अध्याय दो

मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अरब प्रायद्वीप में क्यों पैदा हुए?

विधि का विधान था कि इंसानियत की मुक्ति और उन्हें रास्ता दिखाने का यह सूरज, जिससे दुनिया में रोशनी फैली, अरब प्रायद्वीप के आसमान में उगे, जो उस वक़्त दुनिया का सबसे अंधेरा क्षेत्र था और जिसको इस तेज़ रोशनी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।

अरबों का चयन क्यों?

अल्लाह पाक ने इस दावत के लिए अरबों का चयन इसलिए किया और उनको पूरी दुनिया में इसके प्रचार-प्रसार का ज़िम्मेदार बनाया कि उनके दिलों की पाटी (तख़्ती) बिल्कुल साफ़ थी। उसमें पहले से कुछ न था, जिनको मिटाना कठिन होता। उनके मुक़ाबले में रूमियों, ईरानियों या हिन्दुस्तानियों के जिनको अपने विकास, कला-कौशल, सभ्यता व संस्कृति और दर्शनशास्त्र पर बहुत गर्व था, और इसकी वजह से उनके अन्दर कुछ ऐसी मनोवैज्ञानिक गुत्थियां तथा मानसिक उलझनें पैदा हो गई थीं जिनका दूर करना आसान न था। अरबों के दिल व दिमाग़ की सादा तख़्तियां सिर्फ़ उन मामूली और हल्के-फुल्के लेखों को जानती थीं जिनको उनकी अज्ञानता, निरक्षरता और बदवी जीवन (घुमक्कड़) ने उनमें लिख दिया था, और जिनका धोना व मिटाना और उनकी जगह पर नया लेख लिखना बहुत आसान था। वर्तमान ज्ञान की शब्दावली में वह “सहज अज्ञानता” का शिकार थे, और यह वह ग़लती है जिसको आसानी से सुधारा जा सकता है। दूसरी सभ्य और विकसित क़ौमें “यौगिक अज्ञानता” से घिरी थीं, जिसका इलाज और उसे मिटाकर नए अक्षर लिखने का काम हमेशा बहुत कठिन होता है।

सहज स्वभाव और पक्का इरादा

यह अरब अपने मूल स्वभाव पर थे, मज़बूत और पुख़्ता इरादे के मालिक थे। अगर हक़ बात (सत्य) उनकी समझ में न आती तो वह उसके ख़िलाफ़ तलवार तक उठाने में संकोच न करते और हक़ खुलकर सामने आ जाता तो वह उससे जी-जान से अधिक मुहब्बत करते, उसको गले लगाते और उसके लिए जान तक देने में भी नहीं हिचकते थे।

अरबों की इस हालत की झलक सुहैल बिन अम्र1 के उन शब्दों में मिलती है जो हुदैबिया का समझौता लिखते वक़्त उनकी ज़बान से निकले। समझौते के शुरुआती शब्द यह थे: “यह वह है जिसका फ़ैसला मुहम्मद रसूलुल्लाह ने किया।” उन्होंने कहा, “वल्लाह! अगर हम यह जानते और मानते कि आप अल्लाह के रसूल हैं तो न आपको अल्लाह के घर से रोकते, न आपसे लड़ाई करते।”

यह हालत इक्रमा बिन अबी जहल के शब्दों में भी झलक रही है। जब यरमूक की लड़ाई अपनी चरम सीमा पर थी और इक्रमा पर बड़ा दबाव पड़ रहा था। जब रूमी चढ़ाई करते हुए इक्रमा की तरफ़ बढ़े तो उन्होंने उनको ललकार कर कहा कि “अक़्ल के दुश्मनो! (जब तक बात मेरी समझ में नहीं आई) मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मुक़ाबले में हर जगह डटा रहा, आज मैं तुमसे भागूंगा?” फिर उन्होंने पुकार कर कहा कि “है कोई जो मौत पर मुझसे बैअत2 (शपथ ले) करे?” कुछ लोग आए और बैअत की, फिर वह आगे बढ़कर लड़ने लगे, यहां तक कि ज़ख़्मी हुए और शहादत पाई।3

