अध्याय अट्ठारह

मूता की जंग

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हारिस बिन उमैर अल-अज़्दी रज़ि० को अपने ख़त के साथ बुसरा के हाकिम शुरहबील बिन अम्र अल-ग़स्सानी के पास भेजा। बुसरा बाज़नतीनी साम्राज्य के अधीन था। शुरहबील के आदेशानुसार हारिस को पहले बांध दिया गया, उसके बाद उन्हें शहीद कर दिया गया। ख़त का विषय कितना ही नापसंद हो और कैसा ही विरोधी हो, लेकिन राजदूतों और सन्देशवाहकों के क़त्ल करने का कभी भी दस्तूर न था। हारिस के क़त्ल की घटना ऐसी थी जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती थी। यह राजदूतों व सन्देशवाहकों के लिए ख़तरे की बात और ख़त व ख़त के लेखक दोनों का अपमान था। इसलिए इस तरह का बर्ताव करने वाले का सर कुचलना और ज़ुल्म का बदला लेना ज़रूरी था, ताकि भविष्य में किसी की ऐसी हिम्मत न हो सके, और इस तरह की दुखद घटना की दोबारा न हो।

बाज़नतीनी भूमि पर पहली इस्लामी फ़ौज

जब हारिस की शहादत की ख़बर अल्लाह के रसूल सल्ल० को मिली तो आपने एक लश्कर बुसरा भेजने का फ़ैसला किया। यह बात जुमादल ऊला सन् 8 हिजरी की है।

3000 मुजाहिदों की एक फ़ौज इसके लिए तैयार की गई। हालांकि इस लश्कर में बड़े-बड़े अन्सार व मुहाजिर मौजूद थे, फिर भी आप सल्ल० ने ज़ैद बिन हारिसा रज़ि० को उसका नेतृत्व सौंपा। ज़ैद एक आज़ाद किए हुए ग़ुलाम थे। आपने यह निर्देश भी दिया कि अगर ज़ैद शहीद या ज़ख़्मी हो जाएं तो जाफ़र बिन अबी तालिब को लीडर बनाया जाए, और उनके साथ भी यही हो तो अब्दुल्लाह बिन रवाहा को अमीर नियुक्त किया जाए। पूरी तैयारी के बाद लोगों ने आप सल्ल० द्वारा नियुक्त फ़ौज और लीडरों को विदा किया और उनको अपना सलाम पेश किया। उन्हें एक लम्बा और थका देने वाला रास्ता तय करना था, और उनका सामना ऐसे दुश्मन से था जिसको उस समय के सबसे बड़े साम्राज्य का संरक्षण हासिल था।

इस्लामी फ़ौज रवाना हुई। आगे चलकर उसने ‘मआन’ पर पड़ाव किया। यहां मुसलमानों को सूचना मिली कि हरकुल ‘बलक़ा’ में एक लाख रूमी फ़ौज के साथ पड़ाव किए है, और उसके साथ बड़ी संख्या में अरब क़बीले ‘लख़्म’, ‘जुज़ाम’, ‘बल-क़ैन’, ‘बहरा’ और ‘बली’ आ मिले हैं। मुसलमानों ने दो रातें ‘मआन’ में गुज़ारीं और हालात पर ग़ौर करते रहे। आख़िर में यह फ़ैसला हुआ कि अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास ख़त भेजा जाए और दुश्मन की संख्या से आपको सूचित कर दिया जाए, फिर या तो आप सल्ल० हमारे लिए कुमक रवाना फ़रमाएं या मुक़ाबले का हुक्म दें तो उसका पालन किया जाए।

निडर सिपाही

इस मौक़े पर अब्दुल्लाह बिन रवाहा ने मुजाहिदों को हिम्मत दिलाई और कहा कि “अल्लाह की क़सम! आज तुम उस चीज़ को नागवार (अप्रिय) महसूस कर रहे हो जिसके लिए तुम निकले थे और जो तुम्हारी दिली तमन्ना थी, अर्थात शहादत! हम दुश्मन का मुक़ाबला संख्या और ताक़त की बुनियाद पर नहीं करते। हम तो उसका मुक़ाबला उस दीन की ताक़त से करते हैं जिससे अल्लाह ने हमको गौरवान्वित किया है। इसलिए चल खड़े हो और याद रखो, दोनों हाल में हमारा फ़ायदा है, जीत हो तब भी और शहादत हो तब भी।” यह सुनकर सब लोग उसी वक़्त उठे और रवाना हो गए।

