अध्याय आठ
पैग़म्बरी की शुरुआत
इंसानियत की सुबह
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्ल० ने जिस समय अपनी उम्र के 40 वर्ष पूरे किए, उस समय दुनिया आग के एक गड्ढे के एकदम किनारे, बल्कि यह कहना सही होगा कि उसकी कगार पर खड़ी थी। मानव जाति तेज़ी के साथ आत्महत्या के पथ पर आगे बढ़ रही थी। यह वह नाज़ुक समय था जब इंसानियत की सुबह की किरणें फूटीं, अभागे संसार की क़िस्मत जागी, और हज़रत मुहम्मद सल्ल० की पैग़म्बरी के ऐलान की घड़ी आई। क़ुदरत का शुरू से नियम रहा है कि जब अधर्म और अन्धकार बहुत बढ़ जाता है और अन्तरात्मा मुर्दा होने लगती है, तो उसकी रहमत का कोई जीवनदायक झोंका चलता है और पतझड़ से घिरी इंसानियत के बाग़ में फिर से बहार आ जाती है।
दुनिया में उस समय अज्ञानता, अनाचार तथा शिर्क व बुतपरस्ती का राज था, जिसे देखकर आप सल्ल० की बेचैनी, क़ुदरत की हिदायतों और आदेशों के लिए चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। ऐसा महसूस होता था कि कोई आसमानी ताक़त और आवाज़ आपको बुला रही है और आपको रास्ता दिखा रही है और किसी बड़े मंसब के लिए आपको तैयार कर रही है।
उन दिनों आप सल्ल० अकेले रहना पसन्द करते थे और अकेले बैठने में सुकून मिलता था। आप मक्का की घाटियों से गुज़रते तो पेड़ों और पत्थरों से आवाज़ आती, “अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह” (ऐ अल्लाह के रसूल, आप पर सलामती हो)। आप अपने दाएं-बाएं और पीछे मुड़कर देखते तो पेड़ों और पत्थरों के अलावा कुछ नज़र न आता।1
ग़ार-ए-हिरा में ज्ञान प्राप्ति
आप ज़्यादातर वक़्त ग़ार-ए-हिरा2 में रहते और लगातार कई-कई रातें वहां गुज़ारते। इसका बन्दोबस्त आप पहले से ही कर लेते थे। यहां आप इब्राहीमी तरीक़े पर अल्लाह की इबादत में लीन रहते। इसी तरह आप एक बार ग़ार-ए-हिरा में थे कि नुबूवत के मंसब से आपको गौरवान्वित करने की शुभ घड़ी आ पहुंची।
आपकी उम्र के 41वें वर्ष में, रमज़ान की 17 तारीख़ को (6 अगस्त 610 ई०), आपके पास ग़ार-ए-हिरा में फ़रिश्ता (जिबरईल) आया और कहा, “पढ़िए।” आपने जवाब दिया, “मैं पढ़ा हुआ नहीं हूं।” आप फ़रमाते हैं कि उस पर उसने मुझे पकड़कर दबाया, यहां तक कि मैंने उसकी तकलीफ़ महसूस की। मैंने जवाब दिया, “मैं पढ़ा हुआ नहीं हूं।” उसने फिर मुझे पकड़ा और इतनी ज़ोर से लिपटाया कि मुझ पर उसका सख़्त दबाव पड़ा, फिर मुझे छोड़ दिया और कहा, “पढ़िए।” मैंने कहा कि मैं पढ़ा नहीं हूं। उसने फिर मुझे पकड़कर दोबारा उसी तरह दबाया और कहा:
ग़ार-ए-हिरा से घर वापस
इस अजीब घटना से आप सल्ल० को डर महसूस होने लगा, क्योंकि ऐसा न कभी आपके साथ पेश आया था और न आपने इस तरह की बात कभी सुनी थी। इसलिए आपको अपने लिए ख़तरा महसूस हुआ और आप घर चले आए। डर से आपका कन्धा कांप रहा था। घर पहुंचते ही आपने हज़रत ख़दीजा से कहा कि मुझे जल्दी ओढ़ा दो, मुझे जल्द ओढ़ा दो! मुझे कुछ ख़तरा महसूस हो रहा है।
आपकी पत्नी ख़दीजा ने आपसे इसकी वजह पूछी तो आपने पूरी बात बयान की। ख़दीजा एक समझदार औरत थीं। नुबूवत, नबियों और फ़रिश्तों के बारे में उन्होंने बहुत कुछ सुन रखा था। वह अपने चचेरे भाई वरक़ा बिन नौफ़ल के पास (जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था, आसमानी किताबों का अध्ययन किया था और यहूद व नसारा के पास जिनका बैठना था) कभी-कभी जाया करती थीं। ख़दीजा आपकी पत्नी थीं, वर्षों से आपके साथ रह रही थीं, उन्हें आपका पूरा भरोसा हासिल था और आपके उच्च आचरण से वह भली प्रकार परिचित थीं। आपके आचरण व व्यवहार को देखकर उनको इसका पूरा यक़ीन हो गया था कि हर पल अल्लाह की मदद आपके साथ है, आप अल्लाह के सबसे प्यारे भक्त हैं और आपका आचरण परम प्रिय है, और जो व्यक्ति ऐसा पवित्र आचरण रखता हो उस पर किसी शैतान या जिन्न और आसेब का असर कभी नहीं हो सकता। उन्होंने यक़ीन के साथ बल देकर कहा:
“हरगिज़ नहीं! अल्लाह की क़सम, अल्लाह आपको कभी अपमानित न करेगा। आप रिश्ते-नाते का लिहाज़ करते हैं, दूसरों का बोझ हल्का करते हैं, मोहताजों के काम आते हैं, मेहमानों का आदर-सत्कार करते हैं। (सच्चाई की राह की तकलीफ़ों और मुसीबतों में मदद करते हैं।)”
वरक़ा बिन नौफ़ल के यहां
हज़रत ख़दीजा ने यह बात अपने अनुभव के आधार पर कही थी, लेकिन यह मामला बहुत बड़ा था और इसमें किसी ऐसे व्यक्ति से सलाह की ज़रूरत थी जो धर्मों, उनके इतिहास, नुबूवत और उनके स्वभाव को अच्छी तरह जानता हो। उन्होंने सोचा कि अपने विद्वान चचेरे भाई वरक़ा बिन नौफ़ल से मदद लेनी चाहिए। अतः वह आपको साथ लेकर उनके पास गईं। आप सल्ल० ने वरक़ा को पूरा हाल सुनाया। वरक़ा ने सुनते ही कहा, “क़सम है उसकी जिसके हाथ में मेरी जान है! आप इस उम्मत के नबी हैं, और आपके पास वही महान नामूस (जिबरईल) आया था जो हज़रत मूसा अ० के पास आया था। और एक ज़माना आएगा कि आपकी क़ौम आपको झुठलाएगी, और दुख पहुंचाएगी। आपको निकालेगी और आपसे जंग करेगी।”
जब रसूलुल्लाह सल्ल० ने यह सुना कि क़ौम आपको निकाल देगी तो आपको कुछ हैरत हुई, क्योंकि क़ुरैश में अपनी हैसियत से आप परिचित थे और जानते थे कि वह आप सल्ल० को “सादिक़” (सच्चा) और “अमीन” (अमानतदार) कहते हैं और उनकी ज़बान न थकती थी। आपने हैरत से पूछा, “क्या वह मुझे निकाल देंगे?” वरक़ा ने जवाब दिया, “हां! जब भी कोई वह पैग़ाम लेकर आया जो आप लाए हैं, तो लोगों ने उससे दुश्मनी पर कमर बांध ली और उससे जंग की। यह बराबर होता आया है। अगर मुझे वह दिन नसीब होगा और मैं ज़िंदा रहूंगा तो मैं आपकी पूरी ताक़त से मदद करूंगा।”
इसके बाद बहुत दिनों तक वह्य का सिलसिला बन्द रहा। फिर जारी हुआ और क़ुरआन का उतरना शुरू हुआ और पूरे 23 वर्ष जारी रहा।
सबसे पहले ईमान लाने वाले
हज़रत ख़दीजा का इस्लाम क़ुबूल करना
सबसे पहले हज़रत ख़दीजा ने इस्लाम क़ुबूल किया। आपकी पत्नी होने की वजह से ख़दीजा को आपकी सेवा और सहायता का ख़ूब मौक़ा था, और उन्होंने हर मौक़े पर आपका साथ दिया। लोगों से आपको जो तकलीफ़ें पहुंचतीं, वह उनको हमेशा हल्का करने की कोशिश करतीं और हिम्मत बंधातीं।
हज़रत अली और ज़ैद बिन हारिसा का इस्लाम लाना
हज़रत ख़दीजा के बाद हज़रत अली बिन अबी तालिब इस्लाम लाए। उस समय उनकी उम्र दस साल थी। इस्लाम लाने से पहले आपकी गोद में खेले थे; आपने परेशानी व अकाल के समय उनको अबू तालिब से मांग लिया था और अपने घराने में शामिल कर लिया था। इसके बाद ज़ैद बिन हारिसा, जो आपके गुलाम थे और आपने उनको भी गोद लिया था, इस्लाम लाए। इन लोगों का इस्लाम क़ुबूल करना असल में ऐसे लोगों की गवाही थी जो आपसे सबसे क़रीबी थे और आप सल्ल० को सबसे ज़्यादा जानते थे।
हज़रत अबू बक्र का इस्लाम लाना
हज़रत अबू बक्र का इस्लाम की परिधि में आना कोई कम अहम बात न थी, क्योंकि उनकी सूझ-बूझ, उनके जोश और उनके मियानारवी (बीच का रास्ता अपनाने वाले) की वजह से क़ुरैश में उनको ख़ास स्थान हासिल था। उनके व्यक्तित्व में बड़ी सादगी और सलोनापन था। क़ुरैश के वंशों के इतिहास से पूरी परिचित थे, और एक सुशील एवं सफल व्यापारी भी। अतः अपने जानने-पहचानने वालों तथा अपने आस-पास उठने-बैठने वालों में उन्होंने इस्लाम का प्रचार शुरू किया।
उनके प्रचार से क़ुरैश के बहुत से नामी सरदार इस्लाम लाए, जिनमें हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ि०, ज़ुबैर रज़ि०, अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ि०, तलहा बिन उबैदुल्लाह रज़ि० उल्लेखनीय हैं। हज़रत अबू बक्र इन लोगों को आपके पास लाए और उन्होंने इस्लाम क़ुबूल किया। उनके बाद क़ुरैश के अनेक नामी-गिरामी लोग इस्लाम लाए। उनमें कुछ के नाम इस तरह हैं: अबू उबैदा रज़ि०, अरक़म रज़ि०, उस्मान बिन मज़ऊन रज़ि०, उबैदा बिन हारिस रज़ि०, सईद बिन ज़ैद रज़ि०, ख़ब्बाब रज़ि०, अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ि०, अम्मार बिन यासिर रज़ि०, सुहैब रज़ि० आदि।
इसके बाद लोगों ने बड़ी संख्या में इस्लाम क़ुबूल करना शुरू किया। टोली की टोली इस्लाम की परिधि में आने लगी। इनमें औरतें व मर्द दोनों होते, यहां तक कि मक्का में जगह-जगह इस्लाम की चर्चा होने लगी।
सफ़ा पहाड़ से हक़ का ऐलान
शुरू में अल्लाह के रसूल सल्ल० इस्लाम के प्रचार का काम छिपाकर करते रहे, और तीन साल इसी तरह गुज़र गए। फिर अल्लाह की तरफ़ से आपको खुलकर ऐलान करने का आदेश हुआ:
हुक्म के बाद आप सफ़ा पहाड़ी की चोटी पर चढ़े और ज़ोर से यह सदा लगाई, “या सबाहाह!” यह नारा अरबों के लिए जाना-पहचाना था और उस समय लगाया जाता था जब किसी दुश्मन या लुटेरे के हमले का फ़ौरन ख़तरा होता। “या सबाहाह” का नारा सुनना था कि क़ुरैश का सारा क़बीला वहां जमा हो गया; जो किसी वजह से नहीं आ सका, उसने अपना प्रतिनिधि भेजा। उस समय आपने उनको सम्बोधित करते हुए फ़रमाया:
“ऐ बनी अब्दुल मुत्तलिब! ऐ बनी फ़िहर! ऐ बनी कअब! अगर मैं तुमको यह सूचना दूं कि इस पहाड़ के पहलू में एक लश्कर खड़ा है और तुम पर हमला करना चाहता है, तो क्या तुम इस बात पर यक़ीन करोगे?”
अरब सच्चे और व्यावहारिक लोग थे। उन्होंने एक व्यक्ति में सच्चाई, ईमानदारी और ख़ैरख़्वाही का अनेक बार अनुभव किया था। जब उन्होंने देखा कि यह व्यक्ति पहाड़ की चोटी पर खड़ा है और पहाड़ की दूसरी तरफ़ भी इसकी नज़र है, जबकि वह स्वयं सिर्फ़ अपने सामने की चीज़ देख रहे हैं, तो वह सब एक नतीजे पर पहुंचे और उन सब ने कहा कि “हां, हम यक़ीन करेंगे।”
इस तरह जब सुनने वालों के यक़ीन का ज्ञान हो गया तो आपने बड़े जतनपूर्ण एवं प्रभावी ढंग से फ़रमाया, “तो यह समझो कि मैं तुमको एक सख़्त अज़ाब से डराने और आगाह करने आया हूं, जो बिल्कुल तुम्हारे सामने है।”
यह असल में नुबूवत की सही तारीफ़ और निशानदही थी। यह इस बात का इशारा था कि ग़ैबी हक़ीक़तों तथा ईश्वरीय ज्ञान में नुबूवत को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। सच तो यह है कि इससे आसान एवं संक्षिप्त रास्ता, तथा इससे अधिक सुबोध और साफ़ वर्णन-शैली कोई और नहीं हो सकती थी। यह सुनते ही जन-समूह पर एक ख़ामोशी छा गई। अबू लहब ने हिम्मत करके कहा, “सारे दिन तुम्हारे लिए ख़राबी हो! सिर्फ़ यही कहने के लिए तुमने हमें यहां बुलाया था?”
