अध्याय बारह
उहद की लड़ाई
बद्र में हार, क़ुरैश के बड़े-बड़े सरदारों का मारा जाना और उनकी फ़ौज का तितर-बितर होकर मक्का की तरफ़ भाग जाना, यह ऐसी बात थी जिसका मक्का वासियों पर बहुत बुरा असर पड़ा। इसलिए वह सब, जिनके बाप-बेटे और भाई-रिश्तेदार मारे गए थे, जमा होकर अबू सुफ़ियान के पास गए, और उससे तथा उसके साथियों से सलाह की और उन्हीं के पैसे से अल्लाह के रसूल सल्ल० के ख़िलाफ़ एक नई लड़ाई की तैयारी शुरू की। कवियों ने अपनी कविताओं से उनके स्वाभिमान को उभारा। यह सब बदले की भावना से ओत-प्रोत थे।
हिजरत के तीसरे साल शव्वाल के महीने के बीच में क़ुरैश की सेना ने अपनी पूरी साज-सज्जा के साथ प्रस्थान किया। इनके साथ क़ुरैश को अपना सरदार मानने वाले अन्य क़बीलों के लोग भी थे। उनके साथ औरतें भी भेजी गई थीं ताकि मर्द उनकी वजह से भाग न सकें। क़ुरैश के सरदार अपनी पत्नियों के साथ थे। इस लश्कर ने मदीना के सामने पड़ाव डाला।
अल्लाह के रसूल सल्ल० की राय थी कि मुसलमान मदीना में ही रहें और उनसे कोई छेड़-छाड़ न करें। अगर वह ख़ुद हमला करें तो उनसे लड़ाई लड़ें। आप शहर छोड़कर बाहर निकलकर उनसे मुक़ाबला नहीं करना चाहते थे। अब्दुल्लाह बिन उबई की भी यही राय थी, लेकिन कुछ मुसलमान, जो बद्र की जंग में शामिल नहीं हो सके थे, वह कुछ ज़्यादा उत्साह में आपसे कहने लगे, “या रसूलल्लाह सल्ल०! आप बाहर निकलकर दुश्मनों का मुक़ाबला करें। कहीं वह यह न सोचें कि हम कायरता और कमज़ोरी की वजह से बाहर नहीं निकल रहे हैं।” उनकी यह बातें सुनकर आप घर के अन्दर गए और कवच धारण करके बाहर आए। इस पर उन लोगों को पछतावा हुआ और कहने लगे, “या रसूलल्लाह सल्ल०! हमने आपको इच्छा के ख़िलाफ़ इस काम पर आमादा किया है। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। अगर आप चाहें तो यहीं रहें और यहीं रहकर मुक़ाबला करें।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “नबी की यह शान नहीं कि हथियार उठाने के बाद लड़ाई से पहले हथियार रख दे।” आप एक हज़ार सहाबा (साथियों) को लेकर मुक़ाबले के लिए चले। मदीना से कुछ ही दूर पहुंचे थे कि अब्दुल्लाह बिन उबई एक तिहाई आदमियों के साथ आपको छोड़कर वापस चला गया। उसने कहा कि मेरी बात तो इन्होंने ठुकरा दी और इन नौजवानों की मान ली।
उहद पहाड़ के पहलू में
हज़रत मुहम्मद सल्ल० ने पेशक़दमी करके मदीना से तीन किलोमीटर दूर स्थित उहद पहाड़ के पहलू में पड़ाव डाला। आप और आपकी सेना ने इस तरह पोज़ीशन ली कि उहद पहाड़ ठीक आप सल्ल० की पीठ की तरफ़ पड़ता था। आपने निर्देश दिया कि जब तक मैं आदेश न दूं कोई लड़ाई शुरू न करे, और फिर आपने लड़ाई की विधिवत तैयारी की। आपके साथ उस समय 700 लोग थे। तीरन्दाज़ी का नेतृत्व अब्दुल्लाह बिन जुबैर को दिया गया। उनकी संख्या पचास थी। उन्हें आपने साफ़ निर्देश दिए कि वह तीरन्दाज़ी द्वारा घुड़सवारों को आगे बढ़ने से रोकें और इसका ध्यान रखें कि वह हमारे पीछे से न आ जाएं, चाहे लड़ाई का पासा हमारे हक़ में हो या विपक्ष में। आपने उन्हें यह भी निर्देश दिया कि वह अपनी पोज़ीशन किसी भी हाल में न छोड़ें और उस जगह से न हटें, भले ही चिड़ियां मुसलमानों के लश्कर को उचक ले जाएं। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इस मौक़े पर दोहरी कवच पहनी और इस्लामी लश्कर का झण्डा मुसअब बिन उमैर को दिया।
नौजवानों का जोश