जब इस्लामी लश्कर बलक़ा के क़रीब पहुंचा तो मशारिफ़ नामक स्थान पर उनका सामना बाज़नतीनी सेनाओं से हुआ। मुसलमानों ने मूता1 नामक गांव में मोर्चा संभाल लिया और जंग शुरू हो गई।

ज़ैद बिन हारिसा ने जंग की शुरुआत की। भालों से उनका पूरा बदन छलनी हो गया और आख़िरकार वह शहीद हुए। उनसे झण्डा जाफ़र ने ले लिया और लड़ते रहे। जब लड़ाई का दबाव बढ़ा तो घोड़े से उतर गए और उसकी अगली टांगें काट दीं और पैदल लड़ना शुरू किया। इतने में उनका दायां हाथ भी कट गया, तब उन्होंने झण्डा अपने बाएं हाथ में ले लिया। बायां हाथ भी कट गया तो झण्डे को उन्होंने अपने दोनों कटे हुए ज़ख़्मी हाथों में जकड़ लिया और इसी तरह शहीद हो गए। उस समय उनकी उम्र 33 वर्ष की थी। उनके सीने और बाज़ुओं के बीच 90 घाव थे। यह सब तलवार और भालों के ज़ख़्म थे और इनमें कोई घाव पीठ की तरफ़ नहीं था। इस तरह यह बहादुर जवान जन्नत की नेमतों के गीत गाता हुआ और दुश्मन व दुनिया के शृंगार को पैरों तले रौंदता हुआ शहीद हुआ।

जाफ़र की शहादत के बाद अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा ने झण्डा अपने हाथ में ले लिया और आगे बढ़े। उन्होंने भी अपना घोड़ा छोड़ दिया। इसी बीच उनके एक चचेरे भाई एक गोश्त लगी हड्डी लेकर आए और कहा कि “इसको पेट में डाल लो ताकि कुछ ताक़त आ जाए, क्योंकि तुमने कई दिन से कुछ नहीं खाया है।” अब्दुल्लाह ने उन्हीं के हाथ से थोड़ा सा गोश्त अपने मुंह में लिया, फिर उसको फेंक दिया, तलवार हाथ में ली, आगे बढ़कर दुश्मन से दो-दो हाथ किए और शहीद हो गए।

हज़रत ख़ालिद का नेतृत्व

अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा के शहीद होने के बाद लोगों ने हज़रत ख़ालिद बिन वलीद के नेतृत्व में जंग जारी रखने पर सबने रज़ामंदी जताई और उन्होंने इस्लाम का झण्डा अपने हाथ में ले लिया। वह बहुत बहादुर और रणनीति के अनुभवी व्यक्ति थे। उन्होंने इस्लामी लश्कर को दक्षिण की तरफ़ मोड़ लिया। दुश्मन उत्तर की तरफ़ चला गया। इतने में रात हो गई और लड़ाई बन्द हो गई।

हज़रत ख़ालिद बिन वलीद ने बड़ी संख्या में लोगों को अपने लश्कर के पीछे तैनात कर दिया। उन लोगों ने सुबह के समय इतने ज़ोर से नारा लगाया कि दुश्मन समझे कि मदीना से कोई नई कुमक आ गई, और वह डर गए। आपस में कहने लगे कि “जब 3 हज़ार के लश्कर ने यह आफ़त ढाई तो नई कुमक आ जाने के बाद इनका क्या हाल होगा?” यह सोचकर दुश्मनों की हिम्मत टूट गई और उन्होंने लड़ाई का इरादा छोड़ दिया और लड़ाई नहीं हुई।

इधर मुसलमान मैदान-ए-जंग में अपनी बहादुरी के जौहर दिखा रहे थे और उधर अल्लाह के रसूल सल्ल० मदीना में सहाबा से इस जंग का आंखों देखा हाल बयान कर रहे थे। अनस बिन मालिक कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ज़ैद, जाफ़र और अब्दुल्लाह रज़ि० के शहीद होने की सूचना मदीना ख़बर पहुंचने से पहले ही दे दी थी। आपने फ़रमाया, “अब ज़ैद ने झण्डा लिया, वह शहीद हुए। जाफ़र ने लिया, वह भी शहीद हुए। इब्न रवाहा ने लिया, वह भी शहीद हुए।” (उस समय आप सल्ल० की आंखों से आंसू जारी थे।) आपने फ़रमाया, “यहां तक कि अल्लाह की तलवारों में से एक तलवार (अर्थात ख़ालिद बिन वलीद) ने झण्डा अपने हाथ में लिया और अल्लाह ने मुसलमानों को कामयाबी दिला दी।”

