अध्याय पच्चीस

वफ़ात (निधन)

जब इस्लाम अपनी तरक़्क़ी की चरम सीमा पर पहुंच गया तो क़ुरआन की यह आयत उतरी जिसका अनुवाद निम्न है:

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हिदायत (पथ-प्रदर्शन) का पैग़ाम लोगों को पहुंचा दिया, अल्लाह की अमानत बिना किसी काट-छांट के पहुंचा दी, और हक़ (अल्लाह, सच्चाई) के रास्ते में क़ुर्बानी व बलिदान का हक़ अदा कर दिया, और एक ऐसी उम्मत तैयार कर दी जो नुबूवत की ज़िम्मेदारियों को (नुबूवत के मंसब पर आरूढ़ हुए बिना) पूरा कर सकती थी, और इस उम्मत को उस दावत का अलमबरदार (ज़िम्मेदार) और इस दीन को तहरीफ़ (परिवर्तन व परिवर्द्धन) से बचाए रखने का ज़िम्मेदार बनाया गया। क़ुरआन पाक में अल्लाह पाक का इरशाद है:

इसी के साथ अल्लाह ने क़ुरआन पाक की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी भी ले ली और फ़रमाया:

दूसरी तरफ़ अल्लाह ने अपने नबी की आंखों की ठंडक के लिए जनमानस में इस्लाम क़बूल करने की एक लहर फूंकी, और पूरी दुनिया में इस्लाम के प्रचार व प्रसार की निशानियां दिखने लगीं, और साफ़ दिखाई देने लगा कि देखते ही देखते यह दीन दुनिया के सभी धर्मों पर छा जाएगा।

क़ुरआन पाक में अल्लाह इरशाद फ़रमाता है:

तिलावत और एतिकाफ़ में बढ़ोतरी

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने एतिकाफ़1 में बढ़ोतरी कर दी। आप हर वर्ष रमज़ान माह की आख़िरी दहाई में एतिकाफ़ करते थे, लेकिन जिस वर्ष आप सल्ल० की वफ़ात हुई उस वर्ष आपने बीस दिन का एतिकाफ़ फ़रमाया।

हज़रत जिब्रईल रमज़ान की हर रात में आपसे आकर मिलते और आप उनके साथ क़ुरआन पाक का दौर (पाठ)2 फ़रमाते थे, लेकिन उस वर्ष आपने फ़रमाया कि “इस बार वह एक के बजाए दो बार आए हैं। इससे मुझे अन्दाज़ा होता है कि मेरा वक़्त क़रीब आ गया है।”

इस वक़्त अल्लाह ने अपने नबी को अपने से मिलने की इजाज़त अता फ़रमाई, जिनसे ज़्यादा उसकी मुलाक़ात का शौक़ और किसी को नहीं हो सकता था। अल्लाह को भी इस लिक़ा (मुलाक़ात) का इन्तिज़ार था और आपको भी इसका बड़ा शौक़ था।

अल्लाह ने सहाबा को, जिनसे बढ़कर आपका चाहने वाला इस ज़मीन पर कोई और न था, आपकी वफ़ात की ख़बर सुनने और इस बड़े दुख को बर्दाश्त करने के लिए पहले से तैयार कर दिया था। इससे पहले ग़ज़वा-ए-उहद में उनको आप सल्ल० की अचानक शहादत की ख़बर मिली थी, फिर बाद में मालूम हुआ यह शैतान की साज़िश और फैलाई हुई अफ़वाह थी, और अल्लाह ने उनको अपने नबी के साथ का फ़ायदा उठाने का एक मौक़ा दिया है, हालांकि यह बात किसी न किसी दिन होने वाली है। इसलिए क़ुरआन पाक में अल्लाह का इरशाद हुआ:

यह मुसलमान, जिनको अल्लाह के रसूल सल्ल० ने बेहतरीन शिक्षा-दीक्षा दी थी, और उनके दिलों में अल्लाह की भक्ति भर दी थी, और दुनिया के दूर स्थित जगहों तक इस्लाम का पैग़ाम पहुंचाने के लिए उन्हें तैयार कर दिया था, इस बात का पूरा यक़ीन रखते थे कि आप किसी न किसी दिन इस पल भर की दुनिया को छोड़कर उनसे जुदा हो जाएंगे। जब सूरह नस्र की पहली आयत उतरी तो सहाबा ने समझ लिया कि यह आयत जुदाई की घड़ी का ऐलान है।3 जिस समय सूरह माइदा की तीसरी आयत उतरी तो अनेक महान सहाबियों ने महसूस किया कि आपकी वफ़ात का वक़्त क़रीब है।

