अध्याय सात

जन्म से पैग़म्बरी की शुरुआत तक

अब्दुल्लाह और आमिना

क़ुरैश के सरदार अब्दुल मुत्तलिब के दस लड़के थे, जो सब उत्कृष्ट और मशहूर थे। अब्दुल्लाह अपने भाइयों में बहुत सज्जन और असरदार व्यक्तित्व के मालिक थे। उनके पिता ने उनकी शादी बनी ज़ोहरा के सरदार वहब की बेटी आमिना से की, जो उस समय वंशज तथा सम्मान व श्रद्धा में क़ुरैश की सबसे सम्मानित औरत समझी जाती थीं। हज़रत मुहम्मद सल्ल० अपनी माता के गर्भ में थे कि आप सल्ल० के पिता अब्दुल्लाह का निधन हो गया। हज़रत आमिना को आप सल्ल० के जन्म से पहले ही बहुत-सी निशानियां और लक्षण दिखाई दिए, जिनसे पता चलता था कि उनके बेटे की भविष्य में बड़ी शान होनी है।

आपका जन्म

आपका जन्म 12 रबीउल अव्वल को आमुल-फ़ील में 570 ई० सोमवार के दिन हुआ।1 यह मानव इतिहास का सबसे रोशन और मुबारक दिन था। आपका वंश इस तरह है:

मुहम्मद सल्ल० बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम बिन अब्द मनाफ़ बिन क़ुसई बिन किलाब बिन मुर्रा बिन कअब बिन लुअई बिन ग़ालिब बिन फ़िहर बिन मालिक बिन नज़्र बिन किनाना बिन ख़ुज़ैमा बिन मुदरिका बिन इलयास बिन मुज़र बिन निज़ार बिन मअद बिन अदनान

अदनान का नसब (सिलसिला) हज़रत इस्माईल अ० बिन हज़रत इब्राहीम अ० तक पहुंचता है।2

जब आप सल्ल० का जन्म हुआ तब आपकी माता ने आपके दादा को यह सूचना भिजवाई। वह आए, मुहब्बत से आपको देखा और गोद में लेकर काबा के अन्दर दाख़िल हुए और अल्लाह की प्रशंसा बयान की और दुआ की और आपका नाम “मुहम्मद” रखा। यह नाम बिल्कुल नया था, अतः अरबों को इस पर बहुत हैरत हुई।3

बचपन

कुछ दिन आपको आपके चाचा अबू लहब की बांदी सुवैबा (शुएबा) ने दूध पिलाया। फिर अब्दुल मुत्तलिब ने अपने यतीम पोते के लिए देहात की किसी दूध पिलाने वाली की तलाश शुरू की। अरब उस दौर में अपने बच्चों के शुरुआती पालन-पोषण के लिए शहरों से अधिक देहातों को पसन्द करते थे, क्योंकि वहां की जलवायु, वातावरण अधिक साफ़ और पाक होता था, तथा वहां के वासियों के आचरण में सन्तुलन और सहज प्रवृत्ति अधिक थी। देहातों की ज़बान भी सही और प्रभावशाली मानी जाती थी, और इस तरह उनके बच्चे शहर की बुराइयों से बचते थे।

हलीमा सादिया

क़बीला बनी साद की औरतें इस काम में तथा बहुत मंझी हुई अच्छी ज़बान के लिए अधिक मशहूर थीं। उन्हीं में हलीमा सादिया थीं, जिन्हें यह गौरवपूर्ण काम मिला। हलीमा सादिया बच्चों की तलाश में अपने गांव से आई थीं। सूखा पड़ा था। लोग बहुत परेशान थे। आपको इन सब औरतों के सामने लाया गया, लेकिन अधिकतर ने यह सोचकर कि यह यतीम बच्चा है, इसके पिता होते तो कुछ लाभ की उम्मीद थी, मां और दादा से क्या मिल पाएगा, आपकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया। पहले बीबी हलीमा का खिंचाव भी दूसरी तरफ़ होने लगा, लेकिन अचानक उनके दिल में आपकी मुहब्बत पैदा हो गई। कोई दूसरा बच्चा भी सामने नहीं था, अतः वह वापस आईं और आप सल्ल० को लेकर अपने क़ाफ़िले से जा मिलीं।