दुश्मनी और उत्पीड़न शुरू
जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ने दावत और प्रचार का काम इस तरह निडर होकर शुरू किया, तो शुरू में आपकी क़ौम ने इसकी ज़्यादा परवाह नहीं की और उन्होंने उसके रद्द या जवाब की कोई ज़रूरत नहीं समझी। लेकिन जब आपने उनके पत्थर के बने बुतों और देवताओं की निंदा करनी शुरू की तो यह बात उनको बहुत बुरी लगी, और वह सब एक होकर आपके विरोध पर उतर आए।
इस मौक़े पर आपके चाचा अबू तालिब ने आपको सुरक्षा प्रदान की और आपके साथ बहुत हमदर्दी का बर्ताव किया। आप किसी बाधा को ख़ातिर में लाए बिना दीन के प्रचार-प्रसार में तन-मन से लगे रहे।
अब क़ुरैश में हर तरफ़ और हर समय आपकी चर्चा होने लगी। लोग एक-दूसरे को आपके ख़िलाफ़ और दुश्मनी पर आमादा करते और इसके लिए माहौल बनाते। इसलिए एक बार दोबारा यह सब लोग एक प्रतिनिधि-मण्डल बनाकर अबू तालिब के पास गए और उनसे कहा:
“ऐ अबू तालिब! आप क्योंकि बुज़ुर्ग हैं और हम आपका बहुत सम्मान करते हैं। हमने आपसे पहले भी निवेदन किया था कि आप अपने भतीजे को मना कर लें, लेकिन आपने इस सिलसिले में कुछ न किया। अब अल्लाह की क़सम, हम इससे अधिक सब्र नहीं करेंगे। अब हम अपने पूर्वजों का अपमान, हमें नासमझ व बेवक़ूफ़ ठहराने तथा हमारे देवताओं को ऐब लगाने की कोशिश और अधिक सहन नहीं करेंगे। या तो आप उनको इस हरकत से रोके रखें, या फिर हम उनसे और आपसे समझ लेंगे, यहां तक कि हममें कोई एक पक्ष ख़त्म हो जाए।”
अबू तालिब को अपनी क़ौम की दुश्मनी भी अखरती थी, और वह इस पर भी राज़ी न थे कि अल्लाह के रसूल सल्ल० की मदद से हाथ उठा लें और उनको क़ौम के हवाले कर दें। उन्होंने आपको बुला भेजा और कहा, “मेरे भतीजे! तुम्हारी क़ौम के लोग मेरे पास आए थे और ऐसा-ऐसा कह रहे थे। ज़रा मेरी जान का भी ख़्याल करो और अपनी जान का भी। मुझ पर इतना बोझ न डालो जिसको मैं उठा न सकूं।”
अल्लाह के रसूल सल्ल० को यह सुनकर ख़्याल हुआ कि शायद अबू तालिब अब उनके मामले में चिन्तित हैं और अब आपके चाचा आपको अधिक संरक्षण व समर्थन न दे सकेंगे। आपने फ़रमाया कि:
“चाचा! अल्लाह की क़सम, अगर वह मेरे दाएं हाथ में सूरज व बाएं हाथ में चांद रख दें और यह चाहें कि मैं इस काम को छोड़ दूं, यहां तक कि अल्लाह पाक इसको ग़ालिब करे या मैं इस राह में मर जाऊं, तब भी मैं इससे बाज़ न आऊंगा।”
यह कहकर अल्लाह के रसूल सल्ल० की आंखों में आंसू आ गए और आप रो दिए। इसके बाद आप उठे और जाने लगे। आपको इस तरह जाता देखकर अबू तालिब ने आपको आवाज़ दी और कहा कि मेरे प्यारे भतीजे, आओ! आप सामने आए, उन्होंने कहा, “जाओ, और जो तुम्हारा दिल चाहे और जिस तरह चाहो तबलीग़ (दीन का प्रचार) करो। अल्लाह की क़सम, मैं तुमको कभी किसी के हवाले न करूंगा।”
क़ुरैश के हाथों मुसलमानों पर ज़ुल्म
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने प्रचार का काम पूरे ज़ोर-शोर से शुरू कर दिया। क़ुरैश जब आपसे और आपके चाचा अबू तालिब से निराश हो गए, तो उनका सारा ग़ुस्सा अपने क़बीले के उन लोगों पर उतरने लगा जिन्होंने इस्लाम क़ुबूल किया था और जिनका कोई समर्थक न था। हर क़बीला अपने क़बीले के उन लोगों पर टूट पड़ा जिन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया था। उनको क़ैद, मार-पीट, भूख-प्यास तथा मक्का की झुलसा देने वाली गर्मी का उत्पीड़न बर्दाश्त करना पड़ा।
हज़रत बिलाल रज़ि०
हज़रत बिलाल रज़ि० को उनके आक़ा (स्वामी) उमैया ठीक तपती हुई दोपहर में बाहर लाते, पीठ के बल लिटा देते, फिर हुक्म देते कि एक बहुत बड़ा पत्थर इनके सीने पर रखा जाए। फिर कहते, “नहीं! अल्लाह की क़सम, नहीं! तुमको उस समय तक इसी हालत में रखा जाएगा जब तक तुम्हारा दम न निकल जाए, या तुम मुहम्मद (सल्ल०) का इन्कार कर दो और लात व उज़्ज़ा की पूजा करने लगो।” लेकिन वह इस पर भी तौहीद के ऐलान से बाज़ न आते और कहते, “अहद! अहद!” (वह एक है, वह एक है)। इस हालत में एक बार हज़रत अबू बक्र उनके पास से गुज़रे और उमैया को एक ज़्यादा शक्तिशाली, बलवान, स्वस्थ और काला गुलाम देकर हज़रत बिलाल रज़ि० को आज़ाद करा लिया।
आले यासिर
अम्मार बिन यासिर और उनके मां-बाप को भी बनी मख़ज़ूम बाहर लाते और मक्का की तपती धूप में तरह-तरह की तकलीफ़ें पहुंचाते। अगर अल्लाह के रसूल सल्ल० का उधर गुज़र होता तो फ़रमाते, “यासिर की सन्तान! थोड़ा सब्र! थोड़ा सब्र! तुम्हारी मंज़िल जन्नत है।” उनकी मां को उन लोगों ने इस्लाम के सिवा हर चीज़ का इन्कार करने की वजह से शहीद कर दिया।
मुसअब बिन उमैर रज़ि०
मुसअब बिन उमैर रज़ि० मक्का के सजीले और लाड़-प्यार से पले नौजवान थे। उनके माता-पिता बहुत धनी थे और उनको अच्छे से अच्छे कपड़े पहनाते थे। ख़ुशबू के प्रयोग में मक्का में उनसे बढ़कर कोई न था। बहुत ही क़ीमती जूते पहनते। अल्लाह के रसूल सल्ल० उनकी चर्चा करते हुए फ़रमाते थे, “मैंने मक्का में मुसअब बिन उमैर से अधिक सजीला, सुरुचिपूर्ण और लाड़-प्यार से पला किसी और को नहीं देखा।”
मुसअब बिन उमैर को जब यह ख़बर मिली कि अल्लाह के रसूल सल्ल० अरक़म के घर में इस्लाम की दावत (बुलावा) देते हैं, तो वह भी वहां पहुंचे। इस्लाम क़ुबूल किया, लेकिन अपनी मां और क़ौम के डर से यह बात उन्होंने किसी को बताई नहीं, और छिप-छिपकर अल्लाह के रसूल सल्ल० से मिलते रहे। उस्मान बिन तलहा ने एक बार नमाज़ पढ़ते हुए देख लिया, तो उनकी माता और क़बीले वालों को ख़बर कर दी। वह उनको पकड़कर ले गए और क़ैद कर दिया, और जब तक हब्शा (अबीसीनिया) की तरफ़ पहली हिजरत (प्रस्थान) न हुई, वह क़ैद में ही रहे। इस पहले क़ाफ़िले के साथ उन्होंने हिजरत की। फिर मुसलमानों के साथ इस शान से वापस हुए कि उनकी हालत एकदम बदल चुकी थी। कोमलता और लालित्य की जगह खुरदुरापन पैदा हो गया था। उनकी मां भी उनमें यह बदलाव देखकर कुछ न कह सकीं और चुप रह गईं।
उस्मान बिन मज़ऊन रज़ि०
कुछ अन्य मुसलमानों ने मुशरिकों की पनाह (शरण) भी ली थी। यह मुशरिक क़ुरैश के प्रभावशाली सरदार थे और अपनी पनाह में आए मुसलमानों की पूरी रक्षा करते थे। उस्मान बिन मज़ऊन रज़ि० ने वलीद बिन मुग़ीरा के यहां पनाह ली थी, लेकिन उन्हें किसी ग़ैर-अल्लाह की पनाह पसन्द न थी, इसलिए वह वलीद की पनाह से अलग हो गए। एक दिन उनकी किसी मुशरिक से कुछ बात हुई, इस पर उस मुशरिक ने ग़ुस्से में आकर ऐसा तमाचा मारा कि उनकी आंख जाती रही। वलीद, जो क़रीब ही यह मंज़र देख रहा था, बोल उठा, “मेरे भतीजे! तुम मेरी पनाह में थे, तुमने नाहक़ उसे छोड़ा।” उस्मान ने जवाब दिया, “मेरी अच्छी आंख भी उसी तरह अल्लाह की राह में दुख झेलने के लिए तैयार है। और ऐ अबू अब्दे शम्स! मैं तो उसकी पनाह में हूं जो तुमसे ज़्यादा इज़्ज़त व क़ुदरत वाला है।”
हज़रत उस्मान और हज़रत ख़ब्बाब रज़ि०
जब हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान इस्लाम लाए तो उनको उनके चाचा हकम बिन अबिल आस बिन उमैया ने ख़ूब जकड़कर बांध दिया और कहा, “तुम अपने पूर्वजों का दीन छोड़कर एक नया दीन अपना रहे हो। अल्लाह की क़सम, मैं तुमको उस समय तक न खोलूंगा जब तक तुम अपने इस नए दीन को न छोड़ दोगे।” हज़रत उस्मान ने कहा, “मैं इसको कभी न छोड़ूंगा।” उनकी हिम्मत देखकर हकम ने उनको रिहा कर दिया।
आपके एक और साथी बयान करते हैं कि एक दिन क़ुरैश मुझे पकड़कर ले गए, आग जलाई और उसमें मुझे घसीटकर डाल दिया। फिर एक व्यक्ति ने मेरे सीने पर अपना पैर रखकर इस तरह दबाया कि मेरी पीठ ज़मीन से लग गई। फिर उन्होंने अपनी पीठ खोलकर दिखाई, तो पीठ पर सफ़ेद दाग़ पड़ गए थे।
क़ुरैश की दुश्मनी और आप सल्ल० पर ज़ुल्म
क़ुरैश के तरह-तरह से सताने से भी जब इस्लाम के दीवाने अपने दीन से न हटे, तो क़ुरैश अपनी असफलता पर खीझ उठे। उन्होंने कुछ बेवक़ूफ़ों तथा गुण्डों को आप सल्ल० के पीछे लगा दिया। उन्होंने आपको झुठलाया और तरह-तरह की तकलीफ़ें देना शुरू कीं। आप पर जादूगरी, शायरी और जुनून के आरोप लगाए, और आपको सताने के लिए हर तरह के हरबे आज़माए।
एक दिन मक्का के सरदार “हिज्र”3 में जमा थे कि अचानक अल्लाह के रसूल सल्ल० तशरीफ़ लाए और काबा की परिक्रमा (तवाफ़) करते हुए उनके क़रीब से गुज़रे। उन्होंने आपका मज़ाक़ उड़ाया। तीसरी बार आप रुक गए और फ़रमाया, “क़ुरैश के लोगो! क्या तुम सुनते हो? क़सम है उसकी जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है, मैं तुम्हारे लिए ज़िब्हे अज़ीम (a great slaughter) लेकर आया हूं।” आपके यह शब्द सुनकर उन पर सन्नाटा छा गया। इसके बाद आपसे कुछ ने मेल की बातें करनी शुरू कर दीं।
दूसरे दिन यही घटना घटी। वह लोग उसी जगह जमा थे कि अल्लाह के रसूल सल्ल० तशरीफ़ लाए। वह सब एक साथ आप पर टूट पड़े और आपको घेर लिया। उनमें से एक ने आपकी चादर पकड़कर इस तरह घसीटनी शुरू की कि आपका गला मुबारक कस गया। यह देखते ही हज़रत अबू बक्र दौड़कर बीच में आ गए और रो-रोकर कहने लगे, “क्या तुम एक व्यक्ति को सिर्फ़ इतनी बात पर जान से मार डालना चाहते हो कि वह कहता है, मेरा रब अल्लाह है?” इस पर उन्होंने आपको छोड़ दिया, लेकिन हज़रत अबू बक्र इस हाल में घर वापस हुए कि उनका सिर खुल गया था, उनकी दाढ़ी पकड़कर खींचते हुए उनको बाहर ले जाया गया।
एक दिन आप निकले तो दिन भर आपको कड़े उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। कोई ऐसा न मिला जिसने आपको तकलीफ़ न पहुंचाई हो। जब आप घर आए तो तकलीफ़ के कारण चादर ओढ़कर लेट गए। उस समय सूरह अल-मुद्दस्सिर की शुरुआती आयतें उतरीं, जिसमें आपको “या अय्युहल मुद्दस्सिर” कहकर सम्बोधित किया गया, अर्थात “ऐ चादर ओढ़े हुए पैग़म्बर, उठो और लोगों को सचेत करो।”
हज़रत अबू बक्र का उत्पीड़न
एक दिन हज़रत अबू बक्र रज़ि० एक मजमे में इस्लाम के प्रचार की नीयत से खड़े हुए और इस्लाम का प्रचार करना शुरू किया, तो मुशरिक ग़ुस्से में उन पर टूट पड़े और उनको बहुत मारा। उत्बा बिन रबीआ दो फटे-पुराने जूतों से उनके चेहरे पर इस तरह से मारता रहा कि बाद में उनका चेहरा पहचाना न जाता था। हज़रत अबू बक्र रज़ि० बेहोश हो गए। बनू तैम उनको उठाकर ले गए। दिन ढले हज़रत अबू बक्र को होश आया। होश आने पर सबसे पहले उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० की ख़ैरियत पूछी। बनू तैम ने इस पर उनको बुरा-भला कहा (कि इस हाल में भी उनको अपने से ज़्यादा उनकी फ़िक्र है जिनकी वजह से यह सारी परेशानी उठानी पड़ी)।
उसी समय उम्मे जमील, जो इस्लाम ला चुकी थीं, उनसे क़रीब हुईं तो हज़रत अबू बक्र ने उनसे अल्लाह के रसूल सल्ल० के बारे में पूछा। उम्मे जमील ने कहा, “आपकी माता खड़ी हैं, सुन लेंगी।” हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने कहा कि उनके सामने कोई हर्ज नहीं। तब उम्मे जमील ने बताया कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ख़ैरियत से हैं। हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने कहा, “मेरी अल्लाह से नज़्र है कि मैं उस समय तक न कुछ खाऊंगा न पियूंगा जब तक अल्लाह के रसूल सल्ल० की सेवा में हाज़िर न हो जाऊं।”
जब लोगों का आना-जाना बन्द हुआ और सन्नाटा हुआ, तो उम्मे जमील और अबू बक्र की मां सहारा देकर रसूलुल्लाह सल्ल० की सेवा में हाज़िर हुए। अबू बक्र की यह हालत देखकर आप फ़िक्रमंद हुए। आपने उनकी मां के लिए बहुत दुआ की और उनको इस्लाम लाने पर राज़ी किया, और वह उसी समय मुसलमान हो गईं।
क़ुरैश की एक और साज़िश
क़ुरैश अपनी नाकामियों से बहुत परेशान थे। उनकी समझ में न आता था कि किस तरह अल्लाह के रसूल सल्ल० से लोगों को बदगुमान करें और आपके पास आने और इस्लाम लाने से रोकें। वह चाहते थे किसी तरह दूर तथा निकट से आने वाले क़ाफ़िलों को आपसे दूर रखें और आपकी बात सुनने से रोकें। वह सब मिलकर वलीद के पास गए और उनसे सलाह ली। वलीद ने कहा, “ऐ लोगो! हज का दौर आ चुका है। इस समय अरब के विभिन्न शिष्ट-मण्डल आएंगे, और उन सबके कान में यह बात पड़ चुकी है। इसलिए इन साहब (अल्लाह के रसूल सल्ल०) के बारे में कोई एक बात तय कर लो, जिससे कि एक-दूसरे की काट न हो और सब एक ही बात कहें।”
