अध्याय चार
अरब प्रायद्वीप
सीमाएं
अरब प्रायद्वीप विस्तार में दुनिया का सबसे बड़ा प्रायद्वीप है। अरब विद्वान इसे “जज़ीरतुल अरब”1 अर्थात अरब प्रायद्वीप कहते हैं। हालांकि यह एक द्वीप नहीं है, इसके सिर्फ़ तीन तरफ़ पानी है। यह एशिया में दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। इसके पूर्व में अरब की खाड़ी है, जिसे यूनानी फ़ारस की खाड़ी के नाम से जानते हैं, दक्षिण में हिन्द महासागर और पश्चिम में लाल सागर है, जिसे यूनानी और लैटिन में Sinus Arabicus कहते थे, और अरब इसे प्राचीन समय में “बहरे क़ुलज़ुम” कहते थे। इसकी उत्तरी सीमा, अरब विद्वानों के अनुसार, वह काल्पनिक रेखा है जो अक़बा की खाड़ी से शत्तुल अरब को मिलाने से बनती है।
मुस्लिम भूगोल विशेषज्ञों ने अरब प्रायद्वीप को पांच भागों में विभाजित किया है:
- हिजाज़, जो ऐला (अक़बा) से यमन तक फैला है। इसे हिजाज़ इसलिए कहा जाता है कि यह उस पर्वतमाला से मिलकर बना है जो तिहामा, अर्थात लाल सागर के तटीय भाग, को नज्द से अलग करती है।
- तिहामा।
- यमन।
- नज्द, अर्थात वह पठारी हिस्सा जो हिजाज़ से बहरीन के रेगिस्तान तक फैला है और जिसमें अनेक रेगिस्तान व पर्वत-श्रेणियां हैं।
- अरूज़, अर्थात यमन व नज्द के मध्य का हिस्सा, जिसे “यमामा” भी कहते हैं।
प्राकृतिक दशा और निवासी
अरब प्रायद्वीप का अधिकांश भाग गर्म और शुष्क है। विशेष भौगोलिक हालात के कारण पुराने समय में और आज भी यहां की आबादी कम रही है, और सभ्य समाज तथा बड़े साम्राज्यों का यहां अभाव रहा है। घुमक्कड़ जीवन, व्यक्तिवाद के प्रति आस्था, क़बीलों के बीच लड़ाई-झगड़ों की वजह से सभ्यता उन इलाक़ों में सिमट कर रह गयी थी जहां बारिश होती थी या पानी की आसानी थी।
पानी यहां के जन-जीवन को पटरी पर लाने का माध्यम रहा है। क़ाफ़िले पानी की तलाश में रहते, और जहां पानी आसानी से मिलता, उन हरे-भरे इलाक़ों में अरब बस जाते। वह घुमक्कड़ जीवन बिताते। किसी इलाक़े में वह उसी वक़्त तक रहते जब तक वहां जानवरों के लिए घास और उनके लिए पानी होता; जब यह सुविधा ख़त्म हो जाती तो वह कहीं और चले जाते थे।
इस वजह से उनकी ज़िंदगी मेहनत और कठोरता का नमूना थी, और उनका समाज क़बीले का रूप धारण कर लेता। एक बद्दू के लिए उसका क़बीला हुकूमत और राष्ट्र की हैसियत रखता था। उसकी ज़िंदगी अस्थिर और कठोर होती थी; आराम करने को वह जानते ही नहीं थे। ताक़त का बोलबाला था। वह आपस में लड़ते रहते थे और उससे फ़ुर्सत पाते तो पड़ोस की सभ्य आबादी से लड़ने लगते और ज़िंदगी बिताते, और पड़ोस की सभ्य आबादी के लिए ख़तरा बने रहते। लेकिन वह अपने क़बीलों और उनकी रस्मों के प्रति बड़े वफ़ादार और ईमानदार होते। वह एक अच्छे मेज़बान की पूरी ज़िम्मेदारी निभाते, लड़ाई के समझौतों का पूरा पालन करते, वह एक वफ़ादार दोस्त होते और अपनी रीति व रस्मों का आख़िरी पल तक सम्मान करते। इन सभी बातों के सबूत उनके साहित्य में जगह-जगह मिलते हैं।