सच्चाई और वादे की पाबन्दी

यह अरब बड़े सच्चाई पसंद, गम्भीर, सज्जन, साफ़ बात करने वाले, कड़े मेहनती और पुरुषार्थी थे। वह न दूसरों को धोखा देते थे, न अपने को धोखे में रखना पसन्द करते थे। सच्ची और पक्की बात के आदी, बात की लाज रखने वाले और पक्के इरादे के मालिक थे। इसकी एक ज़िंदा मिसाल बैअत उक़बा-ए-सानिया में हमें नज़र आती है, जिसके बाद ही मदीना तय्यबा हिजरत की शुरुआत हुई।

इब्ने इसहाक़ बयान करते हैं कि जब औस व ख़ज़रज4 अक़बा में रसूलुल्लाह सल्ल० से बैअत करने के लिए जमा हुए तो अब्बास बिन उबादा अल-ख़ज़रजी ने अपनी क़ौम को सम्बोधित करते हुए कहा:

“ऐ ख़ज़रज वासियो! क्या तुम्हें मालूम है कि तुम हुज़ूर सल्ल० से किस चीज़ पर बैअत कर रहे हो?” उन्होंने जवाब दिया, “हां!” कहने लगे कि “तुम इनसे अहमर व असवद हर तरह के लोगों से जंग पर बैअत कर रहे हो (अर्थात बहुत बड़ी संख्या और विभिन्न प्रकार के लोगों से)। अगर तुम ऐसा सोचते हो कि तुम्हारे माल लूट लिए जाएंगे और तबाह व बर्बाद कर दिए जाएंगे, तुम्हारे क़बीले के शरीफ़ और सरदार क़त्ल कर दिए जाएंगे, तो तुम इनको दुश्मनों के हवाले करके अलग हो जाओगे। अगर ऐसा है तो अभी इस बात को ख़त्म कर दो। इसलिए कि अगर तुमने ऐसा किया तो वल्लाह दुनिया व आख़िरत दोनों जगह की रुसवाई (अपमान) है, और अगर तुम्हारा फ़ैसला यह है कि जिस चीज़ के लिए तुमने इनको बुलाया है उसको पूरा करोगे, चाहे तुम्हारा सारा माल व दौलत तहस-नहस हो जाए और तुम्हारे शरीफ़ और सरदार क़त्ल कर दिए जाएं, तो अपना हाथ इनके हाथ में दो। इस समय इसमें अल्लाह की क़सम दुनिया व आख़िरत दोनों जगह की कामयाबी व भलाई है।”

उन लोगों ने जवाब दिया कि “माल व दौलत की तबाही और सरदारों के क़त्ल, हर चीज़ पर हम आपसे बैअत करते हैं। लेकिन ऐ अल्लाह के रसूल! अगर हमने यह इरादा पूरा किया तो इसका बदला क्या मिलेगा?” आप सल्ल० ने फ़रमाया, “जन्नत।” कहने लगे, “हाथ बढ़ाइए।” आपने अपना मुबारक हाथ आगे किया और उन सबने आपसे बैअत की।5

और सच्चाई यह है कि उन्होंने इस वादे को, जिस पर आप सल्ल० से बैअत की थी, पूरा किया। हज़रत साद बिन मुआज़ रज़ि० ने अपने मशहूर वाक्य में इन सबकी भावनाओं को बयान किया था। उन्होंने कहा था कि “अल्लाह की क़सम! अगर आप चलते-चलते बर्कुल-ग़िमाद6 तक पहुंच जाएंगे तब भी हम आपके साथ चलते रहेंगे, अगर आप समुद्र को पार करना चाहेंगे तो हम आपके साथ समुद्र में कूद जाएंगे।”

वह धुन के पक्के व इरादे के सच्चे थे। काम में उनकी लगन और हक़ के सामने सिर झुका देने का पता उस वाक्य से भी मिलता है जो इस्लामी फ़ौज के मशहूर सेनापति उक़बा बिन नाफ़े रज़ि० ने कहा था। जब उनकी विजय के रास्ते में अटलांटिक महासागर की वजह से रुकावट पैदा हुई तो उन्होंने कहा, “ख़ुदाया! यह महासागर रास्ते में है, वरना जी चाहता है कि बराबर आगे बढ़ता जाऊं और जल-थल में तेरे नाम का डंका बजा दूं।”

