अध्याय अट्ठाईस

जग के मोहसिन

छठी शताब्दी ई० में पूरी मानवता आत्महत्या करने पर तुली ही नहीं, बल्कि कमरबस्ता नज़र आती है, जैसे उसने आत्महत्या करने की क़सम खाई हो। अल्लाह ने इस हालत को क़ुरआन पाक में इस तरह बयान किया है:

इतिहासकार और सीरत लिखने वाले अज्ञानता के उस दौर की सही तस्वीर पेश करने में असमर्थ रहे हैं, क्योंकि साहित्य व शब्दकोष उनका साथ नहीं देते। हालत इतनी संगीन और भयानक थी कि लेखनी उसका असल नक़्शा पेश करने का सामर्थ्य नहीं रखती। इतिहासकार इसका हक़ कैसे अदा कर सकते हैं। अज्ञानता के दौर में, जिसमें अल्लाह के रसूल सल्ल० आए, क्या एक या दो क़ौमों के बिगाड़ और पतन की समस्या थी? ख़ाली बुतपरस्ती का मामला था? नैतिक अपराधों की समस्या थी? मदिरापान, जुआबाज़ी, भोग-विलास, अधिकारों के हनन, अत्याचार व अन्याय, आर्थिक शोषण, जाबिर हुकूमतों, ज़ुल्म वाली व्यवस्था और अन्यायपूर्ण क़ानून का मामला था? क्या समस्या यह थी कि किसी देश में बाप अपनी नवजात बच्ची को ज़िन्दा गाड़ देता था? समस्या यह नहीं थी कि अरब के कुछ पत्थरदिल इन्सान अपनी मासूम बच्चियों को झूठी शर्म और काल्पनिक अपमान से बचने के लिए, एक अपने बनाए हुए डर और ज़ुल्म के चलन की वजह से, अपने हाथों ज़मीन में ज़िन्दा दफ़न कर देना चाहते थे। समस्या यह थी कि यह दुनिया अपनी पूरी नस्ल को ज़िन्दा दफ़न करना चाहती थी।

समस्या किसी एक देश या क़ौम की भी नहीं थी। समस्या इंसानियत की क़ीमत की थी, मानव जाति के भविष्य की थी। अगर कोई कलाकार ऐसी तस्वीर पेश करे जिसमें दिखाया गया हो कि मानव जाति का नेतृत्व एक इन्सान कर रहा है, एक सुन्दर प्रतिभा, एक स्वस्थ व बलवान शरीर जो ईश्वर की रचना का बेहतरीन नमूना है, जिससे आदम का नाम ज़िन्दा और उसका सिलसिला क़ायम है, जिसे फ़रिश्ते हसद व जलन की निगाह से देखते हैं, जिसके लिए सृष्टि की रचना की गई, जिसके सर पर अल्लाह ने बादशाहत का ताज रखा और जिसकी वजह से यह ज़मीन वीरान होने के बजाए गुलज़ार व हरी-भरी है। इस इन्सान के सामने आग का एक समुद्र है, एक बहुत ही भयानक ख़न्दक़ (खाई) है जिसकी कोई थाह नहीं। वह इन्सान इसमें छलांग लगाने के लिए तैयार खड़ा है, उसके पैर उठ चुके हैं और कूदने ही वाला है, एक पल की देर है कि वह उसके अंधेरों में ग़ायब हो जाएगा। अगर उस युग की ऐसी तस्वीर खींची जाए तो कुछ हद तक उस हालत का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है जो आप सल्ल० के अभ्युदय के समय छठी शताब्दी ई० में पाई जाती थी, और इसी सच्चाई को बयान करने के लिए फ़रमाया गया है:

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इसी बात का एक उदाहरण देकर बयान किया है। आपने फ़रमाया, “मेरी इस दावत व हिदायत का उदाहरण, जिसके साथ मुझे दुनिया में भेजा गया है, ऐसा है जैसे एक व्यक्ति ने आग जलाई। जब उसकी रोशनी आस-पास फैली तो वह परवाने और कीड़े जो आग पर गिरा करते हैं, हर तरफ़ से उमड़कर उसमें कूदने लगे। इसी तरह से तुम आग में गिरना और कूदना चाहते हो, और मैं तुम्हारी कमर पकड़कर तुमको उससे बचाता और अलग करता हूं।”

असल में समस्या यही थी कि इन्सानियत की नौका को सलामती के साथ पार लगाया जाए। जब इन्सान अपने सही मूड में आ जाएगा, जब ज़िन्दगी में संतुलन पैदा हो जाएगा, तो उन सब रचनात्मक, कल्याणकारी, ज्ञानात्मक, साहित्यिक तथा विकास की कोशिशों का दौर आएगा जिनकी क्षमता विभिन्न लोगों और मानवता के हितैषियों में पाई जाती है। असल में पूरी दुनिया पैग़म्बरों की एहसानमन्द है कि उन्होंने मानव जाति को उन ख़तरों से बचा लिया जो उसके सर पर नंगी तलवार की तरह लटक रहे थे। दुनिया का अस्तित्व व विकास पैग़म्बरों की ही कोशिशों का नतीजा है। इन्सानों ने अपने हाव-भाव से कई बार यह एलान किया कि अब उनकी उपयोगिता ख़त्म हो गई और अब वह दुनिया के लिए कोई उपयोगिता नहीं रखते। उन्होंने अपने ख़िलाफ़ अल्लाह की अदालत में ख़ुद नालिश की और गवाही दी। उनकी मिसिल तैयार थी और वह अपने को बड़ी से बड़ी सज़ा, बल्कि मौत की सज़ा का भागीदार साबित कर चुके थे।

