अध्याय उन्नीस

मक्का की विजय

जब इस्लाम और मुसलमानों की जड़ें मज़बूत हो गईं, अल्लाह ने उनका हर तरह से इम्तिहान ले लिया, और क़ुरैश के ज़ुल्म, आरोप, रुकावट और अनाचार का घड़ा छलकने लगा, तो क़ुदरत का फ़ैसला हुआ कि अल्लाह के रसूल सल्ल० और मुसलमान मक्का में विजयी बनकर दाख़िल हों, काबा को बुतों की गन्दगी से पाक व साफ़ करें, मक्का को उसकी पुरानी हैसियत पर वापस लाएं, अल्लाह के घर को पूरी इंसानियत के मार्गदर्शन व उसकी ख़ुशहाली का स्रोत बनाएं और उसकी रहमत को पूरी दुनिया के लिए फैला दें।

बनी बक्र और क़ुरैश द्वारा समझौता तोड़ना

अल्लाह ने मक्का की कामयाबी के लिए विशेष कारण पैदा कर दिए और ख़ुद क़ुरैश अप्रत्यक्ष रूप से मक्का की कामयाबी की वजह बने। एक ऐसी बात हुई जिसने मक्का की विजय को न सिर्फ़ जायज़ बल्कि ज़रूरी कर दिया।

हुदैबिया समझौते के एक बिन्दु अनुसार जो व्यक्ति अल्लाह के रसूल सल्ल० के संरक्षण में आना चाहे वह ऐसा कर सकता था, और जो व्यक्ति क़ुरैश के संरक्षण में रहना चाहता है वह ऐसा कर सकता था। इसलिए बनी बक्र क़ुरैश के संरक्षण में रहे और ख़ुज़ाआ ने अल्लाह के रसूल सल्ल० का संरक्षण पसन्द किया।

बनी बक्र और ख़ुज़ाआ में इस्लाम के अभ्युदय से पहले से बहुत पुरानी दुश्मनी थी और बदले की कार्रवाइयों का एक सिलसिला जारी थी। जब हुदैबिया समझौते के बाद यह दोनों क़बीले दो विरोधी शिविरों में बंट गए तो बनी बक्र ने मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए ख़ुज़ाआ से अपना हिसाब-किताब चुकता करना चाहा। बनी बक्र के कुछ लोगों ने सांठ-गांठ करके ख़ुज़ाआ पर उस समय रात में हमला किया जब वह पानी के एक सोते के पास ठहरे हुए थे। दोनों में लड़ाई हुई और ख़ुज़ाआ के अनेक लोग मारे गए।

क़ुरैश ने बनी बक्र की हथियारों से मदद की, और रात के अंधेरे का फ़ायदा उठाते हुए क़ुरैश के बड़े सरदार इस लड़ाई में शामिल हुए। यह लोग ख़ुज़ाआ को खदेड़ते हुए हरम-ए-काबा तक पहुंच गए। काबा के क़रीब पहुंचकर क़ुरैश के लोगों ने कहा, “अब हम हरम में हैं, अपने माबूद (पूज्य) का ख़याल करो।” उन्हें जवाब मिला कि “आज के दिन कोई माबूद नहीं। बनी बक्र! आज बदला चुका लो, इसके बाद तुम्हें मौक़ा नहीं मिलेगा।”

इस मौक़े पर अम्र बिन सालिम अल-ख़ुज़ाई अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास आए और कुछ शेर पढ़े। आपके और ख़ुज़ाआ के बीच जो समझौता हुआ था उसका वास्ता देकर आपकी मदद मांगी। उन्होंने आप सल्ल० को सूचित किया कि क़ुरैश समझौते से पीछे हट गए हैं, और उन्होंने रात के समय ख़ुज़ाआ पर चढ़ाई कर दी और नमाज़ की हालत में उन्हें क़त्ल किया गया। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने यह सुनकर फ़रमाया, “अम्र बिन सालिम! तुम्हारी मदद ज़रूर की जाएगी।”

रसूलल्लाह ने ज़रूरी समझा कि इस ख़बर की सच्चाई जान ली जाए। इसलिए आपने उनके पास एक आदमी को इस निर्देश के साथ भेजा कि उनके सामने तीन बातें रखें। एक, यह कि वह ख़ुज़ाआ के क़त्ल किए गए लोगों का “ख़ूंबहा” (Blood Money) अदा कर दें। दो, अथवा बनी बक्र की शाखा बनू नुफ़ासा, जिसने इस समझौते का उल्लंघन किया है और ख़ुज़ाआ पर हमला किया है, उससे सम्बन्ध तोड़ने का ऐलान करें। तीन, या फिर जैसा उन्होंने किया है वही उनके साथ किया जाएगा। इन शर्तों को क़ुरैश के सामने रखा गया। उनके सरदारों ने कहा कि “हम बराबर का जवाब पसंद करेंगे।” इस तरह ज़िम्मेदारी क़ुरैश पर जा पड़ी और मुसलमानों की ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गई।

जब अल्लाह के रसूल सल्ल० को यह ख़बर पहुंची तो आपने फ़रमाया, “मैं देख रहा हूं कि अबू सुफ़ियान समझौते की पुष्टि और उसकी अवधि बढ़ाने के लिए तुम्हारे पास आए हैं।” ऐसा ही हुआ। क़ुरैश को अपने किए पर पछतावा हुआ और उन्होंने अबू सुफ़ियान को इस समझौते की पुष्टि और उसकी अवधि बढ़ाने के लिए आपके पास भेजा।

