अध्याय एक

अज्ञानता का युग

छठी शताब्दी ईस्वी के धर्मों तथा उनके मानने वालों पर एक निगाह

छठी शताब्दी ईस्वी में दुनिया के बड़े धर्म, प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ और उनके उपदेश व सिद्धान्त (जिन्होंने धर्म, आचरण और ज्ञान के क्षेत्र में विभिन्न मौक़ों पर अपनी अहम भूमिका निभाई थी) बच्चों का खिलौना बन चुके थे, और बदलाव व परिवर्धन के समर्थकों, मुनाफ़िक़ों (दोहरी नीति रखने वालों), नास्तिकों व आत्माविहीन धार्मिक नेताओं के लालच का निशाना और काल के गाल का शिकार हो चुके थे, और उनके असल रूप को पहचानना नामुमकिन-सा था। अगर उन धर्मों के प्रवर्तक तथा उनके नबी दोबारा वापस आकर उस हालत को देखते तो उन धर्मों को स्वयं न पहचान पाते और उनको अपने से जोड़ने पर कभी तैयार न होते।1

यहूदी धर्म

यहूदी धर्म कुछ बेजान रीतियों और परम्पराओं का नाम था जिसमें ज़िंदगी की कोई चमक-दमक बाक़ी नहीं थी। यहूदी धर्म ख़ुद अपने में एक नस्ली धर्म है जिसके पास दुनिया के लिए कोई दावत तथा मानवता के दुखों का कोई इलाज नहीं है।

इस धर्म का एकेश्वरवाद में यक़ीन भी (जो विभिन्न धर्मों एवं क़ौमों में इसका विशिष्ट चिह्न रहा है, जिसमें इसके आदर व सम्मान तथा बनी इस्राईल (इस्राईल की सन्तान) की अन्य क़ौमों पर इसकी प्राथमिकता का राज़ छिपा है, और जिसकी वसीयत हज़रत इब्राहीम और हज़रत याक़ूब ने अपने बेटों से की थी) अडिग नहीं रह सका। यहूदियों ने अपनी पड़ोसी क़ौमों के असर और उन पर विजय हासिल करने वाली क़ौमों के दबाव में उनकी बहुत-सी बातों आस्थाओं को मान लिया, और उनकी अनेक जाहिलाना रस्मों को अपना लिया। इस बात को कुछ इंसाफ़पसंद यहूदी इतिहासकारों ने ख़ुद माना है। Jewish Encyclopedia (Vol. XII) के पेज नं० 568-69 से एक पद का अनुवाद इस तरह है:

मूर्ति पूजा के ख़िलाफ़ नबियों का ग़ुस्सा यह बताता है कि देवताओं की पूजा इस्राईली जनता के दिलों में घर कर चुकी थी और बाबुल के देश-निकाले से वापस आने के समय तक पूरी तरह उसका अन्त नहीं हुआ था। अन्धविश्वास और जादू-टोने द्वारा अनेक जाहिलों वाले विचार एवं रस्में जनमानस ने दोबारा अपना ली थीं। तालमूद से भी इस बात की पुष्टि होती है कि मूर्ति पूजा में यहूद के लिए बड़ा आकर्षण था।

बाबुल की तालमूद (जो यहूदियों में बहुत ही पवित्र समझी जाती है और कभी-कभी तौरेत पर उसको प्राथमिकता दी गई है, वह छठी शताब्दी ई० में यहूदियों में लोकप्रिय व प्रचलित थी)। कम समझ, अशिष्ट शब्दों, ईश्वर के प्रति अशिष्ट व्यवहार, दीन-धर्म की सच्चाइयों के साथ मज़ाक़ के अजीब व ग़रीब नमूनों से भरी किताब को देखकर उस शताब्दी में यहूदी समाज के बौद्धिक पतन, धार्मिक दिलचस्पी के बिगाड़ का पूरा अंदाज़ा होता है।2

ईसाई धर्म

ईसाई धर्म अपने पहले ही दौर में उग्रवादियों के परिवर्धन, जाहिलों की व्याख्या तथा रूमी नसरानियों की मूर्ति पूजा का शिकार हो गया था। हज़रत मसीह अ० की सादा, पवित्र शिक्षाएं इस मलबे के नीचे दब गई थीं। ईमानदारी के साथ अल्लाह की इबादत की किरण घने बादलों के अन्दर छिप चुकी थी।

चौथी शताब्दी के अन्त में ईसाई समाज में तस्लीस की आस्था3 किस तरह रच-बस गयी थी, उसके बारे में एक ईसाई विद्वान ने लिखा है:

यह आस्था कि एक अल्लाह तीन सूत्रों (इकाइयों) से मिलकर बना है, ईसाई दुनिया की पूरी ज़िंदगी में चौथी शताब्दी के अन्त में ही रच-बस गयी थी, जिसको मसीही दुनिया सरकारी और मान्यता प्राप्त आस्था के तौर पर बहुत दिनों तक मानती रही, यहां तक कि 19वीं शताब्दी में इस आस्था के बदलाव तथा इस रूप तक पहुंचने का भेद खुला।4

उसी दौर के एक ईसाई इतिहासकार Rev. Houston Baxter ने ईसाई समाज में मूर्ति पूजा की शुरुआत तथा उसके नए-नए रूपों की (उनकी धार्मिक पहचान, उनके आचार-व्यवहार, त्योहारों एवं आयोजनों में) आंख बंद करके नक़ल करने, उनसे प्रभावित होकर या अज्ञानता में उनको अपनाने, नक़ल करने की भावना तथा इस मामले में ईसाइयों द्वारा नई-नई बातें गढ़ने का ख़ूब वर्णन किया है। उसने अपनी किताब The History of Christianity in the Light of Modern Knowledge (Glasgow, 1929, p. 407) में लिखा है:

