अध्याय सत्ताईस

चरित्र-विवरण

हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के किरदार का नक्शा ‘हिन्द बिन अबी हाला’ (जो मुसलमानों की माँ हज़रत ख़दीजा के बेटे और हज़रत हसन व हज़रत हुसैन रज़ि० के मामू हैं) ने बहुत ही पुख्ता अंदाज़ में इस तरह पेश किया है:

“अल्लाह के रसूल सल्ल० हर समय आख़िरत की सोच में रहते और इससे हमेशा चिंतित रहते। अक्सर देर तक ख़ामोश रहते, बिना ज़रूरत न बोलते। बातचीत शुरू करते तो शब्दों का पूरा-पूरा और साफ़ उच्चारण करते। (अर्थात घमण्डियों की तरह आधे कटे शब्द प्रयोग नहीं करते) और इसी तरह बात-चीत ख़त्म करते। आप सल्ल० की बात-चीत और बयान बहुत साफ़ व दो टूक होती, न वह गैर ज़रूरी तौर से न बहुत लम्बी होती न बहुत छोटी। आप नर्म मिजाज (कोमल प्रवृत्ति) थे और नर्म बात करते थे। कटुवादी और बेमुरब्बत न थे। न किसी को अपमानित करते और न अपने लिए अपमान पसन्द करते।1 अल्लाह की दी हुई नेमत (वरदान) की बड़ी क़द्र करते और उसको बहुत अधिक जानते चाहे वह थोड़ी ही क्यों न हो, और उसकी बुराई न फ़रमाते। खाने-पीने की चीज़ों की न बुराई करते न तारीफ़। दुनिया और दुनिया से संबंधित जो भी चीज़ हो तो उस पर आपको ग़ुस्सा न आता, लेकिन जब अल्लाह के किसी हक़ को दबाया जाता तो उस वक़्त आप सल्ल० के जलाल (शौर्य) के सामने कोई चीज़ न ठहर सकती थी। यहां तक कि आप उसका बदला ले लेते। आपको अपनी ज़ात (व्यक्तित्व) के लिए न ग़ुस्सा आता न उसके लिए बदला लेते। जब इशारा फ़रमाते तो पूरे हाथ के साथ इशारा फ़रमाते। जब किसी बात पर हैरत (आश्चर्य) फ़रमाते तो उसको पलट देते। बात करते समय दाहिने हाथ की उंगली को बाएं हाथ के अंगूठे से मिलाते। ग़ुस्सा या नापसंद बात होती तो मुँह उस तरफ़ से बिल्कुल फेर लेते। ख़ुश होते तो नज़रें झुका लेते। आपका हंसना ज़्यादातर तबस्सुम (मुस्कराहट) था जिससे सिर्फ़ आपके दाँत जो बारिश के ओलों की तरह पाक, साफ़ व निर्मल थे, दिखाई देते।”

हज़रत अली जो खानदान के ही एक व्यक्ति थे ने आपको बहुत क़रीब से देखा था। उन्हें आपके बारे में पूरी जानकारी के बेहतरीन संसाधन उपलब्ध थे। उनकी मानव प्रवृत्ति तथा आचरण की बारीकियों पर गहरी निगाह थी, साथ ही चरित्र चित्रण पर उनका अच्छा अधिकार था। वह आपके ‘महान चरित्र’ के बारे में कहते हैं:

“आप स्वभाव से बदकलामी (अपशब्द) और बेहयाई व बेशर्मी से दूर थे और अनजाने में भी ऐसी कोई बात आपसे नहीं होती थी, बाज़ारों में आप कभी आवाज़ तेज़ न फ़रमाते, बुराई का बदला बुराई से न देते बल्कि माफ़ कर देते। आपने किसी पर कभी हाथ न उठाया, सिवाय इसके कि अल्लाह के रास्ते में जिहाद का मौक़ा हो। किसी सेवक या औरत पर आपने कभी हाथ नहीं उठाया। मैंने आपको किसी ज़ुल्म व ज्यादती का बदला लेते हुए भी नहीं देखा। जब तक कि अल्लाह की निर्धारित सीमाओं की ख़िलाफ़वर्ज़ी (उल्लंघन) न हो और उसकी हुरमत (इज़्ज़त) पर आँच न आए। हां, अगर अल्लाह के किसी हुक्म को कुचलने की कोशिश की जाती और उसके गौरव पर आँच आती तो आप उसके लिए हर व्यक्ति से अधिक ग़ुस्सा होते। दो चीज़ें सामने होतीं तो हमेशा आसान चीज़ का चयन करते। जब अपने घर आते तो आम इंसानों की तरह नज़र आते। अपने कपड़ों को साफ़ करते, बकरी का दूध दुहते और अपनी सब ज़रूरतें ख़ुद पूरी करते।

अपनी मुबारक ज़बान की सुरक्षा करते और सिर्फ़ उसी चीज़ के लिए खोलते जिससे आपको कुछ सरोकार होता। लोगों की दिलदारी फ़रमाते और उनका दिल न दुखाते। किसी क़ौम या बिरादरी का इज़्ज़त दार सरदार आदि आता तो उसका आदर-सत्कार करते और उसे अच्छे और उच्च पद पर बैठाते। लोगों के बारे में कुछ कहते तो बहुत सोच समझकर कहते और उन्हें अपनी सरसता व मीठे वचन से वंचित न रखते। अपने साथियों के हालात की बराबर ख़बर रखते। लोगों से लोगों के मामलों के बारे में पूछते रहते।

अच्छी बात की अच्छाई बयान करते और उसे बल प्रदान करते। बुरी बात की बुराई करते और उसे कमज़ोर करते। आपका व्यवहार समान तथा एक सा होता। आप किसी बात से ग़फ़लत न करते। इस डर से कि कहीं दूसरे लोग भी ग़ाफ़िल न होने लगें। हर हाल और हर मौक़े के लिए आपके पास उस हाल के मुताबिक ज़रूरी सामान था। हक़ के मामले में न कोताही करते न हद से आगे बढ़ते। आपके क़रीब जो लोग रहते थे वह सबसे अच्छे और चुने हुए होते थे। आपकी निगाह में सबसे ज़्यादा अफ़ज़ल (उत्कृष्ट) वह था जिसकी ख़ैरख़्वाही (उपकार) और अख़लाक़़़ (आचरण) आम हो अर्थात सबके लिए हो। सबसे अधिक उसकी क़द्र करते जो दूसरों का दुःख बंटाने और उनकी मदद करने में सबसे आगे होता। अल्लाह का ज़िक्र करते हुए खड़े होते और अल्लाह का ज़िक्र हुए बैठते। जब कहीं जाते तो जहां मजलिस ख़त्म होती उस जगह बैठते और दूसरों से ऐसा ही करने के लिए कहते। अपनी मजलिस में मौजूद लोगों में हर व्यक्ति को (अपने ध्यान व दया दृष्टि में) पूरा हिस्सा देते। आपकी मजलिस में शामिल हर व्यक्ति यह समझता कि उससे बढ़कर आपकी निगाह में कोई और नहीं है। अगर कोई व्यक्ति आपको किसी मक़सद से बिठा लेता या किसी ज़रूरत में आपसे बात करता तो बड़े सब्र के साथ उसकी पूरी बात सुनते, यहां तक कि वह ख़ुद ही अपनी बात पूरी करके रुखसत होता। अगर कोई व्यक्ति आपसे कोई सवाल करता या कुछ मदद चाहता तो बिना उसकी ज़रूरत पूरी किए उसे लौटाते नहीं, या कम से कम नर्म-नर्म अन्दाज़ में जवाब देते। आपका यह सुलूक तमाम लोगों के लिए आम था। आप उनके हक़ में बाप हो गए थे। हक़ के मामले में सभी लोग आपकी निगाह में बराबर थे। आपकी मजलिस ज्ञान व भक्ति, हया व शर्म, सब्र व अमानतदारी, की मजलिस थी। न उसमें आवाज़ें बुलन्द होती थीं न किसी के अवगुण बयान किए जाते थे। न किसी की इज़्ज़त पर हमला होता न कमज़ोरियों का ढिंढोरा पीटा जाता। सब एक-दूसरे के बराबर थे और सिर्फ़ तक़वा (अल्लाह के डर) की बुनियाद पर उनको एक दूसरे पर उत्कृष्टता हासिल होती थी। इसमें लोग बड़ों का सम्मान और छोटों पर रहमदिली व शफ़क़त का मामला करते थे। ज़रूरतमंदों को अपने पर प्राथमिकता देते थे। मुसाफ़िर तथा नए आने वालों की सुरक्षा करते और उसका ख़याल रखते थे।

