अध्याय तीन

अरबों का अंधेरा दौर

एक नए नबी की ज़रूरत

अज्ञानता की अंतिम सीमा पर अरब

उन विशेषताओं एवं ख़ूबियों के बावजूद, जिनकी वजह से अल्लाह ने अरबों का चयन हज़रत मुहम्मद सल्ल० के अभ्युदय और इस्लाम के उदय के लिए किया था, अरब प्रायद्वीप में चेतना और बेचैनी के कोई लक्षण नज़र नहीं आते थे। कुछ एक हनीफ़1 और सच की खोज करने वाले बाक़ी रह गए थे, जो उंगलियों पर गिने जा सकते थे और जिनकी हैसियत बरसात की अंधेरी और ठिठुरती हुई रात में उन जुगनुओं से अधिक न थी जो न तो किसी भटके को राह दिखा सकते हैं और न किसी को गर्मी पहुंचा सकते हैं।

जिस समय अरब में हज़रत मुहम्मद सल्ल० का अभ्युदय हुआ, वह अरब के इतिहास का भी अंधेरा दौर था। उस समय पूरा अरब अज्ञानता और पतन की अफ़सोसनाक सीमा तक पहुंच चुका था। ऐसी प्रतिकूल रुकावट वाली हालत शायद ही किसी नबी के प्रचार के रास्ते में पेश आई होगी।

अंग्रेज़ लेखक सर विलियम म्योर, जो इस्लाम और हज़रत मुहम्मद सल्ल० पर आरोप लगाने के लिए कुख्यात है, ने उस दौर का बड़ा अच्छा ख़ाका पेश किया है। उसने पश्चिमी लेखकों की इस धारणा को ग़लत ठहराया है कि हज़रत मुहम्मद सल्ल० के अभ्युदय से पहले लावा बिल्कुल पक चुका था, और हज़रत मुहम्मद सल्ल० ने सिर्फ़ इतना किया कि समय से और सही जगह पर उसको आग दिखा दी और यह लावा फूट पड़ा। वह कहता है:

मुहम्मद की नौजवानी में अरब अत्यधिक सुधार-विरोधी था। शायद उससे पहले वह इतनी निराशाजनक हालत में कभी न था।

ईसाई धर्म के प्रचार की मामूली कोशिश से अरब के ऊपरी धरातल पर जब-तब हल्की लहरें पैदा होती थीं, यहूदी धर्म के गहरे असर कभी-कभी गहरी एवं तेज़ लहरें पैदा कर देते थे, लेकिन स्वदेशी मूर्तिपूजा और इस्माईलियों के अंधविश्वास की तेज़ धारा चारों तरफ़ से काबा की तरफ़ उमड़ कर आ रही थी, और इस बात का सबूत दे रही थी कि मक्का का मज़हब और इबादत का ढंग अरबों के दिल व दिमाग़ में इस तरह रच-बस गया था कि उसमें किसी बदलाव या हस्तक्षेप की गुंजाइश न थी।2

इसी ऐतिहासिक बात को बॉसवर्थ स्मिथ ने संक्षिप्त में, लेकिन बहुत सफ़ाई से, इस तरह पेश किया है:

सबसे ज़्यादा दार्शनिक विचार रखने वाला एक इतिहासकार कहता है कि उन सभी क्रान्तियों में, जिन्होंने इंसानियत के इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी है, किसी का अभ्युदय इंसानी सोच के लिए इतना उम्मीद भरा न था जितना कि अरब के इस मज़हब का। और पहली ही निगाह में यह मानना पड़ता है कि अगर इतिहास नाम की कोई चीज़ है, तो यहां कारक तथा प्रभाव की उन कड़ियों को तलाश करने में असमर्थ है, जिनको खोजना असल में इतिहास का प्रमुख उद्देश्य है।3

एक नए नबी की ज़रूरत

छठी शताब्दी के मध्य में बिगाड़ इतना बढ़ चुका था और मानवता पतन के ऐसे गर्त में पहुंच चुकी थी कि अब वह किसी सुधारक या नैतिक शिक्षा के किसी उपदेशक के बस की बात न थी। सवाल किसी एक अक़ीदा को सही करने, किसी ख़ास आदत को बदलने या इबादत के किसी तरीक़े के चलन का न था, और न ही समस्या समाज-सुधार की थी। इसके लिए वह सुधारक और शिक्षक काफ़ी थे जिनसे कोई दौर और कोई इलाक़ा कभी ख़ाली नहीं रहा।

समस्या यह थी कि अज्ञानता की चादर ओढ़े शिर्क व बुतपरस्ती के उस भयंकर मलबे को किस तरह हटाया और साफ़ किया जाए, जो सदियों से तले-ऊपर जमा हो रहा था और जिसके नीचे नबियों की शिक्षाएं और सुधारकों की कोशिशें दफ़न थीं, और फिर उसकी जगह वह नई, बड़ी और शानदार इमारत कैसे खड़ी की जाए जिसकी छाया में पूरी इंसानियत को पनाह मिल सके। समस्या यह थी कि वह इंसान कैसे ढाला जाए जो अपने से पहले के इंसान से हर बात में भिन्न और नया नज़र आए।

समस्या फ़साद व बिगाड़ की जड़ को हमेशा के लिए ख़त्म करने और बुतपरस्ती को जड़ से इस तरह उखाड़ फेंकने की थी कि दूर-दूर तक उसका कोई असर व निशान बाक़ी न रह जाए, और तौहीद का अक़ीदा लोगों के दिल व दिमाग़ में इस तरह रच-बस जाए कि उससे आगे सोचा भी न जा सके। इंसान के दिल में अल्लाह की रज़ा की खोज तथा इबादत की लगन, इंसानियत की सेवा, सच के रास्ते पर चलने की भावना, तथा हर ग़लत बात से मन को रोकने की क्षमता और ताक़त पैदा की जाए।