अल्लाह के रसूल सल्ल० मां-बाप से बढ़कर

अबू सुफ़ियान अल्लाह के रसूल सल्ल० से मिलने मदीना आए तो अपनी लड़की और हज़रत मुहम्मद सल्ल० की पत्नी हज़रत उम्मे हबीबा रज़ि० के घर गए और आपके बिस्तर पर बैठना चाहा, लेकिन उम्मे हबीबा ने उनको रोक दिया। अबू सुफ़ियान ने कहा, “बेटी! मैं नहीं समझ पाया कि तुमने इस बिस्तर को मेरे लायक़ नहीं समझा या मुझको इस बिस्तर के लायक़ नहीं समझा।” उम्मे हबीबा ने जवाब दिया कि “यह अल्लाह के रसूल सल्ल० का बिस्तर है और आप मुशरिक व नापाक हैं। मैं यह पसंद नहीं करती कि आप इस बिस्तर पर बैठें।” अबू सुफ़ियान ने कहा, “अल्लाह की क़सम! हमसे जुदा होने के बाद तुम बहुत बदल गईं।”

अबू सुफ़ियान की परेशानी

वहां से अबू सुफ़ियान अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास गए और आपसे बातचीत शुरू की, लेकिन आपने कोई जवाब नहीं दिया। फिर वह हज़रत अबू बक्र के पास गए और उनसे निवेदन किया कि वह उनकी तरफ़ से आपसे बात करें। उन्होंने जवाब दिया कि “मैं यह काम नहीं कर सकता।” उसके बाद अबू सुफ़ियान ने हज़रत उमर और हज़रत अली रज़ि० से विनती की, लेकिन उनमें से कोई तैयार न हुए और कहा कि “मामला इतना संगीन है कि हम लोग बोल नहीं सकते।” अबू सुफ़ियान तब घबराए हुए हज़रत फ़ातिमा के पास गए और कहा, “ऐ मुहम्मद (सल्ल०) की बेटी! क्या तुम अपने इस बच्चे को (पांच वर्षीय हज़रत हसन की तरफ़ इशारा करते हुए जो खेल रहे थे) इशारा कर सकती हो कि यह इतना कह दे कि मैंने पक्षों में बीच-बचाव करा दिया, ताकि वह क़यामत तक लिए अरबों का सरदार बन जाए?” हज़रत फ़ातिमा ने जवाब दिया, “मेरा बच्चा अभी इस क़ाबिल नहीं हुआ कि ऐसे अहम मामलों में दख़ल दे। फिर यह कि अल्लाह के रसूल सल्ल० को आप सल्ल० की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई भी सुलह-सफ़ाई के लिए तैयार नहीं कर सकता।” जब हज़रत अली ने अबू सुफ़ियान की परेशानी देखी तो उन्होंने कहा, “मैं नहीं समझता कि इस समय कोई चीज़ तुम्हारे काम आ सकती है। तुम बनी किनाना के सरदार हो, खड़े हो और ख़ुद लोगों में सुलह-सफ़ाई कराओ और तब अपने घर जाओ।” अबू सुफ़ियान ने कहा, “क्या तुम्हारे विचार से इससे कुछ फ़ायदा हो सकता है?” हज़रत अली ने कहा, “मैं तो ऐसा नहीं समझता, लेकिन तुम्हारे पास इसके सिवा कोई चारा ही क्या है।” यह सुनकर अबू सुफ़ियान मस्जिद में गए और वहां खड़े होकर ऐलान किया, “लोगो! मैंने सुलह करा दी।” इसके बाद वह ऊंट पर सवार होकर चल दिए।

जब क़ुरैश ने यह सुना तो कहने लगे कि “तुम तो कोई काम की बात लेकर नहीं आए। यह कार्यवाही न हमारे लिए लाभदायक है न आपके लिए।”

हातिब बिन अबी बलतआ का ख़त

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने लोगों को जिहाद की तैयारी का हुक्म दिया और निर्देश दिया कि सभी बातों को गोपनीय रखा जाए। इसके बाद आपने अपने मक्का प्रस्थान करने का ऐलान किया। आपने अल्लाह से दुआ की, “ऐ अल्लाह! इनका बंदोबस्त फ़रमा दे कि क़ुरैश का कोई जासूस अपना काम न कर सके और हम अचानक क़ुरैश के सिर पर पहुंच जाएं।”

मदीना का इस्लामी समाज एक इन्सानी समाज था और इसमें मानव प्रवृत्तियों, भावनाओं और इच्छाओं की वह झलकियां मौजूद थीं जो किसी सजग समाज में स्वाभाविक रूप से पाई जाती हैं। इसके लोग सही काम भी करते थे और उनसे ग़लतियां भी होती थीं। मुमकिन है कि उनके कुछ फ़ैसले अकारण न रहते हों और उनमें वह हक़ पर भी हों। असल में यह उस हर एक मानव समाज की विशेषता है जिसमें आज़ादी व आत्मविश्वास की भावना पैदा हो। अल्लाह के रसूल सल्ल० उनकी ग़लतियों को माफ़ कर देते और इस्लाम के प्रचार में उनके कारनामों और उनकी सेवाओं का आपको हमेशा एहसास रहता। हदीस, सीरत (पवित्र जीवनी) और इस्लामी इतिहास के लेखकों ने कुछ ऐसी बातों को सुरक्षित कर दिया जो अपने आप में ख़ुद इन किताबों की अमानत, सच्चाई और न्यायपसन्दी का सबूत हैं।