अरब जन्म से लोकतन्त्र का मानने वाला, आज़ादी का मतवाला, सच्चा और व्यवहार-कुशल तथा एक हक़ीक़त-पसन्द होता था। वह अश्लील कामों से नफ़रत करता। वह अपने सीमित साधनों से न केवल ख़ुश रहता, बल्कि अपनी क़िस्मत पर गर्व महसूस करता। मज़हब से उसका इलाक़ा अक्सर कमज़ोर रहता, लेकिन अपने क़बीलों की रस्मों और परम्पराओं पर उनका पक्का ईमान होता। उनका आचरण बहादुरी, शराफ़त और उनका दिल हमदर्दी के गुणों से भरपूर होता था, जिसकी संकल्पना “मुरव्वत” के शब्द में की गई है और जिसकी प्रशंसा के गीत गाते वह कभी नहीं थकता।
सांस्कृतिक केन्द्र
उन स्थानों पर जहां बारिश, झरनों और कुओं का काफ़ी पानी मौजूद होता, वहां गांवों, मौसमी बाज़ारों और मेलों के रूप में एक सभ्यता पैदा हो उठती थी। बद्दुओं की ज़िंदगी पर इन बातों का असर पड़ता, और इस तरह एक ख़ास तरह के समाज तथा माहौल का जन्म होता जो भौगोलिक परिस्थितियों से नियंत्रित होता। इन केन्द्रों का अपना एक विशिष्ट रंग-रूप होता। इस तरह के सांस्कृतिक केन्द्र मक्का, हीरा, यसरब में अपनी-अपनी विशेषताएं लिए हुए थे।
अरब समाज में यमन अपने विशिष्ट हालात, प्राचीन सभ्यता और राजनीतिक कारणों से सबसे अधिक विकसित था, और अनाज की पैदावार, पशुपालन, खनिज के उपभोग, महलों और क़िलों के निर्माण में बहुत आगे था। उद्योगों और ज़िंदगी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए वह बाहर से सामान और उपकरण मंगाता था। उसके इराक़, शाम (सीरिया) और अफ़्रीका से कारोबारी रिश्ते थे।
अरब वासियों के वंशज
लगभग सभी इतिहासकार इस बात को मानते हैं कि प्राचीन अरबों के तीन प्रकार हैं:
- अरब बाइदा, जो इस्लाम से पहले ख़त्म हो चुके थे।
- अरब आरिबा या बनू क़हतान, जो अरब बाइदा के बाद हुए।
- अरब मुस्तअरिबा या हज़रत इस्माईल अ० की सन्तान, जो हिजाज़ में आबाद हुए।
वह वंश के आधार पर अरब वासियों की दो क़िस्में करते हैं (1) क़हतानी, जिनकी आबादी का शुरुआती केन्द्र यमन था और (2) अदनानी, जो पहले हिजाज़ में आबाद थे। इसी तरह वंशावली के अन्वेषक, विशेषज्ञ (Genealogists) अदनान की दो शाखाएं बताते हैं (1) रबीआ (2) मुज़र। क़हतानी व अदनानी प्राचीन काल से एक-दूसरे के दुश्मन थे। इस तरह रबीआ और मुज़र के बीच सदियों से दुश्मनी चली आ रही थी।
वंशावली के विद्वानों का मानना है कि क़हतानी असली और अधिक पुराने हैं तथा अदनानी उनकी शाखा में से हैं जिन्होंने उनसे अरबी सीखी2 और फिर जिसे हज़रत इस्माईल अ० की सन्तान ने हिजाज़ में आने के बाद अपना लिया। हज़रत इस्माईल अ० अरब मुस्तअरिबा अर्थात अदनानियों के पूर्वज हैं।