और तब आपकी बरकत खुली आंखों से उन्होंने देख ली। उनकी हर चीज़ में एक दूसरा रंग दिखाई देने लगा। उनको दूध में, जानवरों में, खाने में, हर चीज़ में साफ़ बरकत महसूस हुई। उनके साथ की जितनी दूध पिलाने वालियां थीं, अब उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि “हलीमा, तुमको तो बहुत मुबारक बच्चा मिला है। बहुत मुबारक जान है।” उन्हें बीबी हलीमा से जलन भी होने लगी।

दूसरी तरफ़ ख़ैर व बरकत का सिलसिला बराबर जारी रहा, यहां तक कि बनी साद के इस क़बीले में आपकी उम्र के दो साल पूरे हो गए और बीबी हलीमा ने आपका दूध छुड़ा दिया और आपको लेकर आपकी मां के पास गईं और उनसे इच्छा व्यक्त की कि कुछ दिनों के लिए आपको उनके पास रहने दिया जाए। अतः बीबी आमिना ने आपको उनके पास वापस लौटा दिया।4

शक़्क़-ए-सद्र (सीना चाक होना)

वापसी के बाद जब बनी साद में थे, दो फ़रिश्ते आए, आपका सीना चाक किया, आपके दिल से गोश्त के टुकड़े के समान एक ख़राब और काली चीज़ निकाल कर फेंक दी। फिर आपके दिल को अच्छी तरह धोकर साफ़ करके अपनी जगह वापस कर दिया और वह उसी तरह हो गया जैसे पहले था।5

आप अपने रज़ाई भाइयों के साथ जंगल में बकरियां भी चराया करते थे। इस तरह आपका पालन-पोषण देहात के साफ़-सुथरे खुले माहौल में हो रहा था, जहां मेहनतकश लोग थे और जो शहर के दूषित पर्यावरण से सुरक्षित था और जहां बनी साद का बड़ा नाम था। आप सहाबा से कभी-कभी फ़रमाया भी करते थे कि “मैं तुम सबसे अधिक अरब हूं, क़ुरैशी हूं और बनी साद बिन बक्र के क़बीले में मैंने दूध पिया है।”

बीबी आमिना और दादा अब्दुल मुत्तलिब का निधन

जब आपकी उम्र छः साल की हुई तो आपकी माता आपको आपके दादा के ननिहाल दिखाने के लिए यसरब ले गयीं। वह अपने पति अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब की क़ब्र पर भी जाना चाहती थीं।6 मक्का वापस होते वक़्त एक जगह पर, जिसको “अबवा”7 कहते हैं, बीबी आमिना का निधन हो गया। अब एक तरफ़ मां की जुदाई का ग़म था, दूसरी तरफ़ सफ़र का अकेलापन। जन्म से लगातार आपके साथ कुछ इसी तरह की घटनाएं होती रहीं। क़ुदरत को अल्लाह ही जानता है। हब्श की रहने वाली एक बांदी उम्मे ऐमन बरका आपको लेकर मक्का आईं और आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब के सुपुर्द किया।

इसके बाद आप अपने दादा की संरक्षता में रहे। आपके दादा आपको बहुत चाहते थे। वह आपको काबा के साये में फ़र्श पर अपने साथ बिठाते और आपसे बहुत मुहब्बत करते। जब आपकी उम्र आठ साल की हुई तो दादा अब्दुल मुत्तलिब का भी निधन हो गया और आप उनकी संरक्षता से वंचित हो गए। आपके लिए दादा का निधन बहुत दुखदायी था। अपने पिता को तो आपने देखा भी न था, इसलिए दादा का बिछड़ना आपको अधिक दुखी कर गया।

चचा अबू तालिब के साथ

दादा के देहान्त के बाद आप अपने चचा अबू तालिब के साथ रहने लगे। अबू तालिब आपके पिता के सगे भाई थे। आपके दादा उनको आपकी देखभाल तथा आपके साथ अच्छा बर्ताव करने की वसीयत बराबर करते रहते थे। अबू तालिब आपके सुख-दुख का पूरा ध्यान रखते और अपने बेटे अली, जाफ़र और अक़ील से भी ज़्यादा आपको प्यार करते।