इन घटनाओं में हातिब बिन अबी बलतआ की घटना भी है। हातिब उन लोगों में है जिन्होंने मक्का से हिजरत की और जंग-ए-बद्र में शामिल हुए। उल्लेखनीय है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जब अपने साथियों से मक्का पर चढ़ाई का इरादा ज़ाहिर किया और ख़ामोशी के साथ उसकी तैयारियां शुरू हो गईं, तो हातिब बिन अबी बलतआ ने एक ख़त लिखा जिसमें मक्कावासियों के लिए रसूलल्लाह सल्ल० के प्रस्थान की सूचना थी। उन्होंने यह ख़त एक औरत को दिया और कहा कि अगर वह इसे सुरक्षित क़ुरैश तक पहुंचा दे तो इसके लिए उसे मेहनताना दिया जाएगा। उस औरत ने ख़त अपने बालों के जूड़े में छिपा लिया और रवाना हो गई। अल्लाह के रसूल सल्ल० को जब अल्लाह की तरफ़ से इसकी सूचना मिली तो आपने हज़रत अली और हज़रत ज़ुबैर रज़ि० को उसका पीछा करने के लिए भेजा। आप सल्ल० ने यह निर्देश दिया कि “जब तुम लोग रौज़तुल ख़ाख़ (मदीना और मक्का के बीच एक जगह) के क़रीब पहुंचोगे तो तुमको वहां एक मुसाफ़िर औरत मिलेगी, जिसके पास क़ुरैश के नाम एक ख़त होगा।” यह दोनों सहाबी घोड़े दौड़ाते हुए वहां पहुंचे। उसी जगह उन्हें वह औरत मिली। उन्होंने उसको सवारी पर से उतरने को कहा और पूछा कि “तुम्हारे पास कोई ख़त है?” उसने जवाब दिया कि “मेरे पास कोई ख़त नहीं है।” उन्होंने उसके सामान की तलाशी ली लेकिन कुछ न मिला।

तब हज़रत अली ने उसे डराया-धमकाया और कहा कि “तुम्हारे पास ख़त है और तुम्हें इसको बाहर निकालना होगा।” जब उसने देखा कि यह लोग पीछा नहीं छोड़ेंगे तो उसने अपने जूड़े से वह ख़त निकाला और उनके हवाले कर दिया। यह दोनों लोग ख़त लेकर अल्लाह के रसूल के पास पहुंचे। यह ख़त हातिब का था जिसमें क़ुरैश को मक्का पर चढ़ाई की सूचना दी गई थी। आपने हातिब को बुला भेजा। हातिब ने कहा, “या रसूलल्लाह! आप जल्दी न करें। अल्लाह की क़सम! मैं अल्लाह और रसूल सल्ल० पर ईमान रखता हूं। न मैंने अपना दीन बदला है न अपनी वफ़ादारी। लेकिन मेरा क़ुरैश से वैसा संबंध नहीं है जैसा इन मुहाजिरों का है। मैं सिर्फ़ उनके पक्ष में हूं। मेरे घर के लोग और बच्चे तो वहां हैं, लेकिन उन्हें ख़ानदानी तौर पर कोई संरक्षण हासिल नहीं है। मैंने सोचा कि जब मुझे यह सुविधा हासिल नहीं है तो मैं उन पर कोई ऐसा एहसान कर दूं जिससे मेरे ख़ानदान के लोग सुरक्षित रहें।” हज़रत उमर ने यह सुनकर कहा, “या रसूलल्लाह सल्ल०! मुझे इजाज़त दें, मैं इसी समय इनकी गर्दन उड़ा दूं, क्योंकि इन्होंने अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० के साथ धोखा किया है और यह मुनाफ़िक़ों में है।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “वह बद्र में शामिल थे। उमर! तुम्हें क्या मालूम कि कहीं अल्लाह ने बद्र वालों को संबोधित करके फ़रमा दिया हो कि तुम चाहे जो करो, मैंने तुम्हारे सब क़सूर माफ़ कर दिए हैं?” यह सुनकर हज़रत उमर रज़ि० की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, “अल्लाह और अल्लाह के रसूल सल्ल० ज़्यादा जानते हैं।”

अल्लाह के रसूल सल्ल० रमज़ान के महीने में मदीने से रवाना हुए। आपके साथ 10 हज़ार सहाबी थे। आप सल्ल० ने मर्रुज़्ज़हरान में पड़ाव किया। क़ुरैश को इसकी बिल्कुल ख़बर नहीं हो पाई। अल्लाह ने उन्हें बेख़बर रखा।

माफ़ीनामा

रास्ते में आपको आपके चचेरे भाई अबू सुफ़ियान मिले। आपने उनसे मुंह फेर लिया क्योंकि उन्होंने आपको बड़ा दुख पहुंचाया था और आपका अपमान किया था। अबू सुफ़ियान हज़रत अली से मिले और इस बात की शिकायत की। हज़रत अली ने कहा कि “तुम अल्लाह के रसूल सल्ल० के सामने आकर वह कहो जो यूसुफ़ अ० के भाइयों ने यूसुफ़ अ० से कहा था, अर्थात ‘अल्लाह की क़सम! अल्लाह ने आपको हम पर बड़ा ठहराया है और बेशक हम दोषी हैं।’” उन्होंने यही किया। उनकी क्षमा-याचना सुनकर आपने फ़रमाया, “आज तुम पर कोई आरोप नहीं। अल्लाह तुम्हें माफ़ फ़रमाए, और वह सब रहम करने वालों से अधिक रहीम है।” इसके बाद अबू सुफ़ियान बिन हारिस बिन अब्दुल मुत्तलिब बहुत अच्छे, सच्चे, पक्के मुसलमान बने, लेकिन मुसलमान होने के बाद शर्म के मारे फिर उन्होंने कभी आपसे आंखें नहीं मिलाईं।

