अध्याय सत्रह
ख़ैबर की जंग
अल्लाह का इनाम
अल्लाह ने हुदैबिया में बैअत-ए-रिज़वान में शामिल लोगों को, जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० की इताअत (आज्ञापालन) की थी, विजयश्री तथा बहुत सारी दौलत की भविष्यवाणी दी थी, क्योंकि उन्होंने अल्लाह के हुक्म को अपनी कामना व विवेक पर प्राथमिकता दी थी। क़ुरआन पाक में आता है:
यह इशारा ख़ैबर की कामयाबी की तरफ़ था। ख़ैबर एक यहूदी कॉलोनी थी जिसमें अनेक मज़बूत क़िले थे।1 ख़ैबर यहूदियों का सामरिक अड्डा और अरब प्रायद्वीप का आख़िरी क़िला था। यहां के यहूदी मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िश रचने में लगे रहते थे, और इस बात को कभी न भूलते थे कि उनके दूसरे भाइयों के साथ क्या हुआ है, वही सब कुछ उनके साथ भी पेश आ सकता है। वह क़बीला ग़तफ़ान के साथ मिलकर मदीना पर हमला करने की साज़िश कर रहे थे।2 अल्लाह के रसूल सल्ल० ने भी निश्चय कर लिया था कि अब उनसे और उनकी साज़िशों से छुटकारा पाना है और इस तरफ़ से इत्मीनान हासिल करना है। ख़ैबर मदीना के उत्तर-पूर्व में 70 मील की दूरी पर स्थित है।
इस जंग का मक़सद सिर्फ़ यहूदियों की उस ताक़त को तोड़ना ही नहीं था जो ख़ैबर में जमा हो गई थी, बल्कि हिजाज़ व नज्द के बीच उत्तर में एक शक्तिशाली क़बीला ग़तफ़ान की तरफ़ से भी इत्मीनान हासिल करना था, जो अरब क़बीलों में बहुत ही लड़ाकू क़बीला था।
नबी के नेतृत्व में इस्लामी लश्कर
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हुदैबिया से निकलकर मदीना में ज़िलहिज्जा का पूरा महीना और मुहर्रम का हिस्सा गुज़ारा और उसके बाद ख़ैबर की तरफ़ प्रस्थान किया। आमिर बिन अल-अकवा रज़ि० लश्कर के साथ थे और शेर पढ़ते थे। इन शेरों का मतलब इस तरह है:
“ऐ अल्लाह! अगर तू मार्गदर्शन न करता तो न हम हिदायत पाते, न ख़ैरात देते, न रोज़ा रखते।
हम वह लोग हैं कि जब कोई क़ौम हम पर चढ़ाई करती है और फ़साद पर आमादा होती है तो हम उससे साफ़ इन्कार कर देते हैं। तू हमारे ऊपर सकीना नाज़िल फ़रमा और मुक़ाबले के समय हमारे क़दमों को जमाए रख।”
अल्लाह के रसूल सल्ल० जिस लश्कर को लेकर ख़ैबर आए उसमें 1400 जवान और 200 घोड़े थे। जो लोग हुदैबिया में पीछे रहे थे आप सल्ल० ने उन्हें इस जंग में शामिल होने की इजाज़त नहीं दी। लश्कर के साथ 20 औरतें भी थीं जिनके ज़िम्मे मरीज़ों का इलाज, घायलों की मरहम-पट्टी तथा खाना-पानी का बंदोबस्त करना था।
आपने यहूद और क़बीला ग़तफ़ान के बीच स्थित ‘रजीअ’ में पड़ाव किया ताकि इन दोनों के बीच संचार व्यवस्था को काट दिया जाए, और यही हुआ। आपके लिए ख़ैबर का रास्ता साफ़ हो गया।