मतलब इंसानियत को, जो आत्महत्या पर उतारू ही न थी बल्कि उसके लिए पर तौल चुकी थी, कमर पकड़ के दुनिया व आख़िरत के नरक से बचाया जाए और उसको उस सच्चे रास्ते पर डाला जाए जिसका पहला सिरा वह पाक ज़िंदगी (जीवन) है जो अल्लाह के परम भक्तों और ईमान वालों को इस दुनिया में ही नसीब होती है, तथा दूसरा सिरा हमेशा रहने वाली वह जन्नत है जिसका तक़वा की ज़िंदगी अपनाने वालों से वादा किया गया है।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अभ्युदय के उपकार का वर्णन करते हुए अल्लाह पाक ने क़ुरआन मजीद में जो इरशाद फ़रमाया है, उससे बढ़कर उस हालत का चित्रण और कहीं नहीं मिल सकता:

इतिहास का सबसे बड़ा कारनामा

मानव विकास के पूरे इतिहास में हमें इससे अधिक नाज़ुक और पेचीदा काम तथा इससे बड़ी ज़िम्मेदारी नज़र नहीं आती जो एक नबी की हैसियत से हज़रत मुहम्मद सल्ल० पर डाली गई और न कोई खेती इतनी उपजाऊ साबित और फलदार हुई, और न कोई कोशिश इतनी फ़ायदेमंद साबित हुई जितनी जीवनदायक और फ़ायदेमंद आप सल्ल० की कोशिश। यह दुनिया के अजूबों में सबसे बड़ा अजूबा और दुनिया का सबसे बड़ा चमत्कार है। मशहूर फ़्रांसीसी साहित्यकार Lamartine ने अपनी किताब Histoire de la Turquie खण्ड दो के पृ० 276–277 पर लिखा है:

किसी भी इन्सान ने कभी भी, जाने या अनजाने में, अपने लिए इतना ऊंचा लक्ष्य नहीं चुना, इसलिए कि यह मक़सद इन्सान की ताक़त के बाहर था। अंधविश्वास और भुलावे, जो इन्सान और उसके मालिक के बीच दीवार बन गए थे, को हिलाकर रख देना, इन्सान को ख़ुदा की पवित्र परिकल्पना को फिर से बहाल करना एक महान लक्ष्य था। किसी इन्सान ने कभी भी ऐसे महान कार्य का, जो किसी तरह इन्सानी ताक़त के बस का न था, इतने कमज़ोर साधनों के साथ बीड़ा नहीं उठाया।

इससे भी अधिक आपका यह कारनामा है कि आपने क़ुर्बानगाहों, देवताओं, धर्मों, विचारों, विश्वास एवं लोगों के अन्तःकरण में एक तहलका मचा दिया। एक ऐसी किताब को बुनियाद बनाकर, जिसका हर एक अक्षर क़ानून की हैसियत रखता है, आपने एक ऐसी रूहानी मिल्लत (आध्यात्मिक समुदाय) की संरचना की जो हर नस्ल और हर ज़बान के लोगों से मिलकर बनी है। इस इस्लामी मिल्लत, जिसे हज़रत मुहम्मद सल्ल० ने हमारे लिए विरसे (उत्तराधिकार) में छोड़ा है, की विशेषता यह है कि उसे झूठे ख़ुदाओं से बहुत नफ़रत है और निराकार एक अल्लाह से सबसे ज़्यादा लगाव, और यही लगाव उसे एक अल्लाह के अपमान के ख़िलाफ़ बदला लेने पर मजबूर कर देता है, और यही लगाव मुहम्मद सल्ल० के मानने वालों की ख़ूबियों की बुनियाद बनता है।

अपनी आस्था को एक तिहाई दुनिया से स्वीकार करा लेना बेशक आपका मोजज़ा (चमत्कार) था, लेकिन ज़्यादा सही तो यह है कि यह एक व्यक्ति का नहीं बल्कि अक़्ल का मोजज़ा (चमत्कार) है। अल्लाह की तौहीद के विचार का ऐसे समय एलान करना, जब दुनिया अनगिनत बिचौलिए ख़ुदाओं के बोझ से दबी हुई थी, ख़ुद अपने में एक महान अजूबा (चमत्कार) था। मुहम्मद सल्ल० की ज़बान से जैसे ही इस अक़ीदे का एलान हुआ, बुतों के तमाम बुतख़ाने में ख़ाक उड़ने लगी और एक तिहाई दुनिया ईमान की लौ से गरम हो गई।

डा० ज़की अली की किताब Islam in the World लाहौर 1947 के पृ० 15–16 से साभार

दुनिया भर में फैली इस क्रांति तथा इंसानियत के नवनिर्माण के इस महान काम को पूरा करने के लिए एक ऐसे नए नबी की मांग थी जो तमाम नबियों से बढ़कर हो। समय को एक ऐसे नबी की ज़रूरत थी जो लोगों को सच्चा रास्ता दिखाए और सच का झण्डा दुनिया में हमेशा के लिए बुलन्द कर दे। क़ुरआन पाक में अल्लाह पाक फ़रमाता है:

टिप्पणियां

  1. 1वह लोग जो मूर्तिपूजा छोड़ चुके थे और अपनी समझ के अनुसार इब्राहीमी आस्था पर क़ायम थे।
  2. 2देखें The Life of Mahomet by Sir William Muir, Vol. I, London, 1858, p. 238–239.
  3. 3देखें Mohammed and Mohammedanism (London, 1876) p. 105 by Bosworth Smith.