जाफ़र रज़ि० के बारे में आपने फ़रमाया कि अल्लाह ने उनके दोनों हाथों के बदले उनको पंख दिए हैं जिनसे वह जन्नत में जहां चाहें उड़कर जा सकते हैं। इसीलिए उनका लक़ब जाफ़र तैयार (उड़ने वाला) और ज़ुल-जनाहैन (दो परों वाला) पड़ गया।2

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जाफ़र की पत्नी से कहा कि “जाफ़र के बच्चों को हमारे पास लाना।” जब वह आए तो आप सल्ल० ने उनको अपने चेहरे से लगा लिया और आपकी आंखों से आंसू जारी हो गए। फिर आपने उनको शहादत की ख़बर सुनाई। जब मैदान-ए-जंग से शहादत की ख़बर आई तो आपने घर वालों से कहा कि “जाफ़र के घर वालों के लिए खाना तैयार करो।” इस बात को सुनकर घर वाले दुःखी होंगे और वह खाना पकाने की हालत में नहीं होंगे। आप सल्ल० भी बहुत दुखी थे।

वापसी के समय जब मुसलमानों का लश्कर मदीने के क़रीब पहुंचा तो अल्लाह के रसूल सल्ल० और मुसलमानों ने आगे बढ़कर उसकी अगवानी की। बच्चे भी उनके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। अल्लाह के रसूल सल्ल० सवारी पर थे। आप सल्ल० ने फ़रमाया कि “बच्चों को अपने साथ बिठा लो और जाफ़र का बच्चा मुझे दे दो।” जाफ़र के बच्चे अब्दुल्लाह को लाया गया। आपने उसको अपनी गोद में बिठा लिया।

चूंकि मुसलमान मैदान-ए-जंग से बिन लड़े वापस आने के आदी न थे, इसलिए मदीनावासी उन ग़ाज़ियों पर मिट्टी फेंकते थे और कहते थे, “भागने वालो! क्या अल्लाह के रास्ते से भागे हो?” आपने फ़रमाया, “भागने वाले नहीं हैं, इन्शा अल्लाह हमला करने वाले हैं।”

मूता की जंग और मक्का विजय के बीच

मूता की जंग और मक्का विजय के बीच एक सरिय्या (चढ़ाई) ज़ातुस्सलासिल के नाम से जुमादल आख़िर सन् 8 हिजरी में हुई। यह स्थान ‘वादी-अल-क़ुरा’ के पीछे था और क़बीला क़ुज़ाआ के इलाक़े में था। इस मौक़े पर इस्लामी लश्कर ने दुश्मन का पूरी तरह सफ़ाया कर दिया। दूसरा सरिय्या अल-ख़बत का था, जिसके अमीर अबू उबैदा इब्नुल जर्राह थे। यह रजब सन् 8 हिजरी में भेजा गया था। इसमें अन्सार व मुहाजिरीन के 300-300 सिपाही शामिल थे। आपने उनको जुहैना के एक क़बीले की गतिविधियों और उनका सिर कुचलने के लिए भेजा था। रास्ते में इन मुहाजिरों को अत्यधिक भूख व फ़ाक़ा का सामना करना पड़ा, यहां तक कि पेड़ों के पत्तों से गुज़ारा करना पड़ा। उस समय समुन्द्र ने उनके लिए “अम्बर” नाम की एक बहुत बड़ी मछली प्रदान कर दी, जिसने 15 दिन तक उनका काम चलाया। उन्होंने उसका तेल भी निकाला। इससे उनकी सेहत और ताक़त बहाल हुई। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जब यह सुना तो फ़रमाया कि “यह अल्लाह की तरफ़ से तुम्हारी मेहमानी थी।” आप सल्ल० ने उसका कुछ गोश्त भी खाया।

टिप्पणियां

  1. 1मूता पूर्वी जॉर्डन के नगर किर्क के दक्षिण में 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मदीना और मूता के बीच की दूरी लगभग 1100 किलोमीटर है। इस पूरी दूरी को मुसलमानों ने घोड़ों और ऊंटों से इस तरह पूरा किया कि उन्हें किसी तरह की मदद या सामग्री मिलने की उम्मीद नहीं थी।
  2. 2सही बुख़ारी में है कि हज़रत उमर रज़ि० जब हज़रत जाफ़र के लड़के से मिलते तो कहते, “दो परों वाले के लड़के! तुम पर सलाम हों।”