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने लश्कर के लिए रसद का बंदोबस्त करने का आदेश दिया तो सिर्फ़ सत्तू हासिल किया जा सका, इसलिए उसी पर सन्तोष किया गया। जब आप ख़ैबर पहुंचे तो आपने हाथ उठाकर अल्लाह से दुआ की, ख़ैबर की विजय का सवाल किया, और ख़ैबर तथा वहां के लोगों की बुराइयों से पनाह मांगी। आपकी आदत थी कि जब कभी आप किसी ग़ज़वे का इरादा करते तो रात को हमला न करते, बल्कि सुबह का इन्तिज़ार करते। अगर अज़ान की आवाज़ आपके कानों में आती तो आप ठहर जाते और हमला न करते। इसी तरह आपने यहां भी रात गुज़ारी। सुबह आप सल्ल० हमले की नीयत से आगे बढ़े। रास्ते में ख़ैबर के किसान-मज़दूर अपने फावड़े और झाबे लिए नज़र आए। आपको देखकर उन लोगों ने नारा लगाया, “मुहम्मद (सल्ल०) और लश्कर आ गया!” और वह वहां भाग खड़े हुए। यह देखकर आप सल्ल० ने फ़रमाया, “अल्लाह की शान! ख़ैबर बर्बाद हुआ। हम जब किसी क़ौम पर हमला करते हैं तो उनकी सुबह बुरी होती है, जिन्हें पहले ही डराया और आगाह किया जा चुका है।”
कामयाब सेनापति
हज़रत मुहम्मद सल्ल० ने सबसे पहले ख़ैबर के क़िलों को एक-एक करके जीतना शुरू किया। इन क़िलों में एक क़िला ऐसा था जहां मशहूर यहूदी घुड़सवार मरहब का सिंहासन था। उसे हज़रत अली रज़ि० ने फ़तह किया। यह क़िला मुसलमानों के लिए अजेय साबित हो रहा था और उनका बस इस पर नहीं चल रहा था। हज़रत अली रज़ि० की उस समय आंखें उठी हुई थीं। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया, “कल झण्डा वह व्यक्ति लेगा जिसे अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत है, उसके द्वारा यह क़िला फ़तह होगा।” यह सौभाग्य हासिल करने के लिए बड़े-बड़े सहाबी उम्मीदवार थे।
आप सल्ल० ने हज़रत अली रज़ि० को बुलवाया। उनकी आंखों में तकलीफ़ थी। वह आए तो आपने अपना थूक उनकी आंखों में लगाया और उनके हक़ में दुआ की। वह उसी वक़्त ऐसे अच्छे हुए कि मानो उनको दर्द ही न था। आपने झण्डा उनके हवाले किया। उन्होंने कहा, “क्या यहूदियों से उस वक़्त तक जंग करूं जब तक कि वह मुसलमान न हो जाएं?” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “यहां से प्रस्थान करके उनके सामने पड़ाव डालो, फिर उनको इस्लाम की दावत दो, और अल्लाह का इस सिलसिले में उन पर जो हक़ है उससे उनको आगाह करो। अल्लाह की क़सम! अगर तुम्हारे द्वारा अल्लाह उनके किसी एक आदमी को भी हिदायत दे दे तो यह तुम्हारे लिए लाल ऊंटों से भी अच्छा है।”3
हज़रत अली रज़ि० का यहूदी घुड़सवार से मुक़ाबला
हज़रत अली रज़ि० इस्लाम का झण्डा लेकर सेना के साथ क़िले पर पहुंचे तो एक मशहूर यहूदी घुड़सवार मरहब वीर रस की कविता पढ़ता हुआ मुक़ाबले के लिए आगे आया। उससे आपके दो-दो हाथ हुए। हज़रत अली रज़ि० ने उस पर तलवार की ऐसी चोट की कि तलवार उसके लौह-टोप व सर को काटती हुई दाढ़ तक उतर गई, और मुसलमानों की विजय हुई।4 मुहम्मद बिन मसलमा ने भी इस जंग में अपनी बहादुरी के जौहर दिखाए और अनेक योद्धाओं को मौत के घाट उतारा।
मेहनत कम, मज़दूरी ज़्यादा