देर तक इस बात पर सोच-विचार होता रहा। अनेक प्रस्ताव सामने आए, लेकिन वलीद किसी बात पर राज़ी नहीं हुआ और उसने सबकी राय को रद्द कर दिया। तब उन्होंने स्वयं उसकी राय पूछी। उसने कहा कि मेरे विचार से सब मिलकर यह कहो, “वह जादूगर है, जादू करने आया है, वह अपने जादू से बाप-बेटे, भाई-भाई, पति-पत्नी और ख़ानदान वालों में फूट और अलगाव पैदा कर देता है।”
क़ुरैश की पत्थर दिली
क़ुरैश ने अल्लाह के रसूल सल्ल० को सताने में बड़ी पत्थर दिली से काम लिया। वे तरह-तरह से आपको तकलीफ़ें पहुंचाते। न तो रिश्ते-नाते का ध्यान किया और न इन्सानियत का। एक बार आप हरम काबा की मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे थे, आपके पास क़ुरैश के लोग बैठे हुए थे कि उक़बा बिन अबी मुऐत कहीं से ऊंट की ओझड़ी ले आया, और जब आप सजदे में गए तो आपकी पीठ पर फेंक दी। आप उसी तरह सजदे में रहे, यहां तक कि बेटी फ़ातिमा रज़ि० आईं। उन्होंने उसको पीठ से हटाया और जिसने यह हरकत की थी उसके लिए बद-दुआ की। आपने भी उन लोगों के लिए बद-दुआ की।
हज़रत हमज़ा रज़ि० का इस्लाम और उत्बा से बातचीत
हज़रत हमज़ा का इस्लाम क़ुबूल करना
एक दिन अबू जहल सफ़ा के क़रीब आपके पास से गुज़रा और आपको बहुत बुरा-भला कहा और आप सल्ल० को तकलीफ़ पहुंचाई। आपने उसका जवाब नहीं दिया तो वह चला गया। थोड़ी देर में हज़रत हमज़ा तीर-कमान लिए एक शिकार से वापस आए। हमज़ा क़ुरैश के सबसे बहादुर और दिलेर नौजवान समझे जाते थे। उनको अब्दुल्लाह बिन जुदआन की बांदी ने पूरी बात बताई। वह उसी समय ग़ुस्से में मस्जिद-ए-हराम में दाख़िल हुए। देखा कि अबू जहल अपने आदमियों के साथ बैठा है। वह उसके क़रीब गए और बिल्कुल सिर के ऊपर खड़े होकर कमान उसके सिर पर मारकर उसे घायल कर दिया और कहा, “तुम्हारी यह हिम्मत कि तुम इनको बुरा-भला कहो और गाली दो, हालांकि मैं इन्हीं के दीन पर हूं और जो वह कहते हैं वही मैं करता हूं।” अबू जहल ख़ामोश रहा। हज़रत हमज़ा इस्लाम लाए, क़ुरैश को उनके मुसलमान होने से बड़ा धक्का पहुंचा।
उत्बा से बातचीत
जब क़ुरैश ने देखा कि आपके समर्थकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, तो उत्बा बिन रबीआ ने सुझाव दिया कि बातचीत द्वारा आप सल्ल० से समझौता किया जाए। उसने क़ुरैश से इजाज़त चाही कि आप सल्ल० से मिलकर उनके सामने कुछ पेशकश और सुझाव रखना चाहता है, हो सकता है आप सल्ल० उसे मानकर अपने प्रचार से बाज़ आ जाएं। क़ुरैश ने उत्बा को इजाज़त दे दी और उसे अपना प्रतिनिधि घोषित किया।
उत्बा अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास आकर बैठ गया और कहा, “मेरे भतीजे! तुम हमारे बीच जिस हैसियत के मालिक हो उसका ज्ञान तुम्हें है। तुमने एक बड़े झगड़े की बात अपनी क़ौम में खड़ी कर दी है। तुमने उनमें फूट डाली, उनको बेवक़ूफ़ और जाहिल ठहराया, उनके धर्म और उनके देवताओं को अपमानित किया, उनके पूर्वजों के तरीक़ों का इन्कार किया। अब मैं कुछ बातें तुम्हारे सामने रखता हूं; मुमकिन है कि इसमें कोई बात तुम्हारे मानने के क़ाबिल हो।” रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया, “कहो, मैं सुन रहा हूं।”
उसने कहा, “मेरे भतीजे! जो तरीक़ा व दीन तुम लाए हो, अगर उससे तुम्हारा मतलब माल व दौलत है, तो हम यह माल व दौलत तुम्हारे लिए इतना जमा कर देंगे कि तुम हममें सबसे अधिक मालदार हो जाओगे। अगर इज़्ज़त व ख्याति चाहते हो तो हम तुम्हें अपना सरदार मान लेंगे और कोई फ़ैसला तुम्हारी मर्ज़ी के बिना नहीं करेंगे। अगर बादशाह बनना चाहते हो तो हम तुमको बादशाह बना लेंगे। अगर यह बात भूत-प्रेत की वजह से है, जिसका बचाव तुम्हारे पास नहीं है, तो इसके लिए हम झाड़-फूंक करने वाले ला सकते हैं, और इस पर जितना ख़र्च होगा दिल खोलकर ख़र्च कर सकते हैं, यहां तक कि इससे तुम्हारी सेहत को पूरी तरह फ़ायदा हो जाए।”
जब उत्बा यह सब कह चुका तो आपने फ़रमाया, “क्या जो कुछ कहना था कह चुके?” उसने कहा, “हां।” आपने फ़रमाया, “अब मुझसे सुनो।” इसके बाद आप सल्ल० ने सूरह फ़ुस्सिलत की कुछ आयतें (सजदा तक)4 उसके सामने पढ़ीं। उत्बा के कान में जब वह आवाज़ पहुंची तो उसने ख़ामोशी के साथ सुनना शुरू किया। उसने दोनों हाथ पीठ की तरफ़ टेक लिए थे और अल्लाह का कलाम पूरा ध्यान लगाकर सुन रहा था। जब आप सजदे की आयत तक पहुंचे तो आपने सजदा किया और फ़रमाया, “अबुल वलीद! तुम्हें जो कुछ सुनना था सुन लिया, अब जैसा तुम समझो।”
उत्बा जब लौटकर अपने साथियों में आया तो लोग उसकी सूरत देखकर कहने लगे, “हम क़सम खाकर कहते हैं कि अबुल वलीद जिस चेहरे के साथ गए थे, यह चेहरा उससे बदला हुआ है।” जब वह बैठा तो लोगों ने फ़ौरन पूछा, “अबुल वलीद! क्या ख़बर लाए?” कहने लगा, “ख़बर यह है कि मैंने एक ऐसा कलाम सुना है जो इससे पहले मैंने कभी नहीं सुना था। अल्लाह की क़सम, ऐ क़ुरैश के लोगो! न वह शायरी है न जादू है, न जादू-टोना है न ज्योतिष। मेरी बात मानो और उस व्यक्ति को उसके हाल पर छोड़ दो।” यह सुनकर क़ुरैश उत्बा को बुरा-भला कहने लगे और कहा कि उसका जादू तुम पर भी चल गया। उत्बा ने कहा, “मेरी राय यही है, अब जो तुम्हारा जी चाहे करो।”
मुसलमानों की हब्शा की तरफ़ हिजरत
जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ने देखा कि आपके साथियों को कठोर यातनाएं सहन करनी पड़ रही हैं, तो आपने उनसे कहा, “अगर तुम लोग हब्शा (अबीसीनिया) की तरफ़ निकल जाओ तो अच्छा है, वह एक अच्छा देश है। वहां का जो बादशाह है उसके कारण कोई दूसरे पर अत्याचार नहीं करता, यहां तक कि अल्लाह पाक तुम्हारे लिए नजात और कुशादगी का कोई सामान पैदा कर दे।”
इस पर दस मुसलमानों की एक टोली मक्का से हब्शा की तरफ़ गई। इस्लाम में यह पहली हिजरत5 थी, जिसका नेतृत्व हज़रत उस्मान बिन मज़ऊन रज़ि० ने किया। इसके बाद जाफ़र बिन अबी तालिब रज़ि० ने हिजरत की, फिर एक-एक करके बहुत से मुसलमान हब्शा पहुंचे। उनमें कुछ लोग अकेले थे, कुछ परिवार के साथ। हब्शा की हिजरत करने वालों की कुल संख्या 83 बताई जाती है।
क़ुरैश का पीछा करना
जब क़ुरैश ने देखा कि मुसलमान हब्शा पहुंच गए और आराम से हैं, तो उन्होंने अब्दुल्लाह बिन अबी रबीआ तथा अम्र बिन आस बिन वाइल को उनका पीछा करने के लिए भेजा, और उनके साथ हब्शा के राजा नजाशी तथा उसके सरदारों और सिपहसालारों के लिए बहुत सी भेंट और तोहफ़े भेजे। हब्शा पहुंचकर पहले इन दोनों ने बादशाह के प्रमुख सरदारों को भेंट देकर उन्हें अपने पक्ष में किया और बादशाह के दरबार में पहुंचकर अपनी बात इस तरह शुरू की:
“महाराजा! आपके देश में हमारे कुछ बेवक़ूफ़ लड़कों ने आकर पनाह ली है, जिन्होंने अपना दीन छोड़ा है और आपका दीन भी स्वीकार नहीं किया, बल्कि एक नया दीन बना लिया है जिसको न हम जानते-पहचानते हैं न आप। हमें आपके पास उनकी क़ौम के कुछ ज़िम्मेदार लोगों ने भेजा है, ताकि आप उनको वापस कर दें।”
बादशाह के पास बैठे प्रमुख सरदार एक स्वर होकर बोले, “यह दोनों बिल्कुल सही कह रहे हैं। आप इनको उनके सुपुर्द कर दें।” नजाशी को इस बात पर बहुत ग़ुस्सा आया और उसने उनकी बात मानने से इन्कार कर दिया, और यह पसन्द नहीं किया कि जो उसकी पनाह में आए उसको इस तरह दूसरों के हवाले कर दिया जाए। उसने इस पर क़सम खाई। उसने अपने पादरियों को जमा किया और मुसलमानों से पूछा, “वह दीन क्या है जिसके लिए तुमने अपनी क़ौम को छोड़ दिया है, और उसे छोड़ने के बाद न मेरे दीन को अपनाया और न किसी अन्य मशहूर धर्म को अपनाया?”
जाफ़र बिन अबी तालिब ने इस्लाम का परिचय पेश किया
उस समय रसूलुल्लाह सल्ल० के चचेरे भाई जाफ़र बिन अबी तालिब खड़े हुए और उन्होंने कहा:
“ऐ बादशाह! हम एक जाहिलियत वाली क़ौम थे। बुतों को पूजते थे, मुर्दार खाते थे, हर तरह की बेहयाई और गुनाहों से घिरे हुए थे। हममें जो ताक़तवर होता वह कमज़ोर को फाड़ खाता। हम इस हाल में थे कि अल्लाह ने हम ही में से एक रसूल भेजा, जिसके ख़ानदान और हसब-नसब से, और जिसकी सच्चाई, अमानतदारी तथा सदाचरण से हम पहले से परिचित थे।
उन्होंने हमको यह दावत दी कि हम सिर्फ़ एक अल्लाह पर ईमान लाएं और उसी की इबादत करें। हम और हमारे पूर्वज जिन बुतों को पूजते थे उनको बिल्कुल छोड़ दें, और उनसे अपने सम्बन्ध तोड़ लें। उन्होंने हमको सच बोलने, अमानत अदा करने, रिश्तेदारी का ख़्याल रखने, पड़ोसी से अच्छा बर्ताव करने, अवैध व हराम बातों तथा नाहक़ ख़ून से बचने का हुक्म दिया। बेहयाई के कामों, झूठ-फ़रेब, यतीम (अनाथ) का माल खाने, पाकदामन व पाकबाज़ औरतों पर आरोप लगाने से मना किया। उन्होंने हमको हुक्म दिया कि हम सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करें और उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराएं। उन्होंने हमें नमाज़, रोज़ा और ज़कात अदा करने का हुक्म दिया और इस्लाम के अन्य अरकान (मूलमंत्र) बताए।
हमने उन्हें माना, उन पर ईमान लाए, और जो तरीक़ा व शिक्षा वह अल्लाह की तरफ़ से लाए हैं उसकी पैरवी (अनुसरण) की। सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत अपनाई और उसके साथ किसी को शामिल नहीं किया। जो उन्होंने हराम बताया उसको हराम माना, जो उन्होंने हलाल बताया उसको हलाल माना। इस पर हमारी क़ौम दुश्मनी पर उतारू हो गई। हमारी क़ौम ने हमको तरह-तरह की तकलीफ़ें पहुंचाईं और हमको इस दीन से फेरने के लिए आज़माइशों में डाला, और इसकी कोशिश की कि एक अल्लाह की इबादत छोड़कर हम फिर बुतों की इबादत को अपना लें, और जिन गुनाहों और जिन अपराधों को पहले वैध समझते थे फिर वैध व हलाल समझने लगें।
जब उन्होंने हमारे साथ बहुत ज़ोर-ज़बरदस्ती की और हमारा जीना दूभर कर दिया, और हमारे दीन के रास्ते में दीवार बनकर खड़े हो गए, तो हम आपके देश में पनाह लेने के लिए आए और इसके लिए आप ही का चयन किया। आपकी पनाह चाही। ऐ बादशाह! हम यहां यह उम्मीद लेकर आए हैं कि हम पर कोई ज़ुल्म न किया जा सकेगा।”
नजाशी ने यह बातें बहुत ग़ौर व सब्र के साथ सुनीं और कहा, “तुम्हारे नबी अल्लाह के पास से जो कुछ लाए हैं, उसकी कोई चीज़ तुम्हारे पास है?” हज़रत जाफ़र ने कहा, “है।” नजाशी ने कहा, “मुझे वह पढ़कर सुनाओ।” हज़रत जाफ़र ने सूरह मरयम की कई शुरुआती आयतें पढ़कर सुनाईं, तो नजाशी रो पड़ा और उसके आंसुओं से उसकी दाढ़ी भीग गई। उसके दरबार के पादरी भी रोने लगे, यहां तक कि उनके सहीफ़े (धार्मिक आसमानी किताब) आंसुओं से भीग गए।
क़ुरैशी शिष्टमण्डल की असफलता
नजाशी ने कहा, “बेशक यह और जो कुछ हज़रत ईसा अ० लाए थे, एक ही रोशनी की किरणें हैं।” फिर उसने क़ुरैश के दोनों प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए कहा, “तुम यहां से चले जाओ। अल्लाह की क़सम, मैं इनको तुम्हारे हवाले करने वाला नहीं।”
इस पर अम्र बिन आस ने अपने तरकश का आख़िरी तीर चलाया। उन्होंने कहा, “बादशाह सलामत! यह लोग हज़रत ईसा मसीह अ० के बारे में ऐसी बातें करते हैं जिनका ज़बान से निकालना भी मुश्किल है।” नजाशी ने पूछा, “तुम लोग हज़रत मसीह अ० के बारे में क्या कहते हो?” जाफ़र बिन अबी तालिब ने जवाब दिया, “हम उनके बारे में वही कहते हैं जो हमारे नबी सल्ल० ने हमें बताया है। वह अल्लाह के बन्दे हैं, अल्लाह के रसूल हैं और रूह (आत्मा) और शब्द हैं, जो उसने कुमारी पाकबाज़ मरयम पर डाला।”
यह सुनकर नजाशी ने अपना हाथ ज़मीन पर मारा और एक तिनका उठाकर कहा, “अल्लाह की क़सम, जो कुछ तुमने बयान किया है, हज़रत ईसा अ० उससे इस तिनके के बराबर भी अधिक नहीं हैं।” नजाशी ने मुसलमानों को अमान दी और उन्हें आदर के साथ विदा किया। क़ुरैश के दोनों दूत अपमानित होकर वहां से निकले, और मुसलमानों ने बहुत अच्छे घर और अच्छे पड़ोस में जगह पाई।
हज़रत उमर रज़ि० का इस्लाम लाना
फिर अल्लाह ने उमर बिन ख़त्ताब, जो क़बीला क़ुरैश के एक सम्मानित व्यक्ति थे, के द्वारा इस्लाम और मुसलमानों की कामयाबी का ग़ैबी सामान पैदा किया। उमर इस्लाम लाए। उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली और रोबीला था। हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्ल० की बड़ी इच्छा थी कि उमर मुसलमान हो जाएं। आप इसके लिए दुआ भी फ़रमाया करते थे।