अल्लाह से मुलाक़ात का शौक़

हज्जतुल विदा से वापसी के बाद अल्लाह के रसूल सल्ल० से ऐसी बातें ज़ाहिर हुईं जिनसे इशारा मिलता था कि आपकी वफ़ात के दिन क़रीब हैं4 और आप इस सफ़र के लिए तैयार और अल्लाह से मिलने के लिए आतुर हैं। आपने उहद के शहीदों के लिए 8 वर्ष बाद इस तरह दुआ की कि जैसे आप जल्द ही अपने साथियों से जुदा होने वाले हैं। फिर आप मिम्बर (आसन) पर गए और फ़रमाया, “मैं तुम्हारे आगे जाने वाला हूं और तुम पर गवाह हूं। अब तुमसे मुलाक़ात हौज़ (कौसर) पर होगी। मैं अपने को उस जगह खड़ा हुआ देख रहा हूं। मुझे ज़मीन के ख़ज़ानों की कुंजियां दे दी गई हैं। मुझे यह डर नहीं कि तुम मेरे बाद शिर्क करने लगोगे, मगर मैं इससे डरता हूं कि तुम माया-जाल में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश करने लगो, और जैसे पिछली क़ौमें ख़त्म हुई थीं तुम भी ख़त्म हो जाओ।”

बीमारी की शुरुआत

अल्लाह के रसूल सल्ल० को शिकायत इस्लामी कैलेण्डर के दूसरे महीने सफ़र के आख़िर में पैदा हुई। इसकी शुरुआत इस तरह हुई कि आप आधी रात को ‘जन्नतुल बक़ी’5 गए और मुर्दों के लिए दुआ की। फिर अपने घर आए। दूसरे दिन सुबह से बीमारी शुरू हो गई।

हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं कि “आप बक़ी से वापस आए तो आपने मुझे इस हालत में पाया कि मेरे सर में सख़्त दर्द था। मैं कह रही थी कि मेरे सर में कितनी तकलीफ़ है। आपने फ़रमाया, ‘नहीं, मेरे सर में कितना दर्द है। आइशा! मेरे सर में कितनी तकलीफ़ है।’” बीमारी बढ़ गई। उस समय आप हज़रत मैमूना रज़ि० के घर में थे। आपने अपनी सभी पवित्र बीवियों को बुलाया और उनसे इजाज़त चाही कि आप बीमारी का ज़माना आइशा रज़ि० के यहां गुज़ारें। उन्होंने इसे ख़ुशी से मान लिया। आप घर दो लोगों, ‘फ़ज़्ल बिन अब्बास और हज़रत अली’, के सहारे वहां से तशरीफ़ ले चले। आप सल्ल० के सर पर पट्टी बंधी हुई थी। आपके क़दम ज़मीन पर रगड़ रहे थे। इस तरह आप हज़रत आइशा रज़ि० के घर आए।

हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं कि आप बीमारी के दौरान फ़रमाते थे कि “आइशा! मैं उस खाने की तकलीफ़ अब तक महसूस करता हूं जो मैंने ख़ैबर में खाया था। इस वक़्त उस ज़हर से मेरी रग (अबहर6) कट रही है।”

आख़िरी लश्कर

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उसामा बिन ज़ैद को एक लश्कर का अमीर बनाकर शाम (सीरिया) भेजा और उनको हुक्म दिया कि उनके घोड़े ‘बलक़ा’ और ‘दारूम’ तक ज़रूर जाएं जो फ़िलस्तीन का हिस्सा है। इस लश्कर में आपने मुहाजिरीन व अन्सार के चुने हुए लोगों को शामिल किया, जिनमें सबसे प्रमुख हज़रत उमर रज़ि० थे। आपने उनको उसामा के लश्कर में, जो उस समय ‘जुर्फ़’ में पड़ाव किए था, जा मिलने का हुक्म दिया, हालांकि आप गम्भीर रूप से बीमार थे। आपकी वफ़ात के बाद हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने आप सल्ल० की इस इच्छा को पूरा करने के लिए उसामा के लश्कर का आगे बढ़ना जारी रखा, और उसे स्थगित नहीं किया।