ख़ैबर के एक हब्शी ग़ुलाम ने, जो अपने मालिक की बकरियां चराने पर नियुक्त था, यह देखा कि ख़ैबरवासी हथियार उठाए हुए हैं और जंग के लिए तैयार हैं, तो उसने पूछा कि “आप लोगों का क्या इरादा है?” उन्होंने कहा कि “हम उस व्यक्ति से जंग करने जा रहे हैं जो नबी होने का दावा करता है।” नुबूवत की बात ने उसके दिल पर ख़ास प्रभाव डाला और वह अपनी बकरियों के रेवड़ के साथ अल्लाह के रसूल सल्ल० की सेवा में हाज़िर हुआ और पूछा कि “क्या कहते हैं? और किस चीज़ की दावत दे रहे हैं?” आपने जवाब दिया कि “मैं इस्लाम की तरफ़ बुलाता हूं, और यह कि मैं अल्लाह का रसूल हूं, और अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करो।” ग़ुलाम ने कहा कि “अगर मैं यह गवाही दूं और अल्लाह पर ईमान ले आऊं तो मुझे क्या मिलेगा?” आपने फ़रमाया, “अगर तुम्हारी इस आस्था पर मौत आई तो तुम्हारे लिए जन्नत है।” वह यह सुनकर इस्लाम ले आया और फिर कहने लगा, “ऐ अल्लाह के नबी! मेरे पास यह बकरियां अमानत हैं। इनका क्या होगा?” आपने फ़रमाया, “तुम इनको मैदान में ले जाकर छोड़ दो। अल्लाह तुम्हारी यह अमानत अदा कर देगा।” उसने यही किया।
अल्लाह का करना कि यह बकरियां ख़ुद ही अपने मालिक के पास चली गईं, और उस यहूदी को पता चल गया कि उसका ग़ुलाम मुसलमान हो गया है। इस मौक़े पर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने खड़े होकर लोगों को सम्बोधित किया, उनको नसीहत दी और दुश्मन से जंग का शौक़ दिलाया। जब दोनों पक्ष मैदान-ए-जंग में उतरे तो इस्लाम के शहीदों में वह ग़ुलाम भी था। मुसलमान उसे उठाकर अपने ख़ेमे में ले गए। कुछ लोगों का कहना है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने शामियाना पर नज़र डाली, फिर अपने सहाबियों को सम्बोधित करते हुए कहा, “अल्लाह ने इस ग़ुलाम के साथ बड़ा करम फ़रमाया और इसको ख़ैबर पहुंचाया। मैंने देखा कि इसके सिरहाने जन्नत की दो हूरें (सुन्दरियां) मौजूद हैं, हालांकि उसने अल्लाह के लिए एक सजदा भी नहीं किया था।”
आपके साथ मैं इसलिए नहीं आया था
एक आराबी (बद्दू) हज़रत मुहम्मद सल्ल० के पास आया, ईमान लाया और आपकी पैरवी क़बूल की और कहा कि “मैं भी आपके साथ हिजरत करूंगा।” आपने सहाबा से कहा कि उसे अपने साथ रखें और उसका ध्यान रखें। ख़ैबर की जंग के मौक़े पर आपने कुछ माल-ए-ग़नीमत बांटा। यह आराबी उस वक़्त चरागाह गया हुआ था। जब वह वापस आया तो उसको उसका हिस्सा दिया गया। उसने कहा कि “यह क्या है?” सहाबा ने उसे बताया कि “यह तुम्हारा हिस्सा है जो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने तुम्हें दिया है।” वह इसे लेकर अल्लाह के रसूल सल्ल० की सेवा में हाज़िर हुआ और पूछा कि “या रसूलल्लाह सल्ल०! यह क्या चीज़ है?” आपने फ़रमाया, “यह तुम्हारा हिस्सा है।” उसने कहा कि “मैं इसके लिए आपके साथ नहीं आया था, मैंने तो आपकी पैरवी इसलिए की थी कि मुझे इस जगह (अपने गले की तरफ़ इशारा करते हुए उसने कहा) दुश्मन का कोई तीर लगे, मेरी मौत हो जाए और मैं जन्नत में पहुंच जाऊं।” आपने फ़रमाया, “अगर तुम्हारी नीयत सही है तो अल्लाह ऐसा ही करेगा।”