मूर्ति पूजा ख़त्म तो हो गई मगर तबाह नहीं हुई, बल्कि ग़ायब हो गई। लगभग सब ही कुछ जो मूर्ति पूजा में था, ईसाइयत के नाम से चलता रहा। जिन लोगों को अपने देवताओं और लोकनायकों से हाथ धोना पड़ा था, उन्होंने अनजाने तौर पर बहुत आसानी से किसी शहीद को पुराने देवताओं के गुणों से युक्त बताकर किसी स्थानीय मूर्ति को उसका नाम दे दिया, और इस तरह काफ़िराना रीति और देवमाला इन स्थानीय शहीदों के नाम से जुड़ गई तथा अल्लाह के गुणों से युक्त वलियों की आस्था की बुनियाद पड़ गई। इन वलियों ने एक तरफ़ तो अरीयोसीन की आस्था के आधार पर इन्सान और अल्लाह के बीच ईश्वरीय गुण रखने वाले इन्सानों की शक्ल अपना ली, और दूसरी तरफ़ यह मध्य युग की पवित्रता एवं पारसाई के निशान बन गए। मूर्ति पूजा करने वाले त्योहार अपनाकर उनके नाम बदल दिए गए, यहां तक कि सन् 400 ई० तक पहुंचते-पहुंचते सूरज देवता के प्राचीन त्योहार ने मसीह के जन्मदिन का रूप अपना लिया।

जब छठी शताब्दी ई० शुरू हुई, उस समय सीरिया व इराक़ के ईसाइयों तथा मिस्र के ईसाइयों के बीच लड़ाई अपनी चरम सीमा पर थी। यह लड़ाई हज़रत मसीह अ० की सच्चाई और अस्तित्व को लेकर हो रही थी। इसकी वजह से स्कूल और गिरजाघर सब कुछ युद्ध-क्षेत्र में बदल गए थे, जो एक-दूसरे की बुराई में लगे रहते और एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे थे। ऐसा मालूम पड़ता था कि यह दो धर्मों या दो विरोधी क़ौमों की लड़ाई है। इस वजह से ईसाइयों को इसकी फ़ुर्सत न थी कि पूरी दुनिया में हो रहे बिगाड़ की रोकथाम और सुधार की कोशिश करते और मानवता को भलाई का पैग़ाम देते।

मजूसी (ईरान के पारसी)

मजूसी (ईरान के पारसी) प्राचीन काल के चार तत्वों (जिसमें सबसे बड़ा तत्व आग था) की इबादत किया करते थे और उन्होंने इसके लिए ख़ास अग्निकुण्ड व पूजाघर बनाए थे। आग की पूजा देश के कोने-कोने में फैली थी। इसके लिए कठोर नियम तय किए गए थे, जिनको मानना ज़रूरी था। आग की पूजा और सूरज की इबादत के सिवा हर आस्था व धर्म वहां मिट चुका था। उनके नज़दीक धर्म की हैसियत कुछ रीतियों या कुछ प्राचीन रस्मों से अधिक न थी, जिनको वह ख़ास मौक़ों पर अदा करते थे। इबादतगाहों से बाहर वह बिलकुल आज़ाद थे, जहां वह अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ मनमानी ज़िंदगी बिताते थे। एक मजूसी और एक अधर्मी, आत्माविहीन व चरित्रहीन व्यक्ति में कोई फ़र्क़ बाक़ी नहीं रह गया था।

“ईरान ब अहदे सासानियान” (ईरान सासानी काल में) के लेखक आर्थर क्रिस्टेनसेन ने उस दौर के धार्मिक कामों और ज़िम्मेदारियों पर रोशनी डालते हुए लिखा है कि:

सरकारी कर्मचारियों के लिए ज़रूरी था कि वह दिन में चार बार सूरज की पूजा करें; चांद, आग और पानी की पूजा इसके अलावा थी। सोने-जागने, नहाने, जनेऊ पहनने, खाने-पीने, बाल बनवाने, नाख़ून कटवाने, शौच के लिए जाने और दिया (दीपक) जलाने, हर काम के लिए दुआएं थीं जिनका पढ़ना उन पर ज़रूरी था। उनको इसका भी हुक्म था कि आग किसी भी समय बुझने न पाए और आग-पानी एक-दूसरे से न मिलें। धातु को मोर्चा (ज़ंग) न लगे, इसलिए कि खनिज भी उनकी निगाह में पूज्य थे।

पृष्ठ 155

ईरान के लोग आग की तरफ़ रुख़ करके इबादत करते थे। ईरान के आख़िरी राजा यज़्दगर्द ने एक बार सूरज की क़सम खाते हुए यह कहा था, “मैं सूरज की क़सम खाता हूं जो सबसे बड़ा माबूद (पूज्य) है।” उसने उन ईसाइयों को, जिन्होंने ईसाइयत से तौबा कर ली थी, इसका पाबन्द किया था कि वह अपनी सच्चाई साबित करने के लिए सूरज की पूजा करें। (पृष्ठ 186-187)

ईरान वाले हर युग में सनवियत (दो ख़ुदाओं) का शिकार रहे, यहां तक कि यह उनकी पहचान बन गई। वह दो ख़ुदाओं के क़ायल थे: एक रोशनी या ख़ैर (अच्छाई) का ख़ुदा, जिसको वह अहुरमज़्दा या यज़दां कहते थे; दूसरा ज़ुल्मत या बुराई का ख़ुदा, जिसका नाम उन्होंने अहरमन रखा था। उनकी आस्था थी कि उन दोनों ख़ुदाओं के बीच आपस में टकराव और शक्ति-परीक्षण बराबर जारी है। (पृष्ठ 183-233)

ईरानी धर्मों के इन इतिहासकारों ने उनके माबूदों के बारे में जो कहानियां लिखी हैं और पूरा पुराण-शास्त्र (Mythology) तैयार कर दिया है, वह अपनी अजायबपसंदी और ब्योरे में यूनानी अथवा हिन्दुस्तानी देवमाला से किसी तरह कम नहीं। (पृष्ठ 204-209)