आप हमेशा ख़ुश रहते थे। बहुत नर्म पहलू थे2। न सख्त तबीयत के थे न सख्त बात कहने के आदी, न चिल्ला कर बोलने वाले, न घमण्ड की बात करने वाले, न किसी को ऐब लगाने वाले, न तंगदिल। जो बात आपको पसन्द न होती उसकी तरफ़ ध्यान न देते। (अर्थात उसे नज़र अन्दाज़ कर देते) और इन्कार करने के बजाय ख़ामोश रहते। तीन बातों से आपने अपने को बिल्कुल बचा रखा था। एक झगड़ा, दूसरे घमण्ड और तीसरे गैर ज़रूरी काम। लोगों को भी आपने तीन बातों से बचा रखा था। न किसी की कमज़ोरियों तथा गोपनीय बातों के पीछे पड़ते थे। सिर्फ़ वह बात करते थे जिस पर सवाब की उम्मीद होती थी। आप जब बात करते तो मौजूद लोग इस तरह सर झुका लेते थे मानो उनके सरों पर चिड़िया बैठी हुई हो। जब आप ख़ामोश होते तब यह लोग बात करते। आपके सामने कभी बहस न करते। आपकी मजलिस में अगर कोई आदमी बात करता तो बाक़ी लोग ख़ामोशी से सुनते, यहां तक कि वह अपनी बात ख़त्म कर लेता। आपके सामने हर व्यक्ति की बात का वही दर्जा होता जो उसके पहले वाले व्यक्ति का होता। जिस बात पर सब लोग हंसते उस पर आप भी हंसते। जिस पर सब हैरत व्यक्त करते आप भी उस पर हैरत करते। मुसाफ़िर और परदेशी की बदतमीज़ी (अशिष्ट व्यवहार) और हर तरह के सवाल को सब्र के साथ सुनते, यहां तक कि आपके साथी ऐसे लोगों का ध्यान आपकी तरफ़ आकर्षित कर लेते। आप फ़रमाते थे, “तुम किसी ज़रूरतमंद को पाओ तो उसकी मदद करो।” आप तारीफ़ उसी व्यक्ति की क़बूल फ़रमाते जो व्यक्ति औसत सीमा के अन्दर रहता। किसी की बात के दौरान बात न करते और उसकी बात कभी न काटते हाँ, अगर वह हद से बढ़ने लगता तो उसको रोक देते या मजलिस से उठकर उसकी बात ख़त्म कर देते।

आप सबसे अधिक उदार, रहमदिल, सच्चे, नर्म तबीयत और व्यवहारिक जीवन में बहुत ही दयालु थे। जो आपको पहली बार देखता उस पर आपका रोब छा जाता लेकिन जब आपके सत्संग में रहता और जान पहचान हासिल होती तो वह आपका दिलदादा (गुणगान करना) हो जाता आप का यश वर्णन करने वाला कहता है कि न आपसे पहले मैंने आप जैसा कोई व्यक्ति देखा न आप के बाद।”3

अल्लाह ने अपने नबी सल्ल० को बहुत ही मनमोहक व्यक्तित्व प्रदान किया था। हिन्द बिन अबी हाला बयान करते हैं, “आप बहुत ख़ुद्दार (स्वाभिमानी) और शान व शौकत वाले थे और दूसरों की निगाह में बहुत ही रोबीले। आपका मुखड़ा चौदहवीं के चाँद की तरह दमकता था।”

बरा बिन आज़िब बयान फ़रमाते हैं:

“अल्लाह के रसूल सल्ल० मियाना कद थे। मैंने आपको एक बार लाल लबादा पहने हुए देखा, उससे अच्छी कोई चीज़ मैंने कभी नहीं देखी।”

हज़रत अबू हुरैरा रज़ि० बयान करते हैं।

“आप मियाना कद थे, कुछ लम्बाई लिए हुए। रंग बहुत गोरा, दाढ़ी के बाल काले, मुँह बहुत सुडौल और सुन्दर, आँखों की पलकें लम्बी, चौड़ा कन्धा। मैंने आप जैसा आप सल्ल० के पहले या आप सल्ल० के बाद कभी नहीं देखा।”

हज़रत अनस रज़ि० बयान करते हैं कि

“मैंने हरीर व दीबाज (मख़मल) को भी आपके हाथ से अधिक नर्म नहीं पाया, न आपकी ख़ुशबू से बढ़कर कोई ख़ुशबू सूँघी।”

अल्लाह से लगाव

यद्यपि अल्लाह ने आपको अपना बहुत ही प्यारा रसूल बनाकर भेजा था और आपके अगले पिछले सब गुनाह माफ़ कर दिए थे, फिर भी आप इबादत में सबसे ज़्यादा लगे रहते और उसके सबसे अधिक इच्छुक थे।

मुग़ीरा बिन शोबा कहते हैं, “एक बार अल्लाह के रसूल सल्ल० नमाज़ (नफ़्ल) में इतनी देर तक खड़े रहे कि आपके पैरों में सूजन आ गई। लोगों ने कहा कि आपके तो पिछले गुनाह माफ़़ हो चुके हैं। यह सुनकर आपने फ़रमाया, “क्या मैं अल्लाह का शुक्रगुज़ार (कृतज्ञ) बन्दा न बनूँ।”

हज़रत आइशा रज़ि० फ़रमाती हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने क़ुरआन पाक की एक आयत (पढ़ने में) में पूरी रात गुज़ार दी।” हज़रत अबू ज़र बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० नमाज़ के लिए खड़े हुए और एक आयत में सुबह कर दी।” यह सूरः मायदा की 118 वीं आयत थी जिसका अनुवाद इस तरह है।

हज़रत आइशा बयान करती हैं, “आप जब रोज़े रखते थे, उसकी अधिकता देखकर हम लोग कहते कि अब शायद आप हमेशा रोज़ा ही से रहेंगे, जब रोज़ा से न होते तो हम सोचते कि शायद अब आप रोज़ा न रखेंगे।”

हज़रत अनस बयान करते हैं, “अगर कोई आपको रात के क़याम (नमाज़) की एक स्थिति में व्यस्त देखना चाहता तो देख सकता था, और इसी तरह नींद की हालत में देखना चाहता तो भी देख सकता था।”

अब्दुल्लाह बिन अश-शिख़्ख़ीर कहते हैं, “मैं आपके पास गया, मैंने देखा कि आप नमाज़ में व्यस्त हैं, और आह भरने से आपके सीने से ऐसी आवाज़ निकल रही है जैसे डेगची उबल रही हो।” आपको नमाज़ के सिवा किसी और चीज़ से तसल्ली न होती थी, और मालूम होता था कि नमाज़ के बाद भी आप नमाज़ के इन्तिज़ार में हैं। आप फ़रमाते थे, “मेरी आँखों की ठंडक नमाज़ में रखी गई है।”

आपके साथियों, सहाबा का बयान है, “जब कभी रात को तेज़ हवाएं चलतीं तो आप मस्जिद में पनाह लेते यहां तक कि हवा थम जाती। अगर आसमान में कोई बदलाव होता जैसे सूरज ग्रहण, चाँद ग्रहण, तो आप नमाज़ पढ़ते और उससे पनाह हासिल करते यहां तक कि ग्रहण ख़त्म हो जाता। “आप नमाज़ के लिए हर वक़्त इन्तिज़ार में रहते और इसके बिना आपको चैन नहीं मिलता, और जब तक नमाज़ पढ़ न लेते आपकी बेचैनी बनी रहती। कभी आप हज़रत बिलाल से फ़रमाते,” बिलाल नमाज़ का बंदोबस्त करो, हमारे सुकून का सामान करो।”

मायाजाल से दूर

जहाँ तक दिरहम, दीनार और धन दौलत का सवाल है, शब्दों के बड़े से बड़ा कोष और उच्चकोटि की वर्णन शैली भी आपकी निगाह में उस की सही हैसियत को पूरी तरह बयान नहीं कर सकती। क्योंकि आपके ईमानी मदरसे के बोरियानशीं (बोरी पर बैठने वाले) अरब तथा अरब के बाहर उनके शागिर्दों के शागिर्द भी दिरहम व दीनार को मिट्टी के ठीकरों से अधिक नहीं समझते थे। उनकी भक्ति, मायाजाल से उनकी दूरी, दूसरों पर अपना माल ख़र्च करने का उनका शौक और आत्म सन्तोष की जो बातें इतिहास के पन्नों में सुरक्षित हैं उनसे इन्सानी अक्ल हैरान रह जाती है। जब आपके सेवकों का यह हाल है तो ख़ुद आप सल्ल० का इस बारे में क्या हाल होगा, जो उनके शिक्षक और पथ प्रदर्शक थे।

इसलिए हम उन कुछ बातों का उल्लेख यहां करते हैं जो आपके साथियों की ज़बान से हम तक पहुंची हैं।

आप सल्ल० के दो मशहूर कथन, जिन्हें आप की पूरी ज़िंदगी का केन्द्र बिन्दु व धुरी कहा जा सकता है और जिस पर आप सल्ल० हमेशा अमल करते थे, का अनुवाद इस तरह है।

(1) ऐ अल्लाह! असल ज़िंदगी तो आख़िरत (परलोक) की ज़िंदगी है।

(2) मुझे दुनिया से क्या सरोकार। मेरा दुनिया से वास्ता (सम्बन्ध) इतना ही है जैसे कोई मुसाफ़िर राह में थोड़ी देर के लिए किसी पेड़ की छाया में दम ले ले फिर अपनी राह ले और उसको छोड़कर चल दे।

हज़रत उमर रज़ि० ने आपको एक बार चटाई पर इस हालत में लेटे हुए देखा कि आपके पहलू में उसके निशान पड़ गए थे यह देखकर उनकी आँखों में आंसू भर आए। आपने पूछा, “क्या बात है?” हज़रत उमर ने कहा, “या रसूलल्लाह! आप अल्लाह की कुदरत में सबसे प्यारे हैं, और ऐश व आराम क़ैसर व किसरा कर रहे हैं।” यह सुनकर आप सल्ल० का चेहरा लाल हो गया और आपने फ़रमाया, “इब्नुल ख़त्ताब! क्या तुम्हें कुछ शक है।” फिर फ़रमाया, “यह वह लोग हैं जिनको दुनिया की ज़िंदगी में सारे मज़े दे दिए गए हैं।” आराम की ज़िंदगी न सिर्फ़ आप अपने लिए नापसन्द फ़रमाते थे बल्कि अपने परिवार के लिए भी इसे पसन्द न करते थे। आपकी दुआ थी, “ऐ अल्लाह! मुहम्मद के परिवार का रिज़्क़ (खाना-पीना) बस ज़रूरत भर हो।” हज़रत अबू हुरैरा रज़ि० बयान करते हैं, “क़सम उसकी जिसके कब्ज़े में अबू हुरैरा की जान है, अल्लाह के नबी और उनके घर वाले कभी लगातार तीन दिन गेहूं की रोटी पेट भर कर न खा सके, यहाँ तक कि इस दुनिया से पर्दा फ़रमा लिया।”

हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं, “हम मुहम्मद सल्ल० के घर वालों को एक चाँद गुज़र कर दूसरा चाँद नज़र आ जाता और हमारे घर में चूल्हा न जलता, सिर्फ़ खजूर और पानी पर हमारी गुज़र बसर होती थी।”

आपकी ज़िरह एक यहूदी के पास गिरवी रखी थी और आपके पास इतना धन न था कि आप उसको छुड़ा सकते, यहां तक इसी हाल में आपकी वफ़ात हो गई।

आपने हज्जतुल विदा इस हाल में किया कि जहां तक नज़र पहुंचती मुसलमान नज़र आ रहे थे। पूरा अरब प्रायद्वीप आपके अधीन था, और हालत यह थी कि आप एक खस्ता हाल कुजावा (फटी पुरानी गद्दी) पर थे, आप सल्ल० पर सिर्फ़ एक चादर पड़ी हुई थी जिसकी मालियत चार दिरहम से अधिक न थी, उस समय आपने फ़रमाया, ‘ऐ अल्लाह! इसको ऐसा हज बना जिसमें कोई रिया दिखावा और शोहरत तलबी (ख्याति की इच्छा) न हो।’

हज़रत अबू ज़र से आपने एक मौक़े पर फ़रमाया, “मुझे यह पसंद नहीं कि मेरे पास उहद पहाड़ के बराबर सोना हो और तीन दिन गुज़र जाएं और उसमें से एक दीनार भी मेरे पास बाक़ी रहे, सिवाय इसके कि किसी दीनी काम के लिए मैं उसमें से कुछ बचा रखूं वरना, अल्लाह के बन्दों में मैं उसको इस तरह दाएं बाएं और पीछे लुटा दूं।”

जाबिर बिन अब्दुल्लाह बयान करते हैं, “कभी ऐसा नहीं हुआ कि अल्लाह के रसूल सल्ल० से किसी चीज़ का सवाल किया गया हो और आप सल्ल० ने उसके जवाब में नहीं, कहा हो।” इब्न अब्बास कहते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० फ़य्याज़ी (उदारता) और दान देने में तेज़ हवा से अधिक तेज़ थे।”

हज़रत अनस रज़ि० बयान करते हैं, “एक व्यक्ति ने आपसे कुछ सवाल किया तो आपने उसे बकरियों-भेड़ों का पूरा झुंड जो दो पहाड़ों के बीच था दे दिया। वह यह सब बकरियां लेकर अपनी क़ौम में वापस गया और कहने लगा, “(लोगो!) इस्लाम ले आओ। मुहम्मद (सल्ल०) इस तरह बांट रहे हैं कि जैसे उनको भुखमरी का डर ही न हो।” एक बार आपकी सेवा में 90 हज़ार दिरहम पेश किए गए। यह धन एक चटाई पर डाल दिया गया और आप सल्ल० ने खड़े होकर बांटना शुरू किया, और किसी सवाल करने वाले को आप सल्ल० ने वापस न किया यहां तक कि सारा ढेर ख़त्म हो गया।”

सामान्य जीवन

लेकिन भक्ति की इस गूढ़ भावना, दुनिया के मायाजाल से दूरी तथा अल्लाह की हर वक़्त याद की वजह, आपके सरस स्वभाव सदाचरण शफ़क़त व दिलदारी और हर आदमी को उसका हक़ देने और उसके पद व हैसियत के अनुसार बर्ताव करने में कोई फ़र्क़ न आया था और यह दोनों बातें ऐसी हैं कि इनको इस तरह जमा करना किसी दूसरे के लिए नामुमकिन है। आप फ़रमाते थे, “जो मैं जानता हूँ वह अगर तुम जान लेते तो बहुत कम हंसते और बहुत ज़्यादा रोते।”

आप तमाम लोगों में सबसे अधिक उदार नर्म तबीयत और ख़ानदानी तौर पर सबसे अधिक श्रद्धा के लायक थे। आप अपने साथियों से अलग थलग न रहते बल्कि उनसे पूरा मेल जोल रखते थे, उनसे बातें करते, उनके बच्चों के साथ ख़ुशी-ख़ुशी मिलते-जुलते, उनको गोद में बिठाते, ग़ुलाम और आज़ाद बन्दी, ग़रीब और कंगाल सबकी दावत क़बूल फ़रमाते। बीमारों की ख़ैरियत पूछने जाते चाहे वह शहर के आख़िर किनारे पर ही क्यों न हो, मजबूरी बताने वालों की मजबूरी समझते उसे मानते। आप सल्ल० को अपने साथियों की मजलिस में कभी पैर फैलाए हुए नहीं देखा गया। ताकि उसकी वजह से किसी को परेशानी हो।

अब्दुल्लाह बिन अल-हारिस बयान करते हैं, “मैंने अल्लाह के रसूल सल्ल० से अधिक हँसमुख किसी को नहीं देखा।” जाबिर बिन समुरा कहते हैं, “मुझे अल्लाह के रसूल सल्ल० की मजलिस में सौ बार से अधिक बैठने का मौक़ा मिला, मैंने देखा कि आपके साथी एक दूसरे से शेर सुन रहे हैं और सुना रहे हैं, और अज्ञानता के दौर की कुछ बातों तथा घटनाओं का ज़िक्र कर रहे हैं और अल्लाह के रसूल सल्ल० चुप हैं। या कभी कोई हँसी की बात होती तो उनके साथ आप सल्ल० भी मुस्कुराते।”

शरीद रज़ि० बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मुझसे उमय्या बिन अबिस्सल्त के शेर सुनने की फ़रमाइश की, इस लिए मैंने आप सल्ल० को उसके शेर सुनाएं।”

आप बहुत ही नर्म दिल, मुहब्बत करने वाले और रहम करने वाले थे। इंसानी दिलचस्पी तथा भावनाओं का आपके चरित्र में बहुत सुन्दर समावेश था। अनस बिन मालिक बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० अपनी बेटी हज़रत फ़ातिमा से फ़रमाते, ‘मेरे दोनों बेटों (हसन-हुसैन) को बुलाओ। वह दौड़े हुए आते आप उन दोनों से मुँह मिलाते और उनको अपने सीने से लगा लेते।’” आप सल्ल० ने एक बार अपने (बड़े) नवासे हज़रत हसन रज़ि० को बुलाया, वह दौड़ते हुए आए और आप सल्ल० की गोद में गिर पड़े, फिर आपकी दाढ़ी में अपनी उंगलियां डालने लगे इसके बाद आपने अपना मुँह खोल दिया और वह अपना मुँह आपके मुँह में डालने लगे।

हज़रत आइशा रज़ि० फ़रमाती हैं, “ज़ैद बिन हारिसा (जो आपके ग़ुलाम थे) मदीना आए, उस समय आप घर पर थे। वह घर पर आए और कुण्डी खटखटाई। आप उसी समय उठ खड़े हुए। आप उस समय पूरे कपड़े न पहने थे चादर बदन से गिरी जा रही थी। ज़ैद को देखते ही आपने गले से लगा लिया और उन्हें चूम लिया।

उसामा बिन ज़ैद बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० की एक बेटी ने आपको यह पैग़ाम कहलवाया कि मेरे बच्चे की आख़िरी साँसें चल रही हैं, आप जल्दी आएं। आपने उनको सलाम कहलवाया और फ़रमाया कि अल्लाह ही के लिए हैं, जो उसने लिया, और उसी के लिए है जो उसने दिया। हर चीज़ उसके यहां नामज़द और मुकर्रर है। बस चाहिए कि सब्र से काम लें और अज्र (बदले) व सवाब की नीयत और उम्मीद रखें। उन्होंने आपको क़सम दिलाई कि आप ज़रूर आएं। आप खड़े हुए और हम आपके साथ थे। आप वहाँ पहुंचे तो बच्चा गोद में आप सल्ल० के पास लाया गया आपने उसे अपनी गोद में लिया। उस वक़्त उसकी साँस उखड़ चुकी थी। आप की आँखों से आंसू जारी हो गए। साद ने कहा, ‘या रसूलल्लाह! यह क्या है?’ आपने फ़रमाया, ‘यह रहम है, जो अल्लाह अपने बन्दों में से जिसके दिल में चाहता है डाल देता है, और बेशक अल्लाह अपने रहमदिल बन्दों ही पर रहम फ़रमाता है।’” जब बद्र के क़ैदियों के साथ हज़रत अब्बास को बांधा गया तो उनकी कराह सुनकर आपको नींद नहीं आई। जब अन्सार को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने उनका बन्धन खोल दिया, लेकिन अन्सार की यह बात आपको इस बात पर राज़ी न कर सकी कि उनके कहने पर हज़रत अब्बास का फ़िदिया (एक तरह का टैक्स) छोड़ दिया जाए।

एक आराबी (बद्दू) अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास आया और कहने लगा, “क्या आप लोग अपने बच्चों को प्यार करते हैं, हम तो उनको प्यार नहीं करते।” आपने फ़रमाया, “अगर अल्लाह ने तुम्हारे दिल से रहम निकाल लिया हो तो मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ।”

आप बच्चों को बहुत प्यार करते थे, और उनसे बड़ी नर्मी का बर्ताव करते थे। हज़रत अनस बयान करते हैं, “आपका गुज़र कुछ खेलते हुए बच्चों के पास से हुआ, आपने उनको सलाम किया।” वह कहते हैं, “आप हममें घुले मिले रहते थे, मेरे एक छोटे भाई से आप फ़रमाते, अबू उमैर! तुम्हारी छोटी चिड़िया क्या हुई?”