ख़ैबर की जंग के शहीद जब अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास लाए गए तो उसमें वह ख़ुशनसीब भी था। आपने पूछा, “क्या यह वही व्यक्ति है?” सहाबा ने जवाब दिया, “जी हां।” आपने फ़रमाया, “अल्लाह के साथ उसने सच्चाई का मामला किया तो अल्लाह ने भी उसकी इच्छा को पूरा कर दिखाया।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अपने जुब्बे (आवरण) में उसे कफ़न दिया, फिर उसकी नमाज़-ए-जनाज़ा5 पढ़ी, और उसके हक़ में दुआ की, “ऐ अल्लाह! तेरा यह बन्दा तेरे रास्ते में हिजरत के लिए निकला था। यह तेरी राह में शहीद हुआ है और मैं इसका गवाह हूं।”
इस तरह एक-एक करके ख़ैबर के क़िलों को मुसलमान जीतते गए और लगातार कई-कई दिन लड़ाई और घेराबन्दी में गुज़रने लगे। यहां तक कि इससे तंग आकर यहूदियों ने अल्लाह के रसूल सल्ल० के सामने सुलह की पेशकश की, लेकिन आपका इरादा उनको वहां से बेदख़ल करने का था। यहूदियों ने कहा, “हमको आप इसी जगह रहने और अपनी खेती-बाड़ी की देखभाल करने की इजाज़त दे दीजिए, क्योंकि हम इस पेशे में आप लोगों से अधिक माहिर हैं।” अल्लाह के रसूल सल्ल० और आपके साथियों को खेती का अनुभव न था। अगर वह यह काम अपने हाथ में ले लेते तो सारा वक़्त इसी में लग जाता, इसलिए आप सल्ल० ने उन यहूदियों को ख़ैबर में रहने की इजाज़त इस शर्त पर दे दी कि कुल पैदावार का आधा मुसलमानों को मिलेगा, और आप जब तक चाहेंगे समझौते को बनाए रखेंगे।
मज़हबी रहमदिली
ख़ैबर की जंग में जो माल-ए-ग़नीमत मुसलमानों के हाथ लगा उसमें तौरेत की अनेक प्रतियां भी थीं। यहूदियों ने प्रार्थना की कि वह उन्हें दे दी जाएं। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने आदेश दिया कि यह सब प्रतियां उनको दे दी जाएं। यहूदी विद्वान डा० इसराईल वेल्फ़िन्सन ने इस घटना के बारे में लिखा है:
“इस घटना से हम अनुमान लगा सकते हैं कि धार्मिक किताबों के प्रति अल्लाह के रसूल के दिल में कितनी इज़्ज़त थी। आपकी इस रवादारी (उदारता) का यहूदियों पर बड़ा असर पड़ा। वह आपके इस एहसान को कभी नहीं भूल सकते कि आपने उनके पवित्र ग्रंथों के साथ अपमान का कोई सुलूक नहीं किया। यहूदियों को वह घटना भली तरह याद थी कि जब रोमन वालों ने यरूशलम को सन् 70 ई० पूर्व में फ़तह किया तो उन्होंने उन पवित्र ग्रंथों को आग लगा दी और उनको पांव से रौंदा। इसी तरह स्पेन में मतवाले ईसाइयों ने यहूदियों पर अत्याचार के दौरान तौरेत की प्रतियां जला दीं। यह वह महान फ़र्क़ है जो इन विजेताओं और इस्लाम के नबी के बीच हमें नज़र आता है।”
जाफ़र बिन अबी तालिब का आना