अरब वासी वंश का विशेष ध्यान रखते थे और इसे बहुत महत्व देते थे। जिसे अजमी विद्वानों ने हमेशा माना है। ईरानी सेनापति रुस्तम ने अपने दरबारियों से, जब वह मुग़ीरा बिन शोबा रज़ि० को फटे कपड़े व ख़स्ताहाली की वजह से इज़्ज़त की निगाह से नहीं देख रहे थे, कहा था, “तुम अजीब बेवक़ूफ़ हो! अरब खाने और कपड़ों को महत्व नहीं देते, बल्कि वह अपने हसब-नसब (वंशज) की सुरक्षा करते हैं।”
भाषाई एकता
इस विशाल प्रायद्वीप में अगर अनेक भाषाएं होतीं तो कोई हैरत की बात न थी, क्योंकि क़बीले दूर-दूर आबाद थे और एक किनारे के वासी दूसरे किनारे के लोगों से कभी-कभी ही मिलते थे। वह क़बायली भेदभाव तथा नस्ली ऊंच-नीच की भावना से घिरे रहते थे। रोम और ईरान की सीमाओं के पास रहने वाले अरब क़बीले वहां की भाषाओं से स्वाभाविक रूप से प्रभावित होते थे। यही वजह है कि मध्य यूरोप और हिन्दुस्तान के उपमहाद्वीप में भाषाएं बहुत हैं। भारत के संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाओं की संख्या 15 है, इनमें कुछ ऐसी भाषाएं भी हैं जिनके बोलने वालों को अनुवादक की ज़रूरत पड़ती है या अंग्रेज़ी से काम लेना पड़ता है।
लेकिन अरब प्रायद्वीप की विशालता एवं क़बीलों की बाहुल्यता के बावजूद इसकी इस्लाम के अभ्युदय से अब तक एक ही भाषा रही है। अरबी यहां के वासियों की हमेशा से बोल-चाल की भाषा रही है, चाहे वह बद्दू हों या क़हतानी व अदनानी, और यह इस प्रायद्वीप की प्रमुख विशेषता रही है। हालांकि भौगोलिक दूरी तथा भौतिक परिस्थितियों में विभिन्नता के फलस्वरूप स्थानीय बोलियों के लहजे में फ़र्क़ पाया जाना स्वाभाविक है, तथापि इसमें एक भाषाई एकता, समानता मौजूद रही है। इस्लाम के प्रचार व प्रसार तथा दूर-दूर तक फैली हुई इकाइयों को अलंकृत भाषा में संबोधित करने तथा उन्हें प्रभावित करने में अरबी भाषा ने अहम भूमिका निभाई है।
मानव विकास का इतिहास और अरब प्रायद्वीप
पुरातत्त्व विज्ञान के अनुसार अरब प्रायद्वीप में प्राचीन पाषाण युग से इन्सानी आबादी के निशान मिलते हैं। यहां जो प्राचीन अवशेष (निशानियां) पाए गए हैं, वह पाषाण युग के प्रथम चरण से सम्बन्धित हैं, जिसे मानव विकास के इतिहास में पैलियोलिथिक काल के शेलियन युग के नाम से जाना जाता है।
अरबों का वर्णन तौरेत में भी आया है, जिससे इब्रानियों के अरबों से सम्बन्ध का पता चलता है। यह वर्णन 750 से 200 ईसा पूर्व का है। इसी प्रकार तालमूद में भी अरबों की तरफ़ इशारे हैं। जोज़ेफ़स (37–100) की किताब में अरबों तथा नबतियों से सम्बन्धित क़ीमती जानकारी मिलती है। इस्लाम से पहले लिखी गई किताबों में कुछ ग़लती और भ्रम के बावजूद अनेक ऐतिहासिक तथा भौगोलिक सबूत मिलते हैं। इनमें बहुत-से ऐसे अरब क़बीलों के नाम मिलते हैं जिनका कहीं और वर्णन नहीं आया है। इस्कन्दरिया उन महत्वपूर्ण केन्द्रों में एक था जहां अरबों के हालात और आदतों तथा देश की पैदावार का हाल मालूम करने की विशेष व्यवस्था थी। यहां से अनेक वस्तुएं भूमध्य सागर के तट पर स्थित देशों के व्यापारियों को पहुंचायी जाती थीं।