सभ्यता की बीमारियों से सुरक्षित

इसके विपरीत यूनान, रोम और ईरान के लोग दुनियादारी और हवा के रुख़ पर चलने के आदी थे। अन्याय व ज़ुल्म के ख़िलाफ़ वह आवाज़ नहीं उठा सकते थे। किसी आदर्श व किसी सिद्धान्त में उनके लिए कोई दिलचस्पी न थी। कोई दावत व अक़ीदा (आस्था व विश्वास) उनके विचारों और भावनाओं में इस तरह रच-बस नहीं पाता था कि वह उसके लिए दुनियादारी और भोग-विलास सब कुछ की बाज़ी लगा दें।

सभ्यता व संस्कृति और भोग-विलास व आरामतलबी की पैदा की हुई इन तमाम बीमारियों और ख़राबियों से अरब बचे हुए थे। इन बीमारियों का इलाज बड़ा कठिन होता है और यह ईमान और अक़ीदा की राह में हमेशा रुकावट डालती हैं और आम तौर पर आदमी के पैरों में बेड़ियां डाल देती हैं। अरब वासियों के अन्दर सच्चाई भी थी, ईमानदारी भी और बहादुरी भी। उनकी प्रवृत्ति दोहरी नीति व साज़िश को पसन्द न करती। उनमें वह सभी गुण थे जो दुनिया में कोई महान काम करने वाली क़ौम के लिए ज़रूरी होते हैं, ख़ासकर उस समय जब लड़ाइयों का युग हो तब बहादुरी का आम चलन हो। अरब जी-जान से लड़ने वाले, घोड़े की पीठ पर ज़्यादा समय बिताने वाले, मज़बूत सुरक्षात्मक शक्ति और सहनशीलता के मालिक, सरल जीवन के आदी, घुड़सवारी और युद्धकला के रसिया थे।

दूसरी बात यह है कि उनकी सोच-विचार की ताक़त और पैदाइशी क्षमताएं सुरक्षित थीं, और दार्शनिकों की निरर्थक तार्किक बहसों और बाल की खाल निकालने तथा वार्तालाप के गूढ़ व संवेदनशील विषयों अथवा स्थानीय या क्षेत्रीय गृह-युद्धों में बर्बाद नहीं हुई थीं। यह एक नई उभरी “सुरक्षित” क़ौम थी जो जीवन की गर्मी, जोश और उल्लास, आकांक्षा और पक्के इरादे से भरपूर थी।

आज़ादी और स्वाभिमान

आज़ादी व समता की भावना, क़ुदरती दृश्यों से लगाव तथा सादगी अरब क़ौम की घुट्टी में पड़ी थी। उसे कभी किसी विदेशी सत्ता के सामने झुकना नहीं पड़ा था। यह क़ौम ग़ुलामी और एक इंसान के दूसरे इंसान पर हुक्म चलाने के मतलब को नहीं जानती थी। उसको ईरानी व रूमी साम्राज्यों के घमंड, मानव और इंसानियत को तिरस्कार की नज़र से देखने का भी अनुभव नहीं हुआ था।

ईरान के बादशाह

इसके विपरीत ईरानी बादशाह (जो अरब प्रायद्वीप के पड़ोस में थे) अलौकिक व्यक्ति समझे जाते थे। अगर ईरानी बादशाह का ऑपरेशन होता या उसे कोई दवा दी जाती तो राजधानी में एलान कर दिया जाता कि आज बादशाह सलामत के फोड़े का ऑपरेशन हुआ है या दवा दी गयी है। इस एलान के बाद शहर में न कोई पेशेवर अपने पेशे में व्यस्त होता और न कोई सरकारी दरबारी आदमी कोई काम कर सकता था।7 अगर उसको छींक आती तो उसके लिए किसी को दुआ शब्द कहने का हक़ नहीं था। वह ख़ुद दुआ करता तो कोई आमीन (अल्लाह करे ऐसा ही हो) भी नहीं कह सकता था। अगर वह अपने मंत्रियों व अमीरों में किसी के घर जाता तो वह दिन बहुत असाधारण और अहम समझा जाता और उस दिन ख़ानदान की नई जंत्री शुरू होती और पत्रों में नई तारीख़ डाली जाती। एक निर्धारित समय के टैक्स माफ़ कर दिए जाते और उस व्यक्ति को अनेक पुरस्कार, पदवियां और माफ़ियां व तरक़्क़ियां मिलतीं, सिर्फ़ इसलिए कि बादशाह ने उसके घर आकर उसका गौरव बढ़ाया है।8