बौद्ध धर्म

बौद्ध धर्म, जो हिन्दुस्तान और मध्य एशिया में फैला हुआ था, वह भी एक ऐसे मूर्ति पूजा वाले धर्म में बदल चुका था कि बुत उसके साथ चलते थे। जहां उसके क़ाफ़िले का पड़ाव होता, वहां गौतम बुद्ध की मूर्ति स्थापित की जाती और देखते-देखते एक माबूद (पूज्य) तैयार हो जाता।

विद्वानों को इस धर्म और इसके संस्थापक के बारे में अभी तक यह शक है कि आसमान और ज़मीन और ख़ुद इन्सान के बनाने वाले ख़ुदा के अस्तित्व पर उनका अक़ीदा व ईमान था या नहीं। उनको हैरत है कि ईमान व आस्था के बिना यह महान धर्म कैसे क़ायम रह सका।

हिन्दू धर्म

जहां तक हिन्दू धर्म की बात है, तो वह देवी-देवताओं की कसरत (बाहुल्यता) में दूसरे धर्मों से बहुत आगे है। छठी शताब्दी में इस धर्म में मूर्ति पूजा अपनी चरम सीमा पर थी। माबूदों (पूज्यों) की संख्या उस शताब्दी में 33 करोड़ तक बताई जाती है। प्रत्येक महान, भयावह अथवा लाभ पहुंचाने वाली चीज़ की पूजा की जाती थी। मूर्तिकला भी अपनी चरम सीमा पर थी और उसमें नई बातें निकाली जाती थीं।

एक हिन्दू विद्वान सी० वी० वैद्य ने अपनी किताब History of Mediaeval Hindu India (Vol. I, Poona, 1921, p. 101) में राजा हर्ष (606–648 ई०) के बारे में लिखा है। याद रहे कि यह वह दौर है जिसके बाद ही अरब प्रायद्वीप में इस्लाम शुरू हुआ:

उस दौर में हिन्दू धर्म और बुद्धमत दोनों ही समान रूप से मूर्ति पूजा के समर्थक थे, बल्कि शायद बुद्धमत मूर्ति पूजा में हिन्दू धर्म से भी आगे बढ़ गया था। यह धर्म असल में अल्लाह के इन्कार से शुरू हुआ, लेकिन आख़िर में उसने बुद्ध को सबसे बड़ा ख़ुदा बना लिया। बाद में और दूसरे ख़ुदाओं, जैसे बोधिसत्व5 आदि, बढ़ते गए और विशेषकर महायान6 धर्म (स्कूल) में मूर्ति पूजा ने पुख़्ता तौर पर अपने क़दम जमा लिए। हिन्दुस्तान में इसे इतनी पहचान मिली कि कुछ पूर्वी भाषाओं में बुद्ध का नाम ही बुत का पर्यायवाची हो गया।

इसमें शक नहीं किया जा सकता कि मूर्ति पूजा उस दौर में पूरी दुनिया में फैली हुई थी। हिन्द महासागर से प्रशान्त महासागर तक दुनिया मूर्ति पूजा में डूबी थी। ईसाई व सामी धर्म, बुद्धमत मानो बुतों के प्रति श्रद्धा में एक-दूसरे से आगे बढ़ जाने की कोशिश में लगे थे।

L. S. S. O’Malley, C.I.E., I.C.S. अपनी किताब Popular Hinduism: The Religion of the Masses (Cambridge, 1935, pp. 6-7) में लिखते हैं कि:

ख़ुदा गढ़ने की क्रिया यहीं पर ख़त्म नहीं हो गई, बल्कि विभिन्न दौर में इस ख़ुदाई अकादमी या कौंसिल में इतनी बड़ी संख्या की बढ़ोतरी हो गई कि इसकी गणना कठिन है। इनमें बहुत-से हिन्दुस्तान के प्राचीन वासियों के माबूद थे, जिनको हिन्दू धर्म के देवताओं और ख़ुदाओं के साथ शामिल कर लिया गया था। इनकी कुल संख्या तीन करोड़ बताई जाती है।

अरब

जहां तक उन अरबों का सम्बन्ध है जो प्राचीन युग में इब्राहीमी दीन के मानने वाले थे और जिनके यहां अल्लाह का सबसे पहला घर बना, नुबूवत और नबियों के दौर से दूरी तथा अरब प्रायद्वीप में बन्द रहने की वजह से बहुत घटिया दर्जे की मूर्ति पूजा से घिरे थे, जिसका उदाहरण हिन्दुस्तान के बुतपरस्तों और मुशरिकों के अलावा कहीं और नहीं मिलता। वह शिर्क7 में भी बहुत आगे थे और अल्लाह को छोड़कर उन्होंने बहुत-से माबूद बना लिए थे। वह आस्था रखते थे कि यह अपने से बनाए माबूद क़ुदरत के बंदोबस्त में अल्लाह के साथ शामिल हैं और लाभ-हानि पहुंचाने तथा ज़िन्दा रखने व मारने की अपने में ताक़त रखते हैं। इसलिए पूरी अरब क़ौम बुतों की पूजा में डूब चुकी थी। हर क़बीले और क्षेत्र का अलग-अलग माबूद था, बल्कि यह कहना सही होगा कि हर घर बुतख़ाना था।

ख़ुद काबा के अन्दर और उसके आंगन में (जिसको हज़रत इब्राहीम अ० ने सिर्फ़ अल्लाह पाक की इबादत के लिए बनाया था) 360 बुत थे। वह बुतों और माबूदों की इबादत से आगे बढ़कर हर तरह के पत्थरों को पूजने लगे थे, तथा फ़रिश्तों, जिन्नों और सितारों को भी अपना माबूद समझते थे। उनकी आस्था थी कि फ़रिश्ते ख़ुदा की बेटियां हैं, जिन्न ख़ुदा के शरीक हैं। इस वजह से वह उनकी ताक़त और असर को मानते थे और उनकी इबादत करना ज़रूरी समझते थे।