शाम का सफ़र और बुहैरा राहिब

कहा जाता है जिस समय अबू तालिब कारोबार के लिए एक क़ाफ़िले के साथ शाम जाने लगे, उस समय आपकी अवस्था 9 वर्ष की थी। आप चलते समय अपने चचा से लिपट गए। चचा इससे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने इस यात्रा में आपको अपने साथ ले लिया।

जब यह क़ाफ़िला शाम में स्थित “बुसरा” पर पहुंच कर ठहरा, तो यहां क़ाफ़िले वालों की भेंट बुहैरा राहिब (संन्यासी) से हुई, जो अपनी ख़ानक़ाह (कुटिया) में रहते थे। बुहैरा ने इस क़ाफ़िले का अद्वितीय तौर पर अतिथि-सत्कार किया, क्योंकि उनको इस क़ाफ़िले के साथ अल्लाह का ख़ास मामला नज़र आ रहा था। बुहैरा ने जब आपको देखा तो आपकी और ज़्यादा अगवानी की और इस बात की संतुष्टि की कि नुबूवत की निशानियां आपके अन्दर मौजूद हैं। उन्होंने अबू तालिब का ध्यान आपके गौरव और पद की गरिमा की तरफ़ दिलाया और कहा कि अपने भतीजे को लेकर अपने देश वापस जाएं और यहूद से ख़ास तौर पर आप सल्ल० की सुरक्षा करें, क्योंकि तुम्हारे भतीजे की आगे चलकर बड़ी शान होने वाली है। अतः अबू तालिब आपको सुरक्षित मक्का वापस ले आए।8

आसमानी प्रशिक्षण

आपका पालन-पोषण विशेष तरह से हुआ। अल्लाह ने आपको जाहिलियत की अपवित्रताओं और बुरी आदतों से हमेशा सुरक्षित व दूर रखा। आप अपनी क़ौम से शुरू से ही सबसे अधिक सज्जन, सदाचारी, हयादार, सच्चे और अमानतदार थे। आप गाली-गलौज से बहुत दूर रहते थे। आपकी क़ौम में लोग आपको “अमीन” के नाम से याद करते थे। आप रिश्तों का ख़्याल करते, लोगों का बोझ हल्का करते और उनकी ज़रूरतें पूरी करते। मेहमानों का आदर-सत्कार करते और अच्छे कामों में दूसरों की मदद करते।9 मेहनत करके रोज़ी हासिल करते और आम और ज़रूरत भर खाने पर सन्तोष करते।

आपकी उम्र 14-15 वर्ष की थी कि क़ुरैश और क़बीला क़ैस के बीच “हर्बुल फ़िजार” की लड़ाई शुरू हो गई। आपने इस लड़ाई को क़रीब से देखा, बल्कि आप दुश्मन के प्रयोग में लाए गए तीरों को क़ुरैश तक पहुंचाते थे। इस मौक़े पर आपको लड़ाई का व्यावहारिक अनुभव हुआ तथा घुड़सवारी व सिपाहगरी से परिचय हुआ।

बकरियां चराना

जब आप कुछ और बड़े हुए तो आपने रोज़ी-रोटी कमाने की तरफ़ ध्यान देना ज़रूरी समझा और बकरियां चराने का पेशा अपनाया, जो उस दौर में एक शरीफ़ाना पेशा होने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दीक्षा, कमज़ोरों व दीन-दुखियों पर दया की भावना पैदा करने तथा साफ़ व ताज़ा हवा का आनन्द लेने के साथ-साथ शारीरिक अभ्यास का मौक़ा प्रदान करता था। इसके अलावा वह नबियों की सुन्नत है। अतः नुबूवत के बाद आपने फ़रमाया कि “कोई नबी ऐसा नहीं गुज़रा जिसने बकरियां न चराई हों।” पूछा गया कि “आपने भी, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल०?” फ़रमाया, “हां, मैंने भी।” आपने पहले भी बनी साद में अपने रज़ाई भाई (दूध शरीक भाई) के साथ बकरियां चराई थीं, इसलिए आप इस काम को जानते थे। हदीस से साबित है कि आप मक्का में कुछ “क़ीरात”, जो आप बकरियों के मालिक से लेते थे, के बदले बकरियां चराते थे।10