हज़रत उमर के इस्लाम लाने की घटना इस तरह है। उनकी बहन फ़ातिमा बिन्ते ख़त्ताब इस्लाम ला चुकी थीं, उनके बाद उनके पति सईद बिन ज़ैद भी इस्लाम ला चुके थे, लेकिन दोनों ने हज़रत उमर के रोब तथा दबदबे की वजह व उनके डर से अभी तक इसे सबके सामने ज़ाहिर नहीं किया था। इस्लाम लाने के बाद ख़ब्बाब बिन अरत फ़ातिमा को क़ुरआन पढ़ाते थे।
हज़रत उमर एक बार तलवार लटकाए हुए अल्लाह के रसूल सल्ल० और आपके साथियों की तलाश में निकले। उनको यह पता चला था कि यह सब लोग उस वक़्त सफ़ा के क़रीब किसी घर में जमा हैं। रास्ते में उनको नुऐम बिन अब्दुल्लाह मिले, जो उन्हीं के क़बीला बनी अदी से थे और इस्लाम ला चुके थे। उन्होंने पूछा, “उमर! कहां का इरादा है?” कहने लगे कि “मुहम्मद का फ़ैसला करने जा रहा हूं, जिसने बेदीनी अपना ली, क़ुरैश में फूट डाली है, उनको जाहिल और बेवक़ूफ़ ठहराया है, उनके दीन पर आरोप लगाया, बुतों को गालियां दीं। आज उनका क़िस्सा ही तमाम कर देना है।” नुऐम ने कहा, “उमर! तुम किस धोखे में पड़े हो? अपने घर वालों की ख़बर लो, और पहले उनको ठीक करो।” हज़रत उमर ने पूछा, “मेरे घर में कौन?” नुऐम ने जवाब दिया, “तुम्हारे बहनोई और चचेरे भाई सईद बिन ज़ैद और तुम्हारी बहन फ़ातिमा, यह दोनों मुसलमान हो चुके हैं और मुहम्मद (सल्ल०) का दीन अपना चुके हैं। पहले उनको देख लो।”
हज़रत उमर उलटे पैर अपनी बहन और बहनोई के पास गए। उस समय उनके पास ख़ब्बाब बिन अरत बैठे हुए थे। उनके पास एक सहीफ़ा था जिसमें सूरह ता-हा लिखी हुई थी, और वह उनको यह सूरह पढ़ा रहे थे। जब उनको हज़रत उमर की आहट महसूस हुई तो ख़ब्बाब घर के एक अन्दरूनी कमरे में छिप गए। फ़ातिमा ने सहीफ़े को जल्दी से अपनी रान के नीचे दबा लिया। हज़रत उमर ने ख़ब्बाब की तिलावत सुन ली थी। वह जब अन्दर आए तो पूछा कि यह क्या खुसर-पुसर हो रही थी? उन दोनों ने जवाब दिया कि क्या तुमने कुछ सुन लिया? उन्होंने कहा, “हां, सुना है, और मुझे मालूम हो चुका है कि तुमने मुहम्मद का दीन अपना लिया है।” फिर वह अपने बहनोई सईद बिन ज़ैद को मारने दौड़े। उनकी बहन फ़ातिमा उनको बचाने के लिए लपकीं तो उमर ने उनकी भी ख़बर ली और घायल कर दिया।
जब यह सब कर चुके तो उनकी बहन और बहनोई ने कहा, “बेशक हम मुसलमान हो चुके हैं, तथा अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान ला चुके हैं। अब तुम हमारा जो चाहे कर लो।”
जब उमर ने अपनी बहन के बदन पर ख़ून के धब्बे देखे तो उनका ग़ुस्सा ठण्डा हुआ और उन्हें अपने किए पर पछतावा-सा हुआ। वह रुक गए और कहने लगे, “मुझे वह सहीफ़ा दो जो अभी मैंने पढ़ते हुए तुम दोनों को सुना था। मैं देखूं कि मुहम्मद की शिक्षा क्या है?” हज़रत उमर पढ़े-लिखे थे। जब उन्होंने यह कहा तो उनकी बहन बोलीं, “हमें डर है, मालूम नहीं तुम इसके साथ क्या करो?” उमर ने कहा, “तुम डरो नहीं, भरोसा रखो,” और अपने बुतों की क़सम खाकर उन्हें यक़ीन दिलाया। जब उमर ने इस तरह कहा तो उनकी बहन को यह लालच हुई कि शायद उमर इस्लाम ले आएं। उन्होंने नर्मी से कहा, “भाई जान! आप शिर्क की वजह से अपवित्र हैं, और इस सहीफ़े को सिर्फ़ पवित्र आदमी छू सकता है।”
हज़रत उमर ने जाकर नहाया, तब उनकी बहन ने यह सहीफ़ा उनके हाथ में दिया। उसमें सूरह ता-हा दर्ज थी। थोड़ा ही सा पढ़ा था कि हज़रत उमर बोल उठे, “क्या पाकीज़ा कलाम है!” जब ख़ब्बाब ने यह सुना तो कमरे से निकलकर सामने आए और कहने लगे, “ऐ उमर! अल्लाह की क़सम, मुझे उम्मीद है कि अल्लाह पाक अपने नबी की दावत से आपको ज़रूर गौरवान्वित करेगा। मैंने कल ही अल्लाह के रसूल सल्ल० को यह दुआ करते सुना है: ‘ऐ अल्लाह! इस्लाम की अबुल हकम बिन हिशाम (अबू जहल) या उमर बिन ख़त्ताब के माध्यम से मदद फ़रमा।’ ऐ उमर! अब तुमको कुछ अल्लाह का ख़ौफ़ और शर्म व लिहाज़ आना चाहिए।”
हज़रत उमर ने कहा, “ख़ब्बाब! मुझे मुहम्मद के पास ले चलो। मैं उनके हाथ पर इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं।” ख़ब्बाब ने कहा कि वह सफ़ा के पास एक घर में हैं, आपके साथ कई और साथी हैं। हज़रत उमर ने तलवार ली और अल्लाह के रसूल सल्ल० की तरफ़ चले। वहां पहुंचकर उन्होंने दरवाज़े पर दस्तक दी। उमर की आवाज़ सुनकर एक सहाबी ने खड़े होकर दरवाज़े की दरार से झांककर इत्मीनान करना चाहा। देखा कि उमर तलवार लगाए हैं। वह घबराए हुए अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास आए और कहने लगे, “या रसूलल्लाह! उमर बिन ख़त्ताब हैं और तलवार लगाकर आए हैं।” हज़रत हमज़ा बोले, “आने दो। अगर वह नेक इरादे से आ रहे हैं तो स्वागत है, और नहीं तो हम उन्हीं की तलवार से उनका काम तमाम कर देंगे।” फिर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया कि इजाज़त दे दो। अतः उन सहाबी रज़ि० ने हज़रत उमर को अन्दर आने की इजाज़त दे दी।
हज़रत उमर आने लगे तो आप आगे बढ़कर कमरे में उनसे मिले और उनका दामन मज़बूती से पकड़कर खींचा और कहा, “इब्ने ख़त्ताब! यहां किस इरादे से आए हो? अल्लाह की क़सम, मुझे ऐसा नज़र आता है कि अन्त से पहले तुम्हें कोई सख़्त आफ़त या मुसीबत का सामना करना पड़ेगा।” हज़रत उमर ने कहा, “या रसूलल्लाह! मैं आपके पास अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान और अल्लाह ने जो हिदायत व शिक्षा आपके द्वारा भेजी है उसको क़ुबूल करने हाज़िर हुआ हूं।” हज़रत उमर बयान करते हैं कि यह सुनकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने तकबीर का नारा बुलन्द किया। इस तकबीर से वहां मौजूद सब सहाबी समझ गए कि उमर मुसलमान हो गए।
हज़रत उमर के इस्लाम लाने से मुसलमानों का हौसला बढ़ गया। हज़रत हमज़ा पहले ही मुसलमान हो चुके थे। वह जानते थे कि क़ुरैश पर इस बात का कड़ा असर होगा। क़ुरैश को किसी दूसरे के इस्लाम लाने से इतनी परेशानी नहीं हुई जितनी हज़रत उमर के। हज़रत उमर ने अपने मुसलमान होने का खुलकर ऐलान किया। क़ुरैश में यह ख़बर आग की तरह फैल गई। वह हज़रत उमर से भी लड़ने-मरने पर आमादा हो गए। हज़रत उमर भी पूरी तरह मुक़ाबले पर आ गए। आख़िर में इस्लाम के दुश्मन निराश व हिम्मत हारकर बैठ गए।
बनी हाशिम का बहिष्कार
इस्लाम अरब के क़बीलों में तेज़ी से फैलने लगा तो क़ुरैश को बहुत फ़िक्र हुई। उन्होंने सलाह के लिए बैठक की और उसमें फ़ैसला लिया गया कि एक लिखित समझौते द्वारा बनी हाशिम और बनी मुत्तलिब को इसका पाबन्द कर दिया जाए कि वह किसी और जगह शादी नहीं कर सकते, न दूसरे उनसे शादी कर सकेंगे, न कोई चीज़ उनके हाथ बेचेंगे न उनसे ख़रीदेंगे। बैठक के बाद उन्होंने इन धाराओं को लिखकर सबके लिए इसका पालन करना अनिवार्य कर दिया, और इसे पुष्टि के लिए काबा के अन्दर लगा दिया।
बनी हाशिम शिअ्बे अबी तालिब की घाटी में नज़रबंद
क़ुरैश की इस पाबन्दी के बाद बनी हाशिम और बनी मुत्तलिब, अबू तालिब के साथ हो गए और शिअ्बे अबी तालिब के साथ उसी घाटी में नज़रबंद हो गए। यह घटना अभ्युदय काल के सातवें वर्ष की है। अबू लहब बिन अब्दुल मुत्तलिब, बनी हाशिम के साथ नहीं था और क़ुरैश के साथ हो गया। बनी हाशिम तीन साल तक इसी तरह घाटी में घिरे रहे। यहां उन्हें बबूल के पत्ते खाकर गुज़ारा करने की नौबत आई; उनके बच्चे भूख से रोते-बिलबिलाते थे। क़ुरैश व्यापारियों को उनके ख़िलाफ़ भड़काते थे। अतः व्यापारियों ने क़ीमत इतनी बढ़ा दी कि वह यह सामान ख़रीद ही न सकें।
तीन साल इसी तरह गुज़रे। इन दिनों कुछ आवश्यक वस्तुएं चोरी-छिपे उनके पास पहुंच पाती थीं। क़ुरैश के कुछ हमदर्द लोग इस तरह चोरी-छिपे उनकी मदद करते थे। इस परीक्षा की घड़ी में भी अल्लाह के रसूल सल्ल० अपनी क़ौम में प्रचार का काम दिन-रात, कभी ऐलानिया कभी छिपकर, करते रहे। बनी हाशिम सब्र और आशा के साथ इन तकलीफ़ों को झेलते रहे।
समझौता ख़त्म
बनी हाशिम की यह दयनीय दशा देखकर क़ुरैश के कुछ हमदर्द लोगों का दिल भर आया। इसमें हिशाम बिन अम्र बिन रबीआ सबसे आगे थे। हिशाम हमदर्द और सज्जन व्यक्ति थे। उनकी क़ौम में उनका बड़ा सम्मान था। उन्होंने इस सम्बन्ध में क़ुरैश के कुछ हमदर्द एवं सक्षम लोगों से सम्पर्क स्थापित कर उनकी शराफ़त और इन्सानियत को ग़ैरत दिलाई, और इस बात पर आमादा किया कि इस अत्याचारपूर्ण समझौते को ख़त्म किया जाए। यह पांच लोग थे, और उन सबने इस समझौते को असंवैधानिक घोषित कर समाप्त करने का निर्णय लिया।
दूसरे दिन क़ुरैश की महफ़िल में ज़ुहैर बिन अबी उमैया लोगों के सामने आए और कहने लगे, “ऐ मक्का वालो! हम मज़े से खाएं-पिएं और बनी हाशिम दाने-दाने को तरसें और मरने के क़रीब पहुंच जाएं। उनके साथ ख़रीदना-बेचना तक बन्द हो। अल्लाह की क़सम, मैं तब तक चैन से नहीं बैठूंगा जब तक कि इस अत्याचारपूर्ण समझौते के टुकड़े-टुकड़े न कर दिए जाएं।” इस पर अबू जहल ने कुछ हस्तक्षेप करना चाहा, लेकिन उसकी कुछ चल न सकी। मुतइम बिन अदी समझौते को फाड़ने की ग़रज़ से आगे बढ़े तो देखा कि दीमक पूरे काग़ज़ को चाटकर ख़त्म कर चुकी है, और सिर्फ़ “बिस्मिका अल्लाहुम्मा” (अल्लाह के नाम से) के शब्द बाक़ी हैं। आख़िर में इस समझौते को फाड़कर फेंक दिया गया, और इस तरह इसमें जो कुछ लिखा था वह सब ख़त्म हो गया।
ख़दीजा और अबू तालिब का निधन
नुबूवत के दसवें वर्ष, एक ही साल के अन्दर हज़रत ख़दीजा और अबू तालिब का निधन हो गया। यह दोनों ही अल्लाह के रसूल सल्ल० के बहुत क़रीब, उनके शुभचिन्तक तथा उनके बहुत अच्छे सहयोगी थे। उनके निधन से आपको बड़ा धक्का पहुंचा, और इसके बाद लगातार कई परेशानियों का सामना आपको करना पड़ा।
क़ुरआन का जादुई असर
तुफ़ैल बिन अम्र दौसी रज़ि०
तुफ़ैल बिन अम्र दौसी, जो अरब के एक उच्च कोटि के कवि तथा सम्मानित व्यक्ति थे, जब मक्का आए तो क़ुरैश ने उनको अल्लाह के रसूल सल्ल० से मिलने से रोकना चाहा। उन्होंने तुफ़ैल को आप सल्ल० के क़रीब जाने और आपकी बात सुनने से बहुत डराया और कहा, “हमें डर है कि कहीं तुम्हारे और तुम्हारी क़ौम के साथ वही बात न हो जो यहां हमारे साथ हो रही है। इसलिए न तुम उनसे न कुछ बात करना न उनकी सुनना।”
तुफ़ैल कहते हैं, “वल्लाह, वह मेरे पीछे पड़े रहे, यहां तक कि मैंने फ़ैसला कर लिया कि न उनकी सुनूंगा न उनसे बात करूंगा। इससे भी बढ़कर यह कि मैंने अपने कानों में रूई ठूंस ली और हरम की तरफ़ गया। अचानक मेरी निगाह उठी तो क्या देखता हूं कि रसूलुल्लाह सल्ल० काबा के नज़दीक नमाज़ पढ़ रहे हैं। मैं आपके पास खड़ा हो गया, और अल्लाह ने आपका कुछ कलाम मुझे ज़बरदस्ती सुनवा ही दिया। मैंने बहुत अच्छा कलाम सुना। मैंने अपने दिल में कहा, ‘मेरी मां मुझे रोए! अल्लाह की क़सम, मैं कवि भी हूं और कविता को परखने वाला भी; कलाम की अच्छाई-बुराई मुझसे छिपी नहीं रह सकती। आख़िर यह कलाम सुनने से मुझे क्या चीज़ रोक रही है? अगर वह सचमुच अच्छी बात है तो मैं उसे क़ुबूल करूंगा, बुरी बात है तो छोड़ दूंगा।’”
इसके बाद तुफ़ैल अल्लाह के रसूल सल्ल० से आपके घर में मिले और सारा क़िस्सा कह सुनाया। आपने तुफ़ैल को इस्लाम लाने की दावत दी और उनके सामने क़ुरआन की तिलावत की। तुफ़ैल मुसलमान हो गए और इस्लाम के प्रचारक बनकर अपनी बिरादरी में वापस हुए। उन्होंने अपने घर वालों के साथ रहने से भी इन्कार कर दिया और कह दिया कि जब तक वह मुसलमान न होंगे, मैं उनसे कोई सम्बन्ध नहीं रखूंगा। इस बात पर उनके घर वाले भी मुसलमान हो गए। उन्होंने अपने क़बीले के लोगों को इस्लाम की दावत दी, और इस क़बीले में इस्लाम का ख़ूब प्रचार हुआ।
हज़रत अबू बक्र रज़ि० की तिलावत
हज़रत अबू बक्र शुरू में अपने घर के अन्दर ही नमाज़ पढ़ा करते थे। फिर उन्होंने अपने घर के आंगन में नमाज़ की एक जगह बना ली, और वहां नमाज़ पढ़ते और क़ुरआन की तिलावत करते। जब वह क़ुरआन की तिलावत करते तो मुशरिकों की औरतें और बच्चे उनको घेर लेते और उन पर टूट पड़ते, वे उनको देखते और हैरत करते। हज़रत अबू बक्र बहुत हमदर्द थे। तिलावत करते समय उनके आंसू निकल आते। यह देखकर मुशरिक और घबरा गए।