दुनिया के अन्य देशों और क़ौमों पर एक निगाह

यह उन धर्मों का हाल था जो अपने-अपने दौर में अल्लाह की तरफ़ बुलाने के लिए आए थे। जहां तक उन सभ्य देशों का सम्बन्ध है जहां महान साम्राज्य क़ायम थे, ज्ञान व कला-कौशल का बाज़ार गरम था और जो सभ्यता व संस्कृति, कारोबार व व्यवसाय तथा ज्ञान व कला-कौशल के केन्द्र समझे जाते थे, वहां धर्मों का रूप बिगड़ चुका था और उन्होंने अपनी सच्चाई, महत्व, मूल्य, शक्ति व उपयोगिता खो दी थी। सुधारकों और आचार्यों का दूर-दूर तक पता न था।

पूर्वी रूमी सल्तनत

पूर्वी रोमन साम्राज्य में टैक्सों की इतनी भरमार थी कि देशवासी अपनी हुकूमत पर विदेशी हुकूमत को प्राथमिकता देने लगे थे। बार-बार क्रांति और बग़ावतें होती थीं। सिर्फ़ 533 ई० के एक दंगे में कुस्तुनतुनिया के 30 हज़ार नागरिकों का क़त्ल कर दिया गया। उनकी सबसे बड़ी दिलचस्पी किसी न किसी साधन से माल हासिल करना, फिर भोग-विलास में उसको ख़र्च करना था। मनोरंजन और भोग-विलास में वह इतना आगे बढ़ गए थे कि उसकी सीमाएं दानवता को छूने लगी थीं।

T. Walter Wallbank और Alastair M. Taylor ने अपनी किताब Civilization: Past and Present (1954, pp. 261-262) में बाज़नतीनियों के समाज में इस अजीब विरोधाभास, नैतिक पतन तथा भोग-विलास पर रोशनी डालते हुए लिखा है कि:

बाज़नतीनियों के सामाजिक जीवन में बड़ा विरोधाभास पाया जाता था। मज़हबीपन उनके मन में घर कर चुका था। दुनिया से दूरी एवं संन्यास की भावना पूरे राज्य में रच-बस गई थी। आम नागरिक भी धार्मिक बहस में गहरी दिलचस्पी लेता था। जन साधारण के दैनिक जीवन पर रहस्य-उद्घाटन में दिलचस्पी एवं अन्तःकरण से लगाव की छाप लगी हुई थी, लेकिन इसके विपरीत यही लोग हर तरह के खेल-तमाशों के असाधारण रूप से शौक़ीन भी थे। बड़े-बड़े सर्कस के मैदान थे जिनमें 80 हज़ार लोगों के बैठने की जगह थी, जहां रथों की दौड़ के मुक़ाबले हुआ करते थे। जन साधारण को “नीले” और “हरे” दो वर्गों में बांट दिया गया था। बाज़नतीनियों में ख़ूबसूरती से प्रेम भी था और ज़ुल्म की आदत भी। उनके खेल-तमाशे आम तौर से ख़ून-ख़राबे वाले एवं दुखदायी होते थे। उनके दुख भयानक तथा उनके अमीरों की ज़िंदगी भोग-विलास, बनाव-शृंगार तथा बुराइयों से युक्त थी।

मिस्र (जो दौलतमन्द बाज़नतीनी साम्राज्य का एक प्रांत था) सबसे ख़राब धार्मिक ज़ुल्मों और राजनीतिक सामन्तशाही का शिकार था, साथ ही वह बाज़नतीनी सल्तनत की ख़ुशहाली का एक बड़ा स्रोत भी था। उसका उदाहरण उस गाय की तरह था जिसको अच्छी तरह दुहा जाए और चारा कम से कम दिया जाए।

शाम (सीरिया), जो बाज़नतीनी साम्राज्य का दूसरा प्रांत था, रोम वालों की विस्तारवादी नीति का शिकार था, जहां सिर्फ़ लाठी के ज़ोर पर विदेशियों की तरह हुकूमत की जाती थी और जनता प्यार व मुहब्बत से सदा वंचित रहती थी। ग़रीबी का हाल यह था कि आम तौर पर वहां के वासी अपना क़र्ज़ चुकाने के लिए अपने बच्चों को बेच देते थे। तरह-तरह के ज़ुल्म, अधिकारों के हनन, ग़ुलाम बनाने और बेगार लेने की प्रथा आम थी।

ईरानी साम्राज्य

ज़रतुश्त धर्म, जिसने मज़दाइयत की जगह ली, ईरान का प्राचीन धर्म है। इस धर्म के संस्थापक ज़रतुश्त सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में सामने आए। ईरानी साम्राज्य पूर्वी रोमन साम्राज्य से (रोमतुल कुबरा से अलग होने के बाद) अपने क्षेत्रफल, आय के साधनों तथा शान व शौकत में अधिक बड़ा था। उसकी बुनियाद 224 ई० में अर्दशीर के हाथों पड़ी। इसके विकास काल में असीरिया, ख़ूज़िस्तान, मीडिया, फ़ारस, आज़रबाइजान, तबरिस्तान, सरख़स, मरजान, किरमान, मर्व, बल्ख़, सुग़्द, सीस्तान, हिरात, ख़ुरासान, ख़्वारिज़्म, इराक़ और यमन सब इसके इलाक़े में शामिल थे। किसी समय सिन्ध नदी के मध्यवर्ती ज़िले और उसके मुहाने के क़रीबी सूबे, जैसे कच्छ, काठियावाड़, मालवा और उनके परे के इलाक़े भी उसके अधीन थे।

तीसफ़ून (अल-मदाइन), जो इस साम्राज्य की राजधानी थी, नगरों का एक समूह था, जैसा कि इसके अरबी नाम से पता चलता है। यह नगर पांचवीं शताब्दी और उसके बाद के दौर में अपनी सभ्यता व विकास तथा भोग-विलास की चरम सीमा पर था।