जब सभ्यता अपनी सीमा से परे निकल जाती है, जब नैतिक मूल्यों का पतन हो जाता है, जब इन्सान अपनी लालच और लोलुपता को पूरा करने के सिवा हर मक़सद और हर सच्चाई को भुला देता है, जब उसके पहलू में इन्सान के दिल के बजाए चीते-भेड़िये का दिल पैदा हो जाता है, जब उसके शरीर में एक फ़र्ज़ी आमाशय और एक तोड़-फोड़ करने वाली प्रवृत्ति पैदा होती है, जब दुनिया पर जुनून का दौरा पड़ता है, तो क़ुदरत उसको सज़ा देने और उसके जुनून का नशा उतारने के लिए नए-नए नश्तर (Ferule) पैदा करती है।

करती है मुलूकियत अन्दाज़-ए-जुनूं पैदा,
अल्लाह के नश्तर हैं तैमूर हो या चंगेज़।

आप ‘मुलूकियत’ के शब्द को ‘सभ्यता’ से बदल दीजिए, क्योंकि सभ्यता का बिगाड़ ‘मुलूकियत’ (सत्ता) के जुनून से अधिक ख़तरनाक व व्यापक होता है। एक कमज़ोर सा मरीज़ अगर पागल हो जाता है तो मुहल्ले की नींद हराम कर देता है। आप ज़रा सोचिए कि जब इंसानियत पागल हो जाए, जब इंसानियत का मिज़ाज ख़राब हो जाए, तो इसका क्या इलाज है?

अज्ञानता के दौर में सभ्यता सिर्फ़ बिगड़ी ही नहीं थी, उसमें सड़न पैदा हो गई थी, उसमें कीड़े पड़ गए थे। इन्सान-इन्सान का शिकारी बन गया था। उसे किसी इन्सान की तड़प, उसकी कराह में वह मज़ा आने लगा था जो बहुत ही मज़ेदार खानों और मनमोहक दृश्यों में नहीं आता था। आप रोम का इतिहास पढ़ें, जिसकी विजय, सुव्यवस्था, संविधान और सभ्यता के दुनिया में डंके बजे। यूरोप के इतिहासकार ‘लेकी’ ने अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ़ दी यूरोपियन मॉरल्स’ में लिखा है:

“रोमवासियों के लिए सबसे ज़्यादा दिलचस्प, रोचक और मस्त कर देने वाला नज़ारा वह होता था जब आपस में तलवार की लड़ाई या ख़ूंख़ार जानवरों की लड़ाई में हारे हुए और घायल ग्लेडियेटर (तलवार से लड़ने वाला योद्धा) की जान निकल रही होती और उसकी आख़िरी हिचकी आ रही होती। उस समय रोम के ख़ुशबाश और ज़िन्दादिल तमाशाई इस रोचक दृश्य को देखने के लिए एक-दूसरे पर गिर पड़ते, और पुलिस के लिए भी इनको कंट्रोल में रखना संभव न होता।”

रोम में उन दिनों एक खेल प्रचलित था जिसमें मनुष्य के पत्थरदिल होने का इससे ख़राब उदाहरण नहीं मिलता। इस खेल का सम्बन्ध समाज के उच्च वर्ग के लोगों से था। इतिहासकार लेकी ने इन खेलों की लोकप्रियता पर रोशनी डालते हुए लिखा है:

“इस खेल की लोकप्रियता कदापि हैरानकुन नहीं है, क्योंकि आकर्षण के जितने पक्ष इसमें जमा हो गए थे उतने किसी अन्य खेल में न थे। चमचमाता अखाड़ा, गोटे-फटके के कपड़े पहने धनवान लोग, तमाशाइयों की अपार भीड़, उनका जोश, आशाओं बन्धी पूर्ण शान्ति, 80 हज़ार मुखों से एक साथ प्रशंसा की गूंज, शहर क्या शहर के बाहर तक की बस्तियां गूंज उठतीं, लड़ाई का पल-पल रंग बदलते रहना, अद्वितीय हिम्मत का प्रदर्शन, इनमें से हर बात की कल्पना शक्ति को झिंझोड़ने के लिए काफ़ी है।”

इस ज़ुल्म वाले मनोरंजन को रोकने के लिए आदेश जारी किए गए, लेकिन यह बाढ़ इतनी शक्तिशाली थी कि कोई बांध इसे रोक नहीं सकता था।

अस्तु असल समस्या थी कि ज़िन्दगी की चूल अपनी जगह से हट गई थी। इन्सान इन्सान नहीं रह गया था। इन्सानियत का मुक़दमा अपने अंतिम चरण में अल्लाह की अदालत में पेश था। इन्सान अपने ख़िलाफ़ गवाही दे चुका था। इस हालत में अल्लाह ने मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को दुनिया में भेजा, और फ़रमाया:

सच्चाई यह कि क़यामत तक का हर दौर अल्लाह के रसूल सल्ल० की पैग़म्बरी, आह्वान और कामयाब कोशिश के हिसाब में है। आपका पहला काम यह था कि आपने उस तलवार को, जो मानव जाति के सर पर लटक रही थी और किसी भी पल उसके सर पर गिरकर उसका काम तमाम कर सकती, उस तलवार को हटा लिया और उसे वह उपहार दिए जिन्होंने उसे नई ज़िन्दगी, नया हौसला, नई ताक़त, नई इज़्ज़त व नई दिशा प्रदान की, और इनकी बरकत से मानवता, मानव सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान, सच्चाई और प्रेम तथा मानवता के नवनिर्माण का एक युग शुरू हुआ। हम यहां पर आपके उन कुछ एक उपकारों का वर्णन करते हैं जिन्होंने मानव जाति का मार्गदर्शन करने तथा मानवता के उत्थान में बुनियादी और नेतृत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और जिनकी बदौलत एक नई दुनिया ने जन्म लिया।