मुसलमानों पर आप बहुत मेहरबान थे और उनके हाल पर बहुत मुरव्वत फ़रमाते थे। इंसान के स्वभाव में जो उक्ताहट और पल दो पल का ठहराव पैदा होता रहता है उसका बराबर ख़याल रखते थे।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० हमको जो नसीहत फ़रमाते थे, वह ठहराव के साथ होती थी, इस ख़याल से कि कहीं हमारे अन्दर उक्ताहट न पैदा होने लगे। नमाज़ से इतना ज़्यादा लगाव होने के बावजूद आप सल्ल० अगर किसी बच्चे का रोना सुन लेते तो नमाज़ छोटी कर देते। आपने ख़ुद इरशाद फ़रमाया, “मैं नमाज़ के लिए खड़ा होता हूँ और चाहता हूँ कि लम्बी नमाज़ पढूँ मगर किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनता हूँ तो इस ख़याल से नमाज़ छोटी कर देता हूँ कि उसकी माँ को दुश्वारी और तकलीफ़ न हो।” वह कहते हैं, ‘एक व्यक्ति ने निवेदन किया- ‘या रसूलल्लाह! अल्लाह की क़सम मैं सुबह की नमाज़ में इसलिए नहीं पहुँचता कि अमुक साहब बहुत लम्बी नमाज़ पढ़ाते हैं।’ इसके बाद आप सल्ल० ने जो नसीहत फ़रमाई, उससे ज़्यादा ग़ुस्से की हालत में मैंने किसी और नसीहत के वक़्त नहीं देखा।” आपने फ़रमाया,” तुममें वह लोग हैं जो लोगों में आतंक और डर व बेज़ारी पैदा करते हैं। तुम में से जो नमाज़ पढ़ाए उसको चाहिए कि छोटी पढ़े, इसलिए कि नमाज़ियों में कमज़ोर भी होते हैं, बूढ़े भी और ज़रूरत वाले भी।”

अंजशा जो औरतों के क़ाफ़िले के हुदीख़्वाँ (गायक) थे, की आवाज़ बड़ी सुरीली थी। उनकी आवाज़ से ऊंट बहुत तेज़ी के साथ चलते थे औरतों को इससे परेशानी होती थी। यह देखकर आप सल्ल० ने फ़रमाया, “अंजशा! ज़रा आहिस्ता! इस तेज़ रफ़्तारी से आबगीनों (कमज़ोर व नाज़ुक लोग) को कहीं तकलीफ़ न पहुंच जाए?”

आप सल्ल० मुसलमानों के हक़ में शफ़ीक़ (प्यारे) पिता की तरह थे और सभी मुसलमान आपके सामने इस तरह थे जैसे आपके परिवार के सदस्य। आप सल्ल० को उनसे ऐसा लगाव था जैसे माँ को अपने गोद के बच्चे से होता है। मुसलमानों के माल व दौलत से तो आपको कोई सरोकार न था, लेकिन उनके क़र्ज़ों को हल्का करना आपने अपने ज़िम्मे लिया था। आप फ़रमाते, “जिसने (अपने पीछे) उत्तराधिकार में माल छोड़ा वह उसके वारिसों का और कुछ क़र्ज़ा आदि बाक़ी है तो वह हमारे ज़िम्मे।” एक और जगह आप सल्ल० ने फ़रमाया, “कोई मोमिन ऐसा नहीं, जिसका मुझसे ज़्यादा दुनिया व आख़िरत में कोई वली (ज़िम्मेदार) हो, अगर चाहो तो यह आयत पढ़ो।”

इसलिए जिस मुसलमान का इन्तिकाल हो और वह कुछ माल छोड़े तो वह उसके क़रीबी रिश्तेदारों का हक़ है, वह जो भी हों, अगर उसके ज़िम्मे कुछ क़र्ज़ और ज़मीन जायदाद रह जाए तो मेरे पास आए उसका ज़िम्मेदार मैं हूँ।

सम तथा सुरुचि स्वभाव

आपके आला किरदार (उच्च आचरण) में पैदाइशी व स्वाभाविक गुणों का जो समावेश था वह मौजूदा और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक नमूना है। आप सल्ल० का स्वभाव सम तथा सुरुचिपूर्ण, सन्तुलित तथा हर तरह से मुकम्मल था और उसमें गैर ज़रूरी दिखावा और भराव न था। हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० को जब दो कामों में किसी एक को प्राथमिकता देनी होती तो हमेशा उसे प्राथमिकता देते जो ज़्यादा आसान होता। लेकिन शर्तें यह कि इसमें गुनाह शक न हो, अगर ऐसा करने में गुनाह होता तो आप उस काम से सबसे ज़्यादा दूर होते।”

हज़रत अबू हुरैरा रज़ि० बयान करते हैं, कि आपने फ़रमाया, “दीन आसान है, और जो भी दीन से ज़ोर आजमाई करेगा, दीन उसे दबोच लेगा। इसलिए बीच का रास्ता अपनाओ, क़रीब के पहलुओं की मुरव्वत करो, ख़ुश रहो और सुबह-शाम तथा किसी क़द्र रात की इबादत से बल हासिल करो।”

आपने फ़रमाया, “ठहरो, इतना ही करो जितना करने की तुम्हारे अन्दर ताक़त हो, क्योंकि अल्लाह की क़सम अल्लाह पाक तो नहीं थकेगा, तुम ही थक जाओगे।” इब्न अब्बास बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० से पूछा गया कि अल्लाह को कौन सा दीन सबसे अधिक प्यारा है?” आपने फ़रमाया, “सहूलत व खुलूस (सत्य निष्ठा) वाला दीन-ए-इब्राहीमी।”

अब्दुल्लाह बिन मसऊद बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, ‘बढ़ा-चढ़ा कर और सख़्ती से काम लेने वाले और बाल की खाल निकालने वाले बर्बाद हुए।’”

आप अपने साथियों को किसी जगह शिक्षा या नसीहत के लिए भेजते तो फ़रमाते, “आसानी पैदा करना, तंगी न करना, ख़ुशख़बरी देना, परेशान न करना। अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन अल-आस बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, ‘अल्लाह इस बात को पसन्द करता है कि अपनी नेमत (वरदान) का निशान अपने बन्दे पर देखे।’”4

बाल बच्चों के साथ

हज़रत मुहम्मद सल्ल० अपने घर में आम इन्सानों की तरह रहते थे। हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं, “आप अपने कपड़ों को भी साफ़़ फ़रमाते थे। बकरी का दूध भी ख़ुद दुह लेते थे, और अपना काम ख़ुद करते थे। अपने कपड़ों में पैवन्द लगा लेते थे, जूता गांठ लेते थे और इस तरह के अन्य काम करते थे।” हज़रत आइशा रज़ि० से पूछा गया, कि आप सल्ल० अपने घर में किस तरह रहते थे?” उन्होंने जवाब दिया, “आप सल्ल० घर के काम काज में रहते थे, जब नमाज़ का वक़्त आता तो नमाज़ के लिए बाहर चले जाते।”

एक बयान में आया है, “आप सल्ल० अपनी जूती टांक लेते थे, कपड़ा सी लेते थे, जैसा तुम में से कोई अपने घर में करता है।”

हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं, “आप तमाम लोगों में सबसे ज़्यादा नर्म थे और सबसे अधिक दया करने वाले थे, और प्रसन्नचित्त रहते थे।”

हज़रत अनस रज़ि० बयान करते हैं, “मैंने किसी आदमी को नहीं देखा जो अल्लाह के रसूल सल्ल० से ज़्यादा अपने बाल बच्चों पर शफ़ीक़ व रहीम हो।” हज़रत आइशा रज़ि० बयान करती हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, ‘तुममें से सबसे बेहतर वह है जो अपने बाल बच्चों के लिए सबसे बेहतर हो, और मैं अपने बाल-बच्चों के मामले में तुम सबसे बेहतर हूँ।’” हज़रत अबू हुरैरा रज़ि० कहते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने किसी खाने में कभी कोई ऐब नहीं निकाला, अगर इच्छा हुई तो खाते थे, नापसन्द हुआ तो छोड़ दिया।”

बिना लालच काम

अपने घर वालों तथा सगे सम्बन्धियों के साथ जो आपसे जितना क़रीब होता, आप सल्ल० हमेशा उस से वैसा बर्ताव करते। आप सल्ल० ख़तरों और इम्तिहान में उसे उतना ही आगे रखते और इनाम व माले ग़नीमत बाँटते वक़्त उतना ही पीछे रखते। जब उत्बा, शैबा और वलीद ने एक मौक़े पर कुरैश को ललकारा तो आप सल्ल० ने हमज़ा, अली और उबैदा को आवाज़ दी और उनके मुक़ाबले पर भेजा, हालांकि मुहाजिरों में अनेक ऐसे वीर बहादुर घुड़सवार मौजूद थे जो उनसे दो-दो हाथ कर सकते थे। बनी हाशिम के यह तीनों लोग ख़ून और रिश्ते में आप सल्ल० से सबसे क़रीब थे और आपको सबसे प्यारे भी थे, लेकिन आप सल्ल० ने उनको इस ख़तरे से बचाने के लिए दूसरों को ख़तरे में नहीं डाला और उन्हीं को मुक़ाबले के लिए भेजा। अल्लाह ने उनको अपने दुश्मनों पर कामयाबी प्रदान की। हज़रत हमज़ा और अली कामयाब होकर वापस हुए हज़रत उबैदा को ज़ख़्मी हालत में वापस लाया गया।

