें निफ़ाक़ या मुनाफ़िक़ों का उल्लेख आया है, मदीना में उतरी हैं। (अनुवादक)
  2. 2यहूदियों में से जो लोग मुसलमान हुए और जिन्हें हज़रत मुहम्मद सल्ल० की सोहबत का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उनकी संख्या 39 तक पहुंचती है।
  3. 3“सरिया” (raid) उस मुहिम को कहते हैं जिसमें हज़रत मुहम्मद सल्ल० ख़ुद मौजूद न थे, बल्कि आपके समय में आपके आदेश पर भेजी जाती थी। “ग़ज़वा” (expedition) वह मुहिम है जिसमें हज़रत मुहम्मद सल्ल० ख़ुद मौजूद होते थे। (अनुवादक)
  4. 4अरब रजब के महीने में उमरा करने को प्राथमिकता देते थे।
  5. 5रजब उन चार पवित्र महीनों में से एक है जिनमें लड़ाई मना थी; जाहिलियत के ज़माने में और इस्लाम के शुरुआती दौर में अरब इस पर अमल करते थे। बाक़ी तीन महीने ज़ीक़ादा, ज़िलहिज्जा और मुहर्रम हैं। विद्वानों का मत है कि (इन महीनों में लड़ाई की मनाही का) यह हुक्म सूरह बराअत (अत-तौबा) की इस आयत से मन्सूख़ (रद्द) हो चुका है: “फिर जब हुरमत वाले महीने बीत जाएं, तो उन मुशरिकों को जहां पाओ क़त्ल करो और उन्हें गिरफ़्तार करो” (9:5)। सईद बिन मुसय्यिब से पूछा गया, “क्या मुसलमान पवित्र महीनों में काफ़िरों से लड़ सकते हैं?” उन्होंने जवाब दिया, “हां।” इस्लामी लड़ाइयों में इसी पर अमल होता था; इतिहास में कहीं नहीं मिलता कि हर साल रजब, या ज़ीक़ादा, ज़िलहिज्जा और मुहर्रम के महीनों में लड़ाई रोक दी जाती हो और इस्लामी फ़ौजें छावनियों में लौट आती हों।