उन्होंने इब्नुद्दग़िना को, जिन्होंने अबू बक्र को पनाह दी थी, बुलवा भेजा। जब वह उनके सामने आए तो उन सबने उनसे कहा कि “तुमने अबू बक्र को जब पनाह दी थी तो हमने उसको इस शर्त पर माना था कि वह अपने घर के अन्दर अल्लाह की इबादत करें, लेकिन उन्होंने अपनी नमाज़ और क़ुरआन पाक की तिलावत और सब कुछ खुलेआम करना शुरू कर दिया है। हमें डर है कि वह हमारे लड़कों व औरतों पर असर डालेंगे। अब अगर वह इस पर राज़ी हों कि अपने घर के अन्दर अल्लाह की इबादत करें तो ठीक है, नहीं तो उनसे कहो कि तुम्हारी पनाह छोड़ दें; क्योंकि न हम अपनी शर्त तोड़ना चाहते हैं और न अबू बक्र को खुलेआम इबादत व तिलावत की इजाज़त देने पर राज़ी हैं।” जब इब्नुद्दग़िना ने अबू बक्र को क़ुरैश की इस मांग से अवगत कराया तो उन्होंने जवाब दिया कि “मैं तुम्हारी पनाह और ज़मानत छोड़ता हूं और अल्लाह की ज़मानत व हिफ़ाज़त पर राज़ी हूं।”
ताइफ़ का सफ़र
अबू तालिब के निधन के बाद अल्लाह के रसूल सल्ल० को क़ुरैश ने अनेक ऐसी तकलीफ़ें पहुंचाईं जिनकी हिम्मत अबू तालिब के जीवनकाल में वह नहीं करते थे। एक बार आपके सिर पर मिट्टी भी फेंकी गई। इन मुसीबतों का सिलसिला टूटता न देखकर आपने ताइफ़ जाने का इरादा किया। आपकी इच्छा यह थी कि आप सक़ीफ़ क़बीला के लोगों को इस्लाम की दावत दें, और उनकी मदद हासिल करें। ताइफ़ वासियों से आपको कुछ अच्छाई की उम्मीद थी, क्योंकि आपका बचपन क़बीला साद में गुज़रा था, जो ताइफ़ के क़रीब आबाद था।
ताइफ़ नगर आबादी के फैलाव तथा सुख-समृद्धि में मक्का के बाद दूसरे नम्बर पर था। क़ुरआन पाक में क़ुरैश की ज़बान से इसी बात की तरफ़ इशारा किया गया है:
ताइफ़ नगर मशहूर बुत “लात” की पूजा का भी केन्द्र था, जहां लोग तीर्थयात्रा पर आते थे। इस बात में ताइफ़ मक्का के समकक्ष था, जो क़ुरैश के सबसे बड़े बुत “हुबल” का पूजा-केन्द्र था। अमीर और धनी लोग गर्मियों के दिन यहीं गुज़ारते थे। इस्लामी दौर में और उसके बाद भी ताइफ़ का यह महत्व बाक़ी रहा।
ताइफ़ वाले जायदाद और ज़मीनों के मालिक थे; उनके पास बड़े बाग़ और खेत थे। इस दौलत और ख़ुशहाली ने उनके अन्दर अहंकार पैदा कर दिया था। क़ुरआन पाक में आता है:
ताइफ़ पहुंचकर सबसे पहले आप सक़ीफ़ के सरदारों से मिलने गए और उनके पास बैठकर उन्हें इस्लाम की दावत दी, लेकिन इसका आपको बहुत बुरा और कठोर जवाब मिला। उन्होंने आपका मज़ाक़ भी उड़ाया, और शहर के औबाश लोगों तथा ग़ुलामों को आप सल्ल० को सताने के लिए छोड़ दिया। ये लोग आपको गालियां देते, शोर मचाते और आप पर पत्थर फेंकते। इसी बेकसी और परेशानी में आप पनाह लेने के लिए एक खजूर की छाया में बैठे। ताइफ़ में आपको जितना सताया गया, वह मक्का की यातनाओं से कहीं अधिक था। ताइफ़ वालों ने रास्ते के दोनों तरफ़ अपने आदमी खड़े कर दिए। आप एक क़दम भी उठाते तो किसी तरफ़ से पत्थर आप पर फेंका जाता, यहां तक कि आपके दोनों पैर ज़ख़्मों से लहूलुहान हो गए। उस समय सहज ही आपकी ज़बान पर यह दुआ जारी हुई:
“इलाही! अपनी कमज़ोरी, बेसरो-सामानी, और लोगों में अपने अपमानित होने की बाबत तेरे सामने फ़रियाद करता हूं। तू सब रहम (दया) करने वालों से अधिक रहम करने वाला है। दलित और दीन-दुखियों का मालिक तू ही है। मुझे किसके सुपुर्द किया जाता है? क्या किसी पराए कटुवादी के, या उस दुश्मन के जो काम पर क़ाबू रखता है?
अगर मुझ पर तेरा ग़ज़ब (क्रोध) नहीं तो मुझे इसकी परवाह नहीं, लेकिन तेरी दया-दृष्टि मेरे लिए अधिक विशाल है। मैं तेरी ज़ात के नूर (प्रकाश) से पनाह चाहता हूं, जिससे सारा अंधेरा रोशनी में बदल जाता है, और तेरा ग़ज़ब मुझ पर उतरे या तेरी नाराज़मन्दी मुझ पर उतरे। मुझे तेरी ही रज़ामन्दी चाहिए, और नेकी करने या बदी (बुराई) से बचने की ताक़त मुझे तेरी ही तरफ़ से मिलती है।”
इस मौक़े पर अल्लाह पाक ने पहाड़ों के फ़रिश्ते को आपके पास भेजा। उसने आपसे इस बात की इजाज़त चाही कि वह उन दोनों पहाड़ों को, जिनके बीच ताइफ़ है, मिला दे। आपने इरशाद फ़रमाया कि नहीं। मुझे उम्मीद है कि इनकी सन्तान में से कोई ऐसा पैदा होगा जो एक अल्लाह की इबादत करेगा और उसके साथ किसी को शामिल न ठहराएगा।
जब उत्बा बिन रबीआ और शैबा बिन रबीआ ने आपकी यह हालत देखी तो उनका दिल कुछ नर्म पड़ा। उन दोनों ने अपने एक ईसाई ग़ुलाम “अद्दास” को बुलाया और उससे कहा, “लो, यह अंगूर का गुच्छा एक प्लेट में रखकर उस व्यक्ति के पास ले जाओ और कहो कि यह उनके खाने के लिए है।” अद्दास ने ऐसा ही किया। वह आपकी बातचीत तथा सदाचरण से प्रभावित होकर मुसलमान हो गया। अल्लाह के रसूल सल्ल० जब ताइफ़ से वापस मक्का आए तो क़ुरैश में आपके ख़िलाफ़ तथा आपको तकलीफ़ें पहुंचाने का पहले जैसा ही हाल था।
मेराज का सफ़र
इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्ल० को मेराज हुई। आपको रातों-रात क़ुदरती ताक़त से मस्जिद-ए-हराम (काबा) ले जाया गया, वहां से मस्जिद-ए-अक़्सा पहुंचाया गया, इसके बाद जन्नत तथा सातों आसमानों की सैर, अल्लाह की निशानियां दिखाई गईं, नबियों से मुलाक़ात की, वह सभी बातें हुईं जिनके बारे में क़ुरआन में आया है कि:
यह अल्लाह की तरफ़ से आपकी आवभगत थी, जो आपकी दिलदारी तथा ताइफ़ की यातनाओं, अपमान और बेगानगी की क्षतिपूर्ति के लिए थी, जिसकी कठिन परीक्षा से आप गुज़रे थे।
जब सुबह हुई तब आपने लोगों को इस बात की ख़बर दी। क़ुरैश ने इस बात पर बहुत हैरत जताई और इसे नामुमकिन बताया। आपको झुठलाया और आपका मज़ाक़ उड़ाया। हज़रत अबू बक्र ने यह सुनकर कहा कि “अगर आपने ऐसी बात कही है तो सच ही कही है। तुमको इस पर हैरत क्यों है? अल्लाह की क़सम, आपने तो मुझे बताया है कि वह्य (आकाशवाणी) आपके पास दिन-रात के किसी हिस्से में आसमान से ज़मीन तक आ जाती है। यह तो उससे भी कठिन है जिस पर तुम लोग हैरत कर रहे हो, और मैं आप सल्ल० की इस बात की पुष्टि करता हूं।”
मेराज का वास्तविक महत्व
मेराज का सफ़र कोई सामान्य बात नहीं थी, जिसमें आपको अल्लाह की बड़ी-बड़ी निशानियां दिखाई गईं और आसमान व ज़मीन की बादशाहत बेपर्दा होकर आपके सामने आ गई। नुबूवत के इस ग़ैबी व आसमानी सफ़र में इसके अलावा भी अनेक रहस्य हैं, और इसमें बड़े दूरगामी इशारे किए गए हैं। मेराज के सफ़र के बारे में क़ुरआन पाक की सूरह अन-नज्म व सूरह अल-इसरा, दोनों यह ऐलान करती हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० दोनों क़िब्लों (काबा और मस्जिद-ए-अक़्सा) के नबी, और दोनों दिशाओं (पूर्व व पश्चिम) के इमाम (लीडर), और अपने से पहले हुए सभी नबियों के वारिस, और बाद में आने वाली मानव जाति के पथदर्शक हैं।
आपकी यह यात्रा काबा और मस्जिद-ए-अक़्सा, मक्का और यरुशलम को जोड़ती है। आपकी इमामत में सभी नबियों ने नमाज़ पढ़ी, और वास्तव में यह बात आपके पैग़ाम की व्यापकता, आपकी चिरस्थायी इमामत तथा मानव जाति के हर वर्ग के लिए आपकी शिक्षाओं की उपयोगिता की दलील और निशानी थी। यह बात अल्लाह के रसूल सल्ल० के व्यक्तित्व का सही ज्ञान कराती है। यह इस बात की तरफ़ भी इशारा करती है कि आपकी उम्मत का स्थान कितना ऊंचा है, और उसे मानवता के कल्याण के लिए इस धरती पर क्या कुछ करना है।
मेराज का सफ़र असल में इस बात का ऐलान करता है कि हज़रत मुहम्मद सल्ल० का पैग़ाम विश्वव्यापी है। अगर आप कोई स्थानीय लीडर, किसी देश के नेता, किसी ख़ास नस्ल को बुराइयों तथा अधर्म से छुटकारा दिलाने वाले होते, या किसी नई एवं महान कृति के संस्थापक होते, तो आपको इस आसमानी मेराज की ज़रूरत न थी, क्योंकि आपको न ज़मीन-आसमान की विशाल बादशाहत की सैर की ज़रूरत थी, न इसकी ज़रूरत थी कि आपके द्वारा धरती व आकाश का यह नया सम्बन्ध बने। उस समय आपकी यह धरती, यह माहौल और यह समाज आपके लिए काफ़ी होता। इसे छोड़कर आपको किसी अन्य क्षेत्र की तरफ़ जाने की भी ज़रूरत न थी, न कि आसमान और सिदरतुल मुन्तहा6 तक पहुंचने की, या मस्जिद-ए-अक़्सा जाने की, जो आपके शहर से बहुत दूर तथा ईसाई धर्म और बलवान रोमन साम्राज्य के अधीन थी।
मेराज का सफ़र यह ऐलान करता है कि हज़रत मुहम्मद सल्ल० उन राष्ट्रीय और राजनीतिक नेताओं की श्रृंखला से कोई सम्बन्ध नहीं रखते, जिनकी क्षमताओं तथा कोशिशों की सीमा उनके देश या उनके राष्ट्र तक सीमित रहती है, और उससे सिर्फ़ उन्हीं नस्लों तथा क़ौमों को फ़ायदा पहुंचता है जिससे उनका सम्बन्ध होता है, और उसी वातावरण तक उनका असर बाक़ी रहता है जिसमें वह पैदा होते हैं। आपका सम्बन्ध अल्लाह के भेजे हुए नबियों की श्रृंखला से है, जो आसमान का पैग़ाम ज़मीन वालों को और क़ुदरत का पैग़ाम क़ुदरत के प्राणियों को पहुंचाते हैं, और उनसे पूरी इन्सानियत (काल, देश और जाति के भेदभाव के बिना) गौरवान्वित होती है और उसकी क़िस्मत जाग उठती है।
नमाज़ फ़र्ज़ होना
इस मौक़े पर अल्लाह ने आप पर और आपकी उम्मत पर पचास वक़्तों की नमाज़ फ़र्ज़ की। आप बराबर इसमें कमी का सवाल करते रहे, यहां तक कि अल्लाह पाक ने इसको दिन व रात में पांच वक़्त सीमित कर दिया, और यह ऐलान कर दिया कि जो ईमान के साथ यह नमाज़ें पढ़ेगा उसे 50 नमाज़ों का ही सवाब मिलेगा।
इस्लाम का रास्ता
अब अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज के ज़माने में अरब के क़बीलों के सामने इस्लाम का प्रचार करना शुरू किया तथा उनकी इस काम में मदद चाही। उन्हें सम्बोधित करते हुए आपने फ़रमाया, “ऐ बनी फ़लां (अमुक)! मैं तुम्हारी तरफ़ अल्लाह का रसूल बनाकर भेजा गया हूं, जो तुम्हें अल्लाह की इबादत का हुक्म देता है कि तुम उसके साथ किसी और को शरीक (सम्मिलित) न ठहराओ, और उन तमाम चीज़ों से जिनको तुमने उनका हमसर बना लिया है और उनकी इबादत करते हो, सम्बन्ध तोड़ लो। उस पर ईमान लाओ, उसकी पुष्टि करो, और मेरी उस समय तक हिफ़ाज़त करो जब तक अल्लाह ने जो चीज़ लेकर मुझे भेजा है वह मैं अच्छी तरह खोलकर बयान न कर दूं।”
जब आप अपनी बात कह चुके तो अबू लहब खड़ा हुआ और कहने लगा, “ऐ बनी फ़लां! यह तुमको इस बात की दावत दे रहे हैं कि तुम “लात” व “उज़्ज़ा” की पूजा छोड़ दो, और अपने मददगार जिन्नों से भी सम्बन्ध तोड़ करके उस बिदअत (नई रीति) तथा भ्रष्टमार्ग को अपना लो जो वह लाए हैं। इसलिए तुम न इनकी बात मानना और न इनकी सुनना।”
यह रास्ता, जो हज़रत मुहम्मद सल्ल० तथा इस्लाम की तरफ़ जाता था, कांटों और हर तरह के ख़तरों से भरा हुआ था, जिस पर अपनी जान का ख़तरा मोल लिए बिना चलना और मंज़िल तक पहुंचना मुमकिन नहीं था।
हज़रत अबू ज़र ग़िफ़ारी रज़ि०
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि० ने हज़रत अबू ज़र ग़िफ़ारी रज़ि० के मक्का तक पहुंचने, अल्लाह के रसूल सल्ल० की सेवा में हाज़िर होने तथा इस्लाम क़ुबूल करने का जो वर्णन किया है, उससे इस बात की पुष्टि होती है। वह कहते हैं:
“जब अबू ज़र रज़ि० को हज़रत मुहम्मद सल्ल० के नबी होने की सूचना मिली तो उन्होंने अपने भाई से कहा, ‘तुम घाटी में जाओ और ज़रा उस आदमी का कुछ पता लगाओ जो यह दावा करता है कि उसके पास आसमान से वह्य आती है। उसकी बातचीत सुनो और फिर आकर बताओ।’ वह गए, अल्लाह के रसूल सल्ल० से मिले, आपकी बात सुनी, फिर वापस जाकर अबू ज़र रज़ि० से कहा, ‘मैंने देखा कि वह बहुत प्रिय तथा उच्च आचरण की शिक्षा देते हैं, और ऐसा कलाम मैंने सुना जो शेर नहीं कहा जा सकता।’ उन्होंने कहा, ‘मैं जो कुछ जानना चाहता था, इससे मेरी तृप्ति नहीं हुई।’
फिर उन्होंने (अबू ज़र) स्वयं सफ़र की तैयारी की और पानी का मश्कीज़ा (चमड़े का डोल) लेकर प्रस्थान किया, मक्का पहुंचे। काबा शरीफ़ में पहुंचकर अल्लाह के रसूल सल्ल० को तलाश करना शुरू किया। वह आपको पहचानते न थे, और किसी से पूछना उचित नहीं समझा। इसी तलाश में रात हो गई। उस समय हज़रत अली रज़ि० ने उन्हें देखा, वह समझ गए कि यह कोई नया मुसाफ़िर है। वह आपके पीछे हो लिए, लेकिन किसी ने एक-दूसरे से कुछ न पूछा। जब सुबह हुई तो अबू ज़र अपना डोल और पोटली लेकर दोबारा उसी मस्जिद में पड़ गए, और यह दिन भी उसी तरह गुज़र गया, हालांकि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उन्हें देख लिया लेकिन कुछ बात नहीं हुई। शाम हो गई और अबू ज़र दोबारा अपने सोने की जगह चले गए। उस समय हज़रत अली रज़ि० उनके पास से गुज़रे और दिल में सोचा, ‘क्या अभी तक इस मुसाफ़िर को अपनी मंज़िल का पता नहीं मिला?’