आपका सबसे बड़ा एहसान (उपकार) यह है कि आपने दुनिया को तौहीद का तोहफ़ा दिया। इससे ज़्यादा क्रांतिकारी, जीवनदायक और युग-प्रवर्तक विश्वास दुनिया को न पहले कभी मिला है और न क़यामत तक कभी मिल सकता है। यह मानव जिसको साहित्य, दर्शनशास्त्र और राजनीति में बड़े-बड़े दावे हैं, और जिसने क़ौमों व देशों को अनेक बार ग़ुलाम बनाया, जल, थल और हवा पर हुकूमत की, पत्थर में फूल खिलाए, पहाड़ों को काटकर दरिया बहाए, और जिसने कभी-कभी ख़ुदाई का दावा भी किया, यह अपने से कहीं अधिक असहाय, निकृष्ट, अचल और अटल, बेजान व मुर्दा और कभी-कभी अपनी बनाई चीज़ों के सामने झुकता था, उनसे डरता और उनकी ख़ुशामद करता था। यह पहाड़ों, दरियाओं, पेड़-पौधों, जानवरों, भूत-प्रेत व शैतानों, चांद व सूरज के सामने नहीं, बल्कि कीड़े-मकोड़ों के सामने नतमस्तक होता था।

उसकी आशाएं इन्हीं से बन्धी होती थीं। वह इन्हीं से डरता था। इसके फलस्वरूप वह कायरता, मानसिक उलझनों, अविश्वास तथा काल्पनिक डर से ग्रसित रहता था। आपने उसको ऐसे शुद्ध एवं सरल तथा जीवनदायक तौहीद की आस्था की शिक्षा दी जिससे वह अल्लाह के अलावा, जो पूरी दुनिया का बनाने वाला है, हर एक से आज़ाद, निडर और निश्चिन्त हो गया। उसमें एक नई शक्ति, नया जोश, नया साहस और नई एकता पैदा हुई। उसने सिर्फ़ अल्लाह को सर्वशक्तिमान, हमारी सभी ज़रूरतों को पूरा करने वाला, लाभ-हानि पहुंचाने वाला समझना शुरू किया। इस नई खोज से उसकी दुनिया बदल गई। वह हर तरह की ग़ुलामी, बन्दगी, बेजा डर तथा हर तरह की खींच-तान से सुरक्षित हो गया। उसे अनेकता में एकता नज़र आने लगी। वह अपने को सबसे अच्छा प्राणी, पूरी दुनिया का सरदार, कर्ता-धर्ता और सिर्फ़ अल्लाह का शासित व आज्ञापालक समझने लगा। इस तरह मानवता की गरिमा व महिमा, जिससे पूरी दुनिया वंचित हो चुकी थी, दोबारा स्थापित हुई।

मुहम्मद सल्ल० के अभ्युदय के बाद चारों तरफ़ से तौहीद की गूंज आने लगी। दुनिया की सारी विचारधाराओं पर उसका कुछ न कुछ असर पड़ा। वह बड़े-बड़े धर्म जिनकी नस-नस में शिर्क व द्वैतवाद की आस्था रच-बस गई थी, किसी न किसी रूप में यह एलान करने पर मजबूर हो गए कि अल्लाह एक है। वह शिर्क की ऐसी विवेचना करने लगे जिससे उन पर शिर्क का इल्ज़ाम न आए और वह इस्लाम के तौहीद के अक़ीदे (आस्था) से कुछ न कुछ मिलते हुए नज़र आएं। उनको शिर्क का इक़रार करने में शर्म व झिझक महसूस होने लगी और शिर्क की सारी व्यवस्था हीनता की भावना से ग्रसित हो गई।

आपका दूसरा क्रान्तिकारी और महान उपकार मानव जाति की एकता की परिकल्पना है जो आपने दुनिया को दी। मानव जाति बिरादरी तथा ऊंचे-नीचे वर्गों में बंटा हुआ था, और उनके बीच इन्सानों व जानवरों, आक़ाओं व ग़ुलामों तथा भक्त-भगवान का सा अन्तर था। एकता व समता की कोई परिकल्पना न थी। आपने सदियों बाद पहली बार यह चकित कर देने वाला क्रान्तिकारी ऐलान किया:

“लोगो! तुम्हारा परवरदिगार एक है, और तुम्हारा बाप भी एक है। तुम सब आदम की औलाद हो और आदम मिट्टी से बने थे। अल्लाह के नज़दीक तुममें से सबसे अधिक सम्मान का पात्र वह है जो तुममें सबसे ज़्यादा पाकबाज़ है। किसी अरबी को अजमी (ग़ैर-अरब) पर फ़ज़ीलत नहीं, मगर तक़वा (अल्लाह से डरना) की बिना पर।”