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ग़ज़वा-ए-उहद में कुछ नवयुवकों को उनकी कम उम्र की वजह से वापस कर दिया। उनमें समुरा बिन जुन्दुब और राफ़े बिन ख़दीज भी थे। उनकी उम्र 15 वर्ष से ज़्यादा न थी। राफ़े के पिता ने आपसे निवेदन किया, “या रसूलल्लाह! मेरा लड़का राफ़े बड़ा तीरन्दाज़ है।” आपने बाप की सिफ़ारिश सुन ली और राफ़े को जंग में हिस्सा लेने की इजाज़त दे दी। फिर समुरा को आपके सामने लाया गया, जो राफ़े की ही उम्र के थे। समुरा ने निवेदन किया, “या रसूलल्लाह सल्ल०! आपने राफ़े को इजाज़त दे दी और मुझे वापस कर दिया, हालांकि अगर मेरी राफ़े से कुश्ती हो तो मैं उनको पछाड़ सकता हूं।” दोनों में कुश्ती हुई और समुरा ने राफ़े को चित कर दिया। इस तरह उनको भी जंग में हिस्सा लेने की इजाज़त मिल गई।
लड़ाई की शुरुआत
लड़ाई शुरू हुई और दोनों पक्ष एक-दूसरे से गुथ गए। हिन्द बिन्त उत्बा औरतों में मौजूद थी। औरतें दफ़ बजा-बजाकर मर्दों को लड़ाई के लिए उकसाती थीं, यहां तक कि घमासान जंग शुरू हो गई। अबू दुजाना हज़रत मुहम्मद सल्ल० से तलवार लेकर मैदान-ए-जंग में कूद पड़े। जो कोई उनके सामने आता, उनकी तलवार से बचकर न निकलता।
हमज़ा और मुसअब बिन उमैर रज़ि० की शहादत
हज़रत हमज़ा ने भी इस लड़ाई में अपनी बहादुरी के जौहर दिखाए और बड़े-बड़े सरदारों को मौत के घाट उतारा। किसी को उनके सामने ठहरने की ताक़त न थी। मगर जुबैर बिन मुतइम का ग़ुलाम वहशी उनकी घात में था। वह भाला फेंककर अपने दुश्मन को मारने में माहिर था। जुबैर ने उससे वादा किया था कि अगर वह हमज़ा रज़ि० को क़त्ल कर देगा तो उसको इसके इनाम में आज़ाद कर देगा। उसका चाचा तुऐमा बद्र की लड़ाई में मारा गया था, इसका ग़म भी उसके दिल में था। दूसरी तरफ़ हिन्दा उसे हज़रत हमज़ा के क़त्ल पर उकसा रही थी। वह उनकी शहादत से अपना कलेजा ठंडा करना चाहती थी। वहशी ने अपना भाला तानकर पूरी ताक़त से हज़रत हमज़ा पर हमला किया। भाला उनकी नाफ़ से पार निकल गया। हज़रत हमज़ा तड़पकर गिर पड़े और शहीद हो गए। मुसअब बिन उमैर अल्लाह के रसूल सल्ल० की रक्षा करते हुए लड़ते रहे, और लड़ते-लड़ते जान दे दी। मुसलमानों ने इस लड़ाई में सरफ़रोशी व बलिदान का हक़ अदा कर दिया और हर इम्तिहान में पूरे उतरे।
मुसलमानों की कामयाबी
अल्लाह ने मुसलमानों की मदद की। कुफ़्फ़ार को मुंह की खानी पड़ी। उनकी औरतें, जो मर्दों को ग़ैरत दिलाने आई थीं, मैदान-ए-जंग से भागने लगीं।
मुसलमानों के ख़िलाफ़ लड़ाई का पासा कैसे पलटा?
जब कुफ़्फ़ार और उनकी औरतें भागने लगीं तो उन्हें भागते देखकर तीरन्दाज़ों ने अपनी पोज़ीशन छोड़ दी और लश्कर से आ मिले। उन्हें कामयाबी का पूरा यक़ीन था। वहां पहुंचकर उन्होंने नारा लगाया, “माले ग़नीमत, माले ग़नीमत!” उनके लीडर ने अल्लाह के रसूल सल्ल० की बात उन्हें याद दिलाई, लेकिन जोश में किसी ने उनकी बात न सुनी, और पूरा यक़ीन करते हुए कि अब मुशरिकों को वापस आना नहीं है, उन्होंने अपनी जगह छोड़ दी, और मुसलमानों के पीछे से घुड़सवारों की फ़ौज का रास्ता खुल गया। कुफ़्फ़ार का झण्डा जो लोग संभाले हुए थे, मारे गए। झण्डे के क़रीब आने की कोई हिम्मत नहीं कर रहा था। इसी बीच कुफ़्फ़ार ने पीछे आकर आवाज़ लगाई कि मुहम्मद (सल्ल०) शहीद हो गए। यह सुनकर मुसलमानों का लश्कर अचानक पीछे की तरफ़ मुड़ा और क़ुरैश को दोबारा हमला करने का मौक़ा मिल गया। इस मौक़े से उन्होंने पूरा फ़ायदा उठाया। मुसलमानों के लिए यह कठिन परीक्षा की घड़ी थी।
इस बीच दुश्मन हज़रत मुहम्मद सल्ल० तक पहुंच गए। उनमें अब्दुल्लाह बिन क़मिआ और उत्बा बिन अबी वक़्क़ास आगे-आगे थे। उस समय एक पत्थर आपके लगा और आप दाएं पहलू पर ग़ार में गिर गए। सामने वाला आपका एक दांत ज़ख़्मी हो गया। सर पर चोट आई और होंठ से ख़ून बहने लगा। ख़ून बहकर चेहरे पर आ गया। आप उसे पोंछते जाते और कहते, “वह क़ौम कैसे कामयाब हो सकती है जिसने अपने नबी के चेहरे को ख़ून से तर कर दिया, जो उनको उनके रब की तरफ़ बुलाता है।”