तीसरे दिन हज़रत अली उसी तरह उनके पास पहुंचे, उनको उठाया और कहा, ‘तुम मुझे बताओगे कि क्या चीज़ तुम्हें यहां लाई है?’ अबू ज़र ने कहा, ‘अगर तुम वादा करो कि तुम मुझे रास्ता दिखाओगे तो मैं बता सकता हूं।’ जब हज़रत अली रज़ि० ने यह वचन दिया तो अबू ज़र उनके साथ चलने को तैयार हो गए। वह अल्लाह के रसूल सल्ल० की सेवा में पहुंचे, तो यह भी उनके साथ सेवा में हाज़िर हुए। आपने उनसे फ़रमाया, ‘अपनी क़ौम में वापस जाओ और यह दावत उन लोगों को पहुंचाओ, यहां तक कि मेरी बात अच्छी तरह फैल जाए।’ अबू ज़र रज़ि० ने कहा, ‘उसकी क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, मैं उनके बीच चिल्ला-चिल्लाकर यह दावत दूंगा।’
फिर निकलकर मस्जिद-ए-हराम में आए और ऐलान किया, ‘मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह एक है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।’ यह सुनकर लोगों ने उन्हें घेर लिया और इतना मारा कि बेदम होकर ज़मीन पर लेट गए। इतने में हज़रत अब्बास रज़ि० आए और उनको झुककर देखा और लोगों से कहा, ‘तुम जानते नहीं, यह क़बीला ग़िफ़ार से सम्बन्ध रखते हैं, और तुम्हारे व्यापारियों का रास्ता जो शाम तक जाता है इसी क़बीले से होकर गुज़रता है।’ फिर उन्होंने अबू ज़र को बचाया। दूसरे दिन भी उन्होंने यही किया, और उत्तेजित होकर लोगों ने उन्हें चोट पहुंचाई, और हज़रत अब्बास रज़ि० ने आकर उनकी मदद की।”
अन्सार इस्लाम की परिधि में
अल्लाह के रसूल सल्ल० हज के ज़माने में इस्लाम के प्रचार-अभियान पर निकले। अक़बा7 के पास क़बीला “ख़ज़रज” के कुछ अन्सार आपसे मिले। आपने उन्हें इस्लाम की दावत दी और क़ुरआन की तिलावत की। यह लोग मदीने में यहूदियों के पड़ोस में रहते थे, उनसे इन लोगों ने सुना था कि निकट भविष्य में कोई नबी आने वाला है। वह आपस में एक-दूसरे से कहने लगे, “वल्लाह! यह वही नबी मालूम होते हैं, जिनकी ख़बर हमको यहूद देते थे।” यह सोचकर कि मुसलमान होने में कोई उनसे आगे बढ़ न जाए, उन लोगों ने उसी समय इस्लाम क़ुबूल किया। आपसे उन्होंने बताया, “हम अपनी बहुत ही लड़ाकू, फूट डालने वाली क़ौम को छोड़कर आए हैं। शायद आपके द्वारा अल्लाह उनको जोड़ दे। हम यहां से जाकर उनको यह बात बताएंगे और इसकी दावत देंगे। आप उन पर भी वह चीज़ पेश करें जिसको हमने क़ुबूल किया। अगर अल्लाह उन्हें आपके हाथों संगठित कर दे तो आपसे अधिक इज़्ज़त वाला फिर कोई न होगा।”
यह लोग इस्लाम लाने के बाद मदीना वापस पहुंचे तो अपने दूसरे भाइयों से आपके बारे में बताया और उनको भी इस्लाम की दावत दी। इस तरह उनकी क़ौम और बिरादरी में इस्लाम का ख़ूब प्रचार हुआ, और अन्सार का कोई घर ऐसा न बचा जहां आपकी चर्चा न हो।
अक़बा की पहली बैअत
अगले साल हज के मौक़े पर अन्सार के 12 लोग आपसे अक़बा की बैअत के मौक़े पर मिले और आपके हाथ पर चोरी, बलात्कार, सन्तानों की हत्या से बचने, अच्छी बातों के करने तथा तौहीद पर बैअत (शपथ)8 की। जब वह वापस जाने लगे तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनके साथ मुसअब बिन उमैर रज़ि० को कर दिया, और उन्हें निर्देश दिया कि उनको क़ुरआन पाक पढ़ाएं, इस्लाम की शिक्षा दें और दीन की बातें बताएं। यही वजह है कि मुसअब रज़ि० को मदीना में “मुक़री” (पढ़ाने वाला) कहा जाता है। वह अस्अद बिन ज़ुरारा के यहां मेहमान थे और नमाज़ भी पढ़ाते थे।
अन्सार के मुसलमान होने के कारण
अल्लाह का करना कि ऐसे नाज़ुक दौर में उसने अपने रसूल और अपने दीन के समर्थन व मदद के लिए “औस” व “ख़ज़रज”9 को खड़ा कर दिया। यह यसरब (मदीना) के दो बड़े और अहम क़बीले थे। उनको अपने समकालीन हिजाज़ वासियों पर इस्लाम लाने की बाज़ी ले जाने का सौभाग्य हासिल हुआ। उन्होंने उस समय इस दीन को अपने सीने से लगाया जब अरब के सब क़बीले, ख़ास तौर पर क़ुरैश ने, उससे बिल्कुल आंखें फेर ली थीं। सच है, “और अल्लाह जिसे चाहता है सीधा रास्ता दिखाता है।”
अल्लाह की हिकमत से विभिन्न कारणों में “औस” व “ख़ज़रज” कई बातों में क़ुरैश से अच्छे थे। वह उदार एवं रहमदिल थे। अहंकार, उग्रवादिता तथा सच को न मानने की बुराई उनमें न थी। इसका इशारा अल्लाह के रसूल सल्ल० के उस कथन में मिलता है जो आपने यमन के एक दल से मिलने के बाद फ़रमाया था। आपने फ़रमाया, “तुम्हारे यमनवासी आए हैं, जो बड़े उदार और रहमदिल हैं।” यह दोनों क़बीले मूलतः यमन से सम्बन्ध रखते थे। प्राचीन समय में उनके पूर्वज वहीं से हिजाज़ आए थे। क़ुरआन पाक में आता है:
अन्सार के इस्लाम लाने की एक वजह यह भी थी कि आपस की निरन्तर लड़ाइयों ने उन्हें चूर-चूर कर दिया था। बुआस की लड़ाई को अभी ज़्यादा दिन नहीं गुज़रे थे, और उसके बुरे परिणाम उनके सामने थे। अब उनके अन्दर मिल-जुलकर अमन से रहने की इच्छा प्रबल हो गई थी। उनके यह शब्द उनकी आत्मा को बताते हैं: “हम अपनी क़ौम को छोड़कर आए हैं। किसी अन्य क़ौम में इतनी अधिक बुराई, फ़साद और आपस की दुश्मनी नहीं जितनी उनके अन्दर है। शायद अल्लाह आपके द्वारा उनको संगठित कर दे। अगर अल्लाह उनको संगठित कर देगा तो फिर आपसे अधिक इज़्ज़त वाला कोई न होगा।” हज़रत आइशा रज़ि० फ़रमाती हैं, “बुआस की जंग अल्लाह के रसूल सल्ल० के लिए एक क़ुदरती मदद तथा मदीने की हिजरत की प्रस्तावना थी।”
दूसरी वजह यह थी कि क़ुरैश तथा अन्य तमाम अरबों का सम्बन्ध नुबूवत से बहुत दिनों से टूटा था, और लम्बा समय गुज़र जाने की वजह से वह नुबूवत के अर्थ से बिल्कुल अपरिचित हो गए थे। उनकी अज्ञानता और निरक्षरता चरम सीमा पर थी। बुतों की पूजा उन्हें सबसे ज़्यादा प्यारी थी। वह उन क़ौमों (यहूदी और ईसाई) से बहुत दूर थे जो नबियों और आसमानी सहीफ़ों (परिवर्तित और संशोधित ही सही) से अपना रिश्ता जोड़े हुए थे। क़ुरआन पाक में आता है:
इसके विपरीत औस व ख़ज़रज यहूद को आपस में नबियों के बारे में बातचीत करते हुए तथा तौरेत की तिलावत करते हुए बराबर देखते और सुनते थे। बल्कि यहूदी अक्सर उनको ख़बर दिया करते थे कि आने वाले समय में एक नबी आने वाला है; हम उसके साथ मिलकर तुमको इस तरह क़त्ल करेंगे जिस तरह “आद” और “इरम” क़त्ल किए गए। क़ुरआन पाक में आता है:
औस और ख़ज़रज तथा मदीने के अन्य आदिवासी, जो मुशरिक और बुत पूजने वाले थे, धार्मिक बातों, पारिभाषिक शब्दावली और अल्लाह की सुन्नत से उतने अनजान न थे जितने कि क़ुरैश और उनके पड़ोसी क़बीले वक़्त की वजह से हो गए थे। औस व ख़ज़रज लम्बे समय से यहूदियों के साथ रहने-बसने की वजह से धर्म की बातों, पारिभाषिक शब्दों, नबियों के नामों, घटना-चक्रों के इतिहास तथा हिदायत (पथ-प्रदर्शन) के आसमानी बंदोबस्त से परिचित हो गए थे। उनका दिन-रात यहूदियों के साथ उठना-बैठना होता था। इन बातों से उनको हज के मौक़े पर मक्का में अल्लाह के रसूल सल्ल० के हाथों पर इस्लाम लाने में सुविधा हुई। आप सल्ल० ने जब उन्हें इस्लाम की दावत दी, तो ऐसा मालूम हुआ कि अचानक उनकी आंखों से पर्दा उठ गया, और मानो वह पहले से इसके लिए तैयार थे।
यसरब: हिजरत का घर
यसरब की विशेषताएं
हिजरत के घर तथा इस्लाम की दावत के प्रमुख केन्द्र के रूप में मदीने के चयन में, मदीना वासियों की इज़्ज़त बढ़ाने तथा उन रहस्यों के अलावा जिनको अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता, एक हिकमत यह भी थी कि मदीना को सामाजिक तथा भौगोलिक निगाह से एक मज़बूत क़िले की हैसियत हासिल थी। अरब प्रायद्वीप का कोई अन्य क़रीब का शहर इसके बराबर न था।
मदीना के पश्चिम में “हर्रतुल वबरा”10 स्थित है, जो एक सुरक्षा-रेखा का काम करता है। पूर्व में “हर्रा वाक़िम” इसे अपने घेरे में लिए हुए था। मदीने का उत्तरी हिस्सा अकेला रास्ता था जो किसी के हमले के लिए खुला था (यह वही इलाक़ा है जहां सन 5 हिजरी में अहज़ाब की लड़ाई के मौक़े पर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़न्दक़ तैयार करने का हुक्म दिया था)। मदीने की अन्य सीमाओं पर खजूर के घने बाग़ और खेत थे। अगर किसी हमला करने वाली फ़ौज को इससे गुज़रना होता, तो उसके रास्ते में ऐसी पगडंडियां और पतले रास्ते पड़ते थे कि इन्हें पूरी साज-सज्जा तथा फ़ौजी ताम-झाम के साथ पार करना आसान काम न था, और मामूली फ़ौजी चौकियां इस काम में रुकावट डालने के लिए काफ़ी थीं।
इब्ने इस्हाक़ कहते हैं, “मदीना की एक सीमा खुली हुई थी; बाक़ी सभी सीमाएं आबादी तथा खजूर के घने बाग़ों से एक-दूसरे से मिल गई थीं, और कोई दुश्मन इसमें से होकर आगे नहीं बढ़ सकता था।”
हिजरत के पहले अल्लाह के रसूल सल्ल० ने भी मदीना के चयन में शायद अल्लाह की इसी हिकमत और मसलहत की तरफ़ इशारा फ़रमाया था: “मुझे तुम्हारी हिजरत का घर दिखाया गया है। यह खजूर के बाग़ों वाला इलाक़ा है, वह लाबतैन (जले हुए क्रमविहीन पत्थरों वाले दो इलाक़े) के बीच स्थित है।” इसी के बाद जिसको हिजरत करनी थी, उसने मदीना हिजरत की।
मदीने के दो क़बीले, औस व ख़ज़रज, देशभक्ति, स्वाभिमान, घुड़सवारी और बहादुरी में विशिष्ट स्थान रखते थे। यह आज़ादी के माहिर और आदी थे। उन्होंने न कभी किसी के सामने अपना सिर झुकाया था, न किसी बड़े क़बीले, हुकूमत को टैक्स और तावान अदा किया था। इसकी विवेचना औस के सरदार साद बिन मुआज़ रज़ि० के उस वाक्य से होती है जो उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० से ग़ज़वा-ए-ख़न्दक़ (ख़न्दक़ की लड़ाई) के मौक़े पर कहा था: “जब हम और यह शिर्क व बुतपरस्ती से घिरे थे, न हम अल्लाह की इबादत करते थे न उसको पहचानते थे, उस समय भी यह मजाल न थी कि मेहमानदारी या क़ीमत दिए बिना यह मदीने की एक खजूर खा लें।”