हज़रत ख़दीजा से शादी

जब आप पच्चीस वर्ष के हुए तो ख़ुवैलिद की लड़की ख़दीजा के साथ आपने शादी की। ख़दीजा क़ुरैश की बहुत ही प्रभावशाली और पहुंच वाली औरत थीं। अपनी सूझ-बूझ, सदाचरण और धन-दौलत के लिए भी वह बहुत मशहूर थीं। ख़दीजा विधवा थीं और उनके पति अबू हाला का निधन हो चुका था। उस समय ख़दीजा की उम्र 40 वर्ष थी और आप सल्ल० 25 वर्ष के थे।

ख़दीजा व्यापार भी करती थीं। रुपया उनका होता था और दूसरे लोग मेहनत करते थे और अपनी मेहनत का मेहनताना पाते थे। ख़दीजा को आपकी सच्चाई, सदाचरण तथा परोपकार की भावना का ज्ञान उस समय अच्छी तरह हो चुका था जब आप शाम के सफ़र पर गए थे। उस सफ़र में आप ख़दीजा का सामान लेकर शाम व्यापार करने गए थे। उस सफ़र में जो अनोखी घटनाएं घटी थीं, उनकी ख़दीजा को जानकारी थी, अतः उन्होंने आपसे रिश्ते की इच्छा जताई, हालांकि वह इससे पहले क़ुरैश के बड़े-बड़े सरदारों की याचना को ठुकरा चुकी थीं। आपके चाचा सैयदना हमज़ा ने यह पैग़ाम आप तक पहुंचाया। अबू तालिब ने निकाह का ख़ुत्बा पढ़ा और आपकी वैवाहिक ज़िंदगी की शुरुआत हुई। आपके लड़के इब्राहीम को छोड़कर (जिनका निधन बचपन में हो गया था) आपकी सारी औलादें उन्हीं से हुईं।

काबा का नव-निर्माण

जब आपकी उम्र 35 वर्ष की हुई तो क़ुरैश ने काबा के नव-निर्माण का इरादा किया और उस पर छत डालने का प्रस्ताव रखा। इससे पहले काबा के निर्माण में मिट्टी और गारे से जोड़े बिना भारी पत्थर तले-ऊपर रख दिए थे, जो इंसान की ऊंचाई से कुछ अधिक ऊंचे थे। अब इसे गिराकर नए सिरे से निर्माण किया जाना था। जब दीवारों की ऊंचाई “हजरे असवद” (काला पत्थर) तक पहुंची, तो हजरे असवद को उसकी सही जगह लगाने में लोगों में बड़ा मतभेद खड़ा हो गया। हर क़बीला चाहता था कि हजरे असवद को उठाकर उसकी सही जगह लगाना उसकी क़िस्मत में आए। नौबत लड़ाई और मार-पीट तक पहुंची। उस दौर में इससे भी मामूली बात पर लड़ाइयां होती रही हैं, यह तो एक बड़ी बात थी।

बनू अब्दुद्दार ने ख़ून से भरी हुई एक लगन तैयार की। अब्दुद्दार और बनू अदी ने ख़ून की लगन में अपना हाथ डालकर मरते दम तक लड़ते रहने की क़सम खाई। क़ुरैश कई दिन तक इसी उलझन में रहे। फिर इस बात पर वह सब एकमत हो गए कि जो व्यक्ति मस्जिद-ए-हराम (काबा हरम परिसर) में सबसे पहले दाख़िल होगा, वह इस बात का फ़ैसला करेगा कि हजरे असवद को कौन उठाकर उसकी जगह रखे। दूसरे दिन सबसे पहले आप सल्ल० मस्जिद-ए-हराम में दाख़िल हुए। अतः आप पर यह फ़ैसला रखा गया।

आपने एक चादर मंगाई और हजरे असवद को स्वयं उठाकर उस चादर में रखा। फिर कहा कि हर क़बीले का एक व्यक्ति चादर का एक कोना पकड़ कर उठाए। सबने ऐसा ही किया। जब चादर में पत्थर उस जगह के पास आया जहां उसे लगाया जाना था, तो आपने अपने हाथ से उठाकर उसको उस जगह रख दिया। इसके बाद बाक़ी इमारत बनाई गई।