यह वह शब्द हैं जिन्हें अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अपने आख़िरी हज में एक लाख 24 हज़ार की विशाल सभा में कहे थे। इनमें दो एकताओं का ऐलान किया गया है, और यही वह दो बुनियादें हैं जिन पर इंसानियत की असल एकता का महल खड़ा किया जा सकता है। यह दो एकताएं क्या हैं? एक, मानव जाति के सृष्टा एवं निर्माता की एकता; दूसरे, उसके पितामह की एकता। इस तरह हर मनुष्य एक-दूसरे से दोहरा रिश्ता रखता है: एक आध्यात्मिक और प्रत्यक्ष, वह यह कि सब इन्सानों और जहानों का रब (पालनहार) एक है; दूसरा शारीरिक और अप्रत्यक्ष, वह यह है कि सब इन्सान एक बाप (हज़रत आदम) की औलाद हैं।

जिस समय यह ऐलान किया गया था उस समय दुनिया इसे सुनने के मूड में नहीं थी। यह ऐलान उस समय की दुनिया के लिए एक भूचाल से कम न था। कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो प्रत्यक्ष नहीं, अप्रत्यक्ष रूप से सहन की जा सकती हैं। बिजली का यही हाल है कि किसी कुचालक की मदद से छू लेते हैं, लेकिन बिजली के खुले तार को कोई छू ले तो छूते ही उसका काम तमाम हो जाता है। आज ज्ञान-विज्ञान तथा मानव चिन्तन के विकास की उन सीढ़ियों ने, जो इस्लाम की दावत, इस्लामी समाज की स्थापना और उसके सुधारकों के प्रयासों से तय हुई हैं, इस क्रान्तिकारी ऐलान को अत्यंत व्यापक बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र संघ के स्टेज से लेकर, जिसने मानव अधिकार चार्टर प्रकाशित किया, प्रत्येक लोकतंत्र और प्रत्येक संस्था की तरफ़ से समान मानव अधिकारों का ऐलान किया जा रहा है और कोई इसको सुनकर आश्चर्यचकित नहीं होता, लेकिन एक समय था जब विभिन्न वर्गों और वंशजों के दिलों में सर्वोपरि होने की भावना घर कर गई थी, और अनेक पीढ़ियों और वंशजों का सम्बन्ध अल्लाह और सूरज-चांद आदि से जोड़ा जाता था। क़ुरआन पाक में आया है कि यहूदी व ईसाई कहते हैं कि हम अल्लाह की लाडली व चहेती औलाद की तरह हैं। मिस्र के फ़िरऔन अपने को सूरज देवता का अवतार कहते थे। हिन्दुस्तान में सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी ख़ानदान मौजूद थे। ईरान का बादशाह, जिन्हें किसरा या ख़ुसरो कहा जाता था, कहते थे कि उनकी शिराओं में अल्लाह का ख़ून है। ईरानवासी उन्हें इसी नज़र से देखते थे। उनका यक़ीन था कि इन जन्मजात बादशाहों की घुट्टी में कोई पाक आसमानी चीज़ शामिल है। कियानी सिलसिले के आख़िरी बादशाह ‘यज़्दगर्द’ का नाम बताता है कि वह और ईरानी उसको अल्लाह के कितने क़रीब और दोस्त समझते थे।

चीन के लोग अपने बादशाह ‘ख़्ता प्रथम’ को आसमान का बेटा समझते थे। उनका विश्वास था कि आसमान नर और धरती मादा है, और इन दोनों के मेल से सृष्टि की रचना हुई है, और बादशाह ‘ख़्ता प्रथम’ इस जोड़े का पिलौठा बेटा है। अरब अपने अलावा पूरी दुनिया को अजमी, अर्थात गूंगा और बेज़ुबान कहते थे। उनका सर्वोच्च क़बीला क़ुरैश आम अरबों से अपने को ऊंचा समझता था, और इसी कारण हज के मौक़े पर भी अपना विशेष अधिकार क़ायम रखता था। ऐसे माहौल में क़ुरआन पाक ने ऐलान किया:

और क़ुरआन पाक की एक ऐसी सूरह, जो क़ुरआन का आमुख है और सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली सूरह है, में कहा गया है:

मानव जाति पर आपका तीसरा एहसान इंसानियत की इज़्ज़त और मनुष्य के प्रति आदर की वह भावना है जो आपने मानव जगत को भेंट की। जिस समय इस्लाम का अभ्युदय हुआ उस समय मनुष्य से अधिक निकृष्ट कोई नहीं था। मानव का अस्तित्व एकदम बेक़ीमत और निरर्थक होकर रह गया था। कभी-कभी पालतू जानवर, कुछ पवित्र ‘प्राणी’, कुछ पेड़ जिनके साथ आस्थाएं जुड़ गई थीं, मानव से कहीं अधिक क़ीमती समझे जाते थे। उनके लिए निःसंकोच इन्सानों की जानें ली जा सकती थीं, और उनके ख़ून व गोश्त के चढ़ावे चढ़ाए जा सकते थे। आज भी बड़े-बड़े विकासशील देशों में इसके नमूने देखे जा सकते हैं। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मानव के दिल व दिमाग़ में यह बात बिठा दी कि इन्सान इस सृष्टि का क़ीमती, प्रेम व श्रद्धा का पात्र और सुरक्षा का अधिकार प्राप्त ‘प्राणी’ है। आपने इन्सान को इतना उठाया कि उससे ऊपर सिर्फ़ सृष्टि का निर्माता ही रह जाता है। क़ुरआन पाक ने ऐलान किया कि वह अल्लाह का नायब है। सारी दुनिया और यह सब कुछ उसी के लिए पैदा किया गया है। अल्लाह फ़रमाता है:

वह सर्वोत्कृष्ट प्राणी और जग का मुखिया है।

इससे अधिक उसके महत्व को और क्या सराहा जा सकता है कि साफ़ कह दिया गया कि दुनिया (ख़ल्क़) अल्लाह का कुटुम्ब (परिवार) है, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, और अल्लाह को अपने भक्तों में सबसे ज़्यादा प्यारा वह है जो उसके कुटुम्ब के साथ अच्छा बर्ताव करे और उसको आराम पहुंचाए।

एक पाक हदीस में फ़रमाया गया:

“अल्लाह पाक क़यामत के दिन कहेगा, ‘ऐ आदम की औलाद! मैं बीमार हुआ था, तू मुझे देखने नहीं आया।’ बन्दा कहेगा, ‘या परवरदिगार! मैं तेरी इयादत क्या कर सकता हूं, तू तो सारे जहानों का पालनहार है।’ अल्लाह कहेगा, ‘क्या तुझे मालूम नहीं हुआ, मेरा अमुक भक्त (बन्दा) बीमार था, तू उसकी इयादत को नहीं गया। तू अगर उसकी इयादत को जाता तो मुझे उसके पास पाता।’ फिर फ़रमाया जाएगा, ‘ऐ आदम की औलाद! मैंने तुझसे खाना मांगा था, तूने मुझे खाना नहीं दिया।’ बन्दा कहेगा, ‘परवरदिगार! मैं तुझे कैसे खाना खिला सकता हूं, तू तो सारे जहान का पालनहार है।’ इरशाद होगा, ‘क्या तुझे मालूम नहीं कि मेरे अमुक बन्दे ने तुझसे खाना मांगा, तूने उसे नहीं खिलाया? तू अगर उसे खाना खिलाता तो तू मुझे उसके पास पाता।’ फिर इरशाद होगा, ‘ऐ आदम की औलाद! मैंने तुझसे पानी मांगा तो तूने मुझे पानी नहीं पिलाया।’ बन्दा कहेगा, ‘ऐ रब! मैं तुझे कैसे पानी पिला सकता हूं, तू तो सारे जहान का पालनहार है।’ इरशाद होगा, ‘तुझसे मेरे अमुक बन्दे ने पानी मांगा था, तूने उसे पानी नहीं दिया। क्या तू नहीं जानता था कि अगर तू उसको पानी पिलाता तो तू मुझे उसके पास पाता?’”

एक ऐसे मज़हब में जो साक्षात तौहीद हो, क्या मानवता की बुलन्दी और मनुष्य के प्रति प्रेम का इससे बढ़कर एतिराफ़ (स्वीकृति) व ऐलान पाया जा सकता है, और क्या दुनिया के किसी अन्य मज़हब में इन्सान को यह स्थान दिया गया है? आपने अल्लाह की रहमत के लिए इन्सानों पर रहम (दया) को शर्त और उसका सबसे बड़ा माध्यम बताया और फ़रमाया, “रहम करने वालों पर रहमान की रहमत होती है, और अगर तुम धरती के वासियों पर रहम खाओगे तो वह जो आसमान पर है (अल्लाह) वह तुम पर रहम करेगा।” मौलाना हाली ने इसी हदीस के भाव को इस तरह शेर में पेश किया है:

करो मेहरबानी तुम अहल-ए-ज़मीं पर,
ख़ुदा मेहरबां होगा अर्श-ए-बरीं पर।

आप ग़ौर करें कि मानव एकता की बात दिलों में बिठाने तथा मानव जाति के प्रति आदर की भावना जगाने के लिए जब यह कोशिश नहीं की गई थी, उस समय इन्सान का क्या हाल रहा होगा? एक व्यक्ति की तुच्छ कामना का मूल्य हज़ारों इन्सानों से अधिक था। बादशाह उठते थे और देशों का सफ़ाया कर देते थे। सिकन्दर उठा और, जैसे कोई कबड्डी खेलता है, हिन्दुस्तान तक चला आया और क़ौमों व सभ्यताओं के दिये बुझा डाले। सीज़र उठा और इन्सानों का इस तरह शिकार खेलना शुरू किया जैसे जंगली जानवरों का शिकार खेला जाता है। हमारे समय में भी दो विश्वव्यापी जंगें हुईं जिसमें लाखों इन्सानों को मौत के घाट उतार दिया गया, और यह सिर्फ़ राष्ट्रीयता के अहंकार, राजनीतिक चौधराहट, सत्ता का लालच और व्यापारिक मण्डियों पर अधिकार करने की भावना की वजह से हुआ।

आपका चौथा वरदान यह है कि आपके अभ्युदय के समय मानव जाति के अधिकांश लोग अल्लाह की रहमत से निराश हो चुके थे। यह हालत पैदा करने में एशिया के कुछ प्राचीन धर्म तथा मध्य-पूर्व व यूरोप के परिवर्तित ईसाई धर्म ने समान भूमिका निभाई। हिन्दुस्तान के प्राचीन धर्मों ने ‘आवागमन’ के विश्वास द्वारा, जिसमें इन्सान के इरादा व इख़्तियार को कदापि दख़ल नहीं है और जिसके अनुसार हर इन्सान को अपने पहले के जन्म के कामों और ग़लतियों की सज़ा भुगतनी ज़रूरी है, और ईसाइयत ने इन्सान को पैदाइशी गुनहगार होने और उसके लिए हज़रत मसीह के सामने कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) बनने की ज़रूरत के अक़ीदे के नतीजे में, उस समय के सभ्य संसार के लाखों-करोड़ों लोगों को, जो इन धर्मों के अनुयायी थे, अपने आप से बदगुमान और अपने भविष्य व अल्लाह की रहमत से निराश कर दिया था।