इब्ने ख़ल्दून लिखते हैं, “यह दोनों क़बीले यसरब में यहूदियों पर ग़ालिब थे, तथा इज़्ज़त, शान व शौकत में नाम पैदा किए हुए थे। उनके क़रीब जो मुज़र के क़बीले आबाद थे, वह भी उन्हीं की मिल्लत (अधीन) में थे।”
मशहूर अरब लेखक इब्ने अब्दे रब्बिह के अनुसार, “अन्सार क़बीला अज़्द से हैं। यह औस व ख़ज़रज कहलाते हैं। हारिसा बिन अम्र बिन आमिर के दो बेटों से इनकी नस्ल चली है। यह लोग तमाम लोगों में सबसे अधिक स्वाभिमानी और सबसे अधिक हौसले वाले थे, और किसी बादशाह या हुकूमत को टैक्स अदा करने वाले नहीं थे।”
इसके अलावा बनी हाशिम का बनू अदी बिन नज्जार से ननिहाली सम्बन्ध था। हाशिम ने उनकी एक लड़की सलमा बिन्ते अम्र से शादी की थी। हाशिम के एक लड़का अब्दुल मुत्तलिब पैदा हुआ। हाशिम ने उसको मां के पास छोड़ दिया; जब लड़का बड़ा हुआ तो उसको उसके चचा मक्का ले आए। अरब के सामाजिक जीवन में रिश्तेदारियों और सम्बन्धों का बहुत महत्व था, और उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती थी। अबू अय्यूब अन्सारी रज़ि०, जिनके घर मदीना पहुंचकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ठहरे थे, का सम्बन्ध बनी अदी बिन नज्जार से था।
औस व ख़ज़रज क़हतान की नस्ल से थे। मुहाजिरीन और जो लोग मक्का तथा उसके क़रीबी इलाक़ों में उनसे पहले इस्लाम ला चुके थे, वह अदनान की नस्ल से थे। जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मदीना हिजरत की और अन्सार ने आपका समर्थन किया, तो इस तरह अदनान और क़हतान दोनों क़बीले इस्लाम के झण्डे तले एक हो गए। अज्ञानता के युग में इनके बीच बड़ी खींचतान थी। इस्लाम की बरकत से शैतान को इनमें फूट डालने का रास्ता न मिल सका।
इन वजहों और विशेषताओं को देखते हुए यसरब अल्लाह के रसूल सल्ल० तथा आपके साथियों की हिजरत के लिए सबसे बेहतर जगह थी। इस शहर को यह हक़ हासिल था कि इसे इस्लामी दावत का केन्द्र बनाया जाए, यहां तक कि इस्लाम ताक़तवर और सक्षम होकर अरब प्रायद्वीप और फिर उस समय के समस्त सभ्य संसार पर छा जाए।
मदीना में इस्लाम का विकास
अब अन्सार के घरानों में इस्लाम का प्रचार शुरू हुआ। पहले साद बिन मुआज़, उसैद बिन हुज़ैर, जो औस की शाखा से थे और अपनी क़ौम के सरदार थे, इस्लाम लाए। इसमें पहले मुसलमान होने वालों की हिकमत, उनके ईमान, उनकी रहमदिली तथा मुसअब बिन उमैर के सुरुचिपूर्ण प्रचार का बहुत दख़ल था। इसके बाद बनी अब्दुल अशहल ने भी इस्लाम क़ुबूल किया, और आख़िर में अन्सार के घरों में से कोई घर ऐसा बाक़ी न बचा जहां कुछ मर्द और औरतें मुसलमान न हों।
अक़बा की दूसरी बैअत
दूसरे साल मुसअब बिन उमैर रज़ि० मक्का वापस हुए, और अन्सार के कुछ मुसलमान, मुशरिकों की एक टोली के साथ जो हज के लिए जा रही थी, मक्का पहुंचे और अल्लाह के रसूल सल्ल० से अक़बा में बैअत का वचन दिया। जब वह हज कर चुके और एक तिहाई रात गुज़र गई, तो वह अक़बा के निकट एक घाटी में जमा हुए। उन सबकी संख्या 73 थी, जिसमें दो औरतें भी शामिल थीं। आप तशरीफ़ लाए; आपके साथ आपके चचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब भी थे, वह उस समय तक मुसलमान नहीं हुए थे।
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनसे बातचीत की, क़ुरआन पाक उनको पढ़कर सुनाया, और अल्लाह की तरफ़ आने की दावत दी और इस्लाम लाने का शौक़ दिलाया। फिर आपने फ़रमाया, “मैं तुमसे इस पर बैअत लेता हूं कि तुम मेरे साथ सुरक्षा का वही मामला करोगे जो अपने परिवार के साथ करते हो।” उन्होंने आपसे बैअत की, और आपसे यह वचन लिया कि आप उन्हें बे-यार व मददगार न छोड़ेंगे, और अपनी क़ौम की तरफ़ वापस हो जाएंगे। आपने उनको वचन दिया और फ़रमाया, “मैं तुमसे हूं और तुम मुझसे हो। जिससे तुम जंग करोगे उससे मैं भी जंग करूंगा, जिससे तुम सुलह करोगे उससे मैं भी सुलह करूंगा।” फिर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनमें से 12 ज़िम्मेदार लोगों का चयन किया: 9 ख़ज़रज और 3 औस के।
मदीना हिजरत करने की इजाज़त
जब अन्सार के इस क़बीले ने अल्लाह के रसूल सल्ल० से बैअत कर ली और आप तथा आपके साथियों का समर्थन करने का वचन दिया, तो बहुत से मुसलमान उनकी पनाह में आ गए। रसूलुल्लाह सल्ल० ने उन तमाम मुसलमानों को, जो आपके साथ मक्का में थे, मदीना की हिजरत करने और अन्सार से मिल जाने का हुक्म दिया, और फ़रमाया, “अल्लाह ने तुम्हारे लिए कुछ भाई और घरबार का बंदोबस्त कर दिया है जहां तुम अमन के साथ रह सकते हो।” यह सुनकर लोग टोलियां बनाकर हिजरत करने लगे। ख़ुद अल्लाह के रसूल सल्ल० मक्का में ठहरकर हिजरत के बारे में अल्लाह के हुक्म का इंतज़ार करने लगे।
मक्का से मुसलमानों की हिजरत कोई हंसी-खेल न था, जिसे क़ुरैश ठण्डे दिल बर्दाश्त कर लेते। उन्होंने मुसलमानों के रास्ते में तरह-तरह की रुकावटें खड़ी कर दीं और मुहाजिरों को तकलीफ़ें देने लगे, लेकिन मुहाजिर अपनी धुन के पक्के और इरादे के सच्चे थे; वह किसी क़ीमत पर मक्का में रहना पसन्द न करते थे। इसलिए किसी को अपनी पत्नी और बच्चों को मक्का में छोड़कर अकेले जाना पड़ा, जैसा कि अबू सलमा रज़ि० ने किया है। किसी को अपनी उम्र भर की कमाई छोड़नी पड़ी, जैसा कि सुहैब रज़ि० ने किया।
हज़रत उम्मे सलमा रज़ि० की दास्तान
हज़रत उम्मे सलमा रज़ि० ख़ुद बयान करती हैं कि अबू सलमा रज़ि० ने मदीना हिजरत करने का फ़ैसला कर लिया तो सफ़र के लिए अपना ऊंट तैयार किया। मुझको उस पर सवार कराया और मेरे लड़के सलमा बिन अबी सलमा को मेरी गोद में दे दिया। फिर ऊंट की नकेल हाथ में ली और चले। जब बनी मुग़ीरा के कुछ लोगों की नज़र उन पर पड़ी तो वह उनके पास आए और कहने लगे, “तुम्हारी हद तक ठीक है, तुम अपने को बचाकर जा रहे हो। इन बीबी को हम तुम्हारे साथ कैसे जाने दे सकते हैं?” यह कहकर उन्होंने ऊंट की नकेल उनके हाथ से छीन ली और मुझे अपने साथ ले गए।
यह देखकर बनू अब्दुल असद, जो अबू सलमा के समर्थक थे, बहुत उत्तेजित हुए। उन्होंने कहा, “अल्लाह की क़सम! तुमने इनको हमारे भाई से छीन लिया, लेकिन हम अपने लड़के को अब उनके पास बिल्कुल नहीं छोड़ेंगे।” इसके बाद दोनों में मेरे बच्चे के लिए खींचतान शुरू हो गई, और दोनों उसे अपनी तरफ़ खींचने लगे, यहां तक कि उसका हाथ उखड़ गया। बनू अब्दुल असद उसको छीन लेने में कामयाब हो गए और उसको अपने साथ ले गए। बनू मुग़ीरा ने मुझे अपनी क़ैद में कर लिया। मेरे पति मदीना जा चुके थे।
इस तरह मेरे बेटे, मेरे पति और मैं एक-दूसरे से अलग हो गए। मैं हर सुबह को बाहर आती और “अबतह” में बैठ जाती और शाम तक रोती रहती। इस तरह एक साल गुज़र गया। एक दिन बनू मुग़ीरा ही में से मेरे एक चचेरे भाई की नज़र मुझ पर पड़ी। मेरी हालत देखकर उसे दया आई, और उसने बनू मुग़ीरा से कहा, “इस ग़रीब को क्यों नहीं छोड़ देते? तुमने इसे अपने पति और बेटे दोनों से अलग कर दिया है।” वह कहने लगे, “अगर तुम्हारा जी चाहे तो अपने पति के पास चली जाओ।” उस समय बनू अब्दुल असद ने मेरा लड़का मुझे वापस कर दिया।
मैंने अपना ऊंट तैयार किया, लड़के को गोद लिया और मदीने में अपने पति की तलाश के लिए चल पड़ी। मेरे साथ कोई और न था। जब मैं तनईम तक पहुंची तो मेरी मुलाक़ात उस्मान बिन तलहा से हो गई, जो बनी अब्दुद्दार में से थे। वह देखते ही बोले, “अबू उमैया की लड़की, कहां जा रही हो?” मैंने कहा, “मदीने में अपने पति के पास जाना चाहती हूं।” उन्होंने कहा, “तुम्हारे साथ कोई है?” मैंने जवाब दिया, “मेरे साथ अल्लाह और इस बच्चे के सिवा कोई नहीं है।” वह कहने लगे, “अल्लाह की क़सम, तुम्हें मंज़िल पर पहुंचना आसान नहीं है।” उन्होंने ऊंट की नकेल अपने हाथ में ले ली और मुझे लेकर आगे बढ़े।
अल्लाह की क़सम, जिन लोगों से अब तक मेरा वास्ता पड़ा है, मैंने किसी को भी उनसे अधिक शरीफ़ और रहमदिल नहीं पाया। जब कोई मंज़िल आती और रुकना पड़ता तो वह ऊंट के पास आकर सामान उतारते, फिर किसी पेड़ से उसे बांधते और किसी पेड़ की छाया में लेट जाते। जब शाम होती और चलने का समय आता तो उठते, ऊंट को तैयार करते, सामान लादते, फिर वहां से कुछ दूर हट जाते और मुझसे कहते कि बैठ जाओ। जब मैं अच्छी तरह बैठ जाती तो आकर उसकी नकेल थाम लेते, और इसी तरह दूसरी मंज़िल तक पहुंचाते। इस तरह उन्होंने मुझे मदीना पहुंचाया। जब उनकी नज़र बनी अम्र बिन औफ़ के गांव क़ुबा पर पड़ी, तो मुझसे कहने लगे, “तुम्हारे पति इसी गांव में हैं (अबू सलमा रज़ि० वहीं ठहरे थे)। अब तुम अल्लाह का नाम लेकर वहां चली जाओ।” यह कहकर उन्होंने मुझे विदा किया और ख़ुद मक्का के लिए वापस हो गए।
वह कहती थीं कि इस्लाम में किसी घराने को वह तकलीफ़ें नहीं उठानी पड़ीं जो अबू सलमा के घर वालों ने उठाई हैं, और मैंने किसी व्यक्ति को उस्मान बिन तलहा से ज़्यादा शरीफ़ और बहादुर नहीं देखा।11
सुहैब रूमी रज़ि०
जब सुहैब रज़ि० ने हिजरत का इरादा किया तो क़ुरैश के कुफ़्फ़ार ने उनसे कहा, “तुम एक भिखारी की हैसियत से हमारे पास आए थे, हमारे यहां रहकर तुम इतने मालदार बन गए, अब तुम चाहते हो कि अपने सारे सामान तथा माल व जान के साथ यहां से निकल जाओ। अल्लाह की क़सम, यह नहीं हो सकता।” सुहैब रज़ि० ने उनसे कहा, “अगर मैं यह माल व दौलत तुम्हारे हवाले कर दूं, तो क्या तुम मुझे जाने दोगे?” उन्होंने कहा, “हां।” सुहैब रज़ि० ने जवाब दिया, “मैं यह सारा माल तुम्हें देता हूं।” जब अल्लाह के रसूल सल्ल० को इसकी सूचना मिली तो आपने फ़रमाया, “सुहैब फ़ायदे में रहे, सुहैब फ़ायदे में रहे!”