यूनान के एस्किलस (525–456 ई० पू०) तथा हेरोडोटस (480–425 ई० पू०) ने सबसे पहले अरबों का वर्णन किया। इनके अलावा जिन लेखकों की किताबों में अरबों का वर्णन मिलता है, उनमें दूसरी शताब्दी ई० में इस्कन्दरिया के क्लॉडियस टालोमियस का नाम उल्लेखनीय है, जिसकी किताब अल्माजेस्ट (Almagest) का अरबी पाठ्यक्रम में प्रमुख स्थान है। मसीही स्रोतों में भी पर्याप्त वर्णन मिलते हैं, यद्यपि इन स्रोतों का मुख्य मक़सद ईसाई धर्म और उसके केन्द्रों का प्रचार-प्रसार था।
तौरेत में जिन अरबों का वर्णन आया है, वह बद्दू अरब हैं। क्योंकि “एरेब” (Ereb) का शाब्दिक अर्थ सेमिटिक में “मरुस्थल” है, तथा उसके लोगों की जो विशेषताएं वर्णन की गई हैं वह बद्दुओं के जीवन पर पूरी उतरती हैं। इसी तरह यूनान तथा रोम वासियों की किताबों और इन्जील में जहां भी इन विशेषताओं का वर्णन आया है, उससे तात्पर्य उन अरब बद्दुओं से है जो रोमन साम्राज्य और यूनान की सीमाओं पर चढ़ाई करते रहते थे। सिसिली के लेखक डियोडोरस ने अरबों के बारे में लिखा है कि वह आज़ादी के मतवाले, खुले वातावरण में ज़िंदगी गुज़ारने वाले, साफ़ विचार तथा पूर्ण आज़ादी के क़ायल हैं। इसीलिए हेरोडोटस ने उनके बारे में लिखा है, “वह हर उस ताक़त का मुक़ाबला करते हैं जो ग़ुलाम बनाने और अपमानित करने की कोशिश करती है।” आज़ादी अरबों का वह विशिष्ट गुण है जिसके लिए वह यूनानी तथा लैटिन लेखकों की नज़रों में मुमताज़ रहे हैं।
अरब तथा हिन्दुस्तान के कारोबारी और सांस्कृतिक रिश्ते बहुत पुराने हैं। इस्लाम के आने से बहुत पहले से दोनों एक-दूसरे को जानते थे, और एशियाई देशों में अरब सबसे अधिक जानकारी हिन्दुस्तान के बारे में रखते थे। यह दोनों देश भौगोलिक तथा आर्थिक निगाह से बहुत कुछ समान थे, जैसा कि आधुनिक खोज से पता चलता है।3
अरब का नुबूवत और आसमानी धर्मों से रिश्ता
अरब प्रायद्वीप बहुत-से नबियों की दावत का केन्द्र रहा है। क़ुरआन में आया है:
हज़रत हूद अ० आद क़ौम की तरफ़ भेजे गए थे। इतिहासकारों के अनुसार आद का सम्बन्ध “अरब बाइदा” से था और वह अहक़ाफ़ में रहते थे। “हिक़्फ़” रेत के ऊंचे टीले को कहते हैं। आद की बस्तियां प्रायद्वीप के दक्षिण में ऊंचाई पर थीं, जो आजकल “रुबउल ख़ाली” के दक्षिण-पश्चिम में हज़रमौत के निकट स्थित हैं। इनमें न अब ज़िंदगी ही है न कोई आबादी है। जब कि किसी समय यहां हरे-भरे इलाक़े में गुलज़ार