आपने जब सूद को हराम और जाहिलियत के खून को ख़त्म करने का ऐलान किया तो शुरुआत अपने चाचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब और अपने भाँजे रबिया बिन अल हारिस बिन अब्दुल मुत्तलिब से की। हज्जतुल विदा के मौक़े पर आपने फ़रमाया, “अज्ञानता के युग का ब्याज़ आज से ख़त्म है और पहला ब्याज़ जो मैं ख़त्म करता हूँ वह हमारे यहां अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब का ब्याज़ है। अज्ञानता के युग का ख़ून भी ख़त्म है और सबसे पहला हमारे यहां का ही रबिया बिन अल हारिस का ख़ून है।

राहत व आराम इनाम व सम्मान के समय आप आम बादशाहों, प्रशासकों या राजनीतिज्ञों के रवैये व आदत के विपरीत इन लोगों को हमेशा पीछे रखते थे और दूसरों को प्राथमिकता देते थे, हज़रत अली बयान करते हैं, “फ़ातिमा को चक्की पीसने में कठिनाई होती थी। उन्हीं दिनों उनको पता चला कि अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास कुछ बन्दियां आई हैं। फ़ातिमा आप सल्ल० के पास गईं और निवेदन किया कि उनको भी उनमें से सेवा और मदद के लिए कोई बन्दी मिल जाए, लेकिन आपने उनका निवेदन स्वीकार नहीं किया। हज़रत फ़ातिमा ने हज़रत आइशा रज़ि० से इसका ज़िक्र किया। उन्होंने आप सल्ल० से कहा, इस लिए अल्लाह के रसूल सल्ल० हमारे घर आए, उस वक़्त हम सोने के लिए लेट चुके थे, आप सल्ल० को देखकर हम खड़े होने लगे। आपने फ़रमाया, “रुके रहो, क्या मैं तुमको इससे बेहतर बात न बताऊँ जिसका तुमने सवाल किया था, जब तुम सोने के लिए लेटो तो 34 बार “अल्लाहु-अकबर” कहो, 33 बार “अल्हम्दुलिल्लाह” और 33 बार “सुब्हानल्लाह” कहो। यह तुम्हारे लिए उससे बेहतर है जिसका सवाल तुम लोगों ने मुझसे किया है।”

एक दूसरी जगह की बात है कि आपने फ़रमाया, “अल्लाह की क़सम इस हालत में कि सुफ़्फ़ा वासियों के पेट भूख की वजह से पीठ से लग गए हैं, मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सकता, मेरे पास उन पर ख़र्च करने के लिए कुछ नहीं है, इनको बेचकर मैं इस आमदनी को उन पर ख़र्च करूंगा।”

उच्च एवं पवित्र अनुभूतियां

आपकी सीरत में नुबूवत और हक़ की दावत के काम, इंसानियत की पीड़ा और उन लगातार चिन्ताओं के भारी बोझ के साथ जिनको बर्दाश्त करना पहाड़ों के लिए भी आसान न था, पाक इंसानी जज़्बे और पाक विचार पूरी चमक-दमक के साथ हमेशा बहादुरी की किरणें बिखेरते थे। उस असाधारण मनोबल, अडिग मक़सद के साथ जो नबियों की सदा ख़ास पहचान व विशेषता होती है, और जो लोगों को अल्लाह की तरफ़़ बुलाने तथा अल्लाह का नाम ऊंचा रखने की राह और उसके आदेशों के पूरा करने में किसी चीज़ को रुकावट नहीं बनने देती और किसी बात को ख़ातिर में नहीं लाती, आप सल्ल० ने अपने उन वफ़ादार साथियों को अपनी ज़िंदगी के आख़िरी पलों तक नहीं भुलाया जिन्होंने आपके बुलावे पर आप सल्ल० का साथ दिया था और सच्चाई की राह में अपना सब कुछ लुटा दिया था। आप उनको बराबर याद करते रहे, उनके लिए दुआएं करते रहे और उनके यहां जाते रहे।

आपका यह प्यार व लगाव लोगों से परे उन बेजान पत्थरों, पहाड़ों और घाटियों से भी था जहां क़ुर्बानी और बलिदान की यह बातें हुई थीं। आप सल्ल० के साथी बयान करते है कि आपने उहद पहाड़ को देखकर कहा, “यह वह पहाड़ है जो हमसे मुहब्बत करता है और हम इससे मुहब्बत करते हैं।” अबू हुमैद कहते हैं, “हम रसूलल्लाह सल्ल० के साथ तबूक की जंग से वापस आ रहे थे, जब मदीना क़रीब आया तो आपने फ़रमाया, ‘यह ताबा (मदीना तय्यिबा) है और हम इससे मुहब्बत करते हैं।’” अनस बिन मालिक बयान करते हैं कि आपकी निगाह जब उहद पहाड़ पर पड़ी तो आपने फ़रमाया, “यह वह पहाड़ है जो हमसे मुहब्बत करता और हम इससे मुहब्बत करते हैं।”

उक़बा का बयान है, “अल्लाह के रसूल सल्ल० एक दिन उहद के उस स्थान पर गए जहां अनेक लोग शहीद हुए थे और आपने उनकी मग़फ़िरत (मोक्ष) के लिए दुआ की।” जाबिर बिन अब्दुल्लाह कहते हैं कि मैंने देखा कि जब अल्लाह के रसूल सल्ल० के सामने उहद में शहीद होने वालों का ज़िक्र किया गया तो आपने फ़रमाया, “अल्लाह की क़सम मेरी इच्छा थी कि मैं भी उहद के शहीदों के साथ उहद पहाड़ के दामन में रह जाता।” आप सल्ल० ने अपने प्यारे चाचा और दूध शरीक भाई की शहादत का सदमा बर्दाश्त किया, लेकिन जब आप उहद से वापस होते हुए मदीना आए और बनी अब्दुल अशहल के घर के सामने से गुज़रे और उनके शहीदों पर रोने की आवाज़ आपके कानों में आई तो इस घटना ने आपके अन्तःकरण को झिंझोड़ दिया और आप सल्ल० की आँखों से आंसू गिरने लगे। आपने फ़रमाया, “लेकिन हमज़ा के लिए रोने वालियां नहीं हैं।”

लेकिन यह अनुराग और जज़्बात कभी भी नुबूवत और इस्लाम की दावत देने की ज़िम्मेदारियों की राह में रुकावट नहीं बने और न ही आप सल्ल० ने उन्हें हुदूद-ए-इलाही (Divine injunctions) पर उनका असर पड़ने दिया। आप सल्ल० की सीरत (जीवनी) लिखने वालों और इतिहासकारों के अनुसार, “जब साद बिन मुआज़ और उसैद बिन हुज़ैर बनी अब्दुल अशहल के घर वापस आए तो उन्होंने अपने घर की औरतों को हुक्म दिया कि तैयार हो कर जाएं और अल्लाह के रसूल सल्ल० के चाचा सैयदना हज़रत हमज़ा का मातम करें। उन औरतों ने ऐसा ही किया। अल्लाह के रसूल सल्ल० जब आए तो आप सल्ल० ने उन्हें मस्जिद-ए-नबवी के दरवाज़े पर रोते हुए पाया। आपने फ़रमाया, “अल्लाह तुम पर रहम फ़रमाए, वापस जाओ, तुम्हारे यहां आने से ही मेरी तसल्ली हो गई।” एक जगह यह भी आता है, “आपने पूछा कि यह सब क्या है? आपको बताया गया कि अन्सार ने अपनी औरतों को किस मक़सद से यहां भेजा है। आपने अल्लाह से मग़फ़िरत मांगी, अच्छे शब्दों से उनको सम्बोधित किया और फ़रमाया, “मेरा मतलब यह नहीं था, मैं मैय्यत (शव) पर रोनापसन्द नहीं करता।” फिर आपने इसे मना फ़रमाया।

इससे नाज़ुक मौक़ा सैयदना हमज़ा के क़ातिल वहशी के साथ पेश आया। जब मुसलमानों ने मक्का पर कामयाबी हासिल की तो वहशी के लिए स्वाभाविक रूप से कठिनाइयां पैदा हो गई। वहशी ने वहां से निकल जाने का इरादा किया, उन्हें लोगों ने समझाया, ‘भले आदमी! अल्लाह के रसूल सल्ल० किसी ऐसे आदमी को क़त्ल नहीं करते जो उनके दीन में दाखिल हो जाए। वहशी की समझ में यह बात आ गई और वह मुसलमान हो गए। मुसलमान होने के बाद जब वह पहली बार आपके पास आए तो आपने उनका सलाम स्वीकार किया और कोई ऐसी बात नहीं कही जिससे उनके दिल में डर हो। आपने उनसे हज़रत हमज़ा के क़त्ल की घटना सुनी। इसे सुनकर आपके अन्दर सैयदना हज़रत हमज़ा के लिए अनुराग की भावना ज़रूर जाग गई, लेकिन यह हालत आपके नुबूवत के पद और ज़िम्मेदारी के अहसास पर छाने नहीं पाई, कि आप उनका सलाम क़बूल नहीं करते या ग़ुस्से में उनको क़त्ल करवा देते। आप सल्ल० ने इसके अलावा कुछ न फ़रमाया, “अल्लाह के बन्दे! मेरे सामने न आना। मैं चाहता हूँ कि मेरी नज़र तुम पर न पड़े।” वहशी कहते हैं कि उसके बाद मैं बराबर आपके सामने आने से कतराता रहा कि कहीं आप मुझे देख न लें। यहां तक कि आपका आख़िरी वक़्त आ गया। बुख़ारी शरीफ़ में है कि “आपकी नज़र जब मुझ पर पड़ी तो आपने फ़रमाया,” क्या तुम वहशी हो? मैंने कहा, ‘हाँ।’ पूछा ‘क्या तुम्हीं ने हमज़ा का क़त्ल किया था?’ मैंने कहा, ‘आपने जो सुना वह सही है।’ आपने कहा, ‘ क्या तुम यह कर सकते हो कि मेरे सामने न आया करो।’