उसामा की टुकड़ी से आपका गहरा लगाव

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने महसूस किया कि लोग उसामा की टुकड़ी में शामिल होने में आगे-पीछे हो रहे हैं, और उनकी, एक नव-उम्र लड़के को बुज़ुर्ग, अनुभव वाले मुहाजिरीन व अन्सार का सरदार बनाए जाने पर, चर्चाओं को आप समझ गए। उसी सख़्त दर्द की हालत में सर पर पट्टी बांधे हुए आप बाहर आए और मिम्बर पर बैठ गए। पहले आपने अल्लाह की तारीफ़ बयान की, फिर फ़रमाया, “लोगो! उसामा के लश्कर को रवाना करो। अगर आज तुम इनके नेतृत्व के बारे में चर्चा करते हो तो कल तुमने इनके पिता के नेतृत्व पर भी आपत्ति की थी। बेशक वह नेतृत्व करने में सक्षम और उसके हक़दार हैं जैसे उनके पिता उसके हक़दार थे।” इतना कहकर आप मिम्बर से नीचे उतर गए और लोग तेज़ी के साथ तैयारी में लग गए। इधर आपकी बीमारी पहले से बहुत बढ़ गई। उधर उसामा लश्कर को लेकर रवाना हो गए और मदीना से तीन मील दूरी पर ‘जुर्फ़’ में पड़ाव किया, ताकि बाक़ी लोग जो आना चाहें वह सब यहां जमा हो जाएं। इस समय आपकी तबीयत ज़्यादा ख़राब थी। उसामा और उनके साथी वहां रुके हुए थे कि देखिए अल्लाह को क्या मंज़ूर है।

आपने बीमारी की हालत में मुसलमानों को वसीयत की कि वह इस लश्कर को उसी तरह रवाना करें जैसे आप उनको रवाना किया करते थे, और फ़रमाया कि अरब प्रायद्वीप में दो मज़हब बाक़ी न छोड़ें और मुशरिकीन को यहां से निकाल दिया जाए।

मुसलमानों के लिए दुआ

बीमारी के दौरान कुछ सहाबा हज़रत आइशा रज़ि० के घर में जमा हुए। आपने उनका स्वागत किया और उनके लिए दुआ की और फ़रमाया, “मैं तुमको अल्लाह से डरने की वसीयत करता हूं और अपने बाद अल्लाह को तुम्हारा रक्षक बनाता हूं। मैं उसकी तरफ़ से तुमको खुला हुआ डराने वाला और आगाही देने वाला हूं। देखना, अल्लाह की बस्तियों और उसके बन्दों में घमण्ड और बरतरी को न अपनाना। अल्लाह ने मेरे लिए और आपके लिए पहले ही फ़रमा दिया है:

फिर आपने सूरह ज़ुमर की 60वीं आयत पढ़ी जिसका अनुवाद है:

दुनिया से दूरी

हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं कि आपने बीमारी के दौरान एक बार पूछा, “आइशा! उस सोने का क्या किया?” वह पांच से सात या नौ के बीच अशरफ़ियां लाईं। आप उनको लेकर अपने हाथ से उलटते-पलटते रहे, फिर फ़रमाया, “मैं इनके साथ अल्लाह को क्या मुंह दिखाऊंगा! जाओ, इन सबको अल्लाह की राह में ख़ैरात कर दो।”

नमाज़ की फ़िक्र

आपकी तबीयत ज़्यादा भारी हो गई तो आपने पूछा, “क्या लोगों ने नमाज़ पढ़ ली?” हमने जवाब दिया, “नहीं, या रसूलल्लाह सल्ल०! सब लोग आपका इन्तिज़ार कर रहे हैं।” आपने फ़रमाया, “मेरे लिए लगन (बर्तन) में पानी रख दो।” लोगों ने पानी रख दिया। आप नहाए, फिर आपने उठने की कोशिश की, लेकिन आप बेहोश हो गए। जब आपको होश आया तो फ़रमाया, “क्या सबने नमाज़ पढ़ ली?” लोगों ने जवाब दिया, “नहीं, या रसूलल्लाह सल्ल०! सब लोग आपका इन्तिज़ार कर रहे हैं।” उस वक़्त सभी लोग मस्जिद-ए-नबवी में ख़ामोश बैठे इशा की नमाज़ के लिए इन्तिज़ार कर रहे थे। आपने हज़रत अबू बक्र को पैग़ाम कहलवाया कि वह नमाज़ पढ़ाएं। हज़रत अबू बक्र बड़े सुकोमल दिल वाले व्यक्ति थे। उन्होंने कहा, “उमर! तुम नमाज़ पढ़ाओ।” हज़रत उमर ने कहा, “आप इसके ज़्यादा अधिकारी हैं।” अतएव उन दिनों हज़रत अबू बक्र ही नमाज़ पढ़ाते रहे।