इसी जंग में हज़रत मुहम्मद सल्ल० के चचेरे भाई जाफ़र बिन अबी तालिब और उनके साथी आप सल्ल० से आकर मिले। आप सल्ल० बहुत ख़ुश हुए और बड़े शौक़ से आपने उनका स्वागत किया, उनके माथे को चूमा और फ़रमाया, “अल्लाह की क़सम! मैं नहीं जानता कि किसी चीज़ से ज़्यादा मैं ख़ुश हूं, ख़ैबर की कामयाबी से या जाफ़र के आने से।”
यहूदियों की एक और साज़िश
इसी जंग में अल्लाह के रसूल सल्ल० को ज़हर दिया गया। सल्लाम बिन मिशकम की यहूदी पत्नी ज़ैनब पुत्री हारिस ने आपको ज़हर मिलाकर एक भुनी हुई बकरी भेंट दी। पहले उसने पूछा कि बकरी का कौन सा हिस्सा आप सल्ल० को अधिक पसन्द है। आपने कहा, “दस्त” (अगली टांग)। यह सुनकर उसने दस्त में विशेष रूप से ज़हर मिलाया। आपने जब दस्त का कुछ हिस्सा तोड़कर खाना शुरू किया तो ख़ुद उस गोश्त ने आपको सूचित किया कि उसमें ज़हर मिला है, इसलिए उसी वक़्त आप सल्ल० ने लुक़्मा (निवाला) उगल दिया। इसके बाद आपने यहूदियों को जमा किया और फ़रमाया कि “अगर मैं तुमसे कुछ पूछूं तो क्या तुम सही-सही जवाब दोगे?” उन्होंने कहा, “हां।” आपने फ़रमाया कि “क्या तुमने इस बकरी में ज़हर मिलाया है?” उन्होंने जवाब दिया कि “हमने सोचा कि अगर आप झूठे हैं तो आपसे छुट्टी मिल जाएगी, और अगर सचमुच नबी हैं तो ज़हर आप पर असर न करेगा।” इसके बाद उस औरत को आपके पास लाया गया। उसने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया और कहा कि “मैंने आप सल्ल० की जान लेने का इरादा किया था।” आपने फ़रमाया कि “अल्लाह मुझ पर तुम्हें क़ाबू नहीं दे सकता।” सहाबा ने इजाज़त चाही कि उस औरत को क़त्ल कर दें। आपने फ़रमाया, “नहीं।” उस समय आप सल्ल० ने उससे कुछ नहीं कहा और उसे कोई सज़ा न दी। बाद में जब उस ज़हर खाने की वजह से बिश्र बिन अल-बरा बिन मारूर का निधन हो गया, जो उस खाने, जिसमें ज़हर था, शामिल थे, तो उस यहूदी औरत को क़त्ल कर दिया गया।
ख़ैबर की जंग का असर
ख़ैबर की जंग में मुसलमानों की शानदार जीत का अरब के उन क़बीलों पर, जो अभी तक इस्लाम नहीं लाए थे, बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। उन्हें ख़ैबर में यहूदियों की फ़ौजी ताक़त, उनकी दौलत, अनाज की बाहुल्यता, हथियारों की अधिकता, क़िलों की मज़बूती और उनके अजेय होने का पूरा ज्ञान था, और वह जानते थे कि उसमें मरहब और हारिस अबी ज़ैनब जैसे अनुभवी योद्धा मौजूद थे। उनके यह सारे अन्दाज़े ग़लत साबित हुए, जिसका उनके जोश और बाद की घटनाओं पर गहरा असर पड़ा।
डा० इसराईल वेल्फ़िन्सन ने लिखा है:
“बेशक इस्लामी विजय के इतिहास में ख़ैबर की विजय का बड़ा महत्व है। यही वजह है कि अरब के तमाम क़बीले बहुत बेसब्री से उसके नतीजों का इन्तिज़ार कर रहे थे, और इसका फ़ैसला अन्सार व यहूदियों की तलवार की झनकार पर होना था। अल्लाह के रसूल सल्ल० के बहुत से दुश्मन जो अरब के विभिन्न शहरों और देहातों में थे, इस जंग से बड़ी उम्मीदें लगाए बैठे थे।”