इस तरह आपने क़ुरैश को बड़ी लड़ाई से बचा लिया। इस मौक़े पर आपने जिस समझदारी व सूझ-बूझ से काम लिया, उससे बढ़कर कोई हिकमत नहीं हो सकती थी। नुबूवत के बाद आपने तमाम इन्सानों और दुनिया की क़ौमों को जिस तरह जंगों की भट्टी से छुटकारा दिलाया, यह घटना वास्तव में उसकी शुरुआत थी। यह घटना आपकी सूझ-बूझ, बेहतरीन शिक्षा, हमदर्दी और आपकी समझौता कराने की परिचायक थी। यह वह बात थी जिसने आपको “रहमतुल-लिल-आलमीन” (सारे जहानों के लिए रहमत) की उच्च पदवी दी, और आप उस सादा और अनपढ़ क़ौम के उन लड़ाकू तथा एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे क़बीलों के लिए नबी-ए-रहमत साबित हुए।

हिल्फ़ुल फ़ुज़ूल

हिल्फ़ुल फ़ुज़ूल अरबों का सबसे शरीफ़ाना समझौता था, जिसमें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम शामिल थे। उसका क़िस्सा यह था कि यमन के शहर ज़ुबैद का एक व्यापारी मक्का में कुछ सामान लेकर आया और क़ुरैश के एक सरदार आस बिन वाइल ने वह सब सामान ख़रीद लिया, लेकिन उसके दाम व्यापारी को नहीं दिए। व्यापारी ने क़ुरैश के सरदारों का समर्थन हासिल करना चाहा, लेकिन आस बिन वाइल के दबदबे की वजह से उन्होंने व्यापारी का साथ देने से मना कर दिया, उसे डांट कर भगा दिया। तब उस व्यापारी ने मक्का वालों से फ़रियाद की और हर न्यायप्रिय व्यक्ति से, जो उसे मिला, इसकी शिकायत की।

आख़िर में उन्हें उनकी ग़ैरत ने झिंझोड़ा, और यह सब लोग अब्दुल्लाह बिन जुदआन के मकान पर जमा हुए। उन्होंने इन सबको खाना खिलाया, इसके बाद उन्होंने अल्लाह के नाम पर क़सम उठाई कि वह ज़ालिम के मुक़ाबले में मज़लूम का समर्थन करने में एक हाथ की तरह रहेंगे और काम करेंगे, जब तक ज़ालिम मज़लूम का हक़ न दे दे। क़ुरैश ने इस समझौते का नाम “हिल्फ़ुल फ़ुज़ूल” अर्थात फ़ुज़ूल का समझौता रखा और कहने लगे कि उन्होंने एक फ़ालतू काम में, जो उनके अधिकार-क्षेत्र से बाहर है, हस्तक्षेप किया है।11 फिर सब मिलकर आस बिन वाइल के पास गए और उस व्यापारी का सामान उनसे ज़बरदस्ती लेकर व्यापारी को वापस कर दिया।

आप इस समझौते से बहुत ख़ुश हुए थे और नुबूवत के बाद भी आपने उसकी तारीफ़ की और फ़रमाया कि:

मैं अब्दुल्लाह बिन जुदआन के मकान पर एक ऐसे समझौते में शामिल था जिसमें अगर इस्लाम के बाद भी मुझे बुलाया जाता तो मैं ज़रूर शामिल होता। उन्होंने वहां पर यह समझौता किया था कि वह हक़ हक़दार तक पहुंचाएंगे और यह कि कोई ज़ालिम मज़लूम पर हावी न हो सकेगा।

सीरत इब्ने कसीर, खण्ड 1

एक अजीब बेचैनी

उम्र में बढ़ोतरी के साथ आप अपने अन्दर एक अजीब बेचैनी महसूस करते थे, जिसकी कोई वजह आपको मालूम न थी। आपके दिल में कभी भूलकर भी यह ख़्याल न आया था कि अल्लाह पाक “वह्य” तथा “रिसालत” से आपको गौरवान्वित करने वाले हैं। क़ुरआन पाक में आता है:

दूसरी जगह आता है:

अल्लाह पाक की ख़ास हिकमत थी कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का पालन-पोषण “उम्मी” की तरह हुआ। आप न पढ़ सकते थे और न लिख सकते थे। इस तरह आप इस्लाम के दुश्मनों के आरोपों और मनगढ़ंत आलोचनाओं से बहुत दूर और सुरक्षित रहे। क़ुरआन में आता है:

क़ुरआन पाक में इसी लिए आपको “उम्मी” की पदवी दी गई और इरशाद हुआ:

टिप्पणियां

  1. 1मशहूर उल्लेख यही है, लेकिन मिस्र के मशहूर ज्योतिषी तथा विद्वान महमूद पाशा की खोज यह है कि आप सल्ल० का जन्म सोमवार के दिन 9 रबीउल अव्वल को हाथी वाली घटना के पहले साल हुआ, जो 20 अप्रैल 571 ई० की तारीख़ थी।
  2. 2लेखक ने अदनान तक आप सल्ल० का नसब यहां दर्ज किया है, जिसमें किसी को कोई मतभेद नहीं है।
  3. 3सुहैली की किताब “अर-रौज़ुल उनुफ़” तथा इब्ने फ़ूरक की “अल-फ़ुसूल” से पता चलता है कि आपसे पहले पूरे इतिहास में सिर्फ़ तीन व्यक्ति ऐसे मिलते हैं जिन्होंने अहले किताब से यह सुनकर कि अरब प्रायद्वीप में एक नबी ज़ाहिर होने वाले हैं जिनका नाम मुहम्मद होगा। उनको यह भी बताया गया था कि उसका समय निकट है और उनकी बीवियां गर्भवती थीं, उस समय इस लालच में उन्होंने नज़्र मानी कि लड़का हुआ तो उसका नाम मुहम्मद रखेंगे। अतः उन्होंने ऐसा ही किया। कुछ लोगों ने इससे अधिक संख्या बताई है, लेकिन लेखक का विचार है इस पर शोधकार्य किया जाना चाहिए, क्योंकि क़ुरैश के प्रत्येक व्यक्ति ने इस पर हैरत व्यक्त की थी।
  4. 4पालन-पोषण की यह लम्बी और रोचक कहानी सीरत इब्ने हिशाम में बहुत विस्तार से बयान की गई है, देखिए पृ० 162–166।
  5. 5विस्तृत वर्णन के लिए सीरत की किताबें देखें, विशेषकर इमाम मुस्लिम की किताब “किताबुल ईमान”। शाह वलीउल्लाह देहलवी रह० ने “हुज्जतुल्लाहिल बालिग़ा” में लिखा है कि फ़रिश्ते ज़ाहिर हुए, आपका सीना चाक किया, दिल को निकाला और उसको ईमान व हिकमत से भर दिया। यह सदृश और चेतना जगत के बीच की स्थिति की घटना है। यह चाक करना ऐसा न था कि जिससे नुक़सान पहुंचता। इसे दोबारा सीने का असर आपके सीने पर बाक़ी न रहा। सदृश और चेतना जगत जहां मिलते हैं, वहां इस प्रकार की घटनाएं घटित होती हैं।
  6. 6हिजरत के बाद बनी नज्जार के मकानों को देखकर फ़रमाया कि “मेरी मां यहीं उतरी थीं और बनी अदी बिन नज्जार की बावली में मैं ख़ूब तैरा था।”
  7. 7यह स्थान मस्तूरा के निकट है, जो इस समय मक्का और मदीना के बीच की मशहूर मंज़िल है जो आधे रास्ते पर है।
  8. 8इस घटना का सीरत इब्ने हिशाम तथा सीरत की अन्य किताबों में विस्तार से वर्णन मिलता है। इसकी सच्चाई में उल्लेख कर्ताओं की कमज़ोर कड़ी तथा परिस्थितिगत प्रमाण दोनों के आधार पर विद्वानों को शंका है। इमाम तिरमिज़ी कहते हैं कि इस घटना का उल्लेख करने वालों में अब्दुर्रहमान बिन ग़ज़वान का नाम भी आता है, जिनके उल्लेख अविश्वसनीय हैं। ज़हबी का मानना है कि अब्दुर्रहमान ने सबसे अधिक जाली हदीसें गढ़ी हैं, और उनमें सबसे ज़्यादा जाली हदीस वह है जिसमें बुहैरा की घटना का उल्लेख है (तिरमिज़ी, खण्ड 1, पृ० 180)। इसमें एक आपत्ति यह भी है कि इस हदीस में यह भी उल्लेख है कि अबू तालिब ने आपको बिलाल के साथ मक्का वापस भेजा था। इब्नुल