फिर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने तबीयत में कुछ हल्कापन महसूस किया और दो आदमियों, अब्बास और अली रज़ि०, के सहारे से ज़ुहर की नमाज़ के लिए बाहर आए। जब हज़रत अबू बक्र ने आपको देखा तो वह पीछे हटने लगे। आपने इशारे से उनको हिदायत की कि वह पीछे न हटें, और आप सल्ल० ने उन लोगों से फ़रमाया कि वह आपको अबू बक्र के पहलू में बिठा दें। हज़रत अबू बक्र खड़े होकर नमाज़ पढ़ाते रहे और आपने बैठकर नमाज़ अदा फ़रमाई।

उम्मुल फ़ज़्ल बिन्त अल-हारिस बयान करती हैं, “मैंने अल्लाह के रसूल सल्ल० को मग़रिब की नमाज़ में सूरह ‘वल-मुर्सलात’ पढ़ते हुए सुना। इसके बाद आपको किसी नमाज़ की इमामत करने का मौक़ा नहीं आया, यहां तक कि अल्लाह ने आप सल्ल० को अपने पास बुला लिया।”

अल-विदाई ख़ुत्बा

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने बीमारी के दौरान मिम्बर पर बैठकर जो बातें कहीं, उनमें एक मौक़े पर आपने फ़रमाया, “अल्लाह के बन्दों में से एक बन्दे को अल्लाह ने दुनिया और अल्लाह के पास जो चीज़ें हैं, में से किसी एक चीज़ को अपनाने का अधिकार दिया, तो उसने जो चीज़ अल्लाह के पास है उसे अपनाया।” हज़रत अबू बक्र इन शब्दों का मतलब समझ गए और उन्होंने महसूस किया कि यह असल में आपने अपने लिए कहा है। यह सोचकर वह रो पड़े और कहा, “नहीं, हमारी जानें और औलाद सब आप पर क़ुर्बान हैं।” आपने फ़रमाया, “अबू बक्र! ठहरो! जल्दी न करो। बेशक कोई आदमी ऐसा नहीं जिसने अपनी जान और माल से मुझ पर इतना एहसान किया है जितना अबू बक्र ने किया है, और अगर मैं लोगों में किसी को अपना ख़लील (ख़ास दोस्त) बनाता, तो अबू बक्र को अपना ख़लील बनाता, लेकिन इस्लाम का सम्बन्ध और इस्लाम से मुहब्बत सबसे अफ़ज़ल (उत्तम) है।”7 आपने यह भी फ़रमाया, “मस्जिद का हर दरीचा8 जिससे मेरा सामना होता है, बन्द कर दो, सिर्फ़ अबू बक्र का ख़ौख़ा (छोटा दरवाज़ा) बाक़ी छोड़ दो।”

अन्सार के साथ अच्छे बर्ताव की वसीयत

हज़रत अबू बक्र और हज़रत अब्बास रज़ि० एक बार अन्सार की एक महफ़िल से गुज़रे। उन्होंने देखा कि वह लोग रो रहे हैं। उन्होंने पूछा, “तुम लोग क्यों रो रहे हो?” अन्सार ने कहा, “हमें अल्लाह के रसूल सल्ल० का साथ और आपकी मजलिस याद आ रही है।” अल्लाह के रसूल सल्ल० को इसकी सूचना मिली तो आप बाहर आए। आपने सर को अपनी चादर के किनारे से ढक लिया था। फिर आप मिम्बर पर आए9 (उस दिन के बाद फिर आपको मिम्बर पर आने का मौक़ा नहीं आया), फिर आपने अल्लाह की तारीफ़ बयान की जो उसकी शान के लायक़ है।

उसके बाद इरशाद हुआ:

“मैं तुमको अन्सार के साथ (अच्छे बर्ताव की) वसीयत करता हूं। वह जिस्म व जान की तरह और मेरे विश्वसनीय व राज़दार हैं। उन पर जो ज़िम्मेदारी थी उसको उन्होंने पूरा किया, उनका जो दूसरों पर हक़ है वह बाक़ी है। इसलिए उनके अच्छे और नेक लोगों की बातें मान लेना और उनमें से जो लोग क़सूरवार हैं उनसे दरगुज़र (माफ़) करना।”