ज़रतुश्त धर्म शुरू से ही उजाले-अंधेरे, भलाई के ख़ुदा और बुराई के ख़ुदा के बीच लगातार टकराव की बुनियाद पर आधारित था। तीसरी शताब्दी ई० में “मानी” इस धर्म के सुधारक के रूप में सामने आया। इसके बाद अर्दशीर पहले इस धर्म का अनुयायी और फिर इसका विरोधी हो गया, इसलिए कि मानी दुनिया से बुराई व बिगाड़ को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए ब्रह्मचर्य जीवन को ज़रूरी बताता था। उसका कहना था कि उजाले व अंधेरे का संगम अपने में ख़ुद एक बुराई है, जिससे इंसान को पहले छुटकारा पाना ज़रूरी है। उसने मरकर फ़ौरन परलोक पहुंचने, अमर होने और अंधेरे पर उजाले की जीत के लिए मानव जाति के सिलसिले को ख़त्म करने और विवाहित जीवन के संबंधों को ख़त्म करने का रास्ता अपनाया। उसने कई वर्षों तक निर्वासित (घर-बार से दूर) जीवन बिताया, फिर ईरान वापस आया और बहराम प्रथम के शासन काल में मारा गया, लेकिन उसकी शिक्षाएं उसकी मौत के बाद भी ज़िंदा रहीं तथा ईरानी विचारधारा और ईरानी समाज पर बहुत दिनों तक असर डालती रहीं।

पांचवीं शताब्दी ई० के शुरू में “मज़दक” सामने आया। उसने माल-दौलत और औरत में पूरी तरह रचने व भागीदारी का खुला आह्वान दिया, और यह चीज़ें सबके लिए बिना किसी रोक-टोक के जायज़ कर दी गयीं। उसकी विचारधारा ने जल्दी ही जड़ पकड़ ली। हालत यह हो गई कि लोग जिसके घर में जब चाहते बेधड़क घुस जाते और उसकी दौलत व औरत पर ज़बरन क़ब्ज़ा कर लेते। एक प्राचीन ईरानी दस्तावेज़, जो “नामा-ए-तन्सर” के नाम से जाना जाता है, में उन हालात को पेश किया गया है जो मज़दक शासन काल में थे। उसमें लिखा है कि:

नामूस अदब (आदर-सम्मान) का पर्दा उठ गया। ऐसे लोग पैदा हो गए जिनमें न शराफ़त थी न अमल (कर्म), न उनके पास पुश्तैनी जागीर थी और न उन्हें ख़ानदान व क़ौम का ग़म था। न वह पुरुषार्थी थे न कारोबारी, न उन्हें किसी तरह की चिन्ता थी और न उनका कोई पेशा था। चुगली और शरारत में चुस्त और निन्दा व आरोप में माहिर थे। यही उनकी आय का माध्यम था और इसी को वह दौलत व सम्मान का साधन बनाते थे।

आर्थर क्रिस्टेनसेन ने अपनी किताब “ईरान सासानियों के शासन काल में” में लिखा है कि:

नतीजा यह हुआ कि हर तरफ़ किसानों की बग़ावतें शुरू हो गयीं। लूटमार करने वाले, अमीरों के महल में घुस जाते थे, माल व दौलत लूटते थे, औरतों को पकड़ ले जाते थे और जागीरों पर क़ब्ज़ा कर लेते थे। ज़मीनें धीरे-धीरे वीरान हो गयीं, क्योंकि यह नए जागीरदार खेती करना नहीं जानते थे।

इन सब बातों से पता चलता है कि प्राचीन ईरान में उग्रवादी आंदोलनों और अपीलों को अपनाने की योग्यता थी और वह हमेशा तेज़ क्रिया-प्रक्रिया के असर में रहा था। लज़्ज़त की विचारधारा और सर्वोत्कृष्ट संन्यास व इच्छाओं के हनन के बीच हमेशा हिचकोले खाता रहा। कभी वह ख़ानदानी व पुश्तैनी जागीरदाराना बंदोबस्त या धार्मिक इज़ारादारी के दबाव में रहा, कभी बे-नकेल साम्यवाद और सामन्तशाही के भयानक साये में। इसी वजह से उसमें वह सन्तुलन और गम्भीरता कभी न पैदा हो सकी जो एक स्वाभाविक और सेहतमंद समाज के लिए ज़रूरी है।

इस साम्राज्य में (विशेषकर सासानी शासन काल में छठी शताब्दी तक) हालात बहुत ख़राब हो चुके थे। पूरा देश उन राजाओं के रहम व करम पर था जो पुश्तैनी तौर पर राज सिंहासन के मालिक बनते थे और अपने को जनसाधारण से ऊंचा समझते थे। बादशाह आसमानी ख़ुदाओं की नस्ल से माना जाता था। ख़ुसरो द्वितीय परवेज़ अपने नाम के साथ निम्नलिखित सम्मानजनक शब्द (अलक़ाब) लिखता था:

ख़ुदाओं में अमर मानव और इंसानों में अद्वितीय ख़ुदा, उसके नाम का बोलबाला, सूरज के साथ उदय होने वाला, रात की आंखों का उजाला।

देश की पूरी सम्पत्ति और आय के सभी संसाधन इन बादशाहों की सम्पत्ति समझे जाते थे। दौलत जमा करने, तोहफ़े और क़ीमती वस्तुएं जमा करने के पागलपन, जीवन-यापन के स्तर में उठान, नए-नए फ़ैशन, ज़िंदगी का मज़ा लूटने, अधिक दौलतमंद बनने और दुनिया के मज़े उड़ाने की होड़ इतनी बढ़ चुकी थी कि उस पर कल्पना की उड़ान और शायरी का शक होने लगता है। इसकी परिकल्पना वही व्यक्ति कर सकता है जिसने प्राचीन ईरान के साहित्य को गहराई से पढ़ा हो, तथा मदाइन (शहर), ऐवाने किस्रा (राजमहल), बहारे किस्रा (वह क़ालीन जिस पर बसंत के मौसम में ईरान के बादशाह मदिरा-पान किया करते थे), ताजे किस्रा, ईरानी बादशाहों से जुड़े नौकर-चाकर, बीवियों, लौंडियों, सेवकों, बावर्चियों, पशु-पक्षियों के सिधाने वाले, शिकार का सामान, बर्तनों आदि के बंदोबस्त से भली-भांति परिचित हो।