क़य्यिम ने “ज़ादुल मआद” में लिखा है कि तिरमिज़ी और दूसरी किताबों में यह आता है कि उन्होंने आपके साथ बिलाल को भेजा, जो सरासर ग़लत है, क्योंकि बिलाल शायद उस वक़्त मौजूद ही न थे और अगर थे भी तो आपके चचा अथवा अबू बक्र के साथ कदापि न थे (ज़ादुल मआद, खण्ड 1, पृ० 18)। पूर्ववर्ती विद्वान (Orientalist) तथा बदनीयत इतिहासकार ऐसे अवसर की तलाश में रहते हैं, अतएव बुहैरा संन्यासी से आपकी इस कुछ पलों की मुलाक़ात को उन्होंने राई का पर्वत बना दिया और यह साबित करना चाहा कि आपने तौहीद की साफ़ व बेलाग शिक्षा वास्तव में एक ईसाई विद्वान से हासिल की। इससे ज़्यादा हैरत की बात यह है कि एक फ़्रांसीसी विद्वान (Carra de Vaux) ने इस विषय पर एक किताब लिखी और उसका नाम (Buhaira, the Author of the Quran) रखा और इसमें यह दावा किया कि इस कुछ पलों की मुलाक़ात में बुहैरा ने पूरा क़ुरआन हज़रत मुहम्मद सल्ल० को याद कराया। यदि बुहैरा संन्यासी से आपकी भेंट को सही भी मान लिया जाए तो भी कोई समझदार और अक़्ल रखने वाला व्यक्ति इस बात को मानने के लिए तैयार न होगा। क्या यह बात किसी की समझ में उस समय आ सकती है कि एक बच्चा, जिसकी उम्र उस समय 9 वर्ष से 12 वर्ष बताई गई है, एक ऐसे बुज़ुर्ग व्यक्ति से, जिसकी भाषा भी वह नहीं जानता और जिसे सिर्फ़ एक समय खाने पर साथ बैठने का मौक़ा मिला हो, ऐसे गूढ़ मामले पर विचारों का आदान-प्रदान करेगा और छठी शताब्दी ई० में ईसाई धर्म के निरस्त अक़ीदा और विचारों की उन बारीकियों से आगाह हो जाएगा जहां तक प्रोटेस्टेंट धर्म के बड़े-बड़े पादरी और विद्वान न पहुंच सकें, और फिर तीस-चालीस वर्ष बाद क़ुरआन के रूप में इन सबको संकलित कर देगा? यह बात सिर्फ़ वही कह सकता है जिसे पक्षपात ने अन्धा कर दिया हो या मनगढ़ंत बातें करने की जिसकी आदत पड़ चुकी हो। अगर यह क़िस्सा सीरत की किताबों में न होता तो यहां इसके उल्लेख की ज़रूरत न थी।
  9. 9देखें हज़रत ख़दीजा, जो आपकी धर्मपत्नी थीं, की गवाही जो उन्होंने आपके ग़ार-ए-हिरा से वापसी पर आपके आचरण के बारे में दी।
  10. 10अल्लामा शिबली नोमानी ने “सीरतुन्नबी” के खण्ड 1 में लिखा है कि “क़ीरात” के अर्थ में विद्वानों का मतभेद है। इब्ने माजा के शैख़ सुवैद बिन सईद की राय है कि यह “क़िरात” का बहुवचन है, जो दिरहम या दीनार का एक अंश था। इस तरह उनके निकट हदीस का भावार्थ यह है कि आप मज़दूरी पर बकरियां चराते थे, लेकिन इब्राहीम हर्बी की खोज यह है कि एक जगह का नाम है। इब्नुल जौज़ी भी इसी को मानते हैं और ऐनी ने तर्क सहित इसी बात को सही ठहराया है। “नूरुन्निब्रास” के लेखक का भी यही मानना है।
  11. 11इसके नामकरण की एक वजह यह बताई गई कि क़ुरैश से पहले जुरहुम क़बीले ने भी एक ऐसा ही समझौता किया था, उसमें जो लोग शामिल थे उनमें से तीन का नाम भी हिल्फ़ुल फ़ुज़ूल पड़ गया। इसके अलावा इसके और भी कारण हैं।