अबू सुफ़ियान बिन हर्ब रसूलल्लाह के सामने

अल्लाह के रसूल सल्ल० के आदेशानुसार आग के अलाव जलाए गए। इसी बीच अबू सुफ़ियान बिन हर्ब टोह लेने के लिए उधर से गुज़रे और उनके मुंह से निकला, “इस शान का लश्कर और ऐसी रोशनी तो मैंने इससे पहले कभी नहीं देखी।” हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब इस लश्कर में मौजूद थे। उन्होंने अबू सुफ़ियान की आवाज़ पहचान ली और कहा, “देखो, अल्लाह के रसूल सल्ल० अपनी सेना के साथ यहां मौजूद हैं। कल क़ुरैश के लिए बुरा दिन होगा।” हज़रत अब्बास ने यह सोचकर कि अगर कोई मुसलमान अबू सुफ़ियान को देख लेगा तो उनका काम तमाम कर देगा, उन्हें अपने ख़च्चर के पीछे बैठा लिया और आपके पास लाए। उन्हें देखकर आपने फ़रमाया, “अबू सुफ़ियान! तुम्हारा भला हो। क्या अभी तक इसका समय नहीं आया कि तुम ईमान लाओ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं?” अबू सुफ़ियान ने कहा, “मेरे मां-बाप आप पर क़ुर्बान! आप कितने उदार और सज्जन हैं। मैं तो सोचता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद होता तो आज मेरे कुछ काम आता।” आपने फ़रमाया, “अबू सुफ़ियान! अल्लाह तुमको समझ दे। क्या अब भी समय नहीं आया कि तुम इस बात को मानो कि मैं अल्लाह का रसूल हूं?” अबू सुफ़ियान ने कहा, “मेरे मां-बाप आप पर क़ुर्बान! आप कितने उदार और सज्जन हैं, लेकिन इस मामले में मुझे अभी कुछ शक है।” यह सुनकर हज़रत अब्बास बोल उठे, “अल्लाह के बन्दे! इससे पहले कि तुम्हारी गर्दन तलवार से उड़ा दी जाए, इस्लाम क़बूल कर लो और गवाही दो कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और मुहम्मद (सल्ल०) अल्लाह के रसूल हैं।” यह सुनकर अबू सुफ़ियान ने यह शब्द कहे और मुसलमान हो गए।

आम माफ़ी

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उस दिन माफ़ी, अमन व शांति के दरवाज़े खोल दिए। आपने फ़रमाया कि “जो अबू सुफ़ियान के घर में दाख़िल हो जाएगा उसको पनाह मिलेगी। जो अपने घर का दरवाज़ा बन्द करेगा वह सुरक्षित है। जो मस्जिद-ए-हराम में दाख़िल होगा उसके लिए अमन है।”

आपने अपनी सेना को निर्देश दिए कि मक्का में दाख़िल होते समय सिर्फ़ उस व्यक्ति पर हाथ उठाएं जो उनके रास्ते में रुकावट पैदा करे। आपने यह भी आदेश दिया कि मक्कावासियों की चल-अचल मनक़ूला सम्पत्ति में बिल्कुल हस्तक्षेप न किया जाए।

अबू सुफ़ियान ने बढ़ती हुई इस्लामी टुकड़ियां देखीं

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत अब्बास से कहा कि अबू सुफ़ियान को ऐसी जगह ले जाएं जहां से इस्लामी टुकड़ियां आगे बढ़ते हुए दिखाई दें। यह टुकड़ियां समुद्र की लहरों की तरह आगे बढ़ रही थीं। क़बीले अपने झंडों के साथ गुज़र रहे थे। जब कोई क़बीला गुज़रता तो अबू सुफ़ियान हज़रत अब्बास से उसका नाम पूछते। जब उन्हें नाम बताया जाता तो कहते कि “मुझे इस क़बीले से क्या काम?” आख़िर में अन्सार व मुहाजिरों की टुकड़ी के साथ अल्लाह के रसूल सल्ल० पधारे। इस कवचधारी टुकड़ी के लोगों की सिर्फ़ आंखें दिखाई पड़ती थीं।

अबू सुफ़ियान ने यह नज़ारा देखकर कहा कि “अल्लाह की शान! अब्बास! यह कौन लोग हैं?” अब्बास ने कहा कि “यह अल्लाह के रसूल सल्ल० हैं जो मुहाजिरों और अन्सार के झुरमुट में जा रहे हैं।” अबू सुफ़ियान ने कहा, “इनमें से किसी को भी इससे पहले ऐसी शान व शौकत हासिल न थी। अल्लाह की क़सम, ऐ अबुल फ़ज़्ल! तुम्हारे भतीजे की सत्ता आज कितनी ऊंची है।” हज़रत अब्बास ने कहा, “अबू सुफ़ियान! यह नुबूवत का चमत्कार है।” इसके बाद अबू सुफ़ियान ने बुलन्द आवाज़ से ऐलान किया, “ऐ क़ुरैश के लोगो! यह मुहम्मद सल्ल० इतनी ताक़त के साथ आपके पास आए हैं जिसकी तुम कल्पना न करते होगे। अब जो अबू सुफ़ियान के घर में आ जाएगा उसको अमान दी जाएगी।” लोग यह सुनकर कहने लगे, “अल्लाह तुमसे समझे! तुम्हारे घर की हैसियत ही क्या है, हम सबको उसमें पनाह मिल सके?” अबू सुफ़ियान ने कहा, “जो अपने घर का दरवाज़ा बन्द कर लेगा उसको अमन मिलेगा, जो मस्जिद-ए-हराम में चला जाएगा उसको अमन मिलेगा।” अतः वह लोग अपने घरों और मस्जिद-ए-हराम में पनाह लेने चल पड़े।