इसका अनुमान सिर्फ़ एक घटना से लगाया जा सकता है। इस्लामी विजय के फलस्वरूप ईरान का अंतिम शासक यज़्दगर्द जब अपनी राजधानी मदाइन से भागा, तो इस हालत में भी उसके साथ एक हज़ार गायक, एक हज़ार चीतों का बंदोबस्त करने वाले, एक हज़ार बावर्ची, शिकरों (चिड़ियों का शिकार करने वाला एक पक्षी) की देख-रेख करने वाले एक हज़ार सेवक, नौकर-चाकर तथा संगियों की बड़ी संख्या थी। इतने बड़े लश्कर के बाद भी वह इस संख्या को कम और ख़ुद को एक आम शरणार्थी समझता था। वह महसूस करता था कि सत्संगियों और कर्मचारियों की संख्या तथा भोग-विलास के सामान में कमी के कारण उसकी हालत बहुत ही दयनीय है।

दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता त्राहि-त्राहि करती और अपनी क़िस्मत को कोसती थी। उन्हें ज़िंदा रहने के लिए कड़ी मेहनत और संघर्ष करना पड़ता था। तरह-तरह के टैक्सों और बंधनों ने उनकी ज़िंदगी को नर्क बना दिया था। वह जानवरों की तरह ज़िंदगी गुज़ारा करते थे। इस मुसीबत से तंग आकर, टैक्सों और फ़ौज में अनिवार्य भर्ती से घबराकर बहुत-से किसानों ने अपने खेतों को छोड़कर साहिबों (संन्यासी सूफ़ी बुज़ुर्गों) की ख़ानक़ाहों में पनाह ली। वह पूर्वी सासानी सल्तनत और पश्चिमी बाज़नतीनी सल्तनत की लम्बी चलने वाली ख़ूनी लड़ाइयों में (जो विभिन्न समयों में होती रहीं और उनका जनहित व जनता की रुचि से कोई लेना-देना नहीं था) ईंधन की तरह काम आते रहे।

हिन्दुस्तान

हिन्दुस्तान, जो प्राचीन युग में गणित, ज्योतिष, चिकित्सा और दर्शनशास्त्र में बहुत नाम रोशन कर चुका था, उसके बारे में इतिहासकारों की आम राय यह है कि उसका धार्मिक, नैतिक और सामूहिक रूप से सबसे अंधकारमय काल छठी शताब्दी ई० से शुरू होता है। भोग-विलास और बेहयाई से उनकी इबादतगाहें भी पाक नहीं रह गयी थीं और इन कामों में कोई बुराई नहीं समझी जाती थी, क्योंकि धर्म ने उनको पवित्रता एवं इबादत का रंग दे दिया था।8 औरत की कोई इज़्ज़त व क़ीमत बाक़ी नहीं रह गयी थी। पति अपनी पत्नी को जुए में हार जाता था।9 अगर उसका पति मर जाता था तो वह ज़िंदा होते हुए भी मरी होती थी; न शादी कर सकती थी, न उसे कोई सम्मान की निगाह से देखता था। अमीर घराने में पति के मरने के बाद औरत के सती हो जाने का चलन था। यह बुरा चलन अंग्रेज़ों के शासन काल के बाद ही ख़त्म हो सका।10

हिन्दुस्तान अपने पड़ोसियों और दुनिया के अन्य देशों की बिरादरियों में वर्ग-भेद और इंसानों के बीच भेदभाव करने में बहुत आगे था। यह एक कठोर और ज़ालिम सामाजिक व्यवस्था थी जिसमें नरमी और लचक की कोई गुंजाइश न थी। भेदभाव के इस व्यवहार को धर्म का संरक्षण हासिल था, और आर्य हमलावरों के शुभचिंतक, धर्म के ठेकेदार ब्राह्मणों के हित की भी यही मांग थी। यह वर्ण व्यवस्था उन पेशों की बुनियाद पर आधारित थी जो विभिन्न बिरादरियों और जातियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही थी। इसके पीछे उस देशी, राजनीतिक और धार्मिक क़ानून की ताक़त थी जिसे उन हिन्दू विधायकों ने बनाया था जो धार्मिक हैसियत के भी मालिक थे। यह क़ानून ज्यों का त्यों पूरे समाज पर लागू था और उसे ज़िंदगी की आचार संहिता समझा जाता था। इसने हिन्दुस्तान के लोगों को चार वर्गों में बांट दिया था:

  1. धर्म के इज़ारादार और पुरोहित, जिनको ‘ब्राह्मण’ कहा जाता था।
  2. सिपाही और फ़ौज में भर्ती होने वाले लोग, ‘क्षत्रिय’।
  3. खेती और कारोबार करने वाले लोग, ‘वैश्य’।
  4. नौकर-चाकर और सेवा करने वाले लोग, ‘दलित’ या ‘अछूत’।

यह अंतिम वर्ग (जो सबसे बड़ी संख्या में था) सर्वाधिक दलित था। इसके बारे में लोग समझते थे कि वह सृष्टि-निर्माता के पैरों से पैदा हुआ है, इसलिए उसका काम सिर्फ़ इन तीनों वर्गों की सेवा करना और आराम व राहत पहुंचाना है।