यह सम्मान व शिष्टाचार उन औपचारिकताओं के अलावा था जिनका पालन करना राज्य के कर्मचारियों, दरबारियों और दूसरे सभी लोगों के लिए ज़रूरी था, जैसे उनके सामने हाथ बान्धे खड़ा रहना9 (यानी सीने पर हाथ रखकर आदर के साथ सिर झुका देना)। उनके सामने अदब के साथ इस तरह खड़ा रहना जिस तरह नमाज़ में कोई अल्लाह के सामने खड़ा होता है। यह हाल ख़ुसरो प्रथम (531 से 579) के शासन काल का है, जो दुनिया में नौशेरवाने आदिल के नाम से मशहूर है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि ईरान के उन बादशाहों का क्या हाल होगा जो ज़ुल्म व अत्याचार के लिए दुनिया में मशहूर थे।

अपनी बात कहने की आज़ादी (न कि आलोचना) बड़े ईरानी साम्राज्य में लगभग ख़त्म थी। तिबरी ने इस सम्बन्ध में नौशेरवाने आदिल की एक रोचक कहानी लिखी है, जिससे हमें अन्दाज़ा होता है कि ईरानी साम्राज्य में विचारों को प्रकट करने पर कितनी सख़्त पाबन्दी थी और शाही दरबार में मुंह खोलने की क्या क़ीमत चुकानी पड़ती थी। इस घटना को “ईरान ब अहदे सासानियान” के लेखक ने तिबरी के हवाले से लिखा है:

उसने सलाहकारों की एक बैठक बुलाई और कर के सचिव को आदेश दिया कि लगान की नई दरें तेज़ आवाज़ में पढ़कर सुनाए। जब वह पढ़ चुका तो ख़ुसरो ने दो बार मौजूद लोगों से पूछा कि किसी को कोई आपत्ति तो नहीं है? सब चुप रहे। जब बादशाह ने तीसरी बार यही सवाल किया तो एक व्यक्ति खड़ा हुआ और अदब से पूछने लगा, “क्या बादशाह यह चाहते हैं कि जल्द बर्बाद होने वाली चीज़ों पर स्थायी कर लगाया जाए, जो हमें अन्याय की तरफ़ ले जाएगा?” इस पर बादशाह ललकार कर बोला, “ऐ गुस्ताख़! तू किन लोगों में से है?” उसने जवाब दिया कि “मैं सचिवों में से हूं।” बादशाह ने हुक्म दिया कि इसको क़लमदानों से पीट-पीट कर मार डालो। इस पर एक सचिव ने अपने क़लमदान से उसको मारना शुरू किया, यहां तक कि वह बेचारा मर गया। इसके बाद सबने कहा, “ऐ बादशाह! जितने टैक्स तूने हम पर लगाए हैं, वह हमारे विचार से सब न्याय पर आधारित हैं।”

हिन्दुस्तान और रोम

हिन्दुस्तान में अछूतों के प्रति तिरस्कार और निरादर की जो भावना फैली थी, वह सोच से परे है। विजयी आर्यों और देश के क़ानून ने उनको बहुत ही गिरे हुए जीव का दर्जा दिया था। अछूत, पालतू जानवरों से सिर्फ़ इस बात में भिन्न थे कि वे दो पैरों पर चलते थे और आदमियों जैसी शक्ल रखते थे। क़ानून में यह बात लागू थी कि अगर कोई शूद्र किसी ब्राह्मण को नुक़सान पहुंचाने के लिए हाथ या लाठी उठाए तो उसका हाथ काट दिया जाए। अगर वह, यह दावा करे कि वह ब्राह्मण को शिक्षा दे सकता है तो उसको खौलता हुआ तेल पिलाया जाए।10 इस क़ानून के अनुसार कुत्ते या बिल्ली, मेंढक, गिरगिट, कौआ, उल्लू तथा अछूत वर्ग के किसी व्यक्ति के क़त्ल की सज़ा बराबर थी।11

इंसानियत को अपमानित करने में रोम और ईरान वासी हिन्दुस्तानियों के हालांकि समकक्ष न थे, लेकिन लगभग उनके समान ही थे। यूरोप के एक इतिहासकार विक्टर शापो (Victor Chapot) ने अपनी किताब The Roman World के पृ० 418 पर लिखा है:

क़ैसर माबूद (पूज्य) समझे जाते थे। यह बात ख़ानदानी उत्तराधिकार के तौर पर न थी, बल्कि जो भी राजगद्दी पर बैठता उसे ख़ुदा मान लिया जाता था, भले ही उसमें इस पद की गरिमा के अनुकूल कोई निशानी न पायी जाती हो। अगस्टस की राज्य-पदवी एक राजा से दूसरे राजा को क़ानून के अनुसार हस्तान्तरित नहीं होती थी, बल्कि रोम की राज्य-सभा को ताक़त के बल पर जारी किए गए हर आदेश को अनुमोदन देने के अलावा और कुछ न करना पड़ता था।

अरबों का स्वाभिमान

अगर इसकी तुलना इस्लाम के आने से पहले, आज़ादी के मतवाले, आदर व सम्मान में बीच का रास्ता अपनाने वाले स्वाभिमानी अरबों से की जाए तो दोनों की हालत, अरबी व अजमी समाज का फ़र्क़ साफ़ हो जाएगा। अरब कभी-कभी अपने बादशाहों को “अबैतल्लअन” (आप बुराई से सुरक्षित रहें) “इम सबाहन” (आप अच्छी तरह सुबह करें) जैसे शब्द कहते थे। अरबों में आज़ादी व स्वाभिमान की इतनी ज़्यादा भावना थी कि वह अपने सरदारों और शासकों की कुछ मांगों और फ़रमाइशों को पूरा करने से भी कभी-कभी मना कर देते थे। इस बारे में इतिहास में यह रोचक घटना आती है कि एक अरब बादशाह ने बनी तमीम क़बीले के एक व्यक्ति से एक घोड़ी, जिसका नाम “सकाब” था, मांगी तो उसने घोड़ी देने से साफ़ इन्कार कर दिया और कविता के माध्यम से कहा, “ऐ बादशाह! यह बहुत क़ीमती और नफ़ीस घोड़ी है, न इसे भेंट दिया जा सकता है न इसे बेचा जा सकता है। इसे हासिल करने की आप कोशिश न करें। आपसे इसकी रक्षा करने का मुझमें बल है।”

आज़ादी, आत्म-सम्मान, सद्‌गुण, शराफ़त और हौसलामन्दी की भावना जनता के हर वर्ग में मौजूद थी तथा स्त्री-पुरुष दोनों में पायी जाती थी। इसका नमूना हमें हीरा के राजा अम्र बिन हिन्द के क़त्ल की घटना में दिखाई देता है। इस घटना को अरब इतिहासकारों ने इस तरह बयान किया है कि अम्र बिन हिन्द ने मशहूर अरब शहसवार (घुड़सवार) और शायर अम्र बिन कुलसूम की दावत की और इच्छा जतायी कि उसकी मां बादशाह की मां के साथ दावत में शामिल हो। अम्र बिन कुलसूम क़बीला बनू तग़लिब के कुछ ज़िम्मेदारों के साथ जज़ीरा से हीरा की तरफ़ चला और उसकी मां लैला बिन्त मुहलहिल भी क़बीले की कुछ औरतों के साथ आयी। अम्र बिन हिन्द का डेरा हीरा और फ़ुरात के बीच लगाया गया। एक डेरे में अम्र बिन हिन्द ने अम्र बिन कुलसूम के स्वागत का बंदोबस्त किया और दूसरे ख़ेमे में हिन्द और लैला जमा हुईं।

अम्र बिन हिन्द ने अपनी मां से पहले ही कह दिया था कि जब खाना लग जाए तो थोड़ी देर के लिए नौकरों को हटाकर लैला से काम लेना। अतः ऐसा ही हुआ। जब खाना लगाया जा चुका तो हिन्द ने (नौकरों को हटाकर) लैला से कहा, “बहन! ज़रा यह तबाक़ (थाल) तो मुझे उठा दो।” लैला ने जवाब दिया, “जिसको ज़रूरत हो, वह ख़ुद उठाए।” जब हिन्द ने दोबारा ज़ोर देकर कहा तो लैला चिल्ला उठी, “हाय! क्या अपमान की बात है! बनू तग़लिब के सपूतो!” मां के यह शब्द सुनकर अम्र बिन कुलसूम आग-बबूला हो उठा। उसने लपक कर अम्र बिन हिन्द की तलवार, जो सामने लटक रही थी, उठायी और उसका काम तमाम कर दिया। इसके साथ बनू तग़लिब ने ख़ेमा लूट लिया और जज़ीरा की तरफ़ वापस आ गए। इसी घटना पर अम्र बिन कुलसूम ने वह मशहूर क़सीदा कहा जिसकी गिनती “सबआ मुअल्लक़ात” (सात झूलती कविताएं) में की जाती है।