कामयाबी लेकिन रहम

अल्लाह के रसूल सल्ल० मक्का में इस शान से दाख़िल हुए कि आपका सर बन्दगी व विनय के कारण झुक गया था। मक्का में दाख़िल होते समय आप सूरह फ़त्ह का पाठ फ़रमा रहे थे और ठोड़ी ऊंटनी के कोहान को छूने को थी। यह 21 रमज़ान, शुक्रवार की सुबह होने वाली रात है। मक्का में एक विजयी के तौर पर दाख़िल होते समय अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इन्साफ़ व बराबरी, विनय और बन्दगी का विशेष ध्यान रखा। हज़रत ज़ैद आपके ग़ुलाम थे, जिन्हें आपने आज़ाद कर दिया। इस मौक़े पर आपने उनके लड़के उसामा को अपने साथ ऊंटनी पर बिठाया, हालांकि उस समय वहां बनी हाशिम और क़ुरैश के अनेक जाने-माने लोग मौजूद थे। विजय के दिन एक व्यक्ति आपसे बात करते हुए कांपने लगा तो आपने फ़रमाया, “डरो नहीं! इत्मीनान रखो, मैं कोई बादशाह नहीं हूं। मैं तो क़ुरैश की एक ऐसी औरत का लड़का हूं जो गोश्त के सूखे टुकड़े खाया करती थी।”

माफ़ी का दिन

जब अन्सार की टुकड़ी के अमीर साद बिन उबादा अबू सुफ़ियान के पास से गुज़रे तो उन्होंने कहा, “आज घमासान लड़ाई है और ख़ूंरेज़ी का दिन है। आज काबा में सब जायज़ होगा। आज अल्लाह ने क़ुरैश को नीचा दिखाया है।” इसके थोड़ी देर बाद जब अल्लाह के रसूल सल्ल० अपनी टुकड़ी के साथ अबू सुफ़ियान के पास से गुज़रे तो उन्होंने आपसे इसकी शिकायत की। आपने साद की कही गई बातों को सुना तो उसे नापसन्द फ़रमाया। आपने कहा, “नहीं, आज तो रहम व माफ़ी का दिन है। आज अल्लाह क़ुरैश को इज़्ज़त देगा और काबा की गरिमा बढ़ाएगा।” इतना ही नहीं, आप सल्ल० ने हज़रत साद को बुलवाया और उनसे इस्लामी झण्डा लेकर उनके बेटे क़ैस को दे दिया। आपने यह सोचा कि उनके बेटे को झण्डा देने का मतलब यह होगा कि मानो झण्डा उनसे वापस नहीं लिया गया।

इस तरह एक अक्षर के हेरफेर (अर्थात ‘अल-मलहमा’ के स्थान पर ‘अल-मरहमा’ कहकर; अल-मलहमा का अर्थ है घमासान जंग और अल-मरहमा का अर्थ है रहम और माफ़ी) से, और एक बाप के हाथ से झण्डा लेकर बेटे के हाथ में दे देने से, साद बिन उबादा का ज़रा भी दिल तोड़े बिना आपने अबू सुफ़ियान की दिलजोई का सामान ऐसे विवेकपूर्ण ढंग से पैदा कर दिया कि इससे अच्छे ढंग की कल्पना करना कठिन है। आप अबू सुफ़ियान के चोट खाए दिल को तसल्ली भी देना चाहते थे और साद बिन उबादा, जिन्होंने इस्लाम की बड़ी सेवा की थी, के दिल को ठेस भी नहीं पहुंचाना चाहते थे। यह आपकी जतनपूर्ण व्यवहार-कुशलता का एक जीता-जागता उदाहरण है।

कुछ झड़पें

इस बीच सफ़वान बिन उमैया, इकरिमा बिन अबी जहल, सुहैल बिन अम्र ने ख़ालिद बिन वलीद के रास्ते में रुकावटें पैदा कीं, जिसके फलस्वरूप उनमें और ख़ालिद के साथियों के बीच कुछ झड़पें हुईं। इन झड़पों में लगभग 12 मुशरिक मारे गए। इसके बाद उन्होंने हार मान ली।

काबा से बुतों की सफ़ाई

जब मक्का में हालात सामान्य हो गए और लोग अपने काम व कारोबार में लग गए तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जाकर काबा का तवाफ़ किया। उस समय काबा में 360 बुत थे। आपके हाथ में एक कमान थी। आप उससे बुतों को कोंचते जाते थे और कहते जाते थे, “हक़ आ गया और बातिल मिट गया, और बातिल मिटने की चीज़ है।” इसी के साथ यह तमाम बुत एक-एक करके मुंह के बल गिरते जाते। काबा में कुछ तस्वीरें भी थीं। आप सल्ल० के हुक्म से उनको भी तोड़ दिया गया।

जब आपने तवाफ़ पूरा कर लिया तो आपने उस्मान बिन तलहा (जिनके पास काबा की कुंजी थी) को बुलवाया, उनसे काबा की कुंजी ली। दरवाज़ा खोला गया और आप काबा में दाख़िल हुए। इससे पहले, मदीना हिजरत करने से पूर्व, जब आपने एक दिन यह कुंजी मांगी तो उस्मान ने सिर्फ़ इन्कार ही नहीं किया बल्कि आपसे गुस्ताख़ी के स्वर में बात की थी। आपने उस वक़्त बहुत नरमी से कहा था, “उस्मान! तुम यह कुंजी किसी वक़्त मेरे हाथ में देखोगे, तब मैं जिसे चाहूंगा इसे दूंगा।” और इसके जवाब में उस्मान ने कहा था, “अगर ऐसा हुआ तो वह दिन क़ुरैश की बड़ी ज़िल्लत व तबाही का दिन होगा।” और आप सल्ल० ने फ़रमाया था, “नहीं, उस दिन वह आबाद और इज़्ज़त वाले होंगे।” आपके यह शब्द उस्मान बिन तलहा के दिल में उतर गए और उन्होंने महसूस किया कि जैसा आप सल्ल० ने फ़रमाया वैसा ही होगा।