मुसलमानों को ख़बर न थी कि आप किस जगह हैं। हज़रत अली रज़ि० ने आपको सहारा दिया और हज़रत तलहा बिन उबैदुल्लाह ने आपको उठाया, अतएव आप खड़े हो गए।
असल में यह भागना न था, बल्कि जंग की कूटनीति थी, जिसे हर सेना को समय पड़ने पर अपनाना पड़ती है, और तब वह संभलकर हमला करती है। मुसलमानों को इस लड़ाई में जिस आज़माइश से गुज़रना पड़ा, उन्हें जो जानी नुक़सान उठाना पड़ा, और अल्लाह के रसूल सल्ल० के जो अहम साथी और मुसलमानों की ताक़त के स्रोत इस लड़ाई में शहीद हुए, वह सब असल में उन तीरन्दाज़ों की चूक का नतीजा थे जिन्होंने हज़रत मुहम्मद सल्ल० के निर्देश के बावजूद अपनी पोज़ीशन छोड़ दी। क़ुरआन पाक में आता है:
जान निछावर करने की नई मिसाल
उहद की लड़ाई में हज़रत मुहम्मद सल्ल० के प्यारे साथियों ने आप पर जान निछावर करने की अद्वितीय मिसालें पेश कीं। अबू उबैदा बिन अल-जर्राह ने हैल्मेट (लोहे की टोपी) की एक कड़ी, जो अल्लाह के रसूल सल्ल० की ठोढ़ी में धंस गई थी, को अपने दांतों से पकड़कर निकाला तो उसी के साथ आपका एक दांत भी गिर पड़ा। दूसरी कड़ी निकाली तो दूसरा दांत भी उसी के साथ आ गया। अबू दुजाना ढाल बनकर आपके सामने खड़े हो गए। तीर उन पर गिरते रहे, लेकिन वह अडिग खड़े रहे, यहां तक कि उनकी पीठ छलनी हो गई। साद बिन अबी वक़्क़ास उसी जगह खड़े-खड़े आपकी रक्षा में दुश्मन पर तीर चलाते रहे। आप एक-एक तीर उनको अपने हाथ से देते और कहते, “तुम पर मेरे मां-बाप क़ुर्बान हों, इसी तरह तीर चलाते रहो।”
क़तादा बिन अन-नोमान की आंख पर ऐसी चोट आई कि आंख निकलकर उनके गाल पर आ गई। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अपने हाथों से उसे उसी जगह कर दिया। वह आंख ऐसी अच्छी हुई कि उसकी रोशनी पहली आंख से भी तेज़ हो गई।
कुफ़्फ़ार आप सल्ल० की तलाश में थे, लेकिन क़ुदरत को कुछ और मंज़ूर था। जब उन्होंने आप सल्ल० पर घेरा डाला तो लगभग दस आदमी आपके सामने आ गए और सब एक-एक करके आप पर क़ुर्बान हो गए। फिर तलहा बिन उबैदुल्लाह ने अपना हाथ सामने कर दिया और उससे तीरों को रोकना शुरू कर दिया। उनका पूरा हाथ लहूलुहान हो गया। अल्लाह के रसूल सल्ल० वहीं एक चट्टान पर चढ़ना चाहते थे, लेकिन चोट की वजह से कमज़ोरी अधिक थी और चढ़ना कठिन हो रहा था। यह देखकर हज़रत तलहा आपके नीचे बैठ गए। उनका सहारा लेकर आप उस चट्टान पर चढ़ गए। नमाज़ का समय क़रीब आया तो आपने बैठकर नमाज़ पढ़ी।
यह वह घड़ी थी जब लोग हारकर इधर-उधर जाने लगे थे, लेकिन अनस बिन अन-नज़्र (जो अल्लाह के रसूल सल्ल० के सेवक अनस बिन मालिक के चाचा हैं) ने उस समय भी हार नहीं मानी और आगे बढ़ते रहे। साद बिन मुआज़ उनको रास्ते में मिले और पूछा, “किधर का इरादा है?” कहने लगे, “साद! मुझे जन्नत की ख़ुशबू उहद पहाड़ के उस तरफ़ साफ़ महसूस हो रही है।” अनस बिन अन-नज़्र मुहाजिरीन व अन्सार के कुछ लोगों के पास से गुज़रे और देखा कि वह हाथ धरे बैठे हैं। उन्होंने कहा, “तुम लोग यहां बैठे क्या कर रहे हो?” वह लोग कहने लगे, “अल्लाह के रसूल सल्ल० शहीद हो गए।” अनस बिन अन-नज़्र ने कहा, “फिर आपके बाद ज़िन्दा रहने से क्या फ़ायदा? उठो, और जिस पर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जान दी, उसी पर तुम भी जान दे दो।” यह कहकर वह आगे बढ़े, दुश्मन से दो-दो हाथ किए और क़ुर्बानी दे दी।