इस मौक़े पर जिन लोगों ने मदीना हिजरत की, उनमें हज़रत उमर रज़ि०, हज़रत तलहा, हज़रत ज़ैद बिन हारिसा, हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़, हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम, हज़रत अबू हुज़ैफ़ा, हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान आदि शामिल थे। इसके बाद हिजरत का एक सिलसिला क़ायम हो गया, और रसूलुल्लाह सल्ल० के साथ मक्का में दो आदमियों को छोड़कर (हज़रत अबू बक्र रज़ि०, हज़रत अली रज़ि०) सिर्फ़ वही बाक़ी बचा जो किसी मजबूरी से नहीं जा सका, या वह जो किसी आज़माइश अथवा फ़ित्ने में पड़ गया।
रसूलुल्लाह सल्ल० के ख़िलाफ़ क़ुरैश की साज़िश
जब क़ुरैश ने देखा कि मदीना में अल्लाह के रसूल सल्ल० के इतने अधिक समर्थक व मददगार हो गए हैं और वहां कोई ज़ोर नहीं चल सकता, तो उन्होंने सोचा कि अगर आप मदीना गए तो फिर आप पर उनका कोई बस नहीं चल सकेगा। यह सोचकर वह सब लोग “दारुन्नदवा” में (जो असल में क़ुसई बिन किलाब का घर था और क़ुरैश अपने सारे महत्वपूर्ण मामले यहीं तय करते थे) जमा हुए, और इस समस्या पर विचार किया गया। इस मौक़े पर क़ुरैश के सब प्रमुख सरदार मौजूद थे।
आख़िर में इस बात पर सभी सहमत हुए कि हर क़बीले से एक बहादुर, ऊंचे वंश का जवान चुना जाए, और वह सब मिलकर एकबारगी अल्लाह के रसूल सल्ल० पर हमला करें। इस तरह यह ख़ून सारे क़बीलों में बंट जाएगा और किसी एक पर इसकी ज़िम्मेदारी न होगी, और बनी अब्दे मनाफ़ सारी क़ौम से जंग का ख़तरा मोल न लेंगे। इसके बाद अलग-अलग हो गए। अल्लाह पाक ने अपने प्यारे रसूल सल्ल० को इस साज़िश से आगाह कर दिया। आपने हज़रत अली रज़ि० को हुक्म दिया कि वह आपकी चादर ओढ़कर आपके बिस्तर पर सो जाएं। आपने यह भी फ़रमाया कि तुमको कोई नुक़सान बिल्कुल न पहुंचेगा।
इधर यह पूरी पार्टी आपके दरवाज़े पर हमले के लिए पूरी तरह तैयार खड़ी थी। आप बाहर आए और थोड़ी-सी मिट्टी अपने हाथ में ले ली। उसी समय अल्लाह ने आपकी ताक में खड़े क़ुरैश की निगाह ख़त्म कर दी। आप यह मिट्टी उनके सिरों पर फेंकते हुए, और सूरह यासीन की आयतें “फ़-अग़्शैनाहुम फ़हुम ला युब्सिरून” तक तिलावत करते हुए, साफ़ उनके सामने से गुज़र गए, और किसी को पता भी न चला।
इस बीच किसी आने वाले ने पूछा, “तुम लोग किस चीज़ के इंतज़ार में खड़े हो?” उन्होंने कहा, “मुहम्मद (सल्ल०) के इंतज़ार में।” उसने कहा, “नामुरादो! वह तो जा चुके हैं।” उन लोगों ने अन्दर झांककर देखा, कोई व्यक्ति बिस्तर पर लेटा सो रहा है। उनको विश्वास हो गया कि हो न हो यह मुहम्मद (सल्ल०) हैं। सुबह हुई तो हज़रत अली रज़ि० बिस्तर से उठे। यह देखकर क़ुरैश लज्जित हुए और निराश होकर वापस हो गए।
रसूलुल्लाह सल्ल० की मदीना हिजरत
रसूलुल्लाह सल्ल० हज़रत अबू बक्र रज़ि० के पास गए और फ़रमाया, “अल्लाह ने मुझे यहां से हिजरत करने की इजाज़त प्रदान की है।” हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने कहा, “या रसूलल्लाह! मैं आपके साथ चलना चाहता हूं।” आपने फ़रमाया, “हां, तुम ही मेरे साथ चलोगे।” हज़रत अबू बक्र रज़ि० यह सुनकर ख़ुशी से रो पड़े। इसके बाद उन्होंने दो सवारियां पेश कीं। उन्होंने अब्दुल्लाह बिन उरैक़ित को गाइड के तौर पर मेहनताने पर साथ ले लिया।
विचित्र विरोधाभास
क़ुरैश अल्लाह के रसूल सल्ल० से कठोर दुश्मनी के बावजूद आपकी अमानतदारी, सच्चाई और आपकी उदारता एवं विशालता पर पूरा भरोसा करते थे। पूरे मक्का में अगर किसी को अपनी चीज़ खोने या लुट जाने का डर होता था, तो वह अपनी चीज़ अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास रखता था। इस तरह आपके पास अनेक धरोहर जमा हो गई थीं। आपने हज़रत अली रज़ि० को इसका ज़िम्मेदार बनाया कि वह उस समय तक मक्का में रहें जब तक यह अमानतें आपकी तरफ़ से अदा न कर दी जाएं। क़ुरआन में अल्लाह पाक का इरशाद है:
हिजरत से एक सबक़
अल्लाह के रसूल सल्ल० की हिजरत से सबसे पहली बात यह साबित होती है कि दावत (प्रचार) व विश्वास-आस्था की ख़ातिर हर प्यारी से प्यारी चीज़ को बिना झिझक क़ुर्बान किया जा सकता है, लेकिन दावत और आस्था को किसी प्यारी चीज़ को हासिल करने के लिए छोड़ा नहीं जा सकता।
मक्का अल्लाह के रसूल सल्ल० और आपके साथियों की जन्मभूमि होने के अलावा उनके लिए बड़ा आकर्षण रखता था, क्योंकि इसी शहर में अल्लाह का घर “काबा” है, जिसकी मुहब्बत उनकी नस-नस में रच-बस गई थी, लेकिन इनमें से कोई एक बात भी उनके रास्ते में रुकावट न बन सकी। मानव स्वभाव की एक सच्ची झलक हमें अल्लाह के रसूल सल्ल० के उस वाक्य में मिलती है जो आपने हिजरत करते समय मक्का नगरी को सम्बोधित करते हुए कहा था। आपने कहा, “तू कितना अच्छा शहर है, और मुझे कितना प्यारा है! अगर मेरी क़ौम मुझे यहां से न निकालती तो मैं तेरे सिवा किसी और जगह वास न करता।”
यह अल्लाह के इस फ़रमान पर अमल था:
ग़ार-ए-सौर की तरफ़
अल्लाह के रसूल सल्ल० और हज़रत अबू बक्र रज़ि० मक्का से छिपते-छिपते रवाना हुए। अबू बक्र रज़ि० ने अपने लड़के अब्दुल्लाह को निर्देश दिया कि वह ज़रा ख़बर रखें कि लोग उनके बारे में क्या साज़िश रचते हैं, और अपने ग़ुलाम आमिर बिन फ़ुहैरा को आदेश दिया कि दूध पहुंचा दिया करें। उनकी बेटी अस्मा खाना पहुंचाया करती थीं।
अनोखा प्यार
मुहब्बत की किरन जन्नत की वह रोशनी है जिससे आत्मा रोशन होती है। वह आदिकाल से जल रही है, और अपने आशिक़ से किसी समय ग़ाफ़िल नहीं होती, और उसके लिए छोटे से छोटे ख़तरे को महसूस कर लेती है। इस सफ़र में अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ हज़रत अबू बक्र रज़ि० का कुछ यही हाल था। इसलिए इस बात का उल्लेख मिलता है कि जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ग़ार की तरफ़ रवाना हुए, तो अबू बक्र रज़ि० चलने में कभी आपसे आगे रहते, कभी पीछे चलने लगते। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इसको महसूस कर लिया और कहा, “अबू बक्र! क्या बात है, कभी तुम मेरे पीछे चलते हो और कभी आगे?” उन्होंने कहा, “या रसूलल्लाह! मुझे जब यह ख़्याल आता है कि कोई हमारा पीछा तो नहीं कर रहा है, तो मैं पीछे चलने लगता हूं; फिर किसी घात का ख़तरा होता है तो आगे आ जाता हूं।”
जब दोनों ग़ार तक पहुंच गए तो हज़रत अबू बक्र ने कहा, “या रसूलल्लाह! आप ज़रा ठहरें, मैं ग़ार को देखभाल लूं और साफ़ कर लूं।” इसके बाद वह ग़ार के अन्दर गए, उसे साफ़ करके, सूराख़ आदि बन्द करके बाहर आए। उस समय उनको याद आया कि एक छेद बाक़ी रह गया है जिसे वह ठीक से नहीं देख सके। फिर उन्होंने कहा, “या रसूलल्लाह! आप ज़रा ठहरें, मैं उसको देख लूं।” फिर उसके अन्दर जाकर इत्मीनान किया। जब यक़ीन हो गया तो कहा, “या रसूलल्लाह! अब आप अन्दर उतर आएं।” अतएव आप ग़ार के अन्दर उतरे।
आसमानी मदद
जब दोनों ग़ार में उतर गए तो अल्लाह ने मकड़ी को भेजा। उसने गुफा और ग़ार के मुहाने पर जो पेड़ था उसके बीच एक जाल बुन दिया, और अल्लाह के रसूल सल्ल० को छिपा लिया। इसी के साथ अल्लाह ने दो जंगली कबूतरियों को भेज दिया, जो ऊपर फड़फड़ाती रहीं, फिर आकर वहां बैठ गईं। (इब्ने कसीर, खण्ड 2, पृ० 240)
मानव इतिहास का सबसे नाज़ुक पल
इधर मुशरिकों ने अल्लाह के रसूल सल्ल० का पीछा किया। यह मानवता के इतिहास का सबसे निर्णायक पल था: या तो एक ऐसी बदनसीबी सामने थी जिसकी कोई सीमा नहीं, या एक ऐसी ख़ुशनसीबी का दरवाज़ा खुलना था जिसकी कोई सीमा न थी। इन्सानियत ने बेचैनी से अपनी सांस रोक ली थी, और हैरत से उन जासूसों और पीछा करने वालों को फटी हुई आंखों से देख रही थी जो उस समय ग़ार के मुहाने पर खड़े थे, और सिर्फ़ इतनी देर बाक़ी थी कि उनमें से कोई नीचे देख ले। लेकिन अल्लाह की क़ुदरत, उसकी महिमा बीच में आ गई और वह धोखा खा गए। उन्होंने देखा कि गुफ़ा का मुख मकड़ी के जाले से बन्द है, तो वह सोच भी न सके कि अन्दर कोई हो सकता है।
इस घटना की तरफ़ इशारा करते हुए अल्लाह पाक फ़रमाता है:
इस पल हज़रत अबू बक्र की निगाह ऊपर उठी तो उन्हें मुशरिकों के पैर नज़र आए। हज़रत अबू बक्र ने कहा, “या रसूलल्लाह! अगर इनमें से किसी ने एक क़दम भी आगे बढ़ाया तो हमें देख लेगा!” आपने जवाब दिया, “उन दो के बारे में तुम्हारा क्या गुमान है जिनका तीसरा अल्लाह है?” इसी सिलसिले में यह आयतें उतरीं:
मदीना की राह
आपका सुराक़ा ने पीछा किया
अल्लाह के रसूल सल्ल० तथा अबू बक्र रज़ि० ने ग़ार-ए-सौर में तीन रातें गुज़ारीं। फिर दोनों, आमिर बिन फ़ुहैरा और अब्दुल्लाह बिन उरैक़ित के साथ, जिनको आपने रास्ता बताने के लिए साथ रखा था, समुद्र-तट की तरफ़ चले। उधर क़ुरैश ने यह ऐलान कर दिया था कि जो व्यक्ति अल्लाह के रसूल सल्ल० को गिरफ़्तार करके लाएगा, उसे सौ ऊंटनियां इनाम में दी जाएंगी। सुराक़ा बिन मालिक इनाम की लालच में आपका पीछा करने पर तैयार हो गया। एक घोड़े पर सवार होकर आपके पद-चिन्हों की मदद से उसने आप सल्ल० का पीछा शुरू किया।
लेकिन उसके घोड़े को अचानक ठोकर लगी और वह गिर पड़ा, लेकिन सुराक़ा ने अब भी हार न मानी और आगे बढ़ता रहा। दूसरी बार उसके घोड़े ने फिर ठोकर खाई और वह गिरा, फिर सवार हुआ और पीछा शुरू किया, यहां तक कि यह लोग उसको सामने नज़र आ गए, और तब तीसरी बार घोड़े ने सख़्त ठोकर खाई और उसके दोनों अगले पैर ज़मीन में धंस गए। सुराक़ा गिर पड़ा; इसी के साथ आंधी के रूप में वहां से धुआं भी उठा।
सुराक़ा ने जब यह देखा तो समझ गया कि अल्लाह के रसूल सल्ल० अल्लाह की हिफ़ाज़त में हैं और उन पर विजय पाना कठिन है। सुराक़ा ने ज़ोर से आवाज़ दी और कहा, “मैं सुराक़ा बिन जुअशुम हूं। मुझे बात करने का मौक़ा दीजिए। मुझसे आप लोगों को कोई नुक़सान नहीं पहुंचेगा।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत अबू बक्र से कहा, “इससे पूछो कि वह हमसे क्या चाहता है?” सुराक़ा ने कहा, “आप एक तहरीर (लिखित) मुझे दे दें जो हमारे-आपके बीच एक निशानी के तौर पर रहे।” आमिर बिन फ़ुहैरा ने हड्डी या झिल्ली पर एक तहरीर लिखकर उसके हवाले कर दी।
एक भविष्यवाणी
अल्लाह के रसूल सल्ल० हिजरत पर मजबूर हैं, मक्का से निकाले जा रहे हैं। दुश्मन हर तरफ़ घात में हैं। आपका पीछा किया जा रहा है। ऐसी दशा में आपकी निगाह उस दिन की तरफ़ जाती है जिस दिन आपके ग़ुलाम किसरा का ताज और क़ैसर का तख़्त अपने पैरों से रौंदेंगे और ज़मीन के ख़ज़ानों के मालिक होंगे। आपने इस घटाटोप अंधेरे में उस रोशनी की भविष्यवाणी की जिसकी पौ निकट भविष्य में फटने वाली थी। सुराक़ा से कहा, “सुराक़ा! उस वक़्त तुम्हारा क्या हाल होगा जब किसरा के कंगन तुम अपने हाथ में पहनोगे?”
क़ुरआन पाक में अल्लाह का इरशाद है:
कमज़ोर निगाह तथा कम अक़्ल के लोगों ने इसे अनहोनी बात समझी, लेकिन आपकी निगाह दूर को क़रीब से देख रही थी। “बेशक अल्लाह ख़िलाफ़-ए-वादा नहीं करता,” और ऐसा ही हुआ। जब हज़रत उमर रज़ि० के सामने किसरा के कंगन, उसका पटका और ताज हाज़िर किया, तो उन्होंने सुराक़ा को बुलाया और उनको यह पहनाया, और अल्लाह के रसूल सल्ल० की भविष्यवाणी शब्द-ब-शब्द पूरी हुई।
ख़ुश क़िस्मत इंसान
अल्लाह के रसूल सल्ल० और हज़रत अबू बक्र रज़ि० अपने सफ़र के दौरान “उम्मे मअबद ख़ुज़ाइया” के पास से गुज़रे। उनके पास एक बकरी थी, जिसका दूध चारा-पानी की कमी की वजह से सूख गया था। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उसके थनों पर हाथ फेरा, अल्लाह का नाम लिया और दुआ की। उसी वक़्त थन से दूध जारी हो गया। आपने दूध उम्मे मअबद और अपने साथियों को पिलाया, यहां तक कि सबने ख़ूब जी भर के पिया। फिर आपने पिया, और दोबारा दुहा, यहां तक कि बर्तन पूरा भर गया। जब अबू मअबद अपने काम से वापस आए तो उम्मे मअबद ने उनसे सारा हाल कह सुनाया और आपकी तारीफ़ की। यह सुनकर अबू मअबद बोले, “अल्लाह की क़सम! मुझे यह क़ुरैश के वही साहब मालूम होते हैं जिनकी क़ुरैश को तलाश है।”
गाइड ने दोनों को साथ लेकर सफ़र जारी रखा, यहां तक कि आप और हज़रत अबू बक्र मदीना के क़रीब क़ुबा तक पहुंच गए। यह बात 12 रबीउल अव्वल, सोमवार के दिन की है12, और उसी से इस्लामी कैलेण्डर, हिजरी सन, शुरू होता है।
टिप्पणियां
- 1सीरत इब्ने हिशाम, खण्ड 1, पृ० 234–235। सहीह मुस्लिम में आपका यह कथन दर्ज है कि मैं मक्का के एक पत्थर से अब भी परिचित हूं जो नुबूवत से पहले मुझे सलाम करता था।
- 2मक्का के पास एक गुफा का नाम, जहां हज़रत मुहम्मद सल्ल० को ज्ञान प्राप्त हुआ। (अनुवाद)
- 3हतीम और काबा की दीवार के बीच की जगह। इसका नाम “हिज्र-ए-इस्माईल” भी है। हतीम उस हिस्से का नाम है जो धनुषाकार दीवार और काबा के बीच है। इसके दोनों किनारे काबे की उत्तरी और पश्चिमी दिशा में मिलते हैं। हिज्र पहले काबा में शामिल था। अभ्युदय काल से पहले एक बाढ़ में जब काबा की दीवारें गिर गईं और क़ुरैश ने नए सिरे से उसे बनाया, तो आर्थिक कठिनाइयों के कारण उन्होंने इसको इतना ही रहने दिया, और बाक़ी हिस्से को मुंडेर से घेर दिया जो धनुषाकार है।
- 4सूरह हा-मीम अस-सजदा की शुरू की 38 आयतें।
- 5अल्लाह की राह में घर-बार छोड़कर कहीं और जाना।
- 6जन्नत के छाया भाग्य वृक्ष की तरफ़ इशारा है।
- 7घाटी। यह मिना के मक्का की तरफ़ वाली ढाल पर आड़ वाली एक जगह थी। यह जगह “जमरतुल कुबरा” के पास ही थी।
- 8अल्लाह के किसी परम भक्त के हाथ में हाथ देकर चोरी, बलात्कार, छोटे-बड़े गुनाहों से बचने, अच्छी बातों का पालन करने तथा अल्लाह को एक मानने की प्रतिज्ञा। (अनु०)
- 9औस व ख़ज़रज (अज़्द) के दो क़बीले थे, जो क़हतान की शाखा से सम्बन्ध रखते थे। उनके पूर्वज यमन की तबाही के बाद 120 ई० पूर्व में हिजाज़ आए थे।
- 10“हर्रा” या “लाबा” काले, झुलसे हुए, आड़े-तिरछे पत्थरों के इलाक़े को कहते हैं। वह भू-आकृति है जो ज्वालामुखी फूटने के समय लावा के बहकर जमा हो जाने से बनती है। इस क्षेत्र में ऊंटों और घोड़ों का चलना या किसी भी सेना-टुकड़ी का गुज़रना तो दूर रहा, किसी एक व्यक्ति का पैदल चलना भी दूभर है। मदीना के पूर्व तथा पश्चिम स्थित हर्रे उसकी बाहरी हमलों से सुरक्षा करते हैं। मज्दुद्दीन फ़ीरोज़ाबादी की किताब “अल-मग़ानिम अल-मुताबा फ़ी मआलिम ताबा” देखें।
- 11उस्मान बिन तलहा रज़ि० हुदैबिया की सुलह के बाद इस्लाम लाए। मक्का की विजय के समय अल्लाह के रसूल सल्ल० ने काबा की कुंजी उनके हवाले की।
- 12यह 24 सितम्बर सन 622 ई० की बात है। (अनुवाद)