मुसलमानों की जमाअत पर आख़िरी निगाह

हज़रत अबू बक्र रज़ि० उसी तरह नमाज़ पढ़ाते रहे। सोमवार का दिन था। मुसलमान फ़र्ज़ नमाज़ के सफ़ में (पंक्तिबद्ध) खड़े थे कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अपने हुजरे (कक्ष) का पर्दा उठाया और कुछ देर तक आप यह मंज़र देखते रहे कि मुसलमान अपने रब के हुज़ूर किस तरह हाज़िर हैं, आपकी दावत और आपकी कोशिश क्या रंग लाई है और यह उम्मत किस तरह तैयार हुई है जो नमाज़ से इतना लगाव रखती है, और अपने नबी की मौजूदगी व ग़ैर-मौजूदगी दोनों हाल में उसी जोश व ख़ुशी के साथ अल्लाह के हुज़ूर हाज़िर है। यह ख़ुशगवार मंज़र देखकर आपकी आंखें ठंडी हुईं और आपको इत्मीनान हुआ कि इस दीन और अल्लाह से इसका संबंध स्थाई है, जो आपकी वफ़ात के बाद भी ख़त्म न होगा। यह मंज़र देखकर आपका चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा। सहाबा बयान करते हैं कि:

“अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत आइशा रज़ि० के हुजरे का पर्दा खोला और हमें खड़े हुए बराबर देखते रहे। ऐसा मालूम होता था कि आपका चेहरा एक खुली हुई किताब का पन्ना है। फिर आप मुस्कुराए और हंस पड़े। हमें यह ख़याल हुआ कि कहीं हम लोग भी ख़ुशी की वजह से आज़माइश में न पड़ जाएं और बेक़ाबू हो जाएं। हमें यह भी गुमान हुआ कि शायद आप नमाज़ के लिए बाहर आने वाले हैं। आपने इशारा फ़रमाया कि नमाज़ पूरी कर लो। इसके बाद आपने पर्दा गिरा दिया, और उसी दिन आपकी वफ़ात हुई।”

क़ब्रों की पूजा से रोक

अल्लाह के रसूल सल्ल० के आख़िरी शब्द यह थे, “अल्लाह यहूद व नसारा (ईसाई) को तबाह करे, उन्होंने अपने नबियों की क़ब्रों को पूजाघर बना लिया। अरब की धरती पर एक समय दो मज़हब न रहें।”

हज़रत आइशा रज़ि० व इब्न अब्बास बयान करते हैं कि जब वफ़ात का समय क़रीब आया तो एक काली धारीदार चादर आप पर पड़ी हुई थी। आप उसको कभी चेहरे पर डालते, कभी हटा देते। इसी हाल में आपने इरशाद फ़रमाया, “यहूद व नसारा पर अल्लाह की लानत (श्राप) हो, उन्होंने अपने नबियों की क़ब्रों को पूजाघर बना लिया।” आप मुसलमानों को इससे ख़बरदार फ़रमा रहे थे।

आख़िरी वसीयत

वफ़ात के क़रीब आपकी ज़्यादातर वसीयत यह थी, “देखो, नमाज़ का ख़याल रखना, अपने मातहतों और ग़ुलामों का।” यह आप बराबर फ़रमाते रहे, यहां तक कि ज़बान-ए-मुबारक से इन शब्दों का अदा करना कठिन हो गया। ऐसा लगा कि आप अन्दर से इन शब्दों को अदा करने की कोशिश कर रहे हैं। हज़रत अली रज़ि० बयान करते हैं, “आपने इस मौक़े पर नमाज़ और जमाअत तथा मातहतों और ग़ुलामों के साथ अच्छा बर्ताव करने की वसीयत फ़रमाई।”

हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं, “मैं क़ुरआन पाक की आख़िरी दो सूरह पढ़कर दम करने लगी कि आपने आसमानों की तरफ़ निगाह उठाई और फ़रमाया, ‘सबसे आला (सर्वोत्तम) रफ़ीक़ (दोस्त) के पास, सबसे आला रफ़ीक़ के पास।’

“इसी समय अब्दुर्रहमान बिन अबी बक्र दाख़िल हुए। उनके हाथ में मिस्वाक (पीलू की) की ताज़ी टहनी थी। आपने उसको एक नज़र से देखा। मैंने सोचा कि शायद आपको इसकी ज़रूरत है। अतएव मैंने अब्दुर्रहमान से टहनी लेकर दातून तैयार की और आपको दी। आपने उससे बहुत अच्छी तरह दांत साफ़ किए, फिर मुझे वापस करने लगे, लेकिन वह आपके हाथ से छूट गई।”

वह फ़रमाती हैं, “आपके सामने पानी का कटोरा था। आप अपने हाथ पानी के अन्दर डालते और चेहरे पर फेर लेते और फ़रमाते, ‘अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। सकरात-ए-मौत बरहक़ है।’ फिर आपने बाईं उंगली ऊपर उठाई और फ़रमाने लगे, ‘सबसे आला रफ़ीक़ के पास, सबसे आला रफ़ीक़ के पास।’ यहां तक कि रूह (आत्मा) परवाज़ (निकल) कर गई और आपका हाथ पानी में एक तरफ़ झुक गया।”