उनके भतीजे अनस बिन मालिक रज़ि० कहते हैं कि उस दिन हमने उनके बदन पर 70 घाव गिने। ज़ख़्मों की अधिकता से उनको पहचानना मुश्किल हो रहा था। सिर्फ़ उनकी बहन ने उनकी उंगली के एक पोर से उनको पहचाना, जिस पर बचपन की निशानी थी। ज़ियाद बिन अस-सकन पांच अन्सारियों के साथ अल्लाह के रसूल सल्ल० की रक्षा करते हुए लड़ रहे थे। लोग एक-एक करके शहीद होते जा रहे थे, यहां तक कि ज़ियाद ज़ख़्मों से चूर और निढाल होकर गिर गए। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने कहा, “उनको मेरे क़रीब लाओ।” लोगों ने उठाकर उनको आपके सामने लिटा दिया। आपने उनके सर को अपने पैरों पर रख लिया। इसी हालत में उनकी जान निकली।
अम्र बिन अल-जमूह एक पैर से विकलांग थे। उनके चार बेटे थे, सब जवान थे और अल्लाह के रसूल सल्ल० पर जान निछावर करने को हर समय तैयार रहते थे। जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ग़ज़वा-ए-उहद के लिए निकले तो अम्र ने भी साथ जाने का इरादा किया। इस पर उनके बेटों ने कहा कि अल्लाह ने आपके लिए छूट दी है, आप न जाएं तो अच्छा है, हम लोग आपकी तरफ़ से काफ़ी हैं, आप पर जिहाद फ़र्ज़ नहीं है। अम्र अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास गए और कहा कि मेरे बच्चे मुझे जिहाद में हिस्सा लेने से रोक रहे हैं, और अल्लाह की क़सम, मेरी इच्छा है कि मैं शहादत पाऊं और जन्नत में इसी तरह लंगड़ाता हुआ चलूं। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनसे फ़रमाया, “अल्लाह ने तुम्हें जिहाद की छूट दी है,” और उनके बेटों से कहा, “क्या हर्ज है कि तुम इनको जिहाद में जाने दो।” अन्ततः वह उहद की जंग में शामिल हुए और शहादत पाई।
ज़ैद बिन साबित बयान करते हैं कि उहद की जंग में अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मुझे साद बिन रबीअ की तलाश में भेजा और फ़रमाया कि अगर वह नज़र आ जाएं तो मेरा सलाम कहना और कहना कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने पूछा है कि इस समय तुम्हें क्या महसूस हो रहा है? वह कहते हैं कि मैं शहीदों के बीच उन्हें तलाश कर रहा था कि एक जगह वह मुझे नज़र आए। मैं उनके पास गया, देखा तो आख़िरी सांस चल रही थी। उनके बदन पर बरछा, तलवार और तीर के 70 घाव थे। मैंने कहा, “साद! अल्लाह के रसूल सल्ल० ने तुम्हें सलाम कहा है और फ़रमाया है कि मुझे बताओ इस समय तुम्हारा क्या हाल है।” जवाब मिला, “अल्लाह के रसूल सल्ल० से सलाम कहना और कहना कि मुझे इस समय जन्नत की ख़ुशबू महसूस हो रही है, और मेरी क़ौम अन्सार से यह कहना कि अगर दुश्मन अल्लाह के रसूल सल्ल० तक पहुंच गए और तुम्हारे दम में दम रहा, तो अल्लाह पाक के लिए तुम्हारे पास कोई जवाब न होगा।” यह कहते हुए उनकी आंख बंद हो गई।
अब्दुल्लाह बिन जहश ने उहद की जंग के बारे में कहा, “ऐ अल्लाह! मुझे तेरी क़सम, कि मैं कल दुश्मन का मुक़ाबला करूं, वह मुझे क़त्ल कर दें, फिर मेरा पेट चाक कर दें और मेरी नाक काट डालें। फिर तू मुझसे पूछे कि यह सब किसके लिए था? और मैं जवाब दूं, तेरे लिए।”
मुसलमानों का दोबारा जमाव
जब मुसलमानों ने अल्लाह के रसूल सल्ल० को पहचान लिया तो उन्हें नया जीवन मिल गया। वह एक बार फिर उठ खड़े हुए। आप सल्ल० उनको लेकर दोबारा घाटी की तरफ़ बढ़े। रास्ते में उबई बिन ख़लफ़ ने आपको देखा। देखते ही कहने लगा, “मुहम्मद (सल्ल०)! अगर तुम सलामत रहे तो मेरी ख़ैर नहीं।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “इसको जाने दो,” लेकिन जब वह बिल्कुल क़रीब आ गया तो आप सल्ल० ने एक सहाबी से भाला लेकर उसकी गर्दन में मारा। भाला लगते ही वह घोड़े से गिर पड़ा।
इस मौक़े पर हज़रत अली रज़ि० अपनी ढाल में पानी भरकर लाए और आप सल्ल० के चेहरे पर लगे ख़ून को धोया। आपकी बेटी हज़रत फ़ातिमा रज़ि० उसको धोती रहीं और हज़रत अली रज़ि० अपनी ढाल से पानी डालते रहे। जब हज़रत फ़ातिमा ने देखा कि पानी से ख़ून किसी तरह बन्द नहीं हो रहा है, बल्कि और अधिक बढ़ने लगा, तो उन्होंने चटाई का टुकड़ा लेकर उसे जलाया और उसकी राख घाव पर बांध दी। इससे ख़ून का बहना थम गया।