आप एक बार एक मिटी हुई क़ब्र पर गए आपका दिल भर आया और आप रो दिए। फिर आपने फ़रमाया, “यह आमिना की क़ब्र है।”

दया और सहिष्णुता (तहम्मुल)

अल्लाह के रसूल सल्ल० सदव्यवहार, दया, स्वागत, सत्कार, सहिष्णुता और रहमदिली में पूरी इंसानियत के इमाम हैं। अल्लाह पाक क़ुरआन पाक में इरशाद फ़रमाता है:

अल्लाह के रसूल सल्ल० का इरशाद है: “मेरी तरबियत (पालन-पोषण) अल्लाह पाक ने फ़रमाई है, और बेहतरीन फ़रमाई है।”

हज़रत जाबिर बयान करते हैं कि आपने फ़रमाया, “अल्लाह ने मुझे सद् आचरण तथा नैतिक मूल्यों को पूरा करने के लिए पैदा किया है।”

हज़रत आइशा रज़ि० से आपके चरित्र के बारे में पूछा गया। उन्होंने कहा, “आप अख़लाक़ में क़ुरआन का मुजस्सम (साक्षात) नमूना थे।” माफ़ी, सहिष्णुता, सब्र व रहमदिली में आपका जो स्थान था वहां तक कल्पना की उड़ान भी मुमकिन नहीं है, अगर इन घटनाओं को इस विशेष तरीके से बयान न किया गया होता जिसमें किसी शक व शंका की गुंजाइश नहीं, तो लोग आज इसको क़बूल न करते, लेकिन यह बातें इतने सही, प्रमाणिक और एक सच्चे बयान कर्ता से दूसरे सच्चे व न्याय प्रिय बयानकर्ता तक इस सिलसिले के साथ बयान की गई हैं और इनमें इतना तवातुर (परिपुष्टि) पाया जाता है कि इस वजह से वह बहुत ही विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेजों से कहीं ज़्यादा यकीन के क़ाबिल है।

आपकी दया दृष्टि और बड़े से बड़े दुश्मन के साथ एहसान का एक नमूना वह था जब मुनाफ़िकों के सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई को क़ब्र में उतारा गया। आप वहां आए। हुक्म दिया कि उसको क़ब्र से निकाला जाए। इसके बाद आपने उसको अपने घुटनों पर रखा और अपना थूक उस पर डाला और अपनी कमीज़ उसको पहनाई।

अनस बिन मालिक बयान करते हैं, “मैं अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ चल रहा था। उस समय आप एक नजरानी चादर पहने हुए थे जिसके किनारे मोटे थे। रास्ते में एक आराबी (बद्दू) आपको मिला और आपकी चादर पकड़ कर ज़ोर से खींची। मैंने नज़र उठाई तो देखा कि आपकी गर्दन पर उसके खींचने से निशान पड़ गए हैं। फिर उस आराबी ने कहा, ‘ऐ मुहम्मद (सल्ल०)! अल्लाह का जो माल आपके पास है वह मुझे देने का हुक्म दीजिए।’ आपने उसकी तरफ़ मुड़ कर देखा और हँसे फिर निर्देश दिया कि उसको दिया जाए।”

ज़ैद बिन सअना आपके पास आया और क़र्ज़ का तक़ाज़ा किया। फिर उसके बाद उसने आपके कन्धे से कपड़ा जोर से खींचा और अपनी मुट्ठी में कपड़ा ले लिया और कड़े अन्दाज़ में बात की। उसने कहा, ‘तुम अब्दुल मुत्तलिब की औलाद! बड़े टाल मटोल करने वाले हो।’ हज़रत उमर रज़ि० ने उसको झिड़का और कड़े अन्दाज़ में बात की। लेकिन आप सल्ल० का रवैया मुस्कराहट का रहा। आपने हज़रत उमर से फ़रमाया, “उमर! हम दूसरे रवैये के हक़दार थे। मुझे तुम क़र्ज़ जल्दी अदा करने को और इसको नर्म लहजे से तक़ाज़ा करने को कहते। “अभी इसका क़र्ज़ अदा करने की समय सीमा तीन दिन बाक़ी है।” आपने हज़रत उमर को उसका क़र्ज़ अदा करने का हुक्म दिया और बीस ‘साअ’ उसे ज़्यादा देने को फ़रमाया, कि यह उसका मुआवजा है जो हज़रत उमर ने उसको झिड़क दिया था। आपका यही सुलूक ज़ैद के मुसलमान होने की वजह बन गया।

हज़रत अनस बयान करते हैं, “एक बार मक्का से 80 हथियार बन्द आदमी ‘तनईम’ पहाड़ी से अचानक निकले और धोखा देकर आपको चोट पहुंचाना चाहा। आपने इन सबको क़ैदी बना लिया और उनको ज़िन्दा रहने दिया।”

हज़रत जाबिर बयान करते हैं, “हम आपके साथ लश्कर में नज्द की तरफ़ गए। रास्ते में दोपहर के समय आप एक बबूल के पेड़ के नीचे आराम करने लगे और अपनी तलवार पेड़ पर टांग दी। हम लोग भी इधर-उधर पेड़ों के नीचे लेट गए। अचानक आपने हमें आवाज़ दी। हम आए तो देखा कि एक आराबी आपके सामने बैठा हुआ है। आपने फ़रमाया, “मैं सो गया था कि वह व्यक्ति आया और मेरी तलवार खींच ली। मैं जागा तो वह तलवार खींचे हुए मेरे सर पर खड़ा था। इसने कहा, ‘तुम्हें मुझसे कौन बचा सकता है।’ मैंने कहा, “अल्लाह” इसने तलवार मियान में रख ली।5 इसके बाद बैठ गया और यह है वह व्यक्ति जो आपके सामने बैठा हुआ है।” आपने उसे कोई सज़ा नहीं दी।

आपकी रहमदिली व नरमी आपके सभी साथियों की नरमी के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा थी। हालांकि वह बड़े सब्र वाले थे। आप सबके लिए एक शफ़ीक़ उस्ताद, एक दयालु सुधारक की तरह थे। हज़रत अबू हुरैरा रज़ि० बयान करते हैं, “एक बार एक आराबी ने मस्जिद में पेशाब कर दिया। लोग यह देखकर उस पर दौड़ पड़े। आपने फ़रमाया, “इसको छोड़ दो” और जहां उसने पेशाब किया है उस पर एक डोल पानी या कुछ पानी के डोल बहा दो, और ख़याल रखो कि तुम आसानी पैदा करने वाले बनकर भेजे गए हो, तंगी व परेशानी पैदा करने वाले बनकर नहीं।”

मुआविया बिन अल हकम बयान करते हैं, “मैं अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ नमाज़ पढ़ता था कि एक व्यक्ति को छींक आई। मैंने कहा, ‘यरहमुकल्लाह’। लोग यह सुनकर मुझे घूरने लगे। मैंने कहा, ‘तुम्हारी माँ तुम पर रोए, आख़िर क्या हुआ है कि तुम लोग मुझे इस तरह कड़ी निगाहों से घूर रहे हो।’ यह सुनकर लोग अपनी रानों पर हाथ मारने लगे। जब मैंने महसूस किया कि वह मुझे ख़ामोश करना चाहते हैं तो मैं चुप हो गया। जब अल्लाह के रसूल सल्ल० नमाज़ पढ़ चुके तो, मेरे माँ-बाप आप सल्ल० पर क़ुर्बान, मैंने न आपसे पहले आप की तरह कोई शिक्षक देखा और न आप के बाद। अल्लाह की क़सम न आपने मुझे डांटा, न मारा न बुरा भला कहा। बस यह फ़रमाया, कि नमाज़ में आम इन्सानी बात-चीत उचित नहीं होती। नमाज़ सिर्फ़ तस्बीह, तकबीर और क़ुरआन की तिलावत के लिए है।

अनस बिन मालिक बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० बहुत रहमदिल थे। आपके पास कोई ज़रूरत मन्द आता तो आप उससे वादा ज़रूर करते और अगर कुछ होता तो उसी समय उसकी ज़रूरत पूरी करते। एक बार नमाज़ खड़ी हो चुकी थी कि एक आराबी आगे बढ़ा और आपका कपड़ा पकड़ कर कहने लगा कि मेरी एक छोटी सी ज़रूरत बाक़ी रह गई है, मुझे डर है कि कहीं भूल न जाऊं। आप उसके साथ गए जब उसने अपनी ज़रूरत पूरी कर ली तो आप वापस आए और नमाज़ अदा की।”

आपके सेवक हज़रत अनस कहते हैं, “मैंने अल्लाह के रसूल सल्ल० की 10 वर्ष सेवा की, आपने कभी ‘हूँह’ भी नहीं कहा और न यह कहा कि फ़लां काम तुमने क्यों न किया।”

सुआद इब्न उमर कहते हैं, “मैं अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास गया। मेरे कपड़े पर ज़ाफ़रान से मली हुई ख़ुशबू का निशान था। आपने देखा तो फ़रमाया, ‘ज़ाफ़रान! ज़ाफ़रान! फेंको! फेंको।’ और मेरे पेट में एक छड़ी मारी जिससे मुझको तकलीफ़ हुई। मैंने कहा, “या रसूलल्लाह मेरा क़िसास (बदला) का हक़ हो गया है,6 तो आपने अपने पेट से कपड़ा हटा दिया और कहा क़िसास ले लो।”

आप सल्ल० की नरमी

आप बहुत ही विनम्र थे और किसी चीज़ में मुमताज़ व ख़ास होनापसन्द नहीं फ़रमाते थे। आप इसको अच्छा नहीं समझते थे कि लोग आपके लिए खड़े हों और आपकी बढ़ा-चढ़ा कर तारीफ़ करें जैसे पिछली उम्मतों ने अपने नबियों के साथ किया था। हज़रत अनस बयान करते हैं, ‘हमको अल्लाह के रसूल सल्ल० से ज़्यादा कोई आदमी प्यारा न था, लेकिन हम आपको देखते और इस ख़याल से खड़े नहीं होते थे कि आप इसको पसंद नहीं फ़रमाते।’