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्ल० ने पूरी ताक़त व सफ़ाई से ऐलान किया कि मानव प्रवृत्ति एक कोरी तख़्ती के समान है जिस पर पहले से कुछ नहीं लिखा है, उस पर अच्छे से अच्छा सुलेख लिखा जा सकता है। इन्सान अपने अच्छे और बुरे काम के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार है। अपनी दुनिया और आख़िरत वह अपने कर्मों से ख़ुद बनाता या बिगाड़ता है। वह किसी दूसरे के कर्म का ज़िम्मेदार या उत्तरदायी नहीं है। क़ुरआन पाक ने बार-बार ऐलान किया कि आख़िरत (परलोक) में कोई किसी का बोझ नहीं उठा सकेगा, और यह कि उसके हिस्से में उसी की कोशिश और उसके प्रतिफल आने वाले हैं। इन्सान की कोशिश का नतीजा ज़रूर ज़ाहिर होगा और उसको उसका भरपूर बदला मिलेगा।

इस ऐलान से मनुष्य का अपने आप पर और अपनी निहित शक्तियों पर वह आत्मविश्वास बहाल हो गया जो एकदम डगमगा गया था, और नए संकल्प के साथ अपनी और मानवता की क़िस्मत चमकाने के लिए कार्यरत हो गया।

अपने गुनाहों और ग़लतियों को एक अस्थायी हालत क़रार दिया, जिसमें इन्सान कभी-कभी अपनी नादानी, संकुचित दृष्टिकोण तथा शैतान के बहकावे में आकर ग्रसित हो जाता है। अच्छे कामों को पसन्द करना और अपना क़सूर स्वीकार करना व पश्चाताप मानव स्वभाव का असल तक़ाज़ा और इन्सानियत का जौहर है। अपनी ग़लती स्वीकार करना, उस पर पश्चाताप करना, अल्लाह के सामने रो-धोकर अपने क़सूर को माफ़ करा लेना और भविष्य में ऐसी ग़लती न करने का संकल्प करना इन्सान की शराफ़त और आदम की मीरास (पूंजी जो उत्तराधिकारी को मिलती हो) है। आपने दुनिया के निराश और गुनाहों के दलदल में गले तक डूबे हुए इन्सानों पर तौबा (प्रायश्चित) का दरवाज़ा खोला, और इसका ऐसा प्रचार किया कि आपका एक नाम “नबी-उत-तौबा” (तौबा का पैग़म्बर) पड़ गया। आपने तौबा को एक मजबूरी की बात के रूप में पेश नहीं किया, बल्कि आपने उसका ऐसा गुणगान किया और उसे इतना ऊंचा उठाया कि वह उच्चकोटि की इबादत और अल्लाह के सानिध्य का ऐसा माध्यम बन गया कि बड़े-बड़े मासूम व निष्पाप भक्तों को रश्क आने लगा। क़ुरआन पाक में अल्लाह पाक इरशाद फ़रमाता है:

एक दूसरी जगह गुनाहों से तौबा करने वालों का उल्लेख करते हुए फ़रमाया गया:

इससे भी आगे बढ़कर क़ुरआन पाक की सूरह तौबा की शुरुआत ही ‘ताइबों’ (तौबा करने वालों) से की गई और फ़रमाया गया:

इस सम्मान और विश्वास का एक ज्वलन्त उदाहरण यह है कि जब क़ुरआन पाक में तीन सहाबा की तौबा के क़बूल होने का ऐलान किया गया, जो तबूक की जंग के मौक़े पर बिना किसी उचित वजह के मदीना में रह गए थे, तो उनका उल्लेख करने से पहले ख़ुद पैग़म्बर और उन मुहाजिरों व अन्सार का उल्लेख किया गया जिनसे इस मौक़े पर कोई कोताही (चूक) नहीं हुई थी, ताकि उन तीन के पीछे रह जाने वालों को अपनी तनहाई और पिछड़ेपन का एहसास न हो और वह हीनता की भावना तथा लोगों की टोक से बरी हो जाएं। तौबा करने वालों की मक़बूलियत और उन्हें ढारस दिलाने का ऐसा उदाहरण कहीं और मिलना कठिन है। सूरह तौबा में है:

इसके अलावा एक सिद्धान्त के रूप में इसका एलान किया कि अल्लाह की रहमत हर चीज़ पर हावी है। क़ुरआन में है:

और हदीस पाक में है:

“मेरी रहमत मेरे ग़ज़ब पर ग़ालिब है।”

क़ुरआन निराशा को कुफ़्र, जहालत व गुमराही का पर्यायवाची ठहराता है। एक जगह एक पैग़म्बर की ज़बान से कहलवाया गया है:

दूसरी जगह एक दूसरे पैग़म्बर का कथन नक़ल किया गया है:

इस तरह अल्लाह के रसूल सल्ल० ने तौबा के महत्व और अल्लाह की रहमत की व्यापकता का एलान व प्रचार करके निराश और अल्लाह के ग़ज़ब से सहमी और डरी इंसानियत को नई ज़िंदगी का पैग़ाम दिया, उसके मुर्दा होते शरीर में नई रोशनी जगाई, उसके घाव पर मरहम रखा और उसे ज़मीन की धूल से उठाकर सम्मान, आत्मविश्वास तथा ईश्वर में आस्था की चरम सीमा पर पहुंचा दिया।