हज़रत आइशा रज़ि० और उम्मे सुलैम रज़ि० इस लड़ाई में चमड़े की डोल में पानी लातीं और घायलों को पिलातीं। जब डोल ख़ाली हो जाती तो वापस जाकर उन्हें दोबारा भर लातीं और घायलों की प्यास बुझातीं। उम्मे सुलैम डोलों में पानी भरकर उनको देती जाती थीं।
हिन्द बिन्त उत्बा ने कुछ अन्य औरतों के साथ मुसलमान घायलों को काटना और लाशों के नाक-कान काटना शुरू किया। वह हज़रत हमज़ा रज़ि० का जिगर निकालकर उसे चबाने लगी, लेकिन वह उसके गले से उतर न सका और उसने उसे फ़ौरन उगल दिया।
जब अबू सुफ़ियान वापस होने लगा तो पहाड़ पर खड़े होकर तेज़ आवाज़ से उसने नारा लगाया, “लड़ाई का मामला डांवाडोल है, आज इसकी जीत, कल उसकी। हुबल का नाम ऊंचा रहे।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “उमर! खड़े होकर इसका जवाब दो,” और कहा, “अल्लाह बहुत बड़ा है, उसके सिवा कोई नहीं। हमारे शहीद जन्नत में हैं और तुम्हारे दोज़ख़ (नरक) में हैं।” यह सुनकर अबू सुफ़ियान बोला, “हमारे पास उज़्ज़ा है, तुम्हारे पास नहीं।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “इसका जवाब दो।” सहाबा ने पूछा, “हम क्या कहें?” आपने फ़रमाया, “कहो कि अल्लाह हमारा संरक्षक है, तुम्हारा कोई संरक्षक नहीं।” जब वह अपनी तरफ़ चला और मुसलमान अपनी तरफ़ जाने लगे, तो उसने आवाज़ लगाई, “अगले साल बद्र में फिर हमारा मुक़ाबला है।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने एक सहाबी से फ़रमाया, “कहो, हां, यह तारीख़ हमारे-तुम्हारे बीच तय है।”
आख़िर में लोग अपने शहीदों को दफ़नाने लगे। अल्लाह के रसूल सल्ल० पर हज़रत हमज़ा की शहादत का बहुत असर था। हज़रत हमज़ा आपके चाचा और रज़ाई भाई थे और हमेशा आपके लिए जान निछावर करने को तैयार रहा करते थे।
एक औरत का सब्र
सफ़िया बिन्त अब्दुल मुत्तलिब रज़ि० हज़रत हमज़ा की सगी बहन थीं। जब वह अपने भाई को देखने आईं तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनके लड़के से कहा, “उन्हें वापस कर दो, ताकि उनकी नज़र उनके छोटे भाई की बोटी-बोटी लाश पर न पड़े।” ज़ुबैर बिन अल-अव्वाम ने जाकर कहा, “अम्मां! अल्लाह के रसूल सल्ल० का हुक्म है कि आप वापस जाएं।” कहने लगीं, “क्यों? मुझे मालूम है कि मेरे भाई का अंग-अंग काट डाला गया है, लेकिन यह सब अल्लाह की राह में है, इसलिए मैं इन्शा अल्लाह सवाब की नीयत रखूंगी और सब्र अपनाऊंगी।” इसके बाद वह वहां आईं, अपने भाई को देखा, इन्ना लिल्लाह पढ़ा, उनके लिए दुआ की। इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उन्हें दफ़नाने का हुक्म दिया और वह उहद की ही शहादतगाह में दफ़नाए गए।
मुसअब बिन उमैर तथा अन्य शहीदों का कफ़न-दफ़न
मुसलमानों के झण्डावाहक मुसअब बिन उमैर इस्लाम से पहले क़ुरैश के बड़े लाडले नौजवान थे। सुन्दरता और राजसी कपड़ों के लिए वह बहुत मशहूर थे। उन्हें दफ़न करने के लिए सिर्फ़ एक चादर मिल सकी, जो इतनी छोटी थी कि सर छिपाया जाता तो पैर खुल जाते और पैर छिपाए जाते तो सर खुल जाता। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “इनका सर छिपा दो और पैरों पर घास डाल दो।”
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने दो-दो शहीदों को एक चादर में दफ़न करने का हुक्म दिया। फिर फ़रमाया, “क़ुरआन पाक का जिसे अधिक ज्ञान हो उसे पहले क़ब्र में उतारो,” और फिर फ़रमाते, “मैं क़यामत के दिन इनका गवाह बनूंगा।” आपने उनको उसी तरह दफ़न करने का हुक्म दिया। न उनकी जनाज़े की नमाज़ हुई, न ग़ुस्ल दिया गया।1