इस क़ानून ने ब्राह्मण को इतने अधिकार दे दिए थे और उन्हें इतना उच्च पद प्रदान किया था जिससे कोई दूसरा उनके बराबर न था। ब्राह्मण के सभी गुनाह माफ़ थे, चाहे वह तीनों लोक को अपने गुनाहों और दुराचारों से गंदा, तबाह व बर्बाद कर दे। उस पर कोई टैक्स नहीं लगाया जा सकता था। उसको किसी दशा में भी मौत की सज़ा नहीं दी जा सकती थी। इसके विपरीत दलित न कुछ कमा सकते थे न जमा कर सकते थे, न किसी ब्राह्मण के पास बैठ सकते थे न उसके शरीर को छू सकते थे, न पवित्र पुस्तकों का पढ़ना उनके लिए वैध था।11

पूरा देश फूट का शिकार था और टुकड़े-टुकड़े हो रहा था। इसमें सैकड़ों राज्य और शासन थे जो आपस में लड़ते रहते थे। अशांति और अव्यवस्था तथा जनता के प्रति लापरवाही और ज़ुल्म हर तरफ़ फैला हुआ था। इसके अलावा यह देश दुनिया से कटकर ज़िंदगी गुज़ार रहा था, उसमें ठहराव आ गया था। वह आदतों, परम्पराओं, रीति-रिवाजों के जाल में फंसा वर्ग-भेद और ऊंच-नीच का शिकार था। ख़ून-नस्ल और नसबी (वंशज) के भेदभाव से पीड़ित था। एक हिन्दू इतिहासकार विद्याधर महाजन (भूतपूर्व प्रो० इतिहास, पंजाब विश्वविद्यालय कालेज) इस्लाम के आगमन से पहले हिन्दुस्तान की हालत पर रोशनी डालते हुए लिखते हैं:

हिन्दुस्तान के लोग सारी दुनिया से कटे हुए थे। वह अपने आप में मगन और दुनिया के हालात से बेख़बर थे। इस बेख़बरी ने उनकी हालत बहुत कमज़ोर कर दी थी। उसमें ठहराव पैदा हो चुका था तथा पतन के लक्षण दिखाई पड़ने लगे थे। उस समय के साहित्य में कोई जान नहीं थी। वास्तुकला, चित्रकला और अन्य ललित कलाओं में भी गिरावट थी। जात-पात के बंधन कठोर थे। विधवाओं की शादी नहीं की जाती थी। खाने-पीने के सिलसिले में कठोर बंधन थे। अछूत बस्तियों के बाहर रहने पर मजबूर थे।12

अरब प्रायद्वीप

अरबों के चाल-चलन भी बहुत बिगड़ चुके थे। वह शराब पीते और जुए के रसिया थे। वह कितने जाहिल और दिल के कितने बुरे थे, इसका अंदाज़ा उनके लड़कियों को ज़िंदा दफ़न कर देने के चलन से किया जा सकता है। क़ाफ़िलों को लूटना और बेगुनाहों को मार डालना उनके शौक़ थे। औरत की उनके समाज में कोई इज़्ज़त न बची थी; घर के अन्य सामानों और जानवरों की तरह जहां चाहती वहां भेज दी जाती अथवा विरसे (उत्तराधिकार) में मिलती थी। कुछ पकवान पुरुषों के साथ विशेषकर जुड़े थे, औरतें उन्हें खा नहीं सकती थीं। मर्द जितनी औरतों से चाहता, शादी कर सकता था। कुछ लोग ग़रीबी और अन्य आर्थिक कठिनाइयों के डर से अपनी औलादों का क़त्ल कर डालते थे। जातिगत, नस्ली और ख़ानदानी भेदभाव बहुत अधिक था। लड़ाई उनकी घुट्टी में पड़ी थी। एक-दूसरे का क़त्ल करना उनके लिए खेल-तमाशा था। कोई आम-सी घटना अक्सर भयानक और लम्बी जंग की वजह बन जाती। कुछ लड़ाइयों का सिलसिला 40-40 साल चला और हज़ारों लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे।

यूरोप

यूरोपीय क़ौमें, जो उत्तर-पश्चिम में दूर तक बसी हुई थीं, अज्ञानता और निरक्षरता से घिरी थीं। भयानक लड़ाइयों में व्यस्त सभ्य संसार से बहुत पीछे तथा कला-कौशल के मैदान से बहुत दूर थीं। बाहर की दुनिया को न उनसे कोई सरोकार था, न उनको बाहर की दुनिया से कोई मतलब। उनके शरीर गन्दे और दिल व दिमाग़ अंधविश्वास से भरे हुए थे। वह पवित्रता का कम ध्यान रखते और पानी का प्रयोग कम से कम करते थे। उनके पादरी और राहिब शरीर को कष्ट पहुंचाते और इंसानों से दूर रहने में बहुत उग्र थे।13 उनके यहां अभी तक यही बात तय न हुई थी कि औरत इंसान है या हैवान (जानवर)? उसके अंदर भी आत्मा है या नहीं? उसको मिल्कियत और ख़रीदने-बेचने का हक़ हासिल है, या इनमें से वह किसी बात का हक़ नहीं रखती?

रॉबर्ट ब्रिफ़ॉल्ट ने अपनी किताब The Making of Humanity में लिखा है:

पांचवीं शताब्दी से लेकर दसवीं शताब्दी तक यूरोप पर गहरा अंधेरा छाया हुआ था, और यह अंधेरा और अधिक गहरा व भयानक होता जा रहा था। उस युग की असभ्यता और वहशत प्राचीन युग की सभ्यता और वहशत से कई गुना अधिक थी। इसका उदाहरण सभ्यता की एक बड़ी लाश के जैसा था जो सड़ गई हो। उसकी सभ्यता के निशान मिट रहे थे और उस पर पतन की मुहर लग चुकी थी। वे देश जहां यह सभ्यता फूली-फली और जो पिछले समय में विकास की चरम सीमा पर पहुंच गए थे, जैसे इटली, फ़्रांस आदि, वहां तबाही, वीरानी और अव्यवस्था का दौर-दौरा था।