जब आप काबा से बाहर आए तो कुंजी आपके हाथ में थी। आपको देखते ही हज़रत अली खड़े हो गए और निवेदन किया, “अल्लाह आपको सलामत रखे। आप सिक़ाया (पानी पिलाने के बंदोबस्त) के साथ हिजाबा (काबा की दरबानी) भी हमें प्रदान करें।” आपने पूछा, “उस्मान बिन तलहा कहां हैं?” उनको बुलाया गया। आपने फ़रमाया, “उस्मान! लो यह तुम्हारी कुंजी है। आज अच्छे सुलूक और वफ़ादारी का दिन है। यह कुंजी लो जो तुम्हारे पास हमेशा-हमेशा रहेगी, और ज़ालिम के सिवा कोई तुमसे इसको छीन नहीं सकेगा।”

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने जब काबा से निकलने के लिए उसका दरवाज़ा खोला तो क़ुरैश पूरे हरम में पंक्तिबद्ध खड़े थे और प्रतीक्षा में थे कि अब आप क्या करने वाले हैं। आपने दरवाज़े के दोनों बाज़ू थामकर फ़रमाया:

“एक अल्लाह के सिवा और कोई अल्लाह नहीं, उसका कोई शरीक नहीं है। उसने अपना वादा सच्चा किया, अपने बन्दे की मदद की, और सभी जत्थों को अकेले हराया। याद रखो कि बदला और ख़ूनबहा सब मेरे क़दमों के नीचे है, सिर्फ़ काबा की देख-रेख और हाजियों को पानी पिलाने का बन्दोबस्त छोड़कर। ऐ क़ुरैश के लोगो! अब जहालत का ग़ुरूर और नसब (वंशज) का घमण्ड अल्लाह ने मिटा दिया। तमाम लोग आदम की नस्ल से हैं और आदम मिट्टी से बने थे।”

इसके बाद आपने क़ुरआन की निम्न आयत पढ़ी:

नबी-ए-रहमत सल्ल०

इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उन्हें सम्बोधित करते हुए फ़रमाया, “ऐ क़ुरैश के लोगो! तुम्हें क्या उम्मीद है कि इस समय मैं तुम्हारे साथ क्या करूंगा?” उन्होंने जवाब दिया, “हम अच्छी उम्मीद रखते हैं। आप रहमदिल और सज्जन हैं और हमदर्द व सज्जन भाई के बेटे हैं।” आपने कहा, “मैं तुमसे वही कहता हूं जो यूसुफ़ अ० ने अपने भाइयों से कहा था, ‘आज तुम पर कोई आरोप नहीं,’ जाओ, तुम सब आज़ाद हो।” इसके बाद हज़रत बिलाल रज़ि० को हुक्म दिया कि काबा पर चढ़कर अज़ान दें। क़ुरैश ने यह एलान सुना और मक्का की घाटी में अज़ान की आवाज़ गूंज उठी। अल्लाह के रसूल सल्ल० उम्मे हानी (पुत्री अबी तालिब) के घर गए, स्नान किया और शुकराने की 8 रकअतें फ़त्ह की नमाज़ (सलातुल फ़त्ह) अदा की।

भाई-भतीजावाद नहीं

बनी मख़ज़ूम की एक औरत ने, जिसका नाम फ़ातिमा था, इस ग़ज़वे में चोरी की। उसकी बिरादरी के लोग उसामा बिन ज़ैद के पास इस विचार से गए कि वह अल्लाह के रसूल सल्ल० को बहुत प्रिय हैं, और सिफ़ारिश करना चाही। उन्होंने जब इस मामले में अल्लाह के रसूल सल्ल० से बात की तो आपके चेहरे का रंग बदल गया। आपने फ़रमाया, “तुम मुझसे अल्लाह द्वारा तय की गई सीमाओं1 में से किसी सीमा के बारे में बात करते हो?” उसामा ने कहा, “या रसूलल्लाह! मैं बहुत शर्मिन्दा हूं, आप मेरे लिए अल्लाह से दुआ करें। मुझसे बड़ी भूल हुई। अल्लाह मुझे माफ़ करे।” शाम को जब सब लोग जमा हुए तो अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अल्लाह की बड़ाई बयान करने के बाद फ़रमाया, “तुमसे पहले लोग इसलिए मिट गए कि उनमें से जब कोई शरीफ़ और हैसियत वाला आदमी चोरी करता था तो वह उसको छोड़ देते थे, बूढ़ा और कमज़ोर व्यक्ति चोरी करता था तो उसे सज़ा देते थे। उस ज़ात की क़सम जिसके क़ब्ज़े में मुहम्मद की जान है! अगर फ़ातिमा बिन्त मुहम्मद ने भी चोरी की होती तो मैं उसके हाथ काट देता।”

इसके बाद आपने हुक्म दिया कि इस औरत के हाथ काट दिए जाएं, इसलिए उसके हाथ काटे गए। फिर सच्चे दिल से उसने तौबा की, उसकी दशा सुधर गई और उसने शादी भी कर ली।