हज़रत मुहम्मद सल्ल० के प्रति अपार प्रेम व श्रद्धा
मुसलमान मदीना पहुंचे तो रास्ते में बनी दीनार की एक औरत के घर के पास उनका गुज़र हुआ। उस औरत के पति, भाई और बाप सब इस लड़ाई में शहीद हुए थे। जब मुसलमानों ने उनको यह ख़बर सुनाई तो उन्होंने सबसे पहले यह कहा कि अल्लाह के रसूल सल्ल० की ख़ैरियत बताओ। उन लोगों ने जवाब दिया, “ऐ फ़लां की मां! अल्लाह का शुक्र है, अल्लाह के रसूल सल्ल० सही-सलामत हैं।” कहने लगीं, “मुझे आपको दिखाओ, मैं आपको ख़ुद देखना चाहती हूं।” लोगों ने आपकी तरफ़ इशारा किया। उन्होंने पास आकर आप सल्ल० को देखा और कहा, “आप सलामत हैं तो हर मुसीबत हेच है।”
स्वामिभक्ति का एक उदाहरण
इधर कुफ़्फ़ार एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगे और कहने लगे, “तुमने कुछ करके न दिया। तुमने एक तरफ़ तो उनकी ताक़त कमज़ोर कर दी और फिर उन्हें पूरी तरह पराजित किए बिना छोड़ दिया।” दूसरी तरफ़ अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हुक्म दिया कि दुश्मनों का पीछा किया जाए। यह वह समय था जब कि मुसलमान ज़ख़्मों से चूर-चूर हो रहे थे। दूसरे दिन रविवार को सुबह पुकार की गई कि लोग दुश्मन का पीछा करने के लिए निकल खड़े हों। साथ ही यह भी एलान किया गया कि इसमें वही लोग शामिल होंगे जो कल की लड़ाई में शामिल थे। एक मुसलमान भी ऐसा न था जो किसी न किसी चोट या तकलीफ़ से पीड़ित न हो, लेकिन वह सब के सब अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ निकल पड़े। एक व्यक्ति भी पीछे न रहा। जब सब लोग मदीना से आठ मील दूर स्थित हमराउल असद तक पहुंच गए तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने वहां पड़ाव किया। आप तमाम मुसलमानों के साथ सोमवार, मंगलवार और बुध, तीन दिन वहां ठहरे। इसके बाद मदीना वापस आए। क़ुरआन पाक में स्वामिभक्ति की इस भावना का चित्रण इस तरह किया गया है:
जान से ज़्यादा प्यारे
हिजरत के तीसरे वर्ष क़बीला अज़ल और क़ारा ने अल्लाह के रसूल सल्ल० से प्रार्थना की कि उनको कुछ ऐसे लोग दिए जाएं जो उनको दीन की शिक्षा दे सकें। आपने सहाबा किराम रज़ि० में से 6 लोगों का एक शिष्टमण्डल इस काम के लिए भेजा, जिसमें आसिम बिन साबित, ख़ुबैब बिन अदी रज़ि० और ज़ैद बिन अद-दसिन्ना भी थे। जब वह उस्फ़ान और मक्का के बीच स्थित ‘रजीअ’ पहुंचे तो इन क़बीलों ने उनके साथ ग़द्दारी की। साथ ही यह भी कहा कि हम अल्लाह के सामने वादा करते हैं कि हम किसी को जान से न मारेंगे। कुछ मुसलमानों ने कहा कि हमें मुशरिकों की किसी प्रतिज्ञा पर यक़ीन नहीं है। उन्होंने मुक़ाबला किया और शहीद हुए। ज़ैद बिन अद-दसिन्ना, ख़ुबैब बिन अदी और अब्दुल्लाह बिन तारिक़ रज़ि० ने हथियार रख दिए, और उन्हें बन्दी बना लिया गया। अब्दुल्लाह बिन तारिक़ रास्ते में शहीद किए गए। ज़ैद और ख़ुबैब को उन लोगों ने क़ुरैश के हाथ बेच दिया। ख़ुबैब को हुजैर बिन अबी इहाब ने ख़रीदा, ताकि अपने बाप इहाब के बदले में क़त्ल कर सकें। ज़ैद को सफ़वान बिन उमैया ने अपने बाप उमैया बिन ख़लफ़ का बदला लेने के लिए ख़रीदा।
ज़ैद रज़ि० को हरम से बाहर क़त्ल के लिए ले जाया गया। उस समय क़ुरैश के बहुत से लोग जमा थे, जिनमें अबू सुफ़ियान भी था। उसने हज़रत ज़ैद से कहा, “ज़ैद! मैं तुमसे क़सम दिलाकर पूछता हूं, क्या तुम यह पसन्द करोगे कि तुम आराम से अपने घर वालों में हो और तुम्हारी जगह मुहम्मद (सल्ल०) हों?” उन्होंने जवाब दिया, “मुझे तो यह भी सहन नहीं है कि मैं अपने घर में आराम से हूं और मुहम्मद सल्ल० को एक कांटा भी चुभे।” अबू सुफ़ियान ने इस पर कहा, “मैंने किसी को किसी से इतनी मुहब्बत करते नहीं देखा जितनी मुहब्बत मुहम्मद (सल्ल०) के साथी करते हैं।” इसके बाद ज़ैद रज़ि० को शहीद कर दिया गया।