घटाटोप अंधेरा और मायूसी का दौर

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि छठी शताब्दी ई०, जिसमें हज़रत मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अभ्युदय (पैग़म्बरी मिली) हुआ, इतिहास का सबसे ख़राब दौर था। वह इंसान के भविष्य और उसकी पहचान की दृष्टि से बहुत अंधेरे वाला और अफ़सोसनाक दौर था।

मशहूर अंग्रेज़ लेखक एच० जी० वेल्स ने भी सासानी और बाज़नतीनी शासन के वर्णन में उस युग का नक़्शा खींचा है। वेल्स ने लिखा है:

इन लड़ाई पर तुली और पतन की तरफ़ बढ़ रही हुकूमतों में साइंस और राजनीति दोनों मौत की नींद सो चुके थे। एथेन्स में बाद के दार्शनिकों ने अपनी तबाही तक, जो उन पर थोप दी गई थी, प्राचीन युग की साहित्यिक धरोहर को, हालांकि बिना सोचे-समझे, लेकिन बहुत ही आस्था से बचा रखा था। लेकिन अब दुनिया में इंसानों का कोई वर्ग ऐसा बाक़ी नहीं रहा था जो प्राचीन युग के शरीफ़ों की तरह बहादुर और साफ़ विचारों का समर्थक होता और पुराणों के लेखों की तलाश या विचारों को बहादुरी से पेश करने के लिए सक्षम होता। इस वर्ग के ख़त्म होने की मुख्य वजह राजनीतिक और सामाजिक अव्यवस्था थी। लेकिन एक कारण और भी था जिससे इस दौर में इंसानी अक़्ल कुन्द और बंजर हो चुकी थी। ईरान और बाज़नतीन दोनों देशों में अशिष्टाचार का दौर था। दोनों एक नई तरह की धार्मिक हुकूमतें थीं जिनमें विचारों की आज़ादी पर कड़े पहरे बिठा दिए गए थे।

बाज़नतीनी साम्राज्य पर ईरानी साम्राज्य के हमले और बाज़नतीनियों की कामयाबी का विस्तार से वर्णन करने के बाद, छठी शताब्दी ई० में सामाजिक व नैतिक पतन पर रोशनी डालते हुए लेखक ने लिखा है:

अगर कोई राजनीतिक पर्यवेक्षक सातवीं शताब्दी के शुरू में दुनिया की समीक्षा करता तो इस नतीजे पर पहुंचता कि सिर्फ़ कुछ एक सदियों की बात है कि पूरा यूरोप और एशिया मंगोलों के प्रभाव में आ जाएगा। पश्चिमी यूरोप में न कोई व्यवस्था थी और न एकता। बाज़नतीनी और ईरानी हुकूमतें एक-दूसरे को तबाह-बर्बाद करने पर तुली थीं। हिन्दुस्तान भी विभाजित और तबाह-हाल था।

विश्वव्यापी बिगाड़

हालांकि हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अभ्युदय के समय पूरी इंसानियत आत्महत्या के रास्ते पर तेज़ी से बढ़ रही थी। इंसान अपने बनाने वाले मालिक को भूल चुका था और ख़ुद अपने आपको और अपने भविष्य को भुला चुका था। उसके अंदर भलाई और बुराई, अच्छे और बुरे की पहचान करने की क्षमता नहीं बची थी। ऐसा मालूम होता था कि लोगों के दिल व दिमाग़ किसी चीज़ में खो चुके हैं। उनको दीन व आख़िरत (इस ज़िंदगी के बाद आने वाली ज़िंदगी) की तरफ़ सिर उठाकर देखने की फ़ुर्सत नहीं थी। आत्मा और अन्तःकरण की शांति, परलोक की भलाई, मानवता की सेवा और सुधार के लिए उनके पास एक पल ख़ाली नहीं था। कभी-कभी पूरे देश में एक व्यक्ति भी ऐसा दिखाई नहीं पड़ता था जिसको अपने दीन की फ़िक्र हो, जो एक अल्लाह को पूजता हो और किसी दूसरे को अल्लाह के साथ न जोड़ता हो, जिसकी अंतरात्मा में इंसानियत के लिए दर्द हो और उसके अंधेरे भविष्य के लिए बेचैनी हो। यह हालत अल्लाह पाक के इस इरशाद (कथन) को दर्शाती थी कि:

टिप्पणियां

  1. 1विस्तार में लेखक की पुस्तक “मंसबे नुबूवत और उसके आली मक़ाम हामिलीन” का व्याख्यान नं० 7 देखें।
  2. 2विस्तृत वर्णन के लिए देखें “यहूदी तालमूद की रोशनी में”, लेखक डा० रोलिंग।
  3. 3ईसाइयों का धार्मिक विश्वास कि हज़रत मसीह अ० अल्लाह के बेटे हैं, जिनका जन्म हज़रत मरियम की कोख से हुआ। (अनुवाद)
  4. 4New Catholic Encyclopedia, Vol. 14, p. 295.
  5. 5संस्कृत में भावी बुद्ध के लिए प्रयुक्त शब्द। (अनुवाद)
  6. 6बौद्ध मत के अनुयायियों की दो शाखाएं हैं: एक उदार दृष्टिकोण पर आधारित महायान, दूसरी संकुचित दृष्टिकोण पर आधारित हीनयान। (अनुवाद)
  7. 7अल्लाह की ज़ात में किसी को शामिल करना।
  8. 8सत्यार्थ प्रकाश, लेखक दयानन्द सरस्वती, पृ० नं० 344।
  9. 9महाभारत का प्रारम्भिक अध्याय।
  10. 10देखें फ़्रांसीसी यात्री बर्नियर का सफ़रनामा तथा मध्य युग के राजगान का इतिहास।
  11. 11देखें मनुशास्त्र, अध्याय 1, 2, 8, 9, 10, 11।
  12. 12मुस्लिम रूल इन इण्डिया, लेखक वी० डी० महाजन (नई दिल्ली, 1970, पृ० नं० 33)।
  13. 13देखें हिस्ट्री ऑफ़ यूरोपियन मॉरल्स, लेखक लेकी।