शहर थे, जिनमें आद जैसी जाबिर क़ौम आबाद थी। उन्हें अल्लाह ने तेज़ आंधी से समाप्त कर दिया, जिसने उन्हें रेतीले तूफ़ान में ढक लिया था। सूरह अहक़ाफ़ की उपरोक्त आयत यह भी बता रही है कि हज़रत हूद अ० इस इलाक़े में आने वाले पहले और आख़िरी नबी नहीं थे; उनसे पहले और बाद भी नबी आते रहे थे। इसलिए क़ुरआन कहता है, “और उनसे पहले और पीछे भी डराने वाले गुज़र चुके थे।”
इस प्रकार क़ौम समूद के नबी हज़रत सालेह अ० का अभ्युदय भी अरब प्रायद्वीप में हुआ। समूद अल-हिज्र में रहते थे, जो तबूक और हिजाज़ के बीच एक बस्ती है। हज़रत इस्माईल अ० जन्म के बाद ही मक्का आ गए और वहीं रहे और वहीं उनकी वफ़ात (निधन) हुई। और अगर प्रायद्वीप की सीमा में मदीने को भी शामिल कर लिया जाए तो हज़रत शुऐब अ० भी अरब ही साबित होते हैं, क्योंकि मदीना शाम के इलाक़े में अरब प्रायद्वीप की सीमा पर था। इतिहासकार अबुल फ़िदा ने लिखा है:
मदीना वासी अरब थे और मदीने में रहते थे, जो मआन के निकट शाम और हिजाज़ की सीमा के पास, लूत सागर (मृतक सागर) के निकट था। क़ौम लूत के बाद ही उनका ज़माना है।
अरब की धरती में बहुत-से नबी पैदा हुए, जिन पर उनके देशवासियों ने बड़े ज़ुल्म ढाए थे और वह अपने देश में परदेसी बनकर रह गए थे। इसलिए उन्होंने दूर-दराज़ ऐसे इलाक़े का चयन किया जो जाबिर बादशाहों और ज़ालिम हाकिमों के असर से दूर थे, जैसा कि हज़रत इब्राहीम अ० के साथ मक्का और हज़रत मूसा अ० के साथ मदीना में पेश आया। इसके अलावा बहुत-से धर्मों को जब अपने केन्द्रों में फलने-फूलने का मौक़ा न मिला तो वह इस प्रायद्वीप में आकर बस गए। अतः यहूद का एक बड़ा समुदाय रोमियों के अत्याचार से तंग आकर यमन व यसरब आ गया, और बाज़नतीनी महाराजाओं से तंग आकर ईसाइयों ने नजरान में पनाह ली।
टिप्पणियां
- 1प्राचीन समय से इस शब्द का प्रयोग होता आया है, क्योंकि प्राचीन काल में द्वीप और प्रायद्वीप में कोई फ़र्क़ नहीं किया जाता था और उनके लिए अलग शब्दावली का प्रयोग होता था। कुछ विद्वानों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि आधुनिक भौगोलिक शब्दावली में अरब एक द्वीप है, जैसे अल्लामा ख़ुज़री की किताब “तारीख़ुल उमम अल-इस्लामिया”, भाग 1। लेकिन इसके लिए प्रायद्वीप की सीमाओं को बहुत दूर तक ले जाने की ज़रूरत पड़ती है।
- 2आधुनिक युग के कुछ शोधकर्ताओं की राय है कि असल अरब अदनानी हैं और वही पहले अरब आरिबा हैं, जब कि अधिकतर इतिहासकारों का मत इसके विपरीत है। उनका कहना है कि यह विभाजन अज्ञानता पर आधारित नहीं है, बल्कि इस्लामी दौर में लिखी गई क़हतानी और यमनी वंशज से संबंधित विद्वानों की किताबों से ली गयी है, अल्लाह जाने।
- 3देखें “अरब व हिन्द के तअल्लुक़ात”, लेखक मौलाना सैयद सुलैमान नदवी।