दुश्मनों के साथ अच्छा सुलूक

जब पूरी तरह कामयाबी मिल गई तो सबको अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अमन दे दी, सिर्फ़ 9 लोगों को छोड़कर, जिनके क़त्ल का हुक्म हुआ, भले ही वह काबा के पर्दों के अन्दर मिलें। उनमें कोई वह था जो इस्लाम लाने के बाद इस दीन से फिर गया, किसी ने धोखा देकर किसी मुसलमान को क़त्ल किया था, किसी ने आपकी बुराई बयान करने को अपने मनोरंजन का साधन बना लिया था। इनमें अब्दुल्लाह बिन साद बिन अबी सरह भी था जो इस दीन से फिर गया था। इकरिमा बिन अबी जहल भी था, जो इस्लाम से नफ़रत और जान के डर से अपना वतन छोड़कर यमन चला गया था। उसकी पत्नी ने उसके फ़रार के बाद अल्लाह के रसूल सल्ल० से उसके लिए अमन मांगी। आपने यह जानते हुए कि वह सारी दुनिया में आपके घोर दुश्मन का लड़का है, उसको अमन दी, और ख़ुशी से उसका स्वागत करने के लिए उसकी तरफ़ इस तरह लपके कि चादर आपके बदन से हट गई थी। इकरिमा इस्लाम लाए तो आपको बहुत ख़ुशी हुई। मुसलमानों में उन्हें विशेष स्थान मिला। धर्म-त्याग की लड़ाइयों तथा बाज़नतीनी जंगों में उन्होंने बड़ा काम किया। उन 9 लोगों में आपके प्यारे चाचा सैयदना हमज़ा के क़ातिल वहशी भी थे, जिन्हें आपने मुसलमान हो जाने की वजह से माफ़ कर दिया। इनमें हब्बार बिन असवद भी था जिसने आपकी बेटी हज़रत ज़ैनब के पहलू पर बर्छी से हमला किया था, जिससे वह एक चट्टान पर गिर पड़ी और गर्भपात की घटना घटित हुई। इस घटना के बाद वह मक्का से भाग गया था, लेकिन बाद में वह मुसलमान हो गया और उसे भी आपने माफ़ कर दिया। सारा तथा दो अन्य गाने वालियों के सम्बन्ध में, जो आपकी निन्दा में कहे गए शेर गाती थीं, भी आपसे अमान चाही गई। आपने उन्हें अमान दी और वह मुसलमान हो गईं।

हिन्द बिन्त उत्बा से आपका संवाद

मक्का में एक भीड़ आपसे इस्लाम पर बैअत करने के लिए जमा हो गई। आप उनको लेकर सफ़ा पहाड़ी पर गए और वहां बैठकर उनसे अल्लाह और रसूल की बात सुनने और उसे मानने की शपथ ली। जब आप मर्दों की बैअत कर चुके तो आपने महिलाओं से बैअत की। इन महिलाओं में अबू सुफ़ियान की पत्नी हिन्द बिन्त उत्बा भी थी। वह पर्दे में थी और सैयदना हमज़ा रज़ि० के साथ उसने जो कुछ किया उसकी वजह से अपने को ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी।

आपने फ़रमाया, “इस पर मुझसे बैअत करो कि अल्लाह के साथ तुम किसी को शरीक नहीं ठहराओगी।” हिन्द ने कहा, “अल्लाह की क़सम! आप हमसे इक़रार ले रहे हैं जो अन्य मर्दों से नहीं लिया है।” अल्लाह के रसूल सल्ल० ने कहा, “और चोरी न करोगी।” हिन्द ने कहा, “मैंने अबू सुफ़ियान के माल में से अक्सर थोड़ा-थोड़ा लिया है। मैं नहीं जानती थी कि ऐसा करना हलाल है या हराम।” यह सुनकर अबू सुफ़ियान ने कहा, “जहां तक पिछली बात का सम्बन्ध है, तुम उससे बरी हो, तुम्हारे लिए हलाल है।” इस पर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, “अच्छा! तुम उत्बा की बेटी हिन्द हो?” हिन्द ने कहा, “हां! आप मेरे पिछले क़सूर माफ़ करें, अल्लाह आपको माफ़ करे।” आपने फ़रमाया, “और ज़िना (अवैध शारीरिक संबंध) न करोगी।” हिन्द ने कहा, “या रसूलल्लाह! क्या कोई शरीफ़ औरत ज़िना भी कर सकती है?” आपने फ़रमाया, “अपनी औलाद को क़त्ल नहीं करोगी।” यह सुनकर हिन्द ने कहा, “जब तक वह बच्चे थे हमने उन्हें पाला, जब बड़े हुए तो आपने उन्हें क़त्ल किया। अब आप जानें और वह जानें।” आप सल्ल० ने कहा, “कोई खुला हुआ बोहतान (आरोप) न बांधोगी।” हिन्द ने कहा, “अल्लाह की क़सम! बोहतान बांधना बहुत बुरी बात है, और कभी-कभी इसकी अनदेखी कर देना ज़्यादा बेहतर है।” आपने फ़रमाया, “और मेरी नाफ़रमानी (अवज्ञा) न करोगी।” हिन्द ने कहा, “हां, अच्छी बातों में।”

हमेशा के साथी

जब अल्लाह ने मक्का के दरवाज़े अपने रसूल सल्ल० के लिए खोल दिए तो अन्सार ने आपस में एक-दूसरे से कहा कि “अल्लाह ने अपने रसूल सल्ल० के लिए आप सल्ल० का देश व वतन फ़तह फ़रमा दिया है। अब आप यहां रुक जाएंगे, मदीना वापस न जाएंगे।” ऐसा शक अन्सार के दिलों में पैदा हुआ। आपने उनसे पूछा, “तुम लोग क्या बात कर रहे थे?” इस बात को उनके सिवा कोई और नहीं जानता था। अन्सार बहुत शर्मिंदा हुए और कुछ हिचकिचाहट के बाद साफ़-साफ़ आपसे बता दिया। उनकी बात सुनकर आप सल्ल० ने फ़रमाया, “अल्लाह माफ़ करे, ऐसा कैसे हो सकता है! जीना भी तुम्हारे साथ है और मरना भी तुम्हारे साथ।”