आपका पांचवां महान और अविस्मरणीय उपकार दीन व दुनिया के सामंजस्य की परिकल्पना है। मनुष्य के कर्म और व्यवहार तथा उसके प्रतिफल मूलतः मानव की मनःस्थिति, कर्म के प्रेरक तत्वों एवं उसके मक़सदों पर निर्भर है। इस्लाम में इसे एक छोटे से, सरल लेकिन सारगर्भित शब्द ‘नीयत’ से व्यक्त किया गया है। इस्लाम में न कोई चीज़ दुनिया है न कोई चीज़ दीन। इसके नज़दीक स्वच्छ मन से अल्लाह की मर्ज़ी की चाह और उसके आदेशों के अनुपालन की भावना एवं संकल्प से बड़े से बड़ा सांसारिक कर्म, यहां तक कि शासन, जंग, दुनिया के मज़े, रोटी-रोज़ी कमाने की कोशिश, मनोरंजन के साधन, दाम्पत्य-जीवन, सब उच्चकोटि की इबादत और अल्लाह के सानिध्य का माध्यम, बड़े से बड़ा ऋषि-मुनि बनने का माध्यम और ख़ालिस दीन बन जाता है। इसके विपरीत बड़ी से बड़ी इबादत और दीन का काम जो अल्लाह की मर्ज़ी और भक्ति-भावना से ख़ाली हो, विशुद्ध सांसारिक और ऐसा कर्म कहा जाएगा जिस पर कोई सवाब और बदला नहीं है।

प्राचीन धर्मों ने ज़िन्दगी को दो ख़ानों में और दुनिया को दो कैम्पों में बांट दिया था: दीन व दुनिया, तथा धार्मिक लोग, सांसारिक लोग। यह दो न सिर्फ़ एक-दूसरे से अलग-थलग थे, बल्कि एक-दूसरे से लड़ने-मरने को तैयार रहते थे। उनके नज़दीक दीन व दुनिया एक-दूसरे के विरोधी थे, और जिसको इनमें से किसी एक को अपनाना हो उसके लिए दूसरे से सम्बन्ध-विच्छेद करना ज़रूरी था। कोई इन्सान एक समय में इन दोनों के साथ नहीं चल सकता था। अल्लाह को भुलाए बिना आर्थिक संघर्ष, धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा का परित्याग किए बिना शासन, सन्यास धारण किए बिना धार्मिक (दीनदार) बनने की परिकल्पना ही नहीं थी। मानव आम तौर पर सहूलत और लज़्ज़त को पसन्द करता है। दीन की ऐसी परिकल्पना जिसमें दुनिया को किसी जायज़ सहूलत, तरक़्क़ी व ताक़त की प्राप्ति की गुंजाइश न हो, बहुधा लोगों के लिए अग्राह्य थी।

फलतः दुनिया के सभ्य, विद्वत, सक्षम एवं व्यवहारिक लोगों की बड़ी संख्या ने अपने लिए ‘दीन’ के बजाए दुनिया का चयन किया। वह हर तरह धार्मिक उन्नयन से निराश होकर दुनिया की प्राप्ति और उसकी तरक़्क़ी में व्यस्त हो गया। दीन व दुनिया के इस विरोधाभास को एक धार्मिक और अकाट्य सत्य समझकर मनुष्यों के विभिन्न वर्गों ने आमतौर पर मज़हब को ख़ैराबाद (त्याग देना) कहा। ‘राजनीति’ और ‘राज्य’ ने कलीसा (गिरजाघर) से बग़ावत की और अपने को उसकी हर पाबन्दी से आज़ाद कर लिया। मानव बेनकेल और समाज निरंकुश होकर रह गया। दीन व दुनिया के इस बंटवारे ने न सिर्फ़ यह कि धर्म व आचरण के प्रभाव को सीमित व कमज़ोर और मानव जीवन को उसकी बरकत व रहमत से वंचित कर दिया, बल्कि दुनियादारी व अधर्म का दरवाज़ा खोला जिसका सबसे पहले यूरोप शिकार हुआ। फिर दुनिया के दूसरे राष्ट्र जो यूरोप के प्रभाव में आए, इससे कुछ न कुछ प्रभावित हुए। वर्तमान दुनिया की स्थिति, जिसमें धर्म व आचरण का पतन अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया है, दीन व दुनिया के इसी फ़र्क़ का नतीजा है।

अल्लाह के रसूल सल्ल० का यह महानतम काम और इंसानियत के लिए महान भेंट है कि आप पूरी तरह एकता के रसूल (रसूल-ए-वहदत) हैं, और एक ही समय ‘बशीर’ (इस बात से आगाह करने वाला कि अच्छे काम का अच्छा नतीजा प्राप्त होगा) और ‘नज़ीर’ (इस बात से आगाह करने वाला कि बुरे काम का बुरा नतीजा हासिल होगा) हैं। आपने दीन व दुनिया के भेद को ख़त्म करके पूरी ज़िन्दगी को इबादत में, और पूरी वसुन्धरा को एक विशाल इबादतगाह में बदल दिया। दुनिया के लोगों को सद्व्यवहार, परोपकार और अल्लाह की रज़ा के एक ही मोर्चे पर लाकर खड़ा कर दिया। यहां दुनिया के भेष में सन्त, राजाओं के भेष में ऋषि-मुनि, तलवार व तस्बीह (माला) धारी, रात के इबादतगुज़ार और दिन के शहसवार नज़र आएंगे।