आप सल्ल० से कहा गया, ‘या ख़ैरुल बरिय्यह’ (ऐ प्राणियों में सबसे अफ़ज़ल) आपने फ़रमाया, “यह इब्राहीम अलैहिस्सलाम का मक़ाम है।” हज़रत उमर कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया, “मेरी इस तरह आगे बढ़कर तारीफ़ न करो जिस तरह नसारा (ईसाई) ने ईसा इब्न मरियम (अ०) के साथ किया था। मैं तो सिर्फ़ एक बन्दा हूं। तुम मुझे अल्लाह का बन्दा और उसका रसूल कहो।”

अब्दुल्लाह बिन अबी औफ़ा बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० को इसमें कोई तकलीफ़ और संकोच न होता था कि आप किसी ग़ुलाम या किसी विधवा के साथ उसके काम से चलें।”

हज़रत अनस कहते हैं, “मदीना की लौंडियों और बांदियों में से कोई आपका हाथ पकड़ लेती और कुछ कहना होता कहती और जितनी दूर चाहती ले जाती।”

अदी बिन हातिम ताई जब आपकी सेवा में हाज़िर हुए तो आपने उनको घर के अन्दर बुलाया। बांदी ने तकिया टेक लगाने के लिए पेश किया। आपने उसको अपने और अदी के बीच रख दिया और ख़ुद ज़मीन पर बैठ गए। अदी कहते हैं, “इससे मैं समझ गया कि वह बादशाह नहीं हैं।”

हज़रत अनस रज़ि० बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० बीमार की ख़ैरियत मालूम करने जाते थे, जनाज़े में शामिल होते थे, गधे पर भी सवारी फ़रमाते थे और ग़ुलाम की दावत क़बूल फ़रमाते थे।”

जाबिर बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० कमजोर के ख़याल से अपनी रफ़्तार सुस्त कर देते थे और उसके लिए दुआ करते थे।”

हज़रत अनस बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० जौ की रोटी और ऐसे सालन पर जिसका मज़ा बदल चुका हो, आमंत्रित होते तो भी आप क़बूल फ़रमाते।” वही आगे बयान करते हैं, “आपने फ़रमाया, ‘मैं बन्दा हूँ। बन्दे की तरह खाता हूँ और बन्दे की तरह बैठता हूँ।’”

अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस कहते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० मेरे यहां आए, मैंने चमड़े का तकिया जिसमें छाल भरी थी आपको पेश किया। आप ज़मीन पर बैठ गए और तकिया मेरे और अपने बीच रख दिया।”

आप स्वयं घर की सफ़ाई कर लेते, ऊंट को बांध लेते और अपने जानवर को चारा भी देते। अपने सेवक के साथ खाना खाते और आटा गूंधने में उसका हाथ बटाते, और बाज़ार से सौदा भी ले जाते।

बहादुर लेकिन सुशील

अल्लाह के रसूल सल्ल० की सीरत (चरित्र) में बहादुरी व शर्म व हया (जिसको बहुत से लोग विरोधी गुण समझते हैं) समान रूप से मौजूद थी। आपकी हया का उल्लेख करते हुए अबू सईद ख़ुदरी बयान करते हैं, “आप पर्दा में रहने वाली कुंवारी लड़की से ज़्यादा हयादार थे। जब आपको कोई चीज़ नापसन्द होती तो उसका असर आपके चेहरे पर दिखाई देने लगता था। शर्म व हया की वजह से किसी के सामने ऐसी बात न कह सकते थे जो उसको नापसन्द हो, अतः यह काम किसी के माध्यम से करते थे। हज़रत अनस रज़ि० बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० की मजलिस में एक व्यक्ति था जिसके कपड़ों पर पीला रंग लगा हुआ था। चूंकि आप किसी के सामने ऐसी बात कहनापसन्द न करते थे जो उसको नापसन्द हो। इस लिए जब वह चलने के लिए खड़ा हो गया तो आपने लोगों से कहा, “अच्छा होता अगर तुम उससे कहते कि वह पीले रंग का इस्तेमाल छोड़ दे।”

हज़रत आइशा बयान करती हैं, “जब आपको किसी के बारे में किसी बुराई की सूचना मिलती तो आप उसका नाम लेकर यह न कहते कि उसने ऐसा क्यों किया। आप यूं कहते कि लोगों को क्या हो गया है कि वह ऐसा कहते हैं या ऐसा करते हैं। आप उसका विरोध तो करते मगर नाम ज़ाहिर न करते।”

आपकी बहादुरी का उल्लेख करते हुए हज़रत अली रज़ि० बयान करते हैं, “जब घमासान जंग होती थी और मालूम होता था कि आँखें हलकों से बाहर आ जाएंगी तो उस समय हम अल्लाह के रसूल सल्ल० को, उनकी पनाह लेने के लिए ढूंढते और यह देखते थे कि मुक़ाबले में दुश्मन के सामने आपसे अधिक कोई क़रीब नहीं है। बद्र की जंग में हमारा यही हाल था। हम आपकी पनाह ले रहे थे और आप दुश्मन से सबसे ज़्यादा (मुक़ाबले में सामने) क़रीब थे।”

हज़रत अनस रज़ि० बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० सबसे ज़्यादा हसीन व जमील, ख़ूबसूरत, सबसे अधिक उदार और सबसे ज़्यादा बहादुर थे। एक रात मदीनावासी डर गए और जिधर से आवाज़ आई थी उधर लोग निकल पड़े। रास्ते में आप आते हुए मिले। डरावनी आवाज़ सुन कर उसकी वजह पता करने के लिए आप सल्ल० उन सबके आगे हो लिए थे। आप कहते जाते थे, “डरो नहीं, डरो नहीं।” आप उस वक़्त अबू तलहा के घोड़े पर सवार जिस पर ज़ीन भी नहीं थी। तलवार आपके कन्धे पर लटक रही थी। आप सल्ल० ने घोड़े की तारीफ़ करते हुए फ़रमाया, “मैंने इसको समुन्द्र की तरह तेज़ रफ़्तार पाया।”

उहद और हुनैन की जंग में जब बड़े-बड़े बहादुर और शूरवीर तितर-बितर हो गए थे और मैदान से हट गए थे उस समय भी आप अपने खच्चर पर उसी इत्मीनान से साबित क़दमी (पुख्ता इरादे) के साथ अपनी जगह पर डटे हुए थे और ऐसा मालूम होता था कि कोई बात ही नहीं हुई। आप एक शेर बार-बार पढ़ते थे जिसका अर्थ है।

“मैं नबी हूँ, यह कोई झूठ बात नहीं है, मैं अब्दुल मुत्तलिब का बेटा हूँ।”

रहम, प्यार और परोपकार

इस बहादुरी के साथ आप बहुत ही नर्म दिल थे। आपकी आँखों में बहुत जल्दी आंसू आ जाते थे। कमज़ोर लोगों और बेज़ुबान जानवरों तक के साथ नर्मी का हुक्म फ़रमाते थे। शद्दाद बिन औस कहते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया कि अल्लाह ने हर चीज़ के साथ अच्छा और नर्म बर्ताव करने का हुक्म दिया है। इसलिए अगर क़त्ल भी करो तो अच्छी तरह करो, तुम में से जो ज़िबह करना चाहे वह अपनी छुरी पहले तेज़ करे और अपने ज़िबीहा (ज़िबह किया जाने वाला जानवर) को आराम दे।”

इब्न अब्बास बयान करते हैं, “एक व्यक्ति ने एक बकरी ज़िबह करने के लिए ज़मीन पर लिटाई। इसके बाद छुरी लिए ज़मीन में तेज़ करना शुरू किया। आपने यह देखकर फ़रमाया, “क्या तुम उसको दो बार मारना चाहते हो? इसको लिटाने से पहले तुमने छुरी तेज़ क्यों न कर ली।”

आपने सहाबा को जानवरों को चारा पानी देने के निर्देश दिए और उनको सताने तथा उन पर उनकी ताक़त से ज़्यादा बोझ लादने को मना किया, और जानवरों की तकलीफ़ दूर करने व उन्हें आराम पहुंचाने को सवाब का काम और अल्लाह के क़रीब होने का रास्ता बताया। हज़रत अबू हुरैरा बयान करते हैं, “एक व्यक्ति कहीं सफ़र पर था, रास्ते में उसको प्यास लगी। सामने एक कुँआ नज़र आया। वह उसमें उतर गया। जब बाहर आया तो देखा कि एक कुत्ता प्यास के मारे कीचड़ चाट रहा है। उसने अपने दिल में कहा कि प्यास से जो मेरा हाल हो रहा था, यही हाल इसका भी है। वह फिर कुँए में उतरा। अपने चमड़े के मोजे पानी से भरे। फिर अपने दांतों से उसे दबाया और ऊपर आकर कुत्ते को पिलाया। अल्लाह ने उसके इस काम को पसन्द किया और उसकी मग़फ़िरत (मोक्ष) फ़रमा दी। लोगों ने पूछा, “या रसूलल्लाह! पशुओं और जानवरों के मामले में भी सवाब है?” आपने फ़रमाया, “हर उस जानदार पर जो तरो ताज़ा जिगर रखता है, सवाब है।”

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० कहते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने बयान फ़रमाया, कि एक औरत को सिर्फ़ इस बात पर अज़ाब दिया गया कि उसने अपनी बिल्ली को खाना पानी नहीं दिया और न उसको छोड़ा कि वह कीड़े मकोड़ों से ही अपना पेट भर ले।”