जब रसूलल्लाह सल्ल० ख़ैबर विजय कर चुके तो आप सल्ल० ने ‘फ़दक’6 की तरफ़ ध्यान दिया। यहूदियों ने अल्लाह के रसूल सल्ल० से उत्पादन के आधे-आधे बंटवारे पर समझौता करना चाहा। आप सल्ल० ने उनका यह समझौता मान लिया। इससे जो कुछ हासिल होता उसे आप अपने और मुसलमानों के हित में जहां उचित समझते बांट देते।
इसके बाद आप वादी-अल-क़ुरा गए। यह ख़ैबर और तैमा के बीच स्थित एक कॉलोनी थी, जिसे यहूद ने इस्लाम से पहले बसाया था। यहां अरब के कुछ लोग भी आकर बस गए थे। उनको अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इस्लाम की दावत दी और उनसे कहा कि यदि वह इस्लाम क़बूल कर लेंगे तो उनकी जान व माल सुरक्षित रहेगा और उनका हिसाब अल्लाह के ज़िम्मे होगा। यहूद ने लड़ने का निश्चय किया। अतएव इस जंग में कई मुक़ाबले हुए, लेकिन ज़ुबैर बिन अल-अव्वाम जैसे लोगों की बहादुरी की वजह से दूसरे ही दिन यहूद ने हथियार डाल दिए, और जो कुछ उनके पास था मुसलमानों के हवाले कर दिया। मुसलमानों को इस तरह बड़ी मात्रा में माल व दौलत मिला। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इस सारी दौलत को सहाबा में बांट दिया। खेत और खजूर के बाग़ यहूद के पास रहे। जब तैमा7 के लोगों को ख़ैबर, फ़दक और वादी-अल-क़ुरा के विजय की सूचना मिली तो उन्होंने आपसे समझौता कर लिया। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और उनकी ज़मीनें उन्हीं की क़ब्ज़े में रहने दीं, और आप मदीना वापस आए।
मुहाजिरों की शराफ़त
मदीना के अन्सार ने अपने माल में मक्का से आए मुहाजिरों को हिस्सा दिया था। अब जबकि ख़ैबर की विजय के बाद मुहाजिर मदीना वापस आए तो उनके पास अपनी ख़ुद की जायदाद हो गई थी, इसलिए उन्होंने अन्सार को उनकी चीज़ें और बाग़ वापस कर दिए। ख़ैबर में उन्हें भी बाग़ मिले थे। अनस बिन मालिक की मां उम्मे सुलैम ने अल्लाह के रसूल सल्ल० को उस ज़माने में कुछ खजूर के पेड़ भेंट किए थे, जिसे आपने अपनी आज़ाद की गई बांदी (सेविका) उम्मे ऐमन को दे दिया था। जब आपको फ़दक के बाग़ मिले तो आपने उम्मे सुलैम को एक खजूर के पेड़ के बदले फ़दक के दस खजूर के पेड़ वापस किए।
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ैबर के बाद भी विभिन्न स्थानों के लिए अनेक सरिय्ये (हमलावर दल) भेजे जिनका नेतृत्व आपके प्रमुख साथी सहाबा कर रहे थे। इनमें से कुछ सरिय्यों में जंग हुई और कुछ में जंग की नौबत नहीं आई।
छूटे हुए उमरह की पूर्ति
दूसरे साल सन् 7 हिजरी में अल्लाह के रसूल सल्ल० तथा आपके साथी सहाबा किराम क़ज़ा उमरह की पूर्ति (अर्थात पहले छूटी हुई मक्का की तीर्थयात्रा) की नीयत से मक्का गए। क़ुरैश ने कोई विरोध नहीं किया। आप तीन दिन वहां ठहरे और उमरह किया। इस बात की तरफ़ क़ुरआन पाक में इस तरह इशारा आया है:
लड़कियों का समाज में समुचित स्थान