इसी तरह जब मुग़ीरा बिन शोबा रज़ि० मुसलमानों के दूत बनकर रुस्तम के दरबार में गए तो वह अपनी शान व शौकत के साथ अपने राज-तख़्त पर बैठा था। मुग़ीरा बिन शोबा रज़ि० अरबों की आदत के अनुसार उसी के साथ उसके सिंहासन पर गाव-तकिया के पास बैठ गए। रुस्तम के दरबारी मुग़ीरा बिन शोबा रज़ि० पर टूट पड़े और उनको नीचे उतार लाए। इस पर मुग़ीरा बिन शोबा रज़ि० ने कहा:

हमने तो सुना था कि तुम लोग बहुत अक़्लमंद हो, लेकिन मुझे तुमसे ज़्यादा मूर्ख कोई नज़र नहीं आता। हम अरब तो सबसे बराबरी का सुलूक करते हैं। हममें से, लड़ाई के मैदान को छोड़कर, कोई किसी को ग़ुलाम (दास) नहीं बनाता। मेरा अनुमान था कि तुम भी इसी तरह अपनी क़ौम से बराबरी का व्यवहार करते होगे। अच्छा यह था कि तुम मुझे पहले बता देते कि तुमने आपस में एक-दूसरे को ख़ुदा बना रखा है और यह बात तुम्हारे साथ तय न हो सकेगी। उस दशा में हम तुमसे यह बर्ताव नहीं करते और न तुम्हारे पास आते, लेकिन तुमने हमें ख़ुद बुलाया है।12

काबा और हज़रत इब्राहीम की दुआ

अरब प्रायद्वीप में आख़िरी नबी सल्ल० के पैदा होने की दूसरी वजह अरब के मक्का शहर में काबा का होना था, जिसको हज़रत इब्राहीम व हज़रत इस्माईल अ० ने इसलिए बनाया था कि एक अल्लाह की इबादत की जाए और यह जगह सदा के लिए तौहीद की दावत (बुलावा) का केन्द्र बने। सूरह आले इमरान की आयत 96 में है:

बाइबिल में “बका की घाटी”

बाइबिल में इतने संशोधन के बाद भी “वादी-ए-बका” का शब्द आज तक मौजूद है, लेकिन अनुवादकों ने इसको “वादी-ए-बुका” बना दिया है, अर्थात “दुख की घाटी”। मज़ामीर दाऊद के शब्दों का अनुवाद इस तरह है:

मुबारक है वह इंसान जिसमें ताक़त तुझसे है, उनके दिल में तेरी राहें हैं, वह बुका की घाटी से गुज़रते हुए इसे एक कुआं बनाते।

किताब मुक़द्दस

लेकिन यहूदी विद्वानों को बाद में इस ग़लती का अहसास हुआ। इसलिए Jewish Encyclopedia में है कि वह एक विशिष्ट घाटी है जिसमें पानी न मिलता था, और जिसने यह लिखा है उसके मन में एक ऐसी घाटी की तस्वीर थी जिसकी विशिष्ट दशाएं थीं। इस बारे में अंग्रेज़ी के अनुवादकों ने अरबी के अनुवादकों की अपेक्षा अधिक सावधानी बरती है। उन्होंने “बका” शब्द को वैसा ही लिखा है जैसा वह मूल रूप से था:

“Blessed is the man whose strength is in thee; in whose heart are the ways of them. Who passing through the valley of Baca make it a well.”

Psalm 84:5–6

अनुवाद: “मुबारकबाद है उन लोगों को जिनकी इज़्ज़त व ताक़त तेरे साथ है, जिनके दिलों में तेरे रास्ते हैं, जो ‘बका’ की घाटी से गुज़रते हुए उसको एक कुआं बनाएंगे।”

इब्राहीम अ० की दुआ और तौरेत की बशारत

हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्ल० का अभ्युदय हज़रत इब्राहीम व हज़रत इस्माईल अ० की दुआ के नतीजे में हुआ जो उन्होंने काबा की बुनियाद रखते समय मांगी थी, और जो इस तरह है:

अल्लाह अपने भक्तों की दुआएं ज़रूर क़ुबूल करता है। नबियों का स्थान तो भक्तों से कहीं अधिक ऊंचा है। तौरेत में आया है कि:

और इस्माईल के हक़ में मैंने तेरी सुनी। देख, मैं इसे बरकत दूंगा और इसे बहुत बढ़ाऊंगा। इससे बारह सरदार पैदा होंगे और मैं इसे बड़ी क़ौम बनाऊंगा।

हज़रत मुहम्मद सल्ल० अपने बारे में फ़रमाया करते थे कि “मैं इब्राहीम अ० की दुआ और ईसा अ० की बशारत हूं।” तौरेत में है कि:

ख़ुदावन्द! तेरा अल्लाह तेरे लिए तेरे ही बीच से, तेरे ही भाइयों में से, मेरी तरह एक नबी बरपा करेगा। तुम उसकी तरफ़ कान धरियो।

“तेरे ही भाइयों” का शब्द स्वयं बता रहा है कि इसका मतलब बनी इस्माईल से है, जो बनी इस्राईल के चचेरे भाई थे। कुछ आगे फिर लिखा है कि:

और ख़ुदावन्द ने मुझे कहा कि उन्होंने जो कुछ कहा सो अच्छा कहा। मैं उनके लिए उनके भाइयों में से तुझ-सा एक नबी बरपा करूंगा और अपना कलाम उसके मुंह में डालूंगा, और जो कुछ मैं उसे फ़रमाऊंगा वह सब उनसे कहेगा।

“अपना कलाम उसके मुंह में डालूंगा” के शब्द निश्चित रूप से हज़रत मुहम्मद सल्ल० की तरफ़ इशारा करते हैं, क्योंकि आप ही वह अकेले नबी हैं जिन पर अल्लाह का कलाम (ईशवाणी) एक-एक अक्षर उतरा हुआ और अल्लाह पाक ने इसका एलान भी फ़रमाया:

दूसरी जगह आता है:

इसके विपरीत बनी इस्राईल के नबियों के सहीफ़े इसका बिल्कुल दावा नहीं करते कि वह भाव व शब्द दोनों तरह से अल्लाह का कलाम है, उनके विद्वान भी उसको नबियों से जोड़ने में तकल्लुफ़ से काम नहीं लेते। Jewish Encyclopedia में आता है कि:

किताब-ए-मुक़द्दस (Old Testament) की पहली पांच किताबें (जैसा कि प्राचीन यहूदी धार्मिक परम्पराएं हमें बताती हैं) मूसा अ० की जमा की हुई हैं। आख़िरी आठ आयतों को छोड़कर (जिनमें मूसा अ० के देहान्त की घटनाएं बयान की गयी हैं) रब्बी (यहूदी विद्वान) इस विरोधाभास तथा एक-दूसरे से भिन्न परम्पराओं पर ग़ौर करते हैं जो इन सहीफ़ों में आयी हैं और इसमें अपनी अक़्ल से सुधार करते रहते हैं।

Vol. 9, p. 589

जहां तक New Testament का सवाल है, वह न शब्दों से और न ही भाव से ईशवाणी है। असल में यह जीवनी की किताबें ज़्यादा मालूम होती हैं, ईशवाणी कम।

अरब प्रायद्वीप की भौगोलिक स्थिति

अरब प्रायद्वीप की भौगोलिक स्थिति दीन की दावत के लिए सबसे ज़्यादा अनुकूल है, जहां से दीन का पैग़ाम सारी दुनिया को पहुंचाया जा सकता है। यह एक तरह से एशिया, अफ़्रीका और यूरोप महाद्वीप के मिलन-केन्द्र के क़रीब है, और इसके निकटवर्ती क्षेत्र हमेशा मानव सभ्यता व संस्कृति का केन्द्र रहे हैं और जहां शक्तिशाली एवं विशाल साम्राज्य स्थापित हुए। जहां से विभिन्न दिशाओं में व्यापारिक मार्ग जाते थे, और यह इलाक़ा कारोबार करने वाले क़ाफ़िलों के लिए बड़ा महत्व रखता था।14