दुश्मन, दोस्त और पापी सन्त बन गए

फ़ुज़ाला बिन उमैर की नीयत ख़राब हुई और उसने यह योजना बनाई कि जब अल्लाह के रसूल सल्ल० तवाफ़ कर रहे हों, उस समय आप पर हमला करे। इस इरादे से जब वह आपके क़रीब आया तो आपने उससे कहा, “फ़ुज़ाला!” उसने कहा, “जी, या रसूलल्लाह!” आपने फ़रमाया, “इस समय तुम्हारे दिल में क्या आ रहा था?” उसने कहा, “कुछ नहीं, अल्लाह को याद कर रहा था।” आप यह सुन हंसे और फ़रमाया, “अल्लाह से माफ़ी चाहो।” फिर अपना हाथ उसके सीने पर रखा। उसका दिल शांत हो गया। फ़ुज़ाला बयान करते थे, “आप सल्ल० ने अपना हाथ मेरे सीने पर से हटाया भी न था, सारी सृष्टि में मेरे लिए आप सल्ल० से अधिक प्यारा कोई और न था।” वह कहते थे कि “इसके बाद मैं अपने घर की तरफ़ चला। रास्ते में मुझे वह औरत मिली जिससे मैं कुछ बातें किया करता था। उसने कहा, ‘आओ फ़ुज़ाला, बैठें, कुछ बात करें।’” फ़ुज़ाला ने जवाब दिया, “अल्लाह और इस्लाम अब इसकी अनुमति नहीं देता।”

मूर्तिपूजा पूरी तरह ख़त्म

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने काबा के चारों तरफ़ जितने बुत थे उन्हें नष्ट करने के लिए दल भेजे, और यह सभी बुत टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। इनमें “लात”, “उज़्ज़ा” और “मनात” के बुत भी शामिल थे। इसके बाद आपके मुनादी ने मक्का में ऐलान कर दिया कि “हर वह व्यक्ति जो अल्लाह और आख़िरत के दीन पर यक़ीन रखता है, उसको चाहिए कि अपने घर के हर बुत को तोड़ दे।” आपने अपने साथियों में से कुछ लोगों को विभिन्न क़बीलों में भेजा और उन्होंने वहां जाकर बुतों को तोड़ने का काम अंजाम दिया।

जरीर बयान करते हैं कि उन दिनों एक बुतख़ाना था जिसका नाम “ज़ुल-ख़लसा” थी। इसी तरह “अल-काबतुल यमानिया” और “अल-काबतुश शामिया” के नाम से बुतख़ाने थे। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मुझसे फ़रमाया, “क्या तुम ‘ज़ुल-ख़लसा’ को टुकड़े-टुकड़े करके मुझे राहत न पहुंचाओगे?” जरीर कहते हैं कि मैं डेढ़ सौ शहसवारों को लेकर वहां गया, उस बुत को भी तोड़ डाला, और जितने लोग उस समय वहां थे उनको भी मौत के घाट उतार दिया। जब वापस आकर अल्लाह के रसूल सल्ल० को इसकी सूचना सुनाई तो आपने हमारे लिए और अहमस, जहां के शहसवार थे, के लिए दुआ की।

फिर आपने मक्का में खड़े होकर ऐलान किया, “किसी व्यक्ति के लिए, जो अल्लाह और आख़िरत के दीन पर ईमान ला चुका है, यह जायज़ नहीं है कि इसमें ख़ून बहाए या यहां के किसी पेड़ को काटे। न मुझसे पहले किसी के लिए यहां ऐसा करना जायज़ था और न मेरे बाद जायज़ होगा।” इसके बाद आप मदीना वापस आए।

मक्का विजय का असर

मक्का की विजय का अरबों के दिलों पर गहरा असर पड़ा। अल्लाह ने उनके दिल इस्लाम के लिए खोल दिए, और उन्होंने टोलियों में आ-आकर इस्लाम क़बूल करना शुरू किया। कुछ ऐसे क़बीले भी थे जो क़ुरैश के साथ किसी न किसी समझौते से जुड़े-बंधे थे और उसकी पाबन्दी उनके इस्लाम क़बूल करने में रुकावट बन रही थी। कुछ क़बीले क़ुरैश से डरते थे, उनकी लड़ाई उनके दिलों में घर कर चुकी थी। जब उन्होंने देखा कि क़ुरैश ने इस्लाम के सामने हथियार डाल दिए हैं तो उनको भी इसका शौक़ पैदा हुआ, और इस तरह वह रुकावट दूर हो गई।

कुछ क़बीलों का यक़ीन था कि मक्का में कोई ज़ालिम व जाबिर दाख़िल नहीं हो सकता है, न उसे बुरी नीयत से फ़तह कर सकता है। उनमें ऐसे लोग भी थे जिनके सामने हाथी वाली घटना हुई थी और उन्होंने अपनी आंखों से देखा था कि अब्रहा को कैसी मुंह की खानी पड़ी थी। वह कहते थे, “जाने दो, इनके और इनकी क़ौम के पीछे पड़ने की ज़रूरत नहीं। अगर वह विजयी होते हैं तो यह इस बात का एलान है कि वह सच्चे नबी हैं।”

फ़त्ह-ए-मक्का के बाद और क़ुरैश के इस्लाम लाने के बाद अरबवासी इस्लाम की तरफ़ जिस तरह आकर्षित हुए कि इससे पहले इसका कोई उदाहरण नहीं मिलता। उनके बड़े-बड़े जत्थे आपके पास आते और इस्लाम क़बूल करते। इसका नक़्शा क़ुरआन पाक में इस तरह आया है:

कमसिन अमीर (लीडर)

मक्का से निकलने से पहले आप सल्ल० ने अत्ताब बिन उसैद को मक्का के मामलों और हज बन्दोबस्त की देखभाल के लिए अमीर (लीडर) नियुक्त किया। उनकी उम्र उस समय लगभग 20 वर्ष थी। उस समय मक्का में अत्ताब से अधिक उम्र वाले अनेक अनुभवी और योग्य लोग मौजूद थे, लेकिन अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अत्ताब का चयन किया, जो यह बताता है कि पद और पदवी योग्यता व क्षमता के आधार पर मिलती है। हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने भी अपने शासनकाल में उनको इसी पद पर उसी तरह बनाए रखा।

टिप्पणियां

  1. 1क़ुरआन व सुन्नत के अनुसार निर्धारित सज़ाएं।