जब यह लोग ख़ुबैब रज़ि० को सूली पर चढ़ाने के लिए लाए तो उन्होंने कहा कि अगर इसमें कोई हर्ज न समझो तो मुझे दो रकअत नमाज़ पढ़ लेने की इजाज़त दे दो। उन लोगों ने कहा कि हां, पढ़ लो। उन्होंने इत्मीनान से दो रकअत नमाज़ पढ़ी। फिर उनको सम्बोधित करते हुए कहा कि अगर मुझे यह शक न होता कि तुम लोग इसको डर समझोगे तो मैं अभी और नमाज़ पढ़ता। इसके बाद उन्होंने अरबी में दो शेर पढ़े, जिनका मतलब है:
“जब मैं इस्लाम के लिए क़त्ल किया जा रहा हूं, तो मुझे इसकी परवाह नहीं कि अल्लाह की राह में किस पहलू पर गिरकर जान दूंगा। यह जो कुछ है, सिर्फ़ अल्लाह के लिए, अगर वह चाहेगा तो इस टुकड़े-टुकड़े शरीर पर बरकत नाज़िल करेगा।”
यह शेर पढ़ते हुए सच की राह में शहीद हुए।
बीर-ए-मऊना
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने आमिर बिन मालिक की प्रार्थना पर उनमें इस्लाम के प्रचार के लिए एक दल भेजा, जिसमें 70 चुने हुए सहाबा शामिल थे। यह लोग चले और बीर-ए-मऊना में पड़ाव किया। यहां बनी सुलैम के क़बीले उसैया, रिअ्ल और ज़कवान ने मिलकर पूरे क़ाफ़िले को घेर लिया। जब उन्होंने यह देखा तो तलवारें खींच लीं और लड़कर सब के सब शहीद हो गए। सिर्फ़ कअब बिन ज़ैद बाक़ी बचे, जिन्होंने ग़ज़वा-ए-ख़न्दक़ में शहादत पाई।
एक शहीद के आख़िरी शब्द, जिसे सुनकर उनके क़ातिल मुसलमान हो गए
इसी लड़ाई (सरिया) में हराम बिन मिल्हान भी शहीद हुए। उन्हें जब्बार बिन सलमा ने क़त्ल किया। हराम बिन मिल्हान ने आख़िरी समय जो शब्द कहे, वही जब्बार के मुसलमान होने की वजह बने। जब्बार ख़ुद बयान करते हैं कि मुझे जिस चीज़ ने इस्लाम की तरफ़ खींचा वह यह बात है कि मैंने उनके एक आदमी के दोनों कंधों के बीच एक भाला मारा। मैंने देखा कि वह सीने के पार हो गया है। उसी वक़्त उनके मुंह से यह शब्द निकले, “काबा के रब की क़सम, मैं कामयाब हो गया!” मैंने अपने दिल में कहा, कैसी कामयाबी? क्या मैंने उनको क़त्ल नहीं किया? बाद में मैंने उनके शब्दों का मतलब जानना चाहा तो लोगों ने बताया कि उनका मतलब शहादत से था। मैंने कहा, अल्लाह की क़सम, वह कामयाब रहे।
बनी अन-नज़ीर का देश-निकाला
अल्लाह के रसूल सल्ल० क़बीला अन-नज़ीर के पास बनी आमिर के दो मरने वालों के बदले के लिए मदद चाहने गए। उनके और बनी आमिर के बीच समझौता था। उन्होंने इस मौक़े पर तो आपसे बहुत मीठी बातें कीं और उम्मीद दिलाई, लेकिन अन्दर-अन्दर आपके ख़िलाफ़ साज़िश में लगे रहे। एक बार अल्लाह के रसूल सल्ल० उनके एक घर की दीवार की छाया में लेटे थे। आपको देखकर यह लोग आपस में कहने लगे कि इससे अच्छा मौक़ा फिर तुम्हारे हाथ न लगेगा। अगर एक आदमी ऊपर चढ़कर एक भारी पत्थर लुढ़का दे तो हम सबको छुटकारा मिल जाएगा। आप सल्ल० के साथ उस समय हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़, हज़रत उमर और हज़रत अली आदि भी थे।
अल्लाह ने आपको उनके नापाक इरादों से आगाह कर दिया। आप उसी वक़्त उठ खड़े हुए और मदीना के लिए चल पड़े। मदीना आकर आपने जंग की तैयारी की, उनके मुक़ाबले के लिए चले और आगे बढ़कर उनके क़बीले में पड़ाव किया। यह रबीउल अव्वल सन 4 हिजरी की घटना है। आपने 6 रातों तक उनका घेराव किया। उनके दिलों में अल्लाह ने इतना रौब डाला कि उन्होंने आपसे ख़ुद ही प्रार्थना की कि आप उनको यहां से देश-निकाला कर दें, लेकिन उनकी जान की माफ़ी दे दें। ऊंट जितने ले जा सकें, उन्हें ले जाने की इजाज़त होगी, हथियार वे अवश्य न ले जा सकेंगे। आप सल्ल० ने उनकी यह प्रार्थना मान ली, और वे सारा सामान जो ऊंटों पर जा सकता था अपने साथ ले गए। लोगों ने देखा कि एक आदमी अपना पूरा का पूरा घर ख़ुद अपने हाथों से गिरा रहा है और जितना सामान ऊंट पर आ सकता है लादकर जा रहा है। इस घटना की तरफ़ इशारा करते हुए क़ुरआन पाक में अल्लाह पाक का इरशाद है:
ग़ज़वा-ए-ज़ातुर्रिक़ा
हिजरत के चौथे साल अल्लाह के रसूल सल्ल० और उनके साथी, जिनमें अबू मूसा अल-अशअरी रज़ि० भी थे, नज्द के एक नख़लिस्तान में चढ़ाई के इरादे से उतरे। इन सब 6 लोगों के बीच सवारी के लिए सिर्फ़ एक ऊंट था, जिसकी वजह से पैदल चलने के कारण लोगों के पैर छिल गए और उंगलियों के नाख़ून तक गिर गए। इसकी वजह से लोगों ने अपने पैरों पर पट्टियां और चिथड़े बांध लिए थे। इसी लिए इसका नाम “ग़ज़वा-ए-ज़ातुर्रिक़ा” अर्थात पट्टियों वाला ग़ज़वा पड़ा। दोनों पक्ष एक-दूसरे से क़रीब हुए, लेकिन लड़ाई की नौबत न आई। लोग एक-दूसरे से डरे हुए थे। इस मौक़े पर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने सलातुल ख़ौफ़ (डर के समय पढ़ी जाने वाली नमाज़) भी पढ़ी।
इस समय तुम्हें कौन बचा सकता है?
जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ग़ज़वा-ए-ज़ातुर्रिक़ा से वापस हुए तो दोपहर को आपने ऐसी जगह आराम फ़रमाई जहां बबूल के बहुत से पेड़ थे। आप बबूल के एक पेड़ के नीचे आराम करने लगे और अपनी तलवार उसी पेड़ पर लटका दी। बाक़ी लोग अन्य पेड़ों के नीचे लेट गए। हज़रत जाबिर रज़ि० बयान करते हैं कि इसी बीच हमारी आंख लग गई। अभी हम थोड़ा सोए ही थे कि महसूस हुआ कि अल्लाह के रसूल सल्ल० हमें आवाज़ दे रहे हैं। हमने देखा कि एक बद्दू आपके पास बैठा हुआ है। आप सल्ल० ने फ़रमाया, “मैं सो रहा था कि इसने तलवार उठाई। मेरी आंख खुली तो यह तलवार मेरे सर पर खींचे हुए था। इसने मुझसे कहा कि इस वक़्त तुम्हें कौन बचा सकता है? मैंने कहा, ‘अल्लाह’। अब यह तुम्हारे सामने बैठा हुआ है।” आपने उस बद्दू को कोई सज़ा नहीं दी।
कुछ ग़ज़वे जिनमें लड़ाई नहीं हुई
हिजरत के चौथे वर्ष शाबान के महीने में अल्लाह के रसूल सल्ल० ने बद्र की तरफ़ जाने का इरादा किया। अबू सुफ़ियान ने तारीख़ तय की थी। आपने वहां पहुंचकर पड़ाव किया और 8 रातें वहां रहे। अबू सुफ़ियान भी मुक़ाबले के लिए निकला, लेकिन उसने लौट जाना ही उचित समझा। उसने अपने आदमियों से कहा कि यह अकाल और सूखे का दौर है, मेरा लौटने का इरादा है, और तुम लोगों को भी लौट चलना चाहिए। अतः इस तरह लड़ाई टल गई और अल्लाह ने मुसलमानों को उनसे बचा लिया।
दौमतुल जन्दल के ग़ज़वे में भी लड़ाई की नौबत नहीं आई और आप मदीना वापस आ गए।
टिप्पणियां
- 1शहीदों को ग़ुस्ल न देने के बारे में कोई विवाद नहीं। उनको ख़ून में लुथड़ा हुआ उस तरह दफ़न कर दिया जाता है कि अल्लाह के सामने इसी तरह पहुंचें। जनाज़े की नमाज़ के बारे में विद्वानों का मतभेद अवश्य है। इमाम मालिक, शाफ़ई और अहमद रह० का मत है कि शहीदों की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ना ज़रूरी नहीं है। इमाम अबू हनीफ़ा रह० (तथा अन्य विद्वान इमाम औज़ाई, सुफ़ियान सौरी, इसहाक़ बिन राहवैह आदि) का मत है कि शहीदों की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी जाए। इमाम अहमद रह० से भी इसकी एक रिवायत (कथन) मिलती है। उनकी दलील में यह उल्लेख आते हैं जिनमें उहद में शहीदों पर नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ने का वर्णन है। ख़ुद उक़बा बिन आमिर से इमाम बुख़ारी ने बयान किया है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० एक दिन उहद पधारे और आपने वहां के शहीदों पर ऐसी नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी जैसी मरने वालों पर पढ़ी जाती है।