यह क्षेत्र दो शक्तिशाली लेकिन एक-दूसरे के कट्टर विरोधी राज्यों के बीच स्थित था: एक तरफ़ पूरब में सासानी हुकूमत थी, दूसरी तरफ़ पश्चिम में बाज़नतीनी ईसाई हुकूमत, और ये दोनों ताक़तें एक-दूसरे से लड़ती रहती थीं, लेकिन इस पर भी अरब प्रायद्वीप ने अपनी आज़ादी और अपने व्यक्तित्व की हमेशा रक्षा की, और अपने कुछ सीमान्त क्षेत्रों और कुछ क़बीलों को छोड़कर वह कभी इन ताक़तों के अधीन नहीं रहा। यह इलाक़ा एक विश्वव्यापी दावत के लिए सबसे उचित था, जो हर तरह के राजनीतिक दबाव से आज़ाद था और मानवता के सन्देश का उचित केन्द्र बन सकता था।

इन सब कारणों से अल्लाह ने अरब में मक्का का चयन हज़रत मुहम्मद सल्ल० के अभ्युदय, आसमानी ‘वह्य’ के उतारने और इस्लाम के विश्वव्यापी प्रचार के लिए पहले केन्द्र के रूप में किया।

टिप्पणियां

  1. 1अरब में सन्तान के नाम के साथ पिता का नाम जोड़ने का चलन है। “बिन” या “इब्न” का मतलब होता है “बेटा”, यानी अम्र के बेटे सुहैल। बेटी के लिए “बिन्त” लिखते हैं।
  2. 2हाथ में हाथ देकर वादा (शपथ) करना।
  3. 3तारीख़ तिबरी, भाग 4, पृ० 36 देखें।
  4. 4अरब के क़बीलों के नाम।
  5. 5सीरत इब्ने हिशाम, भाग 1, पृ० 446 (दूसरा संस्करण)।
  6. 6बर्कुल-ग़िमाद के बारे में विभिन्न कथनों में एक कथन यह है कि वह यमन का कोई बहुत दूर स्थित इलाक़ा है। सुहैली कहते हैं कि इसका मतलब हबश से है। कहने का मतलब यह है कि अगर आप बहुत दूर तक जाएंगे तो भी हम साथ न छोड़ेंगे।
  7. 7देखें “ईरान ब अहदे सासानियान”, पृ० 535–536।
  8. 8देखें “ईरान ब अहदे सासानियान”।
  9. 9इसके लिए अरबी में एक मुहावरा बन गया था, कहते थे, “कफ़्फ़र फ़ुलां”, अर्थात झुकते हुए अपना हाथ सीने पर रखकर सादर सिर झुका दिया। यह ईरान की आम प्रथा थी और वहीं से यह शब्दावली निकली, और अरबी के शब्दकोश में दाख़िल हुई है। लिसानुल अरब में है कि “कुफ़्र” का मतलब है ईरानी का अपने बादशाह के प्रति सम्मान करना। लिखा है कि जैसे कोई देहाती किसान अपने मुखिया के सामने सीने पर हाथ रखकर अदब से अपना सिर झुका देता है। (लिसानुल अरब, खण्ड 7, पृ० 466)
  10. 10मनुशास्त्र, अध्याय 10।
  11. 11आर० सी० दत्त।
  12. 12तारीख़ तिबरी, भाग 4, पृ० 108।
  13. 13अरबी ज़बान में “मीम” और “बे” में आम तौर पर अन्तर नहीं किया जाता है, जैसे “लाज़िम” और “लाज़िब”, और “मलीत” और “बलीत” समान अर्थ रखते हैं। देखें “तफ़्सीर-ए-माजिदी”, लेखक मौलाना अब्दुल माजिद दरियाबादी, और “रहमतुल-लिल-आलमीन”, लेखक क़ाज़ी सुलैमान मंसूरपुरी।
  14. 14डा० हुसैन कमालुद्दीन ने, जो रियाद विश्वविद्यालय के इन्जीनियरिंग कालेज में सिविल इन्जीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष हैं, अपने एक प्रेस इन्टरव्यू में, जो उन्होंने काहिरा के “अल-अहराम” के संवाददाता को जनवरी 1977 में दिया, बताया कि उन्होंने एक नई भौगोलिक खोज की है, जिससे यह साबित होता है कि थल भाग में मक्का भूतल के बीचो-बीच स्थित है। उन्होंने यह शोधकार्य एक ऐसे कम क़ीमत वाले उपकरण की तैयारी के बारे में किया जिससे दुनिया के विभिन्न भागों में काबा की सही दिशा तय की जा सके।