इस्लाम ने अरबवासियों के दिल व दिमाग़ पर बहुत असर डाला और इससे उनके ज़िंदगी में बहुत बदलाव हुआ। वह लड़की जो अब तक ख़ानदानों तथा रईसों के लिए सर नीचा करने की वजह समझी जाती थी, और कुछ क़बीलों में उसे ज़िन्दा दफ़न कर देने तक की रस्म थी, आज ऐसी चहेती बन चुकी थी कि लड़कियों के पालन-पोषण में लोगों में होड़ लग जाती थी। मुसलमान सब बराबर थे और सबको समान अधिकार हासिल थे। किसी को किसी पर अगर प्राथमिकता थी तो वह ज्ञान व आचरण के आधार पर थी। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जब मक्का से वापसी का इरादा किया तो सैयदना हमज़ा रज़ि० की छोटी बच्ची ‘उमामा’ “चाचा! चाचा!” पुकारती हुई आपके पीछे हो ली। हज़रत अली रज़ि० ने उसे ले लिया और हज़रत फ़ातिमा के हवाले करते हुए कहा, “देखो, यह चाचा की लड़की है।” अब हज़रत अली, ज़ैद और जाफ़र रज़ि० के बीच इस बात पर खींचतान होने लगी। हज़रत अली ने कहा, “यह मेरी चचेरी बहन है।” हज़रत जाफ़र ने कहा कि “यह मेरी भी चचेरी बहन है और इसकी ख़ाला मेरी निकाह में है।” हज़रत ज़ैद ने कहा कि “इस्लाम के रिश्ते से यह मेरी भतीजी है।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत जाफ़र के हक़ में फ़ैसला दिया क्योंकि बच्ची की ख़ाला उनके घर में थी और ख़ाला मां की जगह होती है। हज़रत अली से उनकी दिलदारी के लिए आपने फ़रमाया, “तुम सीरत (आचरण) व सूरत दोनों में मुझसे मिलते-जुलते हो।” हज़रत ज़ैद से फ़रमाया, “तुम मेरे भाई, मेरे मौला (Client) हो।”
टिप्पणियां
- 1इनमें नाइम, क़मूस, शिक़ आदि क़िले मशहूर थे। याक़ूबी ने लिखा है कि उन दिनों ख़ैबर में 25 हज़ार जवान मौजूद थे।
- 2डब्ल्यू० मॉन्टगोमरी वॉट (W. Montgomery Watt) ने अपनी किताब Muhammad: Prophet and Statesman में लिखा है कि “ख़ैबर के यहूद और विशेषकर क़बीला बनी अन-नज़ीर के वह सरदार जिनको रसूलल्लाह सल्ल० ने मदीना से देश-निकाला कर दिया था, आप सल्ल० के ख़िलाफ़ अपने दिल में घोर बदले की भावना रखते थे। यही लोग थे जो अरब के दूसरे क़बीलों को धन व दौलत देकर उकसाते और मुसलमानों से जंग करने के लिए तैयार करते थे, और यही मूल कारण था जिसकी वजह से अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ैबर पर चढ़ाई की।” (पृ० 189)
- 3अरब में लाल ऊंट बहुत क़ीमती समझे जाते थे और यह एक दुर्लभ चीज़ थी।
- 4कुछ विद्वानों ने यह घटना नाइम की विजय के सम्बन्ध में और कुछ ने क़िला क़मूस की विजय के सम्बन्ध में नक़ल की है। बुख़ारी में क़िले का नाम अंकित नहीं। इब्ने हिशाम ने मुहम्मद बिन मसलमा को मरहब को हराने वाला बताया है, लेकिन सही मुस्लिम में हज़रत अली रज़ि० का नाम आया है।
- 5मुर्दे के दफ़नाने से पहले पढ़ी जाने वाली नमाज़। विस्तार के लिए लेखक की किताब ‘हिन्दुस्तानी मुसलमान एक दृष्टि में’ पृ० 47 देखें।
- 6हिजाज़ के ऊपरी भाग में स्थित एक राज्य और एक आबाद क़स्बा था। इस क़स्बे में यहूदी आबाद थे, जिनका सम्बन्ध बनी मुर्रा और बनी साद बिन बक्र के क़बीलों से था।
- 7वादी-अल-क़ुरा के उत्तर में सीरिया के निकट स्थित एक क़स्बा।