हज़रत आइशा रज़ि० फ़रमाती हैं, “जिस समय जुदाई की घड़ी क़रीब आई उस समय आपका सर मेरी रान (जांघ) पर था। एक घड़ी के लिए आप पर बेहोशी तारी हुई, फिर आपको होश आ गया और आपने घर की छत की तरफ़ अपनी नज़र उठाई और फ़रमाया, ‘बेशक, सबसे आला व बरतर रफ़ीक़ के पास।’ यह वह आख़िरी शब्द थे जो वफ़ात के वक़्त आप सल्ल० की ज़बान से अदा हुए।”

आप दुनिया से किस हाल में गए

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जब इस दुनिया से पर्दा फ़रमाया, उस समय पूरा अरब प्रायद्वीप आपके अधीन था। दुनिया के बादशाह आपका रोब मानते थे, और आपके साथी आप पर अपना सब कुछ क़ुर्बान करने को तैयार रहते थे। इन सबके बावजूद आप दुनिया से इस हाल में गए कि एक दीनार या एक ग़ुलाम या एक बांदी कोई चीज़ भी अपने पीछे नहीं छोड़ी। सिर्फ़ आपका एक सफ़ेद ख़च्चर था, आपके हथियार थे और एक ज़मीन का टुकड़ा जिसे आपने सदक़ा (दान) कर दिया था।

आपकी वफ़ात के समय आपकी ज़िरह (कवच) एक यहूदी के पास 30 ‘साअ’ (तौल का पैमाना) जौ पर रहन रखी हुई थी, और आपके पास कोई चीज़ ऐसी न थी कि आप उसे देकर ज़िरह को छुड़ा सकते, यहां तक कि आप दुनिया से तशरीफ़ ले गए। आपने अपनी वफ़ात के मर्ज़, यानी बीमारी की हालत में 40 ग़ुलामों को आज़ाद फ़रमाया। आपके पास 6 या 7 दीनार थे। हज़रत आइशा को हुक्म हुआ कि उनको भी सदक़ा कर दें।

हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० की वफ़ात इस हालत में हुई कि मेरे घर में कोई चीज़ न थी जिसको कोई जानवर खा सकता। थोड़ा सा जौ मेरी अलमारी पर रखा हुआ था। मैंने इसी में से कुछ खाया, वह बहुत दिन चला, यहां तक कि मैंने एक दिन उसकी नाप-तौल की, बस उसी दिन के बाद वह ख़त्म हो गया।”

आपकी वफ़ात सोमवार को 12 रबीउल अव्वल सन् 11 हिजरी को दोपहर ढलने के बाद हुई।10 उस समय आपकी उम्र 63 वर्ष की थी। मुसलमानों के लिए यह बहुत ही दुख का दिन था। हज़रत अनस रज़ि० व अबू सईद ख़ुदरी बयान करते हैं, “जिस दिन अल्लाह के रसूल सल्ल० मदीना आए थे तो मदीना की हर चीज़ चमक उठी थी, और जिस दिन आपकी वफ़ात हुई उसी दिन उसकी हर चीज़ अंधेरे में आ गई।” उम्मे ऐमन भी रो रही थीं। लोगों ने वजह पूछी तो उन्होंने जवाब दिया कि “बेशक मुझे मालूम था कि अल्लाह के रसूल सल्ल० इस दुनिया से चले जाएंगे, लेकिन मैं इस बात पर रो रही हूं कि ‘वह्य’ (अल्लाह का पैग़ाम आना) का सिलसिला हमसे हमेशा के लिए टूट गया।”

सहाबा ने वफ़ात की ख़बर कैसे सुनी

आपकी वफ़ात की ख़बर सहाबा पर बिजली बनकर गिरी। इसकी वजह उनका वह आशिक़ाना सम्बन्ध था जिसका उदाहरण नहीं मिलता। वह आपकी छत्र-छाया में इस तरह रहने के आदी हो गए थे जैसे मां-बाप की छत्र-छाया में बच्चे रहते हैं। क़ुरआन पाक में आता है:

इनमें से प्रत्येक व्यक्ति समझता था कि वह आपकी निगाह में सबसे अधिक प्रिय है। कुछ सहाबा को यक़ीन ही नहीं होता था कि आपकी वफ़ात हो गई। हज़रत उमर रज़ि० मस्जिद-ए-नबवी में आए। उन्होंने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा, “अल्लाह के रसूल सल्ल० की वफ़ात उस समय तक न होगी जब तक अल्लाह मुनाफ़िक़ों को ख़त्म नहीं कर देगा।”