आपका छठा एहसान यह है कि आपके अभ्युदय काल से पहले इंसान अपने लक्ष्य से बेख़बर था। उसको याद नहीं रहा था कि उसे कहां जाना है? उसकी क्षमताओं का असल मैदान और उसकी कोशिशों का असल निशाना क्या है? उसने कुछ तुच्छ लक्ष्य बना लिए थे जिनकी प्राप्ति में उसकी क्षमता ख़र्च हो रही थी। कामयाब और बड़ा इन्सान बनने का मतलब सिर्फ़ यह था कि मैं दौलतमन्द बन जाऊं, ताक़तवर और हाकिम बन जाऊं, बड़े से बड़े क्षेत्र और अधिक से अधिक इन्सानों पर मेरा शासन हो। लाखों लोग ऐसे थे जो बेल-बूटों, रंगरेलियों, स्वादिष्ट खानों और पशु-पक्षियों की नक़ल से आगे नहीं सोच पाते थे। हज़ारों लोग ऐसे थे जिनकी सारी शक्ति अपने समय के धनवानों और राजा-महाराजाओं की ख़ुशामद करने में ख़र्च हो रही थी। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मानव जाति के सामने उसकी वास्तविक मंज़िल लाकर खड़ी कर दी। आपने बताया कि मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य ईमान व यक़ीन के साथ अल्लाह को राज़ी करना और उससे राज़ी हो जाना है। अपनी निहित शक्तियों का विश्वास करना, इन्सानों की ख़िदमत करना, त्याग व तपस्या के माध्यम अल्लाह की ख़ुशनूदी हासिल करना और तरक़्क़ी की उस चरम सीमा तक पहुंच जाना, जहां फ़रिश्ते भी नहीं पहुंच सकते, इन्सान की कोशिशों का असल मैदान है।

आपके अभ्युदय के बाद दुनिया की ऋतु बदल गई। इन्सानों के मिज़ाज बदल गए। दिलों में ईश-प्रेम की चिंगारी भड़की। उनके अन्दर ईश-प्राप्ति की भावना जागी। उनको अल्लाह को राज़ी करने की एक धुन लग गई। जिस तरह बरसात के मौसम में ज़मीन में फ़सल पैदा करने की ताक़त, सूखी टहनियों में हरियाली पैदा हो जाती है, नई-नई कोंपलें निकलने लगती हैं और चारों तरफ़ हरियाली दिखाई देने लगती है, उसी तरह आपके अभ्युदय के बाद दिलों में नया जोश, मन में नई उमंग, भावना और तन में नई लगन समा गई। करोड़ों लोग अपने असली लक्ष्य की खोज और उस तक पहुंचने के लिए निकल खड़े हुए। अरब व अजम, मिस्र व सीरिया, तुर्किस्तान, ईरान, इराक़ व ख़ुरासान, उत्तरी अफ़्रीक़ा, स्पेन और हमारा देश हिन्दुस्तान, तथा पूर्वी द्वीप समूह, सब जगह मालूम होता है कि मानवता सदियों की नींद सोते-सोते जाग उठी। आप इतिहास की किताबों का अध्ययन करेंगे तो आप देखेंगे कि लोगों के पास ईश्वर को पाने और उसे पहचानने के सिवा कोई काम ही न था। बस्ती-बस्ती, गांव-गांव बड़ी संख्या में ऐसे अल्लाह की याद में मस्त, त्यागी, तपस्वी लोग दिखाई देते हैं जिन पर फ़रिश्ते भी गर्व करें। उन्होंने दिलों की सर्द अंगीठियां गरमा दीं, ईश-प्रेम की तान छेड़ दी, ज्ञान-विज्ञान के दरिया बहा दिए, ईश-शक्ति की ज्योति जगा दी, अज्ञानता और अत्याचार से नफ़रत पैदा कर दी, समता का पाठ पढ़ाया, दुखों के मारे और समाज के सताए हुए लोगों को गले लगाया। वह बारिश की बूंदों की तरह ज़मीन के कोने-कोने में बरसे।

आप उनकी बहुलता के साथ उनके गुणों को देखें। उनका विवेक, उनकी आत्मा की सरसता, उनकी सुरुचि का हाल पढ़िए। इन्सानों के लिए किस तरह उनका दिल रोता, उन्हें मुसीबत से छुटकारा दिलाने के लिए किस तरह अपने को ख़तरे में डालते और अपने बच्चों व सगे-सम्बन्धियों को आज़माइश में डालते। उनके शासकों को अपनी ज़िम्मेदारी का कितना एहसास रहता और प्रजा में आज्ञापालन व सहयोग की कैसी भावना होती। उनकी इबादत, उनकी दुआ, उनकी भक्ति, उनके सेवा-भाव, शिष्टाचार के हालात पढ़िए। ज्ञान-इन्द्रियों पर नियंत्रण के साथ स्वयं के लेखा-जोखा, दीन-दुखियों व कमज़ोरों से प्यार, दोस्त-दुश्मन के साथ उनके समान व्यवहार और रहमदिली व सहानुभूति के नमूने देखिए। सच तो यह है कि अगर इतिहास के प्रामाणिक तथ्य और लगातार सबूत न होता तो यह बातें क़िस्से-कहानियां और अफ़साने मालूम पड़ते। यह महान परिवर्तन अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का एक चमत्कार है, और इस बात की पुष्टि करता है कि आप सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए।

अल्लाह पाक क़ुरआन मजीद में फ़रमाता है:

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