सुहैल बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० का गुज़र एक ऐसे ऊंट पर हुआ जिसकी पीठ दुबले पन की वजह से उसके पेट से लग गई थी। आपने उसे देखकर फ़रमाया, इन बेज़ुबान जानवरों के मामले में अल्लाह से डरो। ज़िबह करके इनका गोश्त खाओ तो इस हालत में कि यह अच्छी हालत में हों।”

अब्दुल्लाह बिन जाफ़र बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० एक अन्सारी के हाते में दाखिल हुए। उसमें एक ऊँट था। जब उसने आपको देखा तो बिलबिलाने लगा और उसकी आँखों से आंसू बहने लगे। आप उसके पास गए और उसके कोहान तथा कनपतियों पर अपना हाथ फेरा। इससे उसको सुकून हो गया। फिर आपने पूछा कि इस ऊँट का मालिक कौन है? एक नौजवान अन्सारी आया और उसने कहा, ‘या रसूलल्लाह! यह मेरा है। आपने फ़रमाया, “क्या तुम इस जानवर के मामले में जिसका मालिक अल्लाह ने तुमको बनाया है, अल्लाह से नहीं डरते। वह मुझसे शिकायत कर रहा था कि तुम उसको तकलीफ़ देते हो, और हर वक़्त काम में लगाए रखते हो।”

हज़रत अबू हुरैरा बयान करते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया कि अगर तुम किसी हरी भरी जगह जाओ तो ऊंटों को ज़मीन पर उनके हक़ में वंचित न करो और अगर सूखे हिस्से में जाओ तो वहां तेज़ चलो रात को पड़ाव डालना हो तो रास्ते पर न डालो इसलिए कि वहां जानवरों का आना जाना रहता है और कीड़े मकोड़े वहां पनाह लेते हैं।”

इब्ने मसऊद बयान करते हैं, “हम लोग अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ एक सफ़र में थे। आप एक ज़रूरत से थोड़ी देर के लिए गए। इस बीच हमने एक छोटी चिड़िया देखी उसके साथ दो बच्चे थे। हमने दोनों बच्चे ले लिए। चिड़िया यह देखकर अपने परों को फड़फड़ाने लगी। आप आए और पूछा कि किसने इसके बच्चे छीनकर इसको तकलीफ़ पहुंचाई है फिर आपने हुक्म दिया कि इसके बच्चे वापस करो। यहां हमने चींटियों का एक ठिकाना देखा और उसको जला दिया। आपने फ़रमाया इसको किसने जलाया है हमने निवेदन किया कि हम लोगों ने। आपने फ़रमाया, “आग से अज़ाब देने का हक़ सिर्फ़ आग के रब (अल्लाह) को है।”

ख़ादिम (सेवक) नौकर और मज़दूर के साथ, जो और इन्सानों की तरह इन्सान हैं और जिनका अपने मालिक और आका पर अहसान है से आप सल्ल० ने अच्छा बर्ताव करने की शिक्षा दी है। जाबिर बिन अब्दुल्लाह कहते हैं, “अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया कि जो तुम खाते हो वही उनको खिलाओ, जो तुम पहनते हो वही उनको पहनाओ और अल्लाह की मख़लूक को अज़ाब (तकलीफ़) न दो। जिनको अल्लाह ने तुम्हारे अधीन किया है वह तुम्हारे भाई, तुम्हारे ख़ादिम और मददगार हैं। जिसका भाई उसके अधीन हो उसको चाहिए कि जो ख़ुद खाता है वही उसको खिलाए जो ख़ुद पहनता है वही उसको पहनाए। उनके सुपुर्द ऐसा काम न करो जो उनकी ताक़त से बाहर हो। अगर ऐसा करना पड़े ही तो फिर उनका हाथ बटाओ।”

अब्दुल्लाह बिन उमर कहते हैं, एक आराबी अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास आया और पूछा कि मैं अपने नौकर को एक दिन में कितनी बार माफ़ करूं? आपने फ़रमाया, “70 बार।” वही बयान करते हैं कि आपने फ़रमाया, “मज़दूर को उसकी मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे दो।”

एक मुकम्मल, विश्वव्यापी और न ख़त्म होने वाला नमूना

इस अध्याय को उस्ताद मौलाना सैयद सुलेमान नदवी की मशहूर किताब “ख़ुतबात-ए-मदरास” के एक वाक्य पर ख़त्म कर रहा हूँ जिसमें उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० की ज़िंदगी की परिपूर्णता का बहुत असर ढंग से वर्णन किया है:

“एक ऐसी शख़सी ज़िंदगी जो हर वर्ग के लोगों और हर इंसानी मुद्रा की विभिन्न अभिव्यक्तियों तथा हर तरह की सही भावनाओं एवं परिपूर्ण आचरण का संकलन (मजमुआ) हो, सिर्फ़़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत है। अगर तुम दौलतमंद हो तो मक्का के व्यापारियों और बहरीन के ख़ज़ीनादार (Trustee) की पैरवी करो, अगर तुम ग़रीब हो तो शैब अबी तालिब के क़ैदी और मदीना के मेहमान का हाल सुनो, अगर तुम बादशाह हो तो अरब के सुल्तान का हाल पढ़ो, अगर तुम जनता हो तो कुरैश के महकूम को एक नज़र देखो, अगर तुमने विजय हासिल की हो तो बद्र व हुनैन के सेनापति पर निगाह दौड़ाओ, अगर तुमने हार खाई हो तो उहद की लड़ाई से सबक हासिल करो, अगर तुम अध्यापक हो तो सुफ़्फ़ा की पाठ शाला के गुरु को देखो, अगर शिष्य हो तो जिब्रील के सामने बैठने वाले पर नज़र जमाओ। अगर तुम उपदेशक हो तो मदीना की मस्जिद के मिम्बर पर खड़े होने वाले की बातें सुनो। अगर तुम अकेले और बेकस होकर भी सच्चाई का ढिंढोरा पीटना चाहते हो तो मक्का के बेयार व मददगार नबी की ज़िंदगी आपके सामने है। अगर तुम सच्चाई की विजय के बाद अपने दुश्मनों को नीचा दिखा चुके हो और अपने विरोधियों को कमज़ोर बना चुके हो तो मक्का के विजेता को देखो, अगर तुम अपने कारोबार तथा दुनियावी सम्पत्ति का बंदोबस्त ठीक करना चाहते हो तो बनी नज़ीर ख़ैबर और फ़दक की ज़मीनों के मालिक के कारोबार और बंदोबस्त को देखो अगर यतीम (अनाथ) हो तो अब्दुल्लाह और आमिना के लाडले को न भूलो, अगर बच्चे हो तो हलीमा सादिया के लाडले को देखो, अगर तुम जवां हो तो मक्का के एक चरवाहे की सीरत पढ़ो, अगर तुम सफ़र में कारोबार कर रहे हो तो बुसरा के क़ाफ़िले के सरदार के उदाहरण ढूँढो, अगर तुम अदालत के काज़ी (न्यायमूर्ति) हो और पंचायत के सरपंच हो तो काबा में पौ फटने से पहले दाख़िल होने वाले निर्णायक को देखो, जो ‘हज्र-ए-असवद’ को काबा के एक कोने में खड़ा कर रहा है। मदीने की कच्ची मस्जिद के आँगन में बैठने वाले मुंसिफ़ को देखो जिसकी निगाह में रंक व कुबेर, अमीर व ग़रीब सब बराबर थे, अगर तुम बीवियों के शौहर (पति) हो तो ख़दीजा और आइशा के पति की पाक जीवनी का अध्ययन करो, अगर तुम औलाद वाले हो तो फ़ातिमा के बाप और हसन व हुसैन के नाना का हाल पूछो, संक्षेप में तुम जो कुछ भी हो और जिस हाल में भी हो तुम्हारी ज़िन्दगी के लिए नमूना। तुम्हारे आचरण के सुधार के लिए सामान, तुम्हारे मार्गदर्शन के लिए हिदायत का चिराग हज़रत मुहम्मद सल्ल० की सीरत के ख़ज़ाने में हर वक़्त और हर पल मिल सकता है। जिसकी निगाह के सामने अल्लाह के रसूल सल्ल० की सीरत है उसके सामने नूह अ०, इब्राहीम अ०, अय्यूब अ०, यूनुस अ०, मूसा अ० और ईसा अ० सब की सीरतें (जीवनियां) मौजूद हैं। मानो दूसरे तमाम नबियों की सीरतें एक ही जिन्स (सामग्री) की चीज़ों की दुकानें हैं और अल्लाह के रसूल सल्ल० की सीरत, आचार व्यवहार दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार है जहां हर जिन्स के ख़रीदार और चीज़ के ज़रूरतमंद के लिए बेहतरीन सामान मौजूद है।

टिप्पणियां

  1. 1यहां अरबी का ‘अल-मुहीन’ शब्द आया है। ‘मुहीन’ का अर्थ है किसी का अपमान न करते थे, और ‘महीन’ का अर्थ है आप अपने लिए ज़िल्लत (अपमान) पसन्द न करते थे।
  2. 2अर्थात जल्द मेहरबान हो जाने वाले, बड़े करम वाले, बहुत आसानी से माफ़ करने वाले, किसी से झगड़ा न करने वाले, शान्तिप्रिय।
  3. 3शमाइल-ए-तिर्मिज़ी के हवाले से।
  4. 4अर्थात अल्लाह ने उसको जो नेमतें अता की हैं, उसके रहन-सहन से उसकी अभिव्यक्ति हो।
  5. 5यहां ‘शामा’ का शब्द आया है जिसके दो अर्थ आए हैं: 1. तलवार मियान में कर ली। 2. तलवार खींची और उसे देखा।
  6. 6सवाद ने यह मुहब्बत में कहा था, क़िसास लेने के लिए नहीं।