हज़रत अबू बक्र का साहसी क़दम

हज़रत अबू बक्र, जो मदीना के पास किसी बस्ती में थे, को जब आपकी वफ़ात की ख़बर मिली तो उसी समय वह आए और मस्जिद-ए-नबवी के दरवाज़े पर पल भर के लिए रुके। उस समय हज़रत उमर लोगों को सम्बोधित कर रहे थे। हज़रत अबू बक्र सीधे हज़रत आइशा के घर पहुंचे। अल्लाह के रसूल सल्ल० पर एक चादर पड़ी हुई थी। उन्होंने ज़रा सी चादर सरकाई और झुककर आप सल्ल० के चेहरे को चूमा और कहा, “मेरे मां-बाप आप पर क़ुर्बान! मौत का मज़ा तो अल्लाह ने आपकी तक़दीर में लिखा था, आपने चख लिया। अब आपको कभी भी मौत की तकलीफ़ न होगी।” इसके बाद उन्होंने चादर से आपका चेहरा ढक दिया और मस्जिद-ए-नबवी आए। हज़रत उमर रज़ि० लोगों से बात कर रहे थे। हज़रत अबू बक्र ने कहा, “उमर! ज़रा ठहरो।” लेकिन जोश में हज़रत उमर ने उनकी बात नहीं सुनी। जब हज़रत अबू बक्र ने देखा कि वह ख़ामोश नहीं हो रहे हैं तो मजमे की तरफ़ मुड़कर अपनी बात शुरू की। लोगों ने उनकी बात सुननी शुरू कर दी। हज़रत अबू बक्र ने अल्लाह की तारीफ़ बयान करने के बाद फ़रमाया, “लोगो! अगर कोई मुहम्मद सल्ल० की इबादत करता था तो (उसको मालूम हो जाए) निःसन्देह उनकी वफ़ात हो गई, और अगर कोई अल्लाह की इबादत करता था तो (इत्मीनान रखे कि) अल्लाह ज़िन्दा है, उसके लिए मौत नहीं है।” फिर उन्होंने सूरह आले इमरान की आयत नम्बर 144 पढ़ी, जिसका अनुवाद इस तरह है:

जो लोग इस मौक़े पर हाज़िर थे उनका बयान है, “अल्लाह की क़सम! जब हज़रत अबू बक्र ने यह आयत पढ़ी तो ऐसा महसूस हुआ कि आयत अभी-अभी उतरी है, और हज़रत अबू बक्र ने उनके मुंह की बात कह दी।” हज़रत उमर बयान करते हैं, “मैंने जब अबू बक्र को यह आयत पढ़ते सुना तो हैरान होकर मैं ज़मीन पर गिर गया, मेरे पैरों की ताक़त ख़त्म हो चुकी थी। उस समय मानो मुझे पता चला कि अल्लाह के रसूल सल्ल० की वफ़ात हो गई।”

हज़रत अबू बक्र के हाथ पर ख़िलाफ़त की शपथ

इसके बाद सभी मुसलमानों ने बनू साइदा11 के सभागार में हज़रत अबू बक्र के हाथ पर ख़िलाफ़त की बैअत की। जल्दी इसलिए की गई कि शैतान को उनके दिलों में फूट डालने का मौक़ा न मिले और मुनाफ़िक़ सर न उठा सकें, तथा अल्लाह के रसूल सल्ल० अपने आख़िरी सफ़र पर इस हाल में रवाना हों कि मुसलमान एक धागे से जुड़े हों, उनका अमीर (नेतृत्व करने वाला) मौजूद हो और उनके सारे मामलों की देख-भाल कर रहा हो, यहां तक कि ख़ुद अल्लाह के रसूल सल्ल० का कफ़न-दफ़न मुसलमानों के ख़लीफ़ा के हाथ अंजाम पाए।

मुसलमानों ने अपने रसूल सल्ल० को कैसे विदा किया

इसके बाद हालात सामान्य हो गए और सहाबा उन कामों को पूरा करने में लग गए जो आप सल्ल० ने उनको सिखाए थे।

अल्लाह के रसूल सल्ल० को नहलाने और कफ़नाने का काम आपके परिवार के सदस्यों ने किया। इसके बाद आपके जनाज़े को घर ही में रख दिया गया। इस मौक़े पर हज़रत अबू बक्र ने कहा कि उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० को यह कहते हुए सुना है कि “जिस नबी का भी निधन हुआ उसको उसी जगह दफ़न किया गया जहां उसकी वफ़ात हुई।” अतएव आपका बिस्तर जिस पर आपकी वफ़ात हुई थी उठा दिया गया और ठीक उसके नीचे क़ब्र खोदी गई। यह काम अबू तलहा अन्सारी ने किया।

इसके बाद लोगों ने जमाअतों की शक्ल में आना शुरू किया। एक जमाअत आती और जनाज़े की नमाज़ अदा करती। उसके बाद दूसरी जमाअत आकर नमाज़ पढ़ती। पहले मर्द दाख़िल होते रहे, उसके बाद औरतों को दाख़िले की इजाज़त दी गई। उनके बाद बच्चों को इजाज़त हुई और उन्होंने भी आपके जनाज़े की नमाज़ पढ़ी। लोगों ने किसी को इन नमाज़ों का इमाम नहीं बनाया। यह बात मंगलवार की है।

यह मदीना का एक दुखदायी दिन था। जब हज़रत बिलाल ने फ़ज्र की अज़ान दी तो अल्लाह के रसूल सल्ल० को याद करके रोने लगे और उनकी हिचकियां बंध गईं। यह देखकर दुखी मुसलमान और गहरे दुख में डूब गए। उनके कान इस अज़ान को इस हाल में सुनते थे कि अल्लाह के रसूल सल्ल० उनके बीच होते थे। आज हालत बिल्कुल उल्टी हुई थी।

उम्मे सलमा रज़ि० कहती थीं, “यह कितनी सख़्त मुसीबत थी! जब हमको यह मुसीबत याद आती है तो हर मुसीबत हेच और आसान मालूम होती है।”

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ुद अपने बारे में फ़रमाया, “ऐ लोगो! तुममें से किसी को भी कोई मुसीबत पहुंचे तो वह उस मुसीबत के लिए, जो उसको दूसरे के निधन से पेश आ रही है, उस मुसीबत से तसल्ली हासिल करे जो मेरी वफ़ात से इसको पेश आई है, इसलिए कि मेरी उम्मत में किसी व्यक्ति को मेरी वफ़ात के दुख से बढ़कर कोई मुसीबत पेश न आएगी।”

जब लोग आपको दफ़ना चुके तो हज़रत फ़ातिमा रज़ि० ने हज़रत अनस रज़ि० से कहा, “अनस! क्या तुम्हारे दिलों ने यह गवारा (सहन) कर लिया कि आप सल्ल० के पवित्र बदन पर मिट्टी डालो?”

टिप्पणियां

  1. 1रमज़ान के महीने में आख़िरी दहाई (20 रमज़ान की शाम से ईद का चांद होने तक) में मस्जिद में अल्लाह के दर पर पड़ा रहना। विस्तार के लिए लेखक की किताब ‘अरकान-ए-अरबा’ देखें।
  2. 2तिलावत: क़ुरआन का पाठ।
  3. 3इब्न अब्बास के अनुसार इसमें इशारा आप सल्ल० की वफ़ात की तरफ़ है। इमाम अहमद, इब्न अब्बास के हवाले से कहते हैं कि जब यह आयत उतरी तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “मुझे (इस सूरह में) अपनी वफ़ात की ख़बर दी गई है।”
  4. 4सही मुस्लिम शरीफ़ में जाबिर रज़ि० के हवाले से आया है कि आपने ‘जमरतुल अक़बा’ के क़रीब रुककर हम लोगों से फ़रमाया, “मुझसे हज के मनासिक सीख लो, इसलिए कि शायद इस साल के बाद मुझे हज का मौक़ा न मिले।”
  5. 5मदीना का क़ब्रिस्तान।
  6. 6वह रग जो पीठ से निकलकर दिल में जाती है। अगर वह कट जाए तो आदमी मर जाता है।
  7. 7सही बुख़ारी, किताबुस्सलात।
  8. 8दरवाज़ा।
  9. 9सामान्यतः इसी को आपका आख़िरी ख़ुत्बा माना गया है, जो गुरुवार को ज़ुहर की नमाज़ के बाद आपने दिया था। अनस बिन मालिक के हवाले से।
  10. 10कुछ जगहों पर ‘ज़ुहा’ का शब्द आया है, जिसका अर्थ है दोपहर से पहले।
  11. 11सक़ीफ़ा बनू साइदा का चबूतरा, जिस पर छप्पर पड़ा था और मदीनावासी सार्वजनिक मामलों को हल